फ्यूल प्राइस हाई, गोल्ड डिमांड क्रैश: जानिए अपने शहर में पेट्रोल-डीजल और सोने का रेट

नई दिल्ली । देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक बार फिर आम लोगों की जेब पर भारी पड़ रही हैं। 30 मई 2026 को तेल कंपनियों ने ईंधन के दामों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन पिछले दिनों हुई बढ़ोतरी के बाद कई शहरों में पेट्रोल की कीमत 102 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुकी है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई सहित कई प्रमुख महानगरों में ईंधन के दाम रिकॉर्ड स्तर पर बने हुए हैं। तेल कंपनियों के अनुसार, 25 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 2.50 रुपये प्रति लीटर से अधिक की बढ़ोतरी की गई थी, जिसके बाद से बाजार स्थिर जरूर है, लेकिन कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ईरान-अमेरिका तनाव के चलते स्थिति अनिश्चित बनी हुई है, जिसका असर भारत में भी देखने को मिल रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है। तेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत की 22 रिफाइनरियां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात भी कर रही हैं। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि ईंधन का उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए और अनावश्यक खपत से बचा जाए। देश के प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम (प्रति लीटर)दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये पर स्थिर है। मुंबई में पेट्रोल 111.18 रुपये और डीजल 97.83 रुपये तक पहुंच गया है। कोलकाता में पेट्रोल 113.47 रुपये और डीजल 99.82 रुपये दर्ज किया गया है। चेन्नई में पेट्रोल 107.77 रुपये और डीजल 99.55 रुपये, जबकि बेंगलुरु में पेट्रोल 110.93 रुपये और डीजल 98.80 रुपये पर बना हुआ है। पटना और जयपुर जैसे शहरों में भी कीमतें 110 रुपये के ऊपर बनी हुई हैं। वहीं पोर्ट ब्लेयर में ईंधन सबसे सस्ता दर्ज किया गया है। इधर, सोने के बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सरकार द्वारा सोने पर आयात शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने के बाद बाजार में मांग तेजी से घट गई है। इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, सोने की मांग पिछले दो हफ्तों में लगभग 70 प्रतिशत तक गिरकर 7.5 टन रह गई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह करीब 25 टन थी। सोने पर बढ़े टैक्स का असर ग्राहकों की खरीदारी पर साफ दिखाई दे रहा है। अब सोने पर कुल प्रभावी टैक्स 18.45 फीसदी तक पहुंच गया है, जिससे इसकी कीमतें और बढ़ गई हैं। मुंबई के स्पॉट मार्केट में 999 शुद्धता वाला सोना लगभग 1.57 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सोने की मांग में गिरावट केवल टैक्स बढ़ने से नहीं, बल्कि मौसमी कारणों और खरीदारी पर आई गिरावट से भी जुड़ी है। महंगाई, ईंधन की ऊंची कीमतें और त्योहारों से पहले की सुस्ती भी बाजार को प्रभावित कर रही है।
सोना-चांदी की चमक पड़ी फीकी, एक हफ्ते में सोना ₹1,000 और चांदी ₹2,600 से ज्यादा सस्ती

नई दिल्ली । इस सप्ताह घरेलू सर्राफा बाजार में कीमती धातुओं की चमक थोड़ी फीकी पड़ गई है। सोने और चांदी दोनों के दामों में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों और ज्वैलरी बाजार से जुड़े कारोबारियों के बीच हलचल देखने को मिल रही है। पिछले कुछ दिनों में लगातार उतार-चढ़ाव के बाद इस सप्ताह सोना करीब एक हजार रुपये से अधिक और चांदी दो हजार रुपये से ज्यादा सस्ती हो गई है। कीमतों में आई इस नरमी ने उन लोगों के लिए राहत भी दी है जो लंबे समय से खरीदारी की योजना बना रहे थे, जबकि निवेशकों के लिए यह एक अस्थिर संकेत माना जा रहा है। इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन के ताजा आंकड़ों के अनुसार 24 कैरेट सोने की कीमत इस सप्ताह लगभग 1,257 रुपये की गिरावट के साथ 1,56,463 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गई है। इससे पहले यह स्तर 1,58,720 रुपये प्रति 10 ग्राम के करीब था। इसी तरह 22 कैरेट और 18 कैरेट सोने की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली है, जिससे ज्वैलरी सेगमेंट में कीमतों का दबाव साफ नजर आ रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के दिनों में वैश्विक आर्थिक संकेतकों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का असर सीधे घरेलू कीमतों पर दिखाई दे रहा है। इस सप्ताह सोने की कीमतों में दिन-प्रतिदिन उतार-चढ़ाव भी दर्ज किया गया, जहां 25 मई को इसका उच्चतम