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सोने-चांदी के बाजार में ऐतिहासिक 'ब्लैक मंडे'! चांदी ₹9000 से ज्यादा टूटी, 45 सालों की सबसे बड़ी मासिक गिरावट दर्ज!

नई दिल्ली:  साल 2026 के मार्च महीने ने सोने और चांदी के निवेशकों को बड़ा झटका दिया है। घरेलू वायदा बाजार (MCX) से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक, कीमती धातुओं की कीमतों में ऐसी गिरावट देखी गई है जिसे विशेषज्ञ पिछले 45 वर्षों का सबसे बड़ा ‘क्रैश’ मान रहे हैं। सोमवार को एमसीएक्स पर चांदी की कीमतें 4.21% यानी करीब 9,474 रुपये की भारी गिरावट के साथ 2,15,693 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गईं। वहीं, सोने में भी 2,460 रुपये प्रति 10 ग्राम की बड़ी कटौती देखी गई, जिसके बाद भाव 1,36,800 रुपये के स्तर पर सिमट गए। बाजार में आई इस सुनामी के पीछे सबसे बड़ा कारण मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव कम होने के संकेत बताए जा रहे हैं। जैसे ही भू-राजनीतिक अस्थिरता कम होने की उम्मीद जगी, निवेशकों ने ‘सेफ-हेवन’ यानी सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने-चांदी से अपना हाथ खींचना शुरू कर दिया। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाजिर सोना 1.5% गिरकर 4,340.80 डॉलर प्रति औंस पर आ गया, जबकि चांदी में 3.3% की गिरावट दर्ज की गई।45 साल का रिकॉर्ड टूटा, ‘बेयर मार्केट’ की आहटमार्च 2026 का यह महीना इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रहा है क्योंकि इस महीने अब तक दोनों धातुओं की कीमतों में 20% से ज्यादा की गिरावट आई है। यह करीब साढ़े चार दशकों में देखी गई सबसे तेज गिरावट है। तकनीकी रूप से, जब किसी एसेट की कीमत अपने ‘ऑल टाइम हाई’ से 20% या उससे ज्यादा गिर जाती है, तो उसे ‘बेयर मार्केट’ माना जाता है। वर्तमान में सोना और चांदी दोनों इसी दायरे में प्रवेश कर चुके हैं। गिरावट के प्रमुख कारण:विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, इस भारी गिरावट के पीछे चार प्रमुख वैश्विक कारक काम कर रहे हैं: मजबूत अमेरिकी डॉलर: डॉलर के मजबूत होने से अन्य देशों की मुद्राओं के लिए सोना खरीदना महंगा हो गया, जिससे मांग में कमी आई। ऊंची ब्याज दरें: महंगाई के दबाव के कारण केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने की संभावना ने बिना ब्याज देने वाली संपत्तियों (सोना-चांदी) के प्रति आकर्षण कम कर दिया है। मुनाफावसूली: हाल ही में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद निवेशकों ने बाजार से पैसा निकालना शुरू किया, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ा। सेफ हेवन की छवि को झटका: आमतौर पर युद्ध या तनाव के समय सोने के दाम बढ़ते हैं, लेकिन इस बार मजबूत डॉलर और ऊंचे बॉन्ड यील्ड के कारण सोना अपनी साख बरकरार नहीं रख पाया। बाजार जानकारों का मानना है कि अल्पकालिक (Short-term) निवेश करने वालों के लिए यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह ‘करेक्शन’ खरीदारी का एक बेहतर अवसर साबित हो सकता है। फिलहाल, बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है, इसलिए विशेषज्ञों ने चरणबद्ध तरीके से निवेश (Step-by-step investment) करने की सलाह दी है।

मिडिल ईस्ट तनाव से बाजार में हाहाकार! सेंसेक्स 1836 अंक टूटा, निवेशकों के डूबे लाखों करोड़

