शहरों के लिए कौन सी EV बेहतर सौदा? Tata Tiago EV और MG Comet EV की कीमत, EMI और ऑन-रोड खर्च की पूरी तुलना

नई दिल्ली । भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है, जहां बढ़ती ईंधन कीमतों और शहरों में ट्रैफिक के दबाव के कारण लोग अब किफायती और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी बदलते बाजार में Tata Tiago EV और MG Comet EV दो ऐसी कारें हैं जो बजट सेगमेंट में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। दोनों ही मॉडल कीमत, फीचर्स और फाइनेंस विकल्पों के आधार पर ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन EMI और डाउन पेमेंट के लिहाज से किस कार को खरीदना ज्यादा समझदारी भरा सौदा साबित होगा, यह सवाल खरीदारों के बीच लगातार बना हुआ है। Tata Tiago EV की एक्स-शोरूम कीमत लगभग 6.99 लाख रुपये से शुरू होती है और RTO, इंश्योरेंस व अन्य चार्ज जोड़ने के बाद इसकी ऑन-रोड कीमत करीब 7.41 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। यदि ग्राहक 2 लाख रुपये का डाउन पेमेंट करता है और शेष राशि को 9 प्रतिशत ब्याज दर पर 4 साल के लिए फाइनेंस कराता है तो उसकी मासिक EMI लगभग 13,464 रुपये बनती है। वहीं 5 साल की अवधि चुनने पर यह EMI घटकर करीब 11,231 रुपये प्रति माह हो जाती है, जिससे मासिक बजट पर दबाव कुछ कम हो जाता है। दूसरी ओर MG Comet EV की एक्स-शोरूम कीमत लगभग 7.62 लाख रुपये है और ऑन-रोड कीमत करीब 8.07 लाख रुपये तक पहुंचती है। समान 2 लाख रुपये के डाउन पेमेंट और 9 प्रतिशत ब्याज दर पर 4 साल के लोन विकल्प में इसकी मासिक EMI लगभग 15,118 रुपये बनती है। अगर यही लोन 5 साल के लिए लिया जाए तो EMI घटकर करीब 12,611 रुपये प्रति माह के आसपास आ जाती है, लेकिन फिर भी यह Tiago EV की तुलना में अधिक रहती है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि EMI और कुल फाइनेंसिंग बोझ के मामले में Tata Tiago EV, MG Comet EV की तुलना में ज्यादा किफायती विकल्प साबित होती है। हालांकि, खरीद का निर्णय केवल EMI पर आधारित नहीं होना चाहिए क्योंकि दोनों गाड़ियों की उपयोगिता अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर तय की गई है। MG Comet EV एक कॉम्पैक्ट सिटी कार है, जो भीड़भाड़ वाले शहरी इलाकों और सीमित पार्किंग स्पेस के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसका छोटा आकार इसे आसान ड्राइविंग और पार्किंग का फायदा देता है, लेकिन इसमें जगह सीमित होने के कारण यह मुख्य रूप से छोटे परिवार या व्यक्तिगत उपयोग के लिए बेहतर विकल्प है। वहीं Tata Tiago EV एक हैचबैक कार के रूप में अधिक स्पेस, आराम और लंबी दूरी की यात्रा के लिए बेहतर संतुलन प्रदान करती है, जिससे यह फैमिली यूजर्स के बीच ज्यादा लोकप्रिय विकल्प बन जाती है।
होर्मुज संकट के बीच भारत का बड़ा आर्थिक कदम, पेट्रोल-डीजल निर्यात शुल्क में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार पर असर की उम्मीद

नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते दबाव और होर्मुज क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति के बीच भारत सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से जुड़े नियमों में अहम बदलाव करते हुए निर्यात शुल्क में संशोधन का निर्णय लिया है। इस कदम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों के उतार-चढ़ाव और घरेलू आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल, डीजल और विमानन टरबाइन ईंधन पर नई दरें 1 जून से प्रभावी होंगी, जिससे ऊर्जा व्यापार और निर्यात नीति पर सीधा असर पड़ेगा। इस निर्णय के बाद पेट्रोल पर निर्यात शुल्क घटकर 1.5 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है, जबकि डीजल पर यह 13.5 रुपये प्रति लीटर रहेगा। विमानन टरबाइन ईंधन पर 9.