स्तर देखने को मिला, जबकि 27 मई को इसमें सबसे निचला स्तर दर्ज किया गया। यह दर्शाता है कि बाजार में अस्थिरता बनी हुई है और निवेशक अभी भी सुरक्षित निवेश विकल्पों की तलाश में हैं। दूसरी ओर चांदी के बाजार में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला, जहां कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। चांदी की कीमत इस सप्ताह करीब 2,650 रुपये प्रति किलोग्राम की गिरावट के साथ 2,63,350 रुपये पर पहुंच गई है। इससे पहले यह स्तर 2,66,000 रुपये के आसपास था। सप्ताह के दौरान चांदी ने 2,71,100 रुपये के उच्च स्तर और 2,60,917 रुपये के न्यूनतम स्तर को भी छुआ, जो इसकी अस्थिरता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। औद्योगिक मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव का प्रभाव चांदी की कीमतों पर अधिक दिखाई देता है, जिसके कारण इसमें उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत तेज रहता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमती धातुओं के भाव में नरमी देखने को मिली है। डॉलर आधारित बाजार में सोना और चांदी दोनों ही अपने हालिया उच्च स्तरों से नीचे आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई को लेकर बनी चिंताएं और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक कीमती धातुओं की कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। इसके अलावा कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक व्यापार परिस्थितियां भी इस दबाव में योगदान दे रही हैं। हालांकि दीर्घकालिक दृष्टि से सोने और चांदी ने निवेशकों को मजबूत रिटर्न दिया है। पिछले एक वर्ष में इन दोनों धातुओं ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लंबी अवधि के निवेशकों के लिए ये अब भी आकर्षक विकल्प बने हुए हैं। मौजूदा गिरावट को बाजार विशेषज्ञ एक अस्थायी सुधार के रूप में भी देख रहे हैं, जो तेजी के लंबे दौर के बाद सामान्य बाजार प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। वर्तमान स्थिति में सर्राफा बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है और निवेशक आगे के वैश्विक संकेतों पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों और डॉलर की चाल के आधार पर कीमती धातुओं की कीमतों में फिर से बदलाव देखने को मिल सकता है। Google Photo Search Suggestion:gold silver price fall India bullion market coins bars jewelry shop India 2026
CNG और PNG के दाम बढ़े, मुंबई में सफर से लेकर रसोई तक महंगा होगा जीवन; किराया बढ़ाने की मांग तेज

नई दिल्ली। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और उससे जुड़े महानगर क्षेत्र के लाखों लोगों को महंगाई का एक और झटका लगा है। घरेलू रसोई से लेकर रोजमर्रा के सफर तक अब अतिरिक्त खर्च का बोझ बढ़ने वाला है। महानगर क्षेत्र में संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) और पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की कीमतों में बढ़ोतरी लागू कर दी गई है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं, वाहन चालकों और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाले यात्रियों पर पड़ेगा। गैस दरों में हुई इस वृद्धि ने एक बार फिर शहरी जीवनयापन की बढ़ती लागत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। नई दरों के अनुसार CNG की कीमत में प्रति किलोग्राम 2 रुपये की बढ़ोतरी की गई है, जिसके बाद इसकी कीमत 86 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। वहीं घरेलू उपयोग के लिए उपलब्ध पाइप्ड नेचुरल गैस की दर में 50 पैसे प्रति यूनिट की वृद्धि की गई है और अब उपभोक्ताओं को 52 रुपये प्रति यूनिट की दर से भुगतान करना होगा। इस फैसले का असर महानगर क्षेत्र के 31 लाख से अधिक परिवारों पर पड़ेगा, जो घरेलू रसोई के लिए पाइप्ड गैस का उपयोग करते हैं। इसके साथ ही लाखों लोग जो रोजाना CNG आधारित वाहनों से यात्रा करते हैं, उन्हें भी अप्रत्यक्ष रूप से अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ सकता है। गैस वितरण क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और गैस खरीद की लागत में लगातार हो रही वृद्धि के कारण कीमतों में संशोधन आवश्यक हो गया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, महंगे गैस स्रोतों पर निर्भरता और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव जैसे कारकों ने गैस खरीद को पहले की तुलना में अधिक महंगा बना दिया है। इसी बढ़ी हुई लागत का प्रभाव अब उपभोक्ताओं तक पहुंचा है। गैस कीमतों में वृद्धि के बाद ऑटो-रिक्शा और टैक्सी संगठनों ने भी किराए में संशोधन की मांग को तेज कर दिया है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती ईंधन लागत के बीच मौजूदा किराया ढांचा वाहन संचालन की वास्तविक लागत को पूरा नहीं कर पा रहा है। परिवहन क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों का मानना है कि यदि किराए में समय रहते संशोधन नहीं किया गया तो वाहन चालकों की आय पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसी कारण बेस किराए में वृद्धि की मांग संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष रखे जाने की तैयारी की जा रही है। टैक्सी संगठनों ने भी ईंधन लागत बढ़ने का हवाला देते हुए किराए में बढ़ोतरी की आवश्यकता जताई है। उनका तर्क है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान CNG की कीमतों में कई बार संशोधन किया गया है, जिससे संचालन व्यय लगातार बढ़ा है। यदि किराए में संशोधन की अनुमति मिलती है तो इसका असर प्रतिदिन यात्रा करने वाले लाखों यात्रियों की जेब पर भी दिखाई देगा। विशेष रूप से चिंता की बात यह है कि मई महीने में CNG की कीमतों में यह दूसरी बड़ी बढ़ोतरी है। इससे पहले भी इसी महीने कीमतों में वृद्धि की गई थी, जबकि अप्रैल में भी दरों में इजाफा देखा गया था। लगातार बढ़ती कीमतों के कारण परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं की चिंताएं बढ़ रही हैं। मुंबई महानगर क्षेत्र में 12 लाख से अधिक वाहन CNG पर निर्भर हैं। इनमें बड़ी संख्या में ऑटो-रिक्शा, टैक्सियां, निजी कारें, बसें और मालवाहक वाहन शामिल हैं। सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में भी CNG की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसके कारण कीमतों में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे तौर पर लाखों यात्रियों और पूरे शहरी परिवहन तंत्र को प्रभावित करता है। ऐसे में आने वाले दिनों में गैस दरों के प्रभाव और संभावित किराया वृद्धि पर सभी की नजर बनी रहेगी।
बाजार में भारी बिकवाली के बीच चुनिंदा शेयरों का दमदार प्रदर्शन, एक महीने में 20% तक का रिटर्न

नई दिल्ली । सप्ताह और महीने के अंतिम कारोबारी दिन घरेलू शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 1092 अंकों की बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ, जिससे बाजार में व्यापक दबाव का माहौल बना रहा। अधिकांश क्षेत्रों में बिकवाली हावी रही और निवेशकों की सतर्कता साफ दिखाई दी। इसके बावजूद कुछ चुनिंदा लार्ज-कैप शेयरों ने बाजार की इस कमजोरी को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए नया 52-वीक हाई हासिल किया। इन कंपनियों के प्रदर्शन ने यह संकेत दिया कि मजबूत बुनियादी स्थिति और भविष्य की विकास संभावनाएं रखने वाले शेयरों में निवेशकों का भरोसा अब भी कायम है। बाजार में गिरावट के बीच नौ प्रमुख कंपनियों के शेयर एक साल के अपने सर्वोच्च स्तर तक पहुंचने में सफल रहे। किसी भी शेयर का 52-वीक हाई पर पहुंचना निवेशकों के सकारात्मक दृष्टिकोण और उस कंपनी की संभावित विकास क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। ऐसे समय में जब व्यापक बाजार दबाव में हो और प्रमुख सूचकांक लाल निशान में कारोबार कर रहे हों, तब चुनिंदा शेयरों का रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचना उनकी विशेष मजबूती को दर्शाता है। सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला शेयर सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया रहा। कंपनी के शेयर ने नया उच्च स्तर बनाते हुए पिछले एक महीने में लगभग 20 प्रतिशत का मजबूत रिटर्न दिया। इसी तरह अक्षय ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी अडानी ग्रीन एनर्जी ने भी शानदार प्रदर्शन किया और करीब 19 प्रतिशत की बढ़त दर्ज करते हुए नया 52-वीक हाई हासिल किया। ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती मांग और दीर्घकालिक निवेश संभावनाओं ने इन कंपनियों के प्रति निवेशकों का विश्वास मजबूत किया है। सीमेंस एनर्जी इंडिया और पॉलीकैब इंडिया भी इस सूची में प्रमुख रूप से शामिल रहे। दोनों कंपनियों के शेयरों में पिछले एक महीने के दौरान लगभग 17 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। बिजली, ऊर्जा अवसंरचना और औद्योगिक विकास से जुड़ी परियोजनाओं में बढ़ती गतिविधियों का लाभ इन कंपनियों को मिलता दिखाई दे रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि देश में जारी इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं इन कंपनियों के लिए सकारात्मक कारक बनी हुई हैं। ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र की प्रमुख कंपनी समवर्धना मदरसन इंटरनेशनल ने भी निवेशकों को प्रभावित किया। कंपनी के शेयर ने नया रिकॉर्ड स्तर छूते हुए पिछले एक महीने में करीब 14 प्रतिशत का रिटर्न दिया। वहीं अडानी पावर ने लगभग 12 प्रतिशत की तेजी के साथ नया 52-वीक हाई बनाया, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में निवेशकों की बढ़ती रुचि का संकेत मिला। धातु क्षेत्र की बड़ी कंपनी हिंदाल्को इंडस्ट्रीज भी नए उच्च स्तर तक पहुंचने में सफल रही। वैश्विक मांग में सुधार और औद्योगिक गतिविधियों में तेजी की उम्मीदों ने कंपनी के शेयरों को समर्थन दिया। इसी क्रम में अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस ने भी नया रिकॉर्ड स्तर हासिल किया और पिछले एक महीने में सकारात्मक रिटर्न दर्ज किया। ऊर्जा ट्रांसमिशन और वितरण क्षेत्र में कंपनी की मजबूत उपस्थिति निवेशकों को आकर्षित करती रही है। JSW एनर्जी भी उन चुनिंदा कंपनियों में शामिल रही जिन्होंने बाजार की कमजोरी के बीच मजबूती दिखाई। भले ही इसकी मासिक बढ़त अन्य शेयरों की तुलना में अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन नया 52-वीक हाई बनाना कंपनी के प्रति निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है। बाजार विश्लेषकों के अनुसार, व्यापक गिरावट के बावजूद इन शेयरों का रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचना यह बताता है कि निवेशक अभी भी मजबूत व्यवसाय मॉडल, बेहतर आय संभावनाओं और दीर्घकालिक विकास क्षमता वाली कंपनियों पर दांव लगाने को तैयार हैं। आने वाले समय में इन शेयरों की चाल पर बाजार प्रतिभागियों और निवेशकों की विशेष नजर बनी रहने की संभावना है।
ग्लोबल संकेतों के बीच बाजार धड़ाम, निफ्टी 1.5% गिरा और 23,500 के अहम स्तर से नीचे फिसला

नई दिल्ली । सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली, जिससे निवेशकों की संपत्ति को बड़ा नुकसान हुआ। वैश्विक बाजारों से मिले-जुले संकेतों और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच घरेलू बाजार दबाव में आ गया। कारोबार की शुरुआत भले ही सकारात्मक रही हो, लेकिन दिन के आगे बढ़ने के साथ बाजार में कमजोरी बढ़ती गई और अंतिम घंटे में तेज बिकवाली ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। कारोबार के अंत में 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 1,092.06 अंक यानी 1.44 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,775.74 पर बंद हुआ। वहीं एनएसई का निफ्टी 50 भी 359.40 अंक यानी 1.50 प्रतिशत टूटकर 23,547.75 के स्तर पर बंद हुआ। दिनभर के कारोबार में सेंसेक्स ने 76,220.02 का ऊपरी स्तर और 74,589.11 का निचला स्तर छुआ, जबकि निफ्टी 24,002.80 के हाई से फिसलकर 23,484.75 के निचले स्तर तक पहुंच गया। बाजार में यह गिरावट व्यापक स्तर पर देखने को मिली, जहां मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स भी दबाव में रहे। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 1.33 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। सेक्टरवार देखें तो तेल एवं गैस, मेटल और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे प्रमुख सेक्टरों में दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट ने बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनाया। वहीं ऑटो, फार्मा, हेल्थकेयर और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर भी कमजोर रहे, जबकि आईटी सेक्टर में हल्की बढ़त देखने को मिली। निफ्टी 50 के प्रमुख शेयरों में टेक महिंद्रा, एचसीएल टेक, विप्रो, नेस्ले इंडिया और एलएंडटी जैसे स्टॉक्स में मामूली तेजी रही, लेकिन दूसरी ओर पावरग्रिड, इंडिगो, ओएनजीसी, मैक्स हेल्थ, आयशर मोटर्स और टाटा कंज्यूमर जैसे शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई। कुल मिलाकर बाजार में बिकवाली का दबाव इतना अधिक रहा कि एक ही सत्र में निवेशकों को लगभग 6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का नुकसान झेलना पड़ा। विशेषज्ञों के अनुसार बाजार में यह गिरावट मुख्य रूप से वैश्विक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण देखने को मिली। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में हालिया नरमी से कुछ राहत के संकेत मिले हैं, लेकिन मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम अभी भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट से आयात बिल और महंगाई पर कुछ सकारात्मक असर की उम्मीद जरूर जताई जा रही है, लेकिन निवेशकों का भरोसा अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। मुद्रा बाजार में रुपये ने डॉलर के मुकाबले हल्की मजबूती दिखाई है, जिससे कुछ हद तक घरेलू बाजार को सहारा मिला है। लेकिन तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि निफ्टी के 23,500 के नीचे फिसलने से निकट भविष्य में बाजार पर दबाव बना रह सकता है और इसमें आगे और गिरावट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर, सप्ताह का अंत भारतीय शेयर बाजार के लिए कमजोर रहा और आने वाले सत्रों में वैश्विक संकेत, कच्चे तेल की चाल और भू-राजनीतिक घटनाक्रम बाजार की दिशा तय करेंगे।
इलेक्ट्रिक कार सेगमेंट में बड़ा धमाका, टेस्ला ने नया मॉडल पेश किया

नई दिल्ली । अमेरिकी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी टेस्ला ने भारत के ऑटोमोबाइल बाजार में अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए शुक्रवार को नई मॉडल वाई प्रीमियम रियर-व्हील ड्राइव (RWD) वेरिएंट को पेश किया है। इस नए मॉडल की शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत 50.89 लाख रुपये तय की गई है। कंपनी ने घोषणा की है कि इस वाहन की डिलीवरी जुलाई 2026 से शुरू की जाएगी। टेस्ला का यह नया लॉन्च भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में प्रतिस्पर्धा को और तेज करने वाला माना जा रहा है, जहां कंपनी अब तक अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई थी। इस कदम के जरिए टेस्ला का लक्ष्य भारतीय ग्राहकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देना है। नई मॉडल वाई RWD में प्रीमियम ऑल-ब्लैक इंटीरियर दिया गया है, जो इसे एक आधुनिक और आकर्षक लुक प्रदान करता है। इसके साथ ही वाहन में पहली पंक्ति के लिए 16 इंच का बड़ा टचस्क्रीन शामिल किया गया है, जो बेहतर रिस्पॉन्सिवनेस और एडवांस्ड यूजर इंटरफेस के साथ आता है। कंपनी ने इसमें वैकल्पिक जेन ग्रे इंटीरियर थीम का भी विकल्प दिया है, जिससे ग्राहकों को पर्सनलाइजेशन की सुविधा मिलती है। स्पेस और कम्फर्ट की बात करें तो यह मॉडल 2,138 लीटर तक की विशाल स्टोरेज क्षमता प्रदान करता है। इसमें पावर-फोल्डिंग सीटें दी गई हैं, जिससे कार्गो स्पेस को जरूरत के अनुसार बढ़ाया जा सकता है। यह वाहन पांच यात्रियों के बैठने की सुविधा के साथ डिजाइन किया गया है। परफॉर्मेंस के मामले में यह इलेक्ट्रिक कार 0 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार सिर्फ 5.9 सेकंड में पकड़ सकती है। वहीं, WLTP मानकों के अनुसार यह लगभग 500 किलोमीटर तक की ड्राइविंग रेंज देने में सक्षम है, जो इसे लंबी दूरी की यात्रा के लिए भी उपयुक्त बनाता है। सुरक्षा के लिहाज से मॉडल वाई RWD को वैश्विक स्तर की मान्यता प्राप्त हुई है। इसे NHTSA, IIHS, Euro NCAP, ANCAP और C-IASI जैसे प्रमुख सुरक्षा संगठनों से उच्चतम सुरक्षा रेटिंग मिली है, जो इसकी मजबूती और सुरक्षा तकनीक को प्रमाणित करती है। हाल ही में टेस्ला ने भारत में छह सीटों वाली मॉडल वाई L भी लॉन्च की थी, जिसकी शुरुआती कीमत 61.99 लाख रुपये है। इसके अलावा कंपनी ने बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड में अपना पहला एक्सपीरियंस सेंटर खोलकर भारत में अपने विस्तार की शुरुआत की थी। टेस्ला की वरिष्ठ निदेशक इसाबेल फैन ने कहा कि कंपनी का उद्देश्य तकनीक को अधिक सुलभ बनाना और चार्जिंग समाधानों के जरिए इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा देना है। कंपनी ने ग्राहकों के लिए फाइनेंस विकल्प भी पेश किए हैं, जिसमें 39,990 रुपये से मासिक EMI और 6 लाख रुपये से डाउन पेमेंट की सुविधा शामिल है। यह कदम भारतीय बाजार में प्रीमियम इलेक्ट्रिक वाहनों को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत–ओमान आर्थिक साझेदारी लागू होने की तैयारी, टैरिफ छूट से बदल सकती है एक्सपोर्ट तस्वीर

नई दिल्ली । भारत और ओमान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता यानी सीईपीए के लागू होने की संभावना के साथ भारतीय व्यापार जगत में नई उम्मीदें जगी हैं। इस समझौते को दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे न केवल व्यापार में वृद्धि होगी बल्कि भारतीय निर्यातकों के लिए खाड़ी क्षेत्र के बाजारों में प्रवेश और आसान हो जाएगा। लंबे समय से स्थिर बने हुए भारत–ओमान व्यापार को अब नई दिशा मिलने की संभावना है, जिससे विभिन्न उद्योगों में विस्तार के अवसर पैदा हो सकते हैं। वित्तीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 से भारत का ओमान को निर्यात लगभग 4 अरब डॉलर के स्तर पर स्थिर बना हुआ था, जिसमें अपेक्षित वृद्धि नहीं देखी जा रही थी। लेकिन सीईपीए लागू होने के बाद इस स्थिति में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। समझौते के तहत लगभग 98 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क मुक्त पहुंच उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे भारतीय उत्पादों की लागत प्रतिस्पर्धी बनेगी और उनकी मांग में वृद्धि हो सकती है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे करीब 3.64 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात पर मौजूदा शुल्क समाप्त हो जाएगा, जो अभी तक पांच प्रतिशत तक के टैक्स के दायरे में आता था। इस समझौते का सबसे बड़ा प्रभाव फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग सामान, रसायन, रत्न एवं आभूषण और वस्त्र उद्योग जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर देखने को मिलेगा। इन क्षेत्रों को ओमान के बाजार में लगभग शुल्क मुक्त पहुंच मिलने से भारतीय कंपनियों को अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिलेगा। खासकर दवा उद्योग और इंजीनियरिंग उत्पादों की मांग खाड़ी देशों में लगातार बढ़ रही है, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए नए ऑर्डर और दीर्घकालिक व्यापार संभावनाएं बन सकती हैं। इसके अलावा यह समझौता भारत को खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक दृष्टि से और मजबूत स्थिति में लाने में मदद कर सकता है। ओमान एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है, जो व्यापारिक मार्गों के लिहाज से भी अहम माना जाता है। ऐसे में यह समझौता भारतीय वस्तुओं के परिवहन और वितरण को अधिक सुगम बनाने में सहायक हो सकता है, जिससे लॉजिस्टिक लागत में भी कमी आने की संभावना है। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से केवल बड़े उद्योग ही नहीं बल्कि छोटे और मध्यम स्तर के निर्यातकों को भी लाभ मिल सकता है। नए बाजारों तक पहुंच आसान होने से एमएसएमई सेक्टर को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार का अवसर मिलेगा। साथ ही निर्यात में विविधता आने से भारत का व्यापार पोर्टफोलियो अधिक मजबूत और स्थिर हो सकता है। कुल मिलाकर यह समझौता भारत और ओमान के बीच आर्थिक संबंधों को एक नई दिशा देने की क्षमता रखता है। आने वाले समय में यदि इसका प्रभाव अपेक्षाओं के अनुरूप रहा तो भारतीय निर्यात क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है, जिससे देश की वैश्विक व्यापार स्थिति और अधिक मजबूत होने की संभावना है।
भारत के बॉन्ड बाजार में बड़े सुधार की तैयारी, सेबी की योजनाओं से निवेश ढांचे में आ सकता है बदलाव

नई दिल्ली । भारत का बॉन्ड मार्केट अब एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की ओर बढ़ रहा है, जहां बाजार नियामक सेबी इसे अधिक गहरा, पारदर्शी और निवेशकों के लिए सुलभ बनाने की दिशा में नई पहल कर रहा है। हाल के वर्षों में शेयर बाजार में रिटेल निवेशकों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है, लेकिन इसके मुकाबले बॉन्ड मार्केट अभी भी सीमित दायरे में सिमटा हुआ है। ऐसे में सेबी की नई योजनाएं इस अंतर को कम करने और कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को अधिक आकर्षक बनाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये सुधार प्रभावी ढंग से लागू होते हैं तो निवेश के पारंपरिक ढांचे में बड़ा बदलाव संभव है और छोटे निवेशकों के लिए भी नए अवसर खुल सकते हैं। सेबी का मुख्य फोकस बॉन्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी बॉन्ड ETF और कॉरपोरेट बॉन्ड इंडेक्स से जुड़े डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स को विकसित करने पर है। इन उपकरणों के माध्यम से बॉन्ड बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाने, निवेश प्रक्रिया को सरल बनाने और ब्याज दर जोखिम को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही टोकनाइजेशन जैसी आधुनिक तकनीक पर भी विचार किया जा रहा है, जिससे डिजिटल लेजर सिस्टम के जरिए बॉन्ड ट्रेडिंग और सेटलमेंट को तेज और अधिक पारदर्शी बनाया जा सके। यह कदम भारतीय वित्तीय बाजार को वैश्विक मानकों के करीब लाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत में कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार पिछले दशक में तेजी से बढ़ा है, लेकिन वैश्विक तुलना में यह अभी भी छोटा है। आंकड़ों के अनुसार भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार देश की जीडीपी का लगभग 16 प्रतिशत है, जबकि चीन, मलेशिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में यह अनुपात कहीं अधिक है। इस अंतर के कारण भारत में कंपनियों की फंडिंग का बड़ा हिस्सा अभी भी बैंकिंग सिस्टम पर निर्भर है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत बॉन्ड बाजार से न केवल कंपनियों को सस्ते और विविध फंडिंग स्रोत मिलेंगे, बल्कि देश की आर्थिक वृद्धि और बुनियादी ढांचे के विकास को भी गति मिलेगी। हालांकि रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाना आसान नहीं माना जा रहा है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय निवेशक अभी भी उच्च रिटर्न वाले इक्विटी निवेश की ओर अधिक आकर्षित होते हैं, जबकि बॉन्ड को अपेक्षाकृत कम लाभ वाला विकल्प माना जाता है। इसके अलावा डेट फंड्स और कॉरपोरेट बॉन्ड में निवेश की जटिल संरचना भी छोटे निवेशकों को दूर रखती है। हाल के वर्षों में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए बॉन्ड खरीदना आसान हुआ है, लेकिन निवेश का दायरा अभी भी सीमित है और अधिकांश निवेशक जोखिम भरे हाई-यील्ड बॉन्ड की ओर झुकाव रखते हैं, जिससे जोखिम बढ़ जाता है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल नए वित्तीय उत्पाद लाने से बदलाव पूरा नहीं होगा, बल्कि टैक्स संरचना में सुधार और निवेशकों के लिए प्रोत्साहन भी जरूरी है। यदि डेट इंस्ट्रूमेंट्स पर टैक्स बोझ कम किया जाता है और उन्हें इक्विटी के समान प्रतिस्पर्धी बनाया जाता है, तो रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ सकती है। इसके साथ ही निवेशकों की वित्तीय शिक्षा और जागरूकता भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि बॉन्ड बाजार में जोखिम और रिटर्न की समझ जरूरी होती है। सेबी इस समय सिर्फ उत्पाद विकास पर ही नहीं, बल्कि नियामकीय ढांचे में भी बदलाव पर विचार कर रहा है। लिस्टेड डेट कंपनियों के लिए अनुपालन नियमों को सरल बनाने की दिशा में समीक्षा चल रही है, ताकि अधिक कंपनियां बॉन्ड बाजार में प्रवेश कर सकें। इसके अलावा टोकनाइजेशन और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रयोगों पर भी पायलट प्रोजेक्ट के तहत काम किया जा रहा है। यदि ये सभी पहल सफल होती हैं, तो भारत का बॉन्ड बाजार आने वाले वर्षों में निवेश और पूंजी जुटाने का एक मजबूत वैकल्पिक मंच बन सकता है।
मजबूत ऑर्डर बुक के दम पर Siemens को लेकर ब्रोकरेज में भरोसा कायम, मुनाफे पर दबाव के बावजूद खरीदारी की राय बरकरार

नई दिल्ली । इंजीनियरिंग और ऑटोमेशन क्षेत्र की प्रमुख कंपनी Siemens Limited के ताजा तिमाही नतीजों के बाद निवेशकों और बाजार विश्लेषकों के बीच मिला-जुला लेकिन काफी हद तक सकारात्मक रुख देखने को मिल रहा है। कंपनी के प्रदर्शन में जहां एक ओर कारोबार और ऑर्डर इनफ्लो में मजबूती दर्ज की गई है, वहीं बढ़ती लागत, कच्चे माल की कीमतों में उछाल और मुद्रा में उतार-चढ़ाव के कारण मुनाफे पर दबाव साफ नजर आया है। इसके बावजूद ब्रोकरेज हाउसों का मानना है कि कंपनी की लंबी अवधि की ग्रोथ स्टोरी अभी भी मजबूत बनी हुई है और आने वाले वर्षों में इसके बिजनेस में स्थिरता और विस्तार की संभावना बनी रह सकती है। तिमाही नतीजों के अनुसार कंपनी की आय में सालाना आधार पर लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इसके विविध कारोबार क्षेत्रों में मांग के मजबूत बने रहने का संकेत देती है। हालांकि इसी अवधि में शुद्ध मुनाफा करीब 10 प्रतिशत घटकर प्रभावित हुआ, जिसका मुख्य कारण इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी और विदेशी मुद्रा की अस्थिरता रही। इसके बावजूद कंपनी के परिचालन आधार में कोई बड़ी कमजोरी नहीं दिखी, बल्कि इसके विपरीत ऑर्डर बुक में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है, जिसने बाजार को भरोसा दिया है कि आने वाली तिमाहियों में राजस्व प्रवाह स्थिर रह सकता है। सबसे महत्वपूर्ण संकेत कंपनी के ऑर्डर इनफ्लो से मिला है, जो इस तिमाही में करीब 33 प्रतिशत बढ़कर नए स्तर पर पहुंच गया। इसके साथ ही कुल ऑर्डर बुक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचते हुए लगभग 450 अरब रुपये तक दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत अधिक है। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि कंपनी के पास आने वाले समय में लगातार प्रोजेक्ट्स का मजबूत बैकअप मौजूद है, जिससे उसकी कमाई की दृश्यता बेहतर बनी हुई है। डेटा सेंटर, रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रिफिकेशन, स्मार्ट सिटी और निजी क्षेत्र के निवेश जैसे क्षेत्रों से मिल रही मांग कंपनी के लिए मुख्य ग्रोथ ड्राइवर के रूप में उभर रही है। ब्रोकरेज हाउसों की बात करें तो अधिकांश विश्लेषकों ने शेयर को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखा है। कुछ प्रमुख ब्रोकरेज संस्थानों ने स्टॉक पर खरीदारी की सलाह देते हुए मौजूदा स्तर से बेहतर अपसाइड की संभावना जताई है, जबकि कुछ ने इसे होल्ड या न्यूट्रल श्रेणी में रखते हुए अल्पकालिक मार्जिन दबाव की चेतावनी दी है। उनका मानना है कि भले ही लागत का दबाव कुछ समय तक बना रह सकता है, लेकिन रेलवे, इंफ्रास्ट्रक्चर और मोबिलिटी जैसे सेगमेंट से मिलने वाले बड़े ऑर्डर कंपनी की स्थिति को मजबूत बनाए रखेंगे। बाजार प्रदर्शन के लिहाज से भी Siemens का शेयर निवेशकों को संतोषजनक रिटर्न देता रहा है। हाल के महीनों में उतार-चढ़ाव के बावजूद इसमें स्थिर बढ़त देखी गई है और लंबे समय में इसने बाजार से बेहतर प्रदर्शन किया है। पिछले एक साल में शेयर में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि तीन साल की अवधि में इसमें उल्लेखनीय मजबूती दिखी है, जिससे निवेशकों का भरोसा कंपनी के बिजनेस मॉडल पर बना हुआ है। कुल मिलाकर स्थिति यह दर्शाती है कि अल्पकालिक मुनाफे पर दबाव के बावजूद Siemens की दीर्घकालिक विकास कहानी मजबूत बनी हुई है। मजबूत ऑर्डर पाइपलाइन, बढ़ती इंफ्रास्ट्रक्चर मांग और विविध व्यवसाय मॉडल इसे आने वाले समय में स्थिर वृद्धि का आधार प्रदान कर सकते हैं, हालांकि वैश्विक लागत दबाव और मुद्रा जोखिमों पर नजर रखना आवश्यक रहेगा।
कोटक निफ्टी अल्फा लो-वोलैटिलिटी 30 इंडेक्स फंड का एनएफओ खुला, इक्विटी निवेशकों के लिए नया फैक्टर-बेस्ड ऑप्शन

नई दिल्ली । भारतीय म्यूचुअल फंड बाजार में निवेशकों के लिए एक नया विकल्प सामने आया है, जहां Kotak Mahindra Asset Management Company ने अपना नया इंडेक्स फंड Kotak Nifty Alpha Low-Volatility 30 Index Fund लॉन्च किया है। यह एक ओपन-एंडेड स्कीम है, जिसका उद्देश्य निवेशकों को एक ऐसा इक्विटी निवेश विकल्प देना है जो बेहतर रिटर्न की संभावना के साथ-साथ जोखिम नियंत्रण पर भी ध्यान केंद्रित करे। इस नए फंड का न्यू फंड ऑफर 29 मई 2026 से निवेश के लिए खुल चुका है और यह 12 जून 2026 तक उपलब्ध रहेगा। कंपनी ने इस फंड में न्यूनतम निवेश राशि 1000 रुपये रखी है और इसमें किसी प्रकार का एग्जिट लोड नहीं लगाया गया है, जिससे निवेशक अपनी जरूरत के अनुसार आसानी से एंट्री और एग्जिट कर सकते हैं। यह फंड Nifty Alpha Low-Volatility 30 Index पर आधारित है, जो 30 चुनिंदा कंपनियों के प्रदर्शन को ट्रैक करता है। इन कंपनियों का चयन दो प्रमुख फैक्टर्स के आधार पर किया जाता है, जिनमें अल्फा और लो-वॉलेटिलिटी शामिल हैं। अल्फा का अर्थ उन शेयरों से है जिनमें बाजार के औसत प्रदर्शन से बेहतर रिटर्न देने की क्षमता होती है, जबकि लो-वॉलेटिलिटी उन शेयरों को दर्शाता है जिनमें कीमतों में उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत कम होता है। इन दोनों फैक्टर्स के संयोजन का उद्देश्य एक ऐसा पोर्टफोलियो तैयार करना है जो एक तरफ बेहतर रिटर्न की संभावना दे और दूसरी तरफ बाजार की अस्थिरता के प्रभाव को कम कर सके। फंड हाउस के अनुसार यह रणनीति पूरी तरह नियम-आधारित यानी रूल-बेस्ड है, जिसमें समय-समय पर इंडेक्स की पुनर्संतुलन प्रक्रिया की जाती है ताकि बदलते बाजार हालात के अनुसार पोर्टफोलियो को अपडेट किया जा सके। फंड का मुख्य उद्देश्य इंडेक्स के प्रदर्शन को करीब से ट्रैक करना है, इसलिए इसमें उन्हीं कंपनियों को शामिल किया जाएगा जिनका वेटेज इंडेक्स में तय है। इसके अलावा फंड जरूरत के अनुसार डेरिवेटिव्स जैसे फ्यूचर्स और ऑप्शंस में भी निवेश कर सकता है ताकि ट्रैकिंग को अधिक सटीक बनाया जा सके। कंपनी के प्रबंधन के अनुसार यह फंड उन निवेशकों के लिए उपयुक्त हो सकता है जो लंबी अवधि के लिए इक्विटी में निवेश करना चाहते हैं और साथ ही स्थिरता और जोखिम नियंत्रण को भी प्राथमिकता देते हैं। इस रणनीति का उद्देश्य एक ऐसा संतुलित पोर्टफोलियो तैयार करना है जो विभिन्न बाजार चक्रों में बेहतर प्रदर्शन कर सके और निवेशकों को अधिक स्थिर परिणाम प्रदान कर सके। फंड मैनेजर का कहना है कि यह मॉडल ऐसे शेयरों की पहचान करने में मदद करता है जो न केवल प्रदर्शन की क्षमता रखते हैं बल्कि बाजार की तेज हलचलों में भी अपेक्षाकृत स्थिर बने रहते हैं। इस स्कीम के तहत निवेशकों को इक्विटी, डेट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में भी अप्रत्यक्ष एक्सपोजर मिलेगा, जिससे पोर्टफोलियो में विविधता बनी रहेगी। सरकार और कॉरपोरेट बॉन्ड्स के साथ-साथ शॉर्ट टर्म डिपॉजिट और ट्रेजरी बिल जैसे सुरक्षित विकल्पों में भी निवेश की संभावना रखी गई है। कुल मिलाकर यह नया इंडेक्स फंड निवेशकों को एक संरचित, पारदर्शी और फैक्टर-आधारित निवेश मॉडल प्रदान करता है, जो आधुनिक निवेश रणनीतियों के अनुरूप माना जा रहा है।