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू राजनीतिक तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर साफ नजर आया। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली और प्रमुख सूचकांक BSE Sensex और Nifty 50 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट के साथ बंद हुए। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 1836.57 अंक यानी 2.46 प्रतिशत टूटकर 72696.39 पर आ गया, जबकि निफ्टी 601.85 अंक यानी 2.60 प्रतिशत गिरकर 22512.65 पर बंद हुआ। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव और युद्ध जैसे हालात ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ा है। निवेशकों को भारी नुकसान, 13.65 लाख करोड़ डूबेइस बड़ी गिरावट से निवेशकों की संपत्ति में भारी कमी आई है। बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब 14 लाख करोड़ रुपए घट गया और यह 428.76 लाख करोड़ रुपए से गिरकर 415.11 लाख करोड़ रुपए रह गया। इंट्रा डे में बाजार और भी ज्यादा दबाव में दिखा, जहां सेंसेक्स एक समय करीब 1974 अंक तक लुढ़क गया था। वहीं, निफ्टी भी 643 अंकों तक गिर गया था। बाजार में घबराहट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि India VIX में 19 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी आई, जो निवेशकों के बीच बढ़ती चिंता को दर्शाता है। मिडकैप और स्मॉलकैप में ज्यादा मार, सभी सेक्टर दबाव मेंबाजार में गिरावट सिर्फ बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में और ज्यादा कमजोरी देखने को मिली। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स करीब 3.90 प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स 3.94 प्रतिशत गिरा। सेक्टरवार देखें तो कंस्ट्रक्शन, रियल्टी और मेटल सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। बैंकिंग, ऑटो और एफएमसीजी सेक्टर में भी भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि आईटी सेक्टर में अपेक्षाकृत कम कमजोरी देखने को मिली। यह संकेत देता है कि बाजार में व्यापक स्तर पर बिकवाली हुई है और निवेशकों ने जोखिम भरे एसेट्स से दूरी बनानी शुरू कर दी है। तेल कीमतें और होर्मुज संकट बने बड़ी वजहविशेषज्ञों के अनुसार, बाजार में इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल है। Strait of Hormuz में संभावित बाधा से सप्लाई प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है, ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी से देश की अर्थव्यवस्था और कंपनियों की कमाई पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते बयानबाजी और संभावित सैन्य कार्रवाई के संकेतों ने बाजार का माहौल और नकारात्मक कर दिया है। आगे का रुख अनिश्चित, निवेशकों में बढ़ी चिंतामार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता, तब तक बाजार में स्थिरता लौटना मुश्किल है। वैश्विक बाजारों के साथ तालमेल के चलते भारत भी इस दबाव से बच नहीं पा रहा है। फिलहाल बाजार का रुख कमजोर बना हुआ है और निवेशकों के लिए सतर्क रहने की जरूरत है। अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो बाजार में और गिरावट देखने को मिल सकती है।