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लागू किया गया है। यह बदलाव विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के रूप में लागू होगा और इसके तहत रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को शामिल नहीं किया जाएगा, जिससे कर ढांचे में आंशिक सरलता देखने को मिलेगी। सरकार का कहना है कि निर्यात शुल्क की समीक्षा हर पखवाड़े की जाती है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति स्थिति का आकलन शामिल होता है। पिछले संशोधन के बाद अब नई दरों की घोषणा मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता को ध्यान में रखकर की गई है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर अनिश्चितता के चलते सरकार का फोकस इस बात पर है कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और किसी भी प्रकार का घरेलू संकट उत्पन्न न हो। इसी उद्देश्य से निर्यात नीति में समय-समय पर संशोधन किया जाता है ताकि घरेलू जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संतुलन बना रहे। इससे पहले भी इसी वर्ष मार्च में निर्यात शुल्क प्रणाली को लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य निर्यात प्रवाह को नियंत्रित करना और घरेलू खपत के लिए पर्याप्त भंडार सुनिश्चित करना था। मई में हुए पिछले संशोधन के बाद अब एक बार फिर नई दरों की घोषणा की गई है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नीतिगत निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को मजबूत करते हैं और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के बीच घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। आने वाले समय में तेल कीमतों और अंतरराष्ट्रीय हालात के आधार पर इस नीति में और बदलाव संभव हैं, क्योंकि सरकार हर पखवाड़े समीक्षा प्रक्रिया के जरिए स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखती है।
क्रेडिट कार्ड लंबे समय तक इस्तेमाल न करने पर हो सकता है बंद, बैंक नियमों को लेकर जानें अहम अपडेट

नई दिल्ली । आज के समय में क्रेडिट कार्ड वित्तीय लेन-देन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका सही तरीके से उपयोग न करना ग्राहकों के लिए नुकसान का कारण बन सकता है। कई लोग सुविधा के तौर पर क्रेडिट कार्ड लेते हैं, लेकिन लंबे समय तक उसका उपयोग नहीं करते। ऐसी स्थिति में बैंक और वित्तीय संस्थान इसे निष्क्रिय मानकर बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। हाल ही में सामने आई जानकारी के अनुसार यदि किसी क्रेडिट कार्ड का उपयोग लगातार कई महीनों तक नहीं किया जाता है तो उसे “डेड कार्ड” की श्रेणी में रखा जा सकता है और बैंक उसे बंद भी कर सकते हैं। बैंकिंग नियमों के अनुसार आमतौर पर तीन से बारह महीने तक यदि किसी कार्ड पर कोई लेन-देन नहीं होता है तो उसे निष्क्रिय माना जाता है। इस दौरान यदि कार्ड से कोई खरीदारी, भुगतान, स्टेटमेंट जनरेशन या अन्य गतिविधि नहीं होती है तो बैंक उसे बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। कई मामलों में ग्राहक को सूचना दिए बिना भी कार्ड को निष्क्रिय किया जा सकता है, हालांकि अधिकांश बैंक पहले नोटिस जारी करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार क्रेडिट कार्ड को सक्रिय बनाए रखना आवश्यक है क्योंकि यह सीधे व्यक्ति के क्रेडिट इतिहास और क्रेडिट स्कोर से जुड़ा होता है। यदि कार्ड लंबे समय तक उपयोग में नहीं रहता है तो इसका असर क्रेडिट प्रोफाइल पर पड़ सकता है। इससे भविष्य में लोन या अन्य वित्तीय सेवाएं लेने में कठिनाई आ सकती है। क्रेडिट स्कोर को मजबूत बनाए रखने के लिए समय-समय पर कार्ड का उपयोग करना और उसका भुगतान समय पर करना जरूरी माना जाता है। वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई ग्राहक बारह महीने तक अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग नहीं करता है तो बैंक उसे निष्क्रिय मान सकता है। इसके अलावा कुछ बैंक छोटी गतिविधियों जैसे पिन परिवर्तन या स्टेटमेंट चेक करने को भी सक्रियता में शामिल करते हैं, लेकिन मुख्य रूप से लेन-देन ही आधार माना जाता है। ऐसे में ग्राहकों को सलाह दी जाती है कि वे समय-समय पर छोटे लेन-देन कर अपने कार्ड को सक्रिय रखें। क्रेडिट कार्ड बंद होने का एक और बड़ा प्रभाव यह होता है कि इससे व्यक्ति की कुल उपलब्ध क्रेडिट लिमिट भी कम हो जाती है। इसका सीधा असर क्रेडिट यूटिलाइजेशन रेशियो पर पड़ता है, जो क्रेडिट स्कोर निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि यह अनुपात बिगड़ता है तो स्कोर में गिरावट आ सकती है। इसके अलावा बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और जोखिम प्रबंधन के लिए भी निष्क्रिय खातों और कार्डों की निगरानी की जाती है। बैंक यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके सिस्टम में केवल सक्रिय और उपयोग में आने वाले खाते ही बने रहें, जिससे धोखाधड़ी और अनावश्यक जोखिम को कम किया जा सके। अंततः यह स्पष्ट है कि क्रेडिट कार्ड केवल एक सुविधा नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। इसका समझदारी से उपयोग न केवल वित्तीय सुविधा देता है बल्कि आपके क्रेडिट इतिहास को भी मजबूत बनाता है। लंबे समय तक इसे निष्क्रिय छोड़ना भविष्य में वित्तीय समस्याओं का कारण बन सकता है, इसलिए समय-समय पर इसका उपयोग आवश्यक माना जाता है।
वीकेंड पर कीमती धातुओं में नहीं दिखा बदलाव, सोमवार से फिर तय होगी बाजार की दिशा

नई दिल्ली । देश के सर्राफा बाजार में रविवार को सोने और चांदी की कीमतों में किसी प्रकार का बदलाव दर्ज नहीं किया गया। वीकेंड के चलते घरेलू बाजार और मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज दोनों ही बंद रहे, जिसके कारण कीमतें पिछले कारोबारी सत्र के स्तर पर स्थिर बनी रहीं। हालांकि, चेन्नई जैसे कुछ प्रमुख शहरों में सोने की कीमतें पहले से ही ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, जहां 24 कैरेट सोना 1,59,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के पार पहुंच चुका है। अन्य महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु में भी कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई के आसपास बनी हुई हैं, लेकिन उनमें हल्का अंतर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक बाजारों में जारी अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव के चलते सोने की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। निवेशकों द्वारा सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में सोने को प्राथमिकता दिए जाने के कारण इसकी कीमतों में दीर्घकालिक मजबूती देखी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की नीतिगत अनिश्चितताओं का भी असर सोने की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। चांदी की कीमतों में भी इस समय स्थिरता बनी हुई है। देश के प्रमुख बाजारों में चांदी का औसत भाव लगभग 2,75,000 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बना हुआ है, जबकि कुछ औद्योगिक केंद्रों में यह 2,80,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक दर्ज किया जा रहा है। औद्योगिक मांग और वैश्विक बाजार संकेतों के आधार पर चांदी की कीमतों में समय-समय पर उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, लेकिन फिलहाल बाजार में कोई बड़ा बदलाव नहीं है। जानकारों का मानना है कि वीकेंड पर कारोबार बंद रहने के कारण कीमतों में स्थिरता स्वाभाविक है। असली दिशा अब सोमवार को बाजार खुलने के बाद ही स्पष्ट होगी, जब अंतरराष्ट्रीय संकेतों के साथ घरेलू मांग और निवेश प्रवाह का प्रभाव सामने आएगा। खासकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था से आने वाले रोजगार और विकास संबंधी आंकड़े तथा वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियां कीमती धातुओं की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। निवेश विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा समय में सोने में दीर्घकालिक निवेश को लेकर सकारात्मक रुख बना हुआ है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सोना एक सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में मजबूत स्थिति में है। हालांकि अल्पकालिक निवेशकों के लिए बाजार में उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है, जिससे उन्हें सावधानी के साथ निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है। बाजार विश्लेषकों का यह भी कहना है कि आने वाले दिनों में यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव या आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, तो सोने और चांदी दोनों की कीमतों में और तेजी देखी जा सकती है। वहीं यदि वैश्विक परिस्थितियों में स्थिरता आती है, तो कीमतों में हल्का दबाव भी संभव है। ऐसे में निवेशकों की नजर अब अगले कारोबारी सप्ताह पर टिकी हुई है, जो कीमती धातुओं की दिशा के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
1 जून से पेट्रोल, डीजल और एटीएफ के निर्यात शुल्क में राहत, घरेलू ईंधन कीमतों पर नहीं पड़ेगा कोई असर

नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू निर्यात शुल्क की दरों में एक बार फिर संशोधन करते हुए 1 जून से नए शुल्क ढांचे को लागू करने का निर्णय लिया है। सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में बदलाव किया गया है, जबकि घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर लागू उत्पाद शुल्क की दरों को यथावत रखा गया है। इस फैसले का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप कर ढांचे को संतुलित बनाए रखना और देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना माना जा रहा है। नई व्यवस्था के तहत पेट्रोल के निर्यात पर 1.5 रुपये प्रति लीटर, डीजल के निर्यात पर 13.5 रुपये प्रति लीटर और एटीएफ के निर्यात पर 9.5 रुपये प्रति लीटर शुल्क निर्धारित किया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन दरों का निर्धारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल तथा पेट्रोलियम उत्पादों की औसत कीमतों को ध्यान में रखकर किया गया है। समय-समय पर की जाने वाली समीक्षा के आधार पर इन शुल्कों में आवश्यक बदलाव किए जाते हैं ताकि वैश्विक मूल्य परिवर्तनों का संतुलित प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़े। पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्यात शुल्क की व्यवस्था मार्च 2026 में लागू की गई थी। उस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता के कारण सरकार ने देश के भीतर ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू आपूर्ति प्रभावित न हो और आवश्यक ऊर्जा संसाधनों का संतुलित प्रबंधन किया जा सके। पिछले कुछ महीनों के दौरान सरकार ने बाजार परिस्थितियों के अनुसार कई बार शुल्क दरों में संशोधन किया है। मई के मध्य में हुए बदलाव के दौरान पेट्रोल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाया गया था, जबकि डीजल पर शुल्क में कटौती की गई थी। अब नई समीक्षा के बाद पेट्रोल और डीजल दोनों पर शुल्क को और कम किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की स्थिति और आपूर्ति संबंधी चिंताओं में कुछ हद तक सुधार देखा गया है। डीजल पर लागू निर्यात शुल्क में पिछले दो महीनों के दौरान कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। मार्च के अंत में निर्धारित दर को अप्रैल में काफी बढ़ाया गया था, लेकिन बाद में बाजार की परिस्थितियों में बदलाव आने पर इसे चरणबद्ध तरीके से कम किया गया। इसी तरह एटीएफ पर लागू शुल्क भी पहले बढ़ाया गया था, जिसके बाद लगातार समीक्षा के दौरान उसमें कटौती की गई है। नवीनतम संशोधन के बाद एटीएफ पर शुल्क पहले की तुलना में काफी कम स्तर पर पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात शुल्क में यह संशोधन वैश्विक ऊर्जा बाजार की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया है। हालांकि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि पेट्रोल और डीजल पर लागू कर संरचना में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे आम उपभोक्ताओं के लिए ईंधन की खुदरा कीमतों पर तत्काल कोई प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। सरकार की यह नीति ऊर्जा सुरक्षा, घरेलू आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में वैश्विक तेल कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर शुल्क संरचना की आगे भी समीक्षा की जा सकती है।
वैश्विक और घरेलू आर्थिक घटनाक्रमों के बीच निवेशकों की बढ़ी सतर्कता, बाजार के लिए निर्णायक रहेगा आने वाला सप्ताह

नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए आने वाला सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि घरेलू और वैश्विक स्तर पर जारी होने वाले कई अहम आर्थिक संकेतक निवेशकों की धारणा और बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। पिछले सप्ताह बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला था और अब निवेशकों की निगाहें उन घटनाक्रमों पर टिकी हैं जो आने वाले दिनों में निवेश रणनीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। बीते सप्ताह बाजार ने सकारात्मक शुरुआत की थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और पश्चिम एशिया से जुड़ी कुछ सकारात्मक उम्मीदों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया था। हालांकि सप्ताह आगे बढ़ने के साथ वैश्विक अनिश्चितताओं ने दोबारा बाजार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक जोखिमों को लेकर बढ़ी चिंता के कारण बाजार में मुनाफावसूली देखने को मिली। सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में बिकवाली का दबाव और बढ़ गया, जिससे प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए। अब निवेशकों का पूरा ध्यान अगले सप्ताह जारी होने वाले आर्थिक आंकड़ों और नीतिगत फैसलों पर केंद्रित है। सप्ताह की शुरुआत विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़ों के साथ होगी। मई महीने के मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई के आंकड़े देश की औद्योगिक गतिविधियों, मांग की स्थिति और कारोबारी माहौल की दिशा का शुरुआती संकेत देंगे। इसके साथ ही विभिन्न ऑटोमोबाइल कंपनियों की मासिक बिक्री रिपोर्ट भी बाजार के लिए अहम रहेगी, क्योंकि इससे उपभोक्ता मांग और आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाया जाता है। घरेलू स्तर पर औद्योगिक उत्पादन से जुड़े आंकड़ों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। ये आंकड़े विनिर्माण, खनन और बिजली क्षेत्र के प्रदर्शन की तस्वीर पेश करेंगे। मजबूत उत्पादन आंकड़े आर्थिक गतिविधियों में तेजी का संकेत दे सकते हैं, जबकि कमजोर प्रदर्शन बाजार में सतर्कता बढ़ा सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका से आने वाले आर्थिक आंकड़े भी वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिकी सेवा क्षेत्र और रोजगार से जुड़े प्रमुख संकेतकों को लेकर निवेशकों में विशेष रुचि बनी हुई है। इन आंकड़ों के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन किया जाएगा और यह भी तय होगा कि भविष्य में ब्याज दरों को लेकर वहां की केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ सकती है। इसका असर वैश्विक पूंजी प्रवाह, उभरते बाजारों में निवेश और विदेशी निवेशकों की रणनीतियों पर दिखाई दे सकता है। भारतीय शेयर बाजार के लिए सबसे बड़ा केंद्र बिंदु भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक होगी। तीन दिनों तक चलने वाली इस बैठक के बाद ब्याज दरों, महंगाई, आर्थिक विकास और वित्तीय प्रणाली की स्थिति को लेकर केंद्रीय बैंक का दृष्टिकोण सामने आएगा। बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के शेयरों पर इस निर्णय का सीधा प्रभाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा केंद्रीय बैंक द्वारा मानसून, खाद्य महंगाई और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर किए गए आकलन पर भी निवेशकों की विशेष नजर रहेगी। सप्ताह के अंत में देश की आर्थिक वृद्धि से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जारी किए जाएंगे। प्रारंभिक जीडीपी वृद्धि दर और मार्च तिमाही के प्रदर्शन से भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। यदि वृद्धि दर अनुमान से बेहतर रहती है तो इससे निवेशकों का भरोसा मजबूत हो सकता है। वहीं कमजोर आंकड़े बाजार में दबाव बढ़ा सकते हैं। इसी दिन अमेरिका के रोजगार आंकड़े और बेरोजगारी दर भी जारी होगी। ये आंकड़े वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं और इनके आधार पर अंतरराष्ट्रीय निवेश धारणा प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया से जुड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक बने रहेंगे। ऐसे में आने वाला सप्ताह निवेशकों के लिए सतर्कता, विश्लेषण और रणनीतिक निवेश निर्णयों का सप्ताह साबित हो सकता है।
इंडिगो को ₹2,536 करोड़ का तिमाही घाटा: महंगे ईंधन और रुपये की कमजोरी से बढ़ा दबाव, किराया बढ़ने के संकेत

नई दिल्ली । देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के वित्तीय नतीजों ने एविएशन सेक्टर में दबाव की तस्वीर को एक बार फिर सामने ला दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कंपनी को 2,536 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में कंपनी ने 3,068 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था। एक साल के भीतर मुनाफे से घाटे में पहुंचना इस बात का संकेत है कि एयरलाइन उद्योग इस समय बढ़ती लागत, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और परिचालन चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। इंटरग्लोब एविएशन के तहत संचालित इंडिगो का कुल कारोबार हालांकि इस अवधि में थोड़ा बढ़ा है, लेकिन मुनाफे पर भारी दबाव देखने को मिला है। कंपनी का परिचालन राजस्व 22,438 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि दर्शाता है। इसके बावजूद खर्चों में तेज बढ़ोतरी ने लाभ को घाटे में बदल दिया। कंपनी के अनुसार इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की बढ़ती कीमतें और भारतीय रुपये की कमजोरी रही है। डॉलर में होने वाले लीज, मेंटेनेंस और अन्य भुगतान के कारण मुद्रा विनिमय दर में बदलाव का सीधा असर लागत पर पड़ता है। इसके अलावा इस तिमाही में कंपनी पर लगभग 250 करोड़ रुपये का एकमुश्त खर्च भी आया, जिसने वित्तीय परिणामों को और प्रभावित किया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और मध्य पूर्व में तनाव के कारण जेट फ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, जिसका असर वैश्विक विमानन उद्योग पर साफ दिखाई दे रहा है। इंडिगो ने संकेत दिए हैं कि यदि लागत में यह बढ़ोतरी जारी रहती है तो आने वाले समय में हवाई किरायों में वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कंपनी अब फ्यूल हेजिंग जैसी रणनीतियों पर भी विचार कर रही है, ताकि भविष्य में ईंधन की कीमतों में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव से बचा जा सके। यह रणनीति दुनिया की कई बड़ी एयरलाइंस पहले से अपनाती रही हैं। इसके साथ ही इंडिगो ने लगभग 450 मिलियन डॉलर के प्रीपेमेंट को भी मंजूरी दी है, जिसका उपयोग विमान और इंजन जैसे एविएशन एसेट्स की खरीद में किया जाएगा। यह कदम कंपनी को लंबी अवधि में लीज निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ा सकता है। प्रबंधन का कहना है कि वित्तीय दबाव के बावजूद कंपनी की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है। कंपनी की क्षमता में वृद्धि हुई है और कुल आय में भी सुधार दर्ज किया गया है। हालांकि यात्रियों की संख्या में हल्की गिरावट देखने को मिली है, जो इस तिमाही में 1.1 प्रतिशत घटकर 31.6 मिलियन रह गई। प्रति किलोमीटर आय और सीट भराव दर में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि उद्योग मानकों के अनुसार यह स्थिति अब भी स्थिर मानी जा रही है। शेयर बाजार में भी नतीजों का असर देखने को मिला और कंपनी के शेयर में दबाव रहा। हालांकि इंडिगो का बाजार पूंजीकरण अब भी मजबूत स्तर पर बना हुआ है, जो इसकी बाजार स्थिति को दर्शाता है। कुल मिलाकर यह तिमाही एयरलाइन उद्योग के लिए चुनौतीपूर्ण रही है, जहां बढ़ती लागत ने मजबूत मांग के बावजूद मुनाफे को प्रभावित किया है। आने वाले महीनों में किराया निर्धारण और ईंधन कीमतों की दिशा कंपनी के प्रदर्शन के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।
भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक और भरोसेमंद तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनावों के दबाव में हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर को स्थिर और मजबूत माना गया है, जिसका प्रमुख कारण घरेलू मांग की मजबूती और आर्थिक नीतियों में निरंतरता बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के कारण वैश्विक झटकों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का प्रभाव भारत पर सीमित रहने की संभावना जताई गई है। केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियां संतुलित गति से आगे बढ़ती रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर सतत निगरानी आवश्यक होगी। वैश्विक परिदृश्य को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसके कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मंदी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के आधार पर वैश्विक विकास दर में भी हल्की गिरावट का संकेत दिया गया है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। रिपोर्ट में मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट सेक्टर की स्थिर वित्तीय स्थिति, सरकार के बढ़ते पूंजीगत व्यय और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को प्रमुख ताकतों के रूप में रेखांकित किया गया है। कृषि उत्पादन की स्थिरता भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सभी कारकों के आधार पर आरबीआई ने माना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां और अधिक खराब नहीं होतीं तो भारत 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है। महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगभग 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे में मानी जा रही है। खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता और कृषि उत्पादन की मजबूती को महंगाई नियंत्रण का प्रमुख आधार बताया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भविष्य में जोखिम पैदा कर सकते हैं। कृषि क्षेत्र पर मौसम की स्थिति का प्रभाव भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। मानसून की अनिश्चितता और संभावित अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, हालांकि इंडियन ओशन डिपोल के सकारात्मक रहने की संभावना से कुछ राहत की उम्मीद जताई गई है। इसके साथ ही श्रम सुधारों और नए लेबर कोड के लागू होने से रोजगार सृजन और उत्पादकता में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई है। विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र को लेकर भी रिपोर्ट में भरोसा जताया गया है। सेवा निर्यात, विदेशी रेमिटेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पर्याप्त पूंजी और मजबूत स्थिति में बताते हुए किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके से निपटने में सक्षम माना गया है।
CRUDE OIL : वैश्विक तेल बाजार में गिरावट का दबाव, अमेरिका-ईरान कूटनीति से क्रूड प्राइस में बड़ी नरमी दर्ज

CRUDE OIL : नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच संभावित कूटनीतिक समझौते की उम्मीदों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव पैदा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और क्रूड छह सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया है। बाजार में यह गिरावट उस समय देखने को मिली है जब होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल आपूर्ति सामान्य होने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं और भू-राजनीतिक तनाव में कुछ नरमी के संकेत मिले हैं। इस घटनाक्रम का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर पड़ा है, जिससे निवेशकों की धारणा में बदलाव देखा जा रहा है। वैश्विक बाजार में अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड और अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड दोनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से उस जोखिम प्रीमियम में कमी के कारण हुई है, जो लंबे समय से मध्य पूर्व में तनाव की वजह से तेल कीमतों में शामिल था। जैसे ही कूटनीतिक समाधान की संभावना बढ़ी, बाजार ने भविष्य की आपूर्ति को अधिक स्थिर मानते हुए कीमतों में कटौती शुरू कर दी। WEST BENGAL POLITICS: बंगाल चुनाव में बड़ा उलटफेर: बूथ-स्तरीय डेटा से खुलासा, टीएमसी के कई दिग्गज अपने ही क्षेत्रों में कमजोर साबित अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है, जिसमें सीजफायर को आगे बढ़ाने और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से अभी अंतिम सहमति की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संवाद की प्रक्रिया जारी रहने से बाजार में सकारात्मक संकेत बने हैं। इसी उम्मीद के चलते तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका कम हुई है और कीमतों पर दबाव बढ़ गया है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि यह मार्ग पूरी तरह सुरक्षित और सुचारु रूप से कार्य करने लगे, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों में और नरमी आ सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में अभी समय लग सकता है क्योंकि कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। GUNA BJP MLA: BJP विधायक का अपनी ही सरकार पर हमला, बोले- दिखावे से नहीं काम से चलेगी सरकार इस बीच भारत सहित कई देशों में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति सामान्य बनी हुई है। रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर काम कर रही हैं और सरकार की ओर से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के पर्याप्त भंडार बनाए रखने का दावा किया गया है। साथ ही आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाए रखने के लिए निगरानी और प्रवर्तन तंत्र को भी सक्रिय किया गया है, ताकि किसी भी प्रकार की कमी या असंतुलन की स्थिति न बने। विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों की दिशा पूरी तरह अमेरिका-ईरान वार्ता के परिणाम और वैश्विक आपूर्ति स्थिरता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की दिशा में प्रगति होती है तो कीमतों में और गिरावट संभव है, जबकि किसी भी प्रकार की रुकावट या तनाव बढ़ने पर बाजार फिर से अस्थिर हो सकता है। फिलहाल बाजार कूटनीतिक संकेतों पर नजर बनाए हुए है और निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
फ्यूल प्राइस हाई, गोल्ड डिमांड क्रैश: जानिए अपने शहर में पेट्रोल-डीजल और सोने का रेट

नई दिल्ली । देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक बार फिर आम लोगों की जेब पर भारी पड़ रही हैं। 30 मई 2026 को तेल कंपनियों ने ईंधन के दामों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन पिछले दिनों हुई बढ़ोतरी के बाद कई शहरों में पेट्रोल की कीमत 102 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुकी है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई सहित कई प्रमुख महानगरों में ईंधन के दाम रिकॉर्ड स्तर पर बने हुए हैं। तेल कंपनियों के अनुसार, 25 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 2.50 रुपये प्रति लीटर से अधिक की बढ़ोतरी की गई थी, जिसके बाद से बाजार स्थिर जरूर है, लेकिन कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ईरान-अमेरिका तनाव के चलते स्थिति अनिश्चित बनी हुई है, जिसका असर भारत में भी देखने को मिल रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है। तेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत की 22 रिफाइनरियां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात भी कर रही हैं। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि ईंधन का उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए और अनावश्यक खपत से बचा जाए। देश के प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम (प्रति लीटर)दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये पर स्थिर है। मुंबई में पेट्रोल 111.18 रुपये और डीजल 97.83 रुपये तक पहुंच गया है। कोलकाता में पेट्रोल 113.47 रुपये और डीजल 99.82 रुपये दर्ज किया गया है। चेन्नई में पेट्रोल 107.77 रुपये और डीजल 99.55 रुपये, जबकि बेंगलुरु में पेट्रोल 110.93 रुपये और डीजल 98.80 रुपये पर बना हुआ है। पटना और जयपुर जैसे शहरों में भी कीमतें 110 रुपये के ऊपर बनी हुई हैं। वहीं पोर्ट ब्लेयर में ईंधन सबसे सस्ता दर्ज किया गया है। इधर, सोने के बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सरकार द्वारा सोने पर आयात शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने के बाद बाजार में मांग तेजी से घट गई है। इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, सोने की मांग पिछले दो हफ्तों में लगभग 70 प्रतिशत तक गिरकर 7.5 टन रह गई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह करीब 25 टन थी। सोने पर बढ़े टैक्स का असर ग्राहकों की खरीदारी पर साफ दिखाई दे रहा है। अब सोने पर कुल प्रभावी टैक्स 18.45 फीसदी तक पहुंच गया है, जिससे इसकी कीमतें और बढ़ गई हैं। मुंबई के स्पॉट मार्केट में 999 शुद्धता वाला सोना लगभग 1.57 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सोने की मांग में गिरावट केवल टैक्स बढ़ने से नहीं, बल्कि मौसमी कारणों और खरीदारी पर आई गिरावट से भी जुड़ी है। महंगाई, ईंधन की ऊंची कीमतें और त्योहारों से पहले की सुस्ती भी बाजार को प्रभावित कर रही है।