ऊर्जा सुरक्षा मजबूत! देश के रणनीतिक तेल भंडार पर सरकार का बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बड़ा भरोसा जताया है। संसद में जानकारी देते हुए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री Suresh Gopi ने बताया कि भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में इस समय 3.37 मिलियन मीट्रिक टन से ज्यादा कच्चा तेल मौजूद है। यह कुल भंडारण क्षमता का लगभग 64 प्रतिशत है, जो किसी भी अल्पकालिक आपूर्ति संकट से निपटने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है। सरकार के अनुसार, यह भंडार देश की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के असर को कम करने में अहम भूमिका निभाता है। आईएसपीआरएल के तहत मजबूत भंडारण व्यवस्थासरकार ने Indian Strategic Petroleum Reserves Limited के माध्यम से आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में तीन प्रमुख स्थानों पर रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार स्थापित किए हैं। इनकी कुल क्षमता 5.3 मिलियन मीट्रिक टन है। तटीय क्षेत्रों में स्थित ये भंडार आपातकालीन स्थिति में बफर के रूप में काम करते हैं। मंत्री ने बताया कि इन भंडारों में मौजूद कच्चे तेल की मात्रा स्थिर नहीं रहती, बल्कि बाजार की स्थिति, खपत और आपूर्ति के अनुसार बदलती रहती है। फिलहाल इनमें लगभग 3.372 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल उपलब्ध है, जो देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है। भविष्य की तैयारी, नए भंडारों को मिली मंजूरीऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए सरकार लगातार कदम उठा रही है। जुलाई 2021 में ओडिशा और कर्नाटक में 6.5 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता वाले दो अतिरिक्त रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार स्थापित करने को मंजूरी दी गई थी। इन नए प्रोजेक्ट्स के पूरा होने के बाद भारत की कुल भंडारण क्षमता और बढ़ेगी, जिससे किसी भी वैश्विक संकट के दौरान देश की निर्भरता कम होगी। यह कदम भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयात में विविधता, 41 देशों से तेल की खरीदसरकार ने कच्चे तेल के आयात के स्रोतों में भी बड़ा बदलाव किया है। पहले जहां भारत मुख्य रूप से मध्य पूर्व के देशों पर निर्भर था, वहीं अब आयात को विविध बनाकर जोखिम कम किया गया है। वर्तमान में भारत इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के साथ साथ अमेरिका, नाइजीरिया, अंगोला, कनाडा, ब्राजील और मैक्सिको सहित कुल 41 देशों से कच्चा तेल आयात कर रहा है। खासतौर पर Strait of Hormuz में व्यवधान के बाद यह रणनीति और महत्वपूर्ण हो गई है। अब देश के लगभग 70 प्रतिशत तेल आयात खाड़ी देशों के बाहर से हो रहे हैं, जिससे सप्लाई बाधित होने का खतरा काफी हद तक कम हो गया है।

कॉर्पोरेट सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी, संसद में आया नया संशोधन बिल

नई दिल्ली। वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने सोमवार को लोकसभा में कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश कर दिया। इस विधेयक का उद्देश्य Companies Act 2013 और Limited Liability Partnership Act 2008 में जरूरी बदलाव करना है। सरकार का कहना है कि इन संशोधनों से कॉर्पोरेट क्षेत्र में पारदर्शिता, सुगमता और निवेश को बढ़ावा मिलेगा। विधेयक पेश करते हुए वित्त मंत्री ने इसे आगे की विस्तृत जांच के लिए संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे लोकसभा ने मंजूरी दे दी। उन्होंने बताया कि यह विधेयक दो वर्षों के गहन विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया है और इसमें कंपनी विधि समिति की सिफारिशों को शामिल किया गया है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस और निवेश को मिलेगा बढ़ावावित्त मंत्री ने कहा कि कंपनी अधिनियम निगमन, कॉर्पोरेट प्रशासन, प्रकटीकरण और विघटन से जुड़े नियमों को नियंत्रित करता है, जबकि एलएलपी अधिनियम व्यवसायों को अधिक लचीला ढांचा प्रदान करता है। इस संशोधन के जरिए दोनों कानूनों को और अधिक सरल और प्रभावी बनाया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी विधि समिति में उद्योग संगठनों, पेशेवर संस्थानों, कानूनी और लेखा विशेषज्ञों को शामिल किया गया था, जिनकी सिफारिशों के आधार पर विधेयक तैयार हुआ है। रिपोर्ट को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए भी जारी किया गया था, जिसके बाद प्राप्त सुझावों को ध्यान में रखकर अंतिम मसौदा तैयार किया गया। विपक्ष का विरोध, सीएसआर प्रावधानों पर उठे सवालहालांकि, विधेयक पेश किए जाने से पहले विपक्ष ने इसका विरोध किया। कांग्रेस सांसद Manish Tewari, टीएमसी के Saugata Roy और डीएमके की T. Sumathy ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी सीएसआर प्रावधानों को कमजोर कर सकता है। इन आरोपों का जवाब देते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि संशोधन का उद्देश्य नियमों को आसान बनाना और निवेश को आकर्षित करना है, न कि किसी प्रावधान को कमजोर करना। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इससे कॉर्पोरेट गवर्नेंस और मजबूत होगा। आईबीसी संशोधन की भी तैयारी, समाधान प्रक्रिया होगी तेजसरकार कॉर्पोरेट क्षेत्र में सुधार के लिए अन्य कदम भी उठा रही है। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिवालियापन और दिवालिया संहिता में संशोधन को मंजूरी दी है, जिससे चालू सत्र में नया विधेयक पेश करने का रास्ता साफ हो गया है। यह प्रस्ताव Insolvency and Bankruptcy Code में सुधार से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य कॉर्पोरेट समाधान प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाना है। यह संशोधन Baijayant Panda की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की सिफारिशों पर आधारित है, जिसने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

उज्ज्वला योजना का असर! देशभर में LPG कनेक्शन का विस्तार, सप्लाई भी हुई बेहतर

नई दिल्ली। देश में स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने वाली Pradhan Mantri Ujjwala Yojana ने एलपीजी पहुंच के मामले में बड़ा बदलाव किया है। सरकार के मुताबिक, इस योजना के लागू होने के बाद अब देश में लगभग हर घर तक एलपीजी कनेक्शन पहुंच चुका है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 1 मार्च 2026 तक देशभर में करीब 10.56 करोड़ पीएमयूवाई कनेक्शन जारी किए जा चुके हैं। इनमें महाराष्ट्र में 52.60 लाख और गुजरात में 43.92 लाख कनेक्शन शामिल हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि योजना ने खासतौर पर गरीब और ग्रामीण परिवारों तक स्वच्छ ईंधन पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। सरकार का लक्ष्य, हर जरूरतमंद तक एलपीजी कनेक्शनसरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में 25 लाख अतिरिक्त एलपीजी कनेक्शन देने की मंजूरी भी दी है, ताकि लंबित आवेदनों को जल्द पूरा किया जा सके। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री Suresh Gopi ने राज्यसभा में बताया कि 1 मार्च 2026 तक महाराष्ट्र में करीब 0.48 लाख और गुजरात में लगभग 0.87 लाख नए कनेक्शन दिए जा चुके हैं। योजना की शुरुआत से पहले देश में एलपीजी कवरेज करीब 62 प्रतिशत थी, जो अब काफी बढ़कर लगभग सार्वभौमिक स्तर पर पहुंच गई है। इससे ग्रामीण और गरीब परिवारों को धुएं से मुक्ति मिली है और स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ा है। उपयोग बढ़ा, वितरण नेटवर्क हुआ मजबूतपीएमयूवाई के विस्तार के साथ ही एलपीजी के उपयोग में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। जहां 2021-22 में एक लाभार्थी परिवार औसतन 3.68 सिलेंडर सालाना इस्तेमाल करता था, वहीं 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 4.80 सिलेंडर हो गया है। यह दर्शाता है कि लोग अब पारंपरिक ईंधनों की बजाय एलपीजी को तेजी से अपना रहे हैं। साथ ही, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने सप्लाई व्यवस्था को भी मजबूत किया है। देश में अब कुल 25,605 एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर काम कर रहे हैं, जिनमें से 17,677 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। इनकी सप्लाई के लिए 214 बॉटलिंग प्लांट सक्रिय हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों तक भी समय पर सिलेंडर पहुंच रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस, सब्सिडी से मिल रही राहतसरकार ने ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में एलपीजी की पहुंच बढ़ाने के लिए पिछले 10 वर्षों में बड़े पैमाने पर काम किया है। अप्रैल 2016 से फरवरी 2026 के बीच 8,037 नए डिस्ट्रीब्यूटर शुरू किए गए, जिनमें से 93 प्रतिशत यानी 7,444 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। इसके अलावा, सरकार उपभोक्ताओं को आर्थिक राहत देने के लिए सब्सिडी भी प्रदान कर रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में 14.2 किलोग्राम के सिलेंडर पर 300 रुपए तक की सब्सिडी दी जा रही है, जो अधिकतम 9 रिफिल तक लागू है। साथ ही ‘सक्षम’ पहल के तहत ऊर्जा बचत और टिकाऊ विकास को लेकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है।

ऊर्जा और कृषि पर सरकार का फोकस, Narendra Modi बोले-भारत आत्मनिर्भरता की राह पर

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी तैयारी मजबूत कर ली है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने संसद में स्पष्ट किया कि देश के पास उर्वरकों का पर्याप्त भंडार मौजूद है और आयात के स्रोतों को भी विविध बनाया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में किसानों को किसी भी संकट से बचाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया कि खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की उपलब्धता पूरी तरह सुनिश्चित की गई है, जिससे खेती पर किसी तरह का नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। साथ ही ‘मेक इन इंडिया’ के तहत देश में ही उर्वरकों के उत्पादन को बढ़ावा दिया गया है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो रही है और किसानों को समय पर खाद मिल रही है। किसानों को राहत, सौर पंप और योजनाओं से मजबूतीप्रधानमंत्री ने बताया कि सरकार ने किसानों की लागत घटाने और उन्हें ऊर्जा के वैकल्पिक साधन देने के लिए बड़े स्तर पर काम किया है। डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए अब तक 22 लाख से ज्यादा सौर पंप किसानों को दिए जा चुके हैं। इससे न सिर्फ किसानों का खर्च कम हुआ है, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले से ही उर्वरकों की जरूरत का आकलन कर लिया है और पर्याप्त स्टॉक बनाए रखा है, ताकि किसी भी वैश्विक संकट का असर किसानों तक न पहुंचे। यह कदम देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा रहा है। इथेनॉल मिश्रण से घटा तेल आयात, ऊर्जा सुरक्षा को बलऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत को बड़ी सफलता इथेनॉल मिश्रण से मिल रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि इथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण देश हर साल लगभग 4.5 करोड़ बैरल तेल के आयात को कम करने में सफल हो रहा है। यह न सिर्फ विदेशी मुद्रा की बचत कर रहा है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में उतार चढ़ाव से भी देश को बचा रहा है। सरकार वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में केंद्र ने राज्यों को 15,000 ई बसें भी उपलब्ध कराई हैं, जिससे स्वच्छ और टिकाऊ परिवहन को बढ़ावा मिल रहा है। ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्र के लिए रणनीति, अर्थव्यवस्था मजबूतप्रधानमंत्री ने कहा कि ऊर्जा किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है और पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में सरकार ने संभावित व्यवधानों से निपटने के लिए व्यापक रणनीति बनाई है। हाल ही में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक में उर्वरकों के वैकल्पिक स्रोतों, बिजली संयंत्रों में पर्याप्त कोयला भंडार और जरूरी आयात के स्रोतों में विविधता लाने पर चर्चा की गई। रसायन, फार्मास्यूटिकल्स और पेट्रोकेमिकल्स जैसे क्षेत्रों के लिए भी नई रणनीतियां तैयार की जा रही हैं। साथ ही भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए नए निर्यात बाजार विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि देश की अर्थव्यवस्था किसी भी वैश्विक संकट में मजबूत बनी रहे।

एविएशन सेक्टर पर दबाव, IndiGo के भविष्य को लेकर Goldman Sachs की चेतावनी

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन InterGlobe Aviation को लेकर वैश्विक ब्रोकरेज Goldman Sachs ने सतर्क रुख अपनाया है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार चढ़ाव के बीच कंपनी के मुनाफे पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है। विश्लेषकों ने इंडिगो के टारगेट प्राइस को 13.33 प्रतिशत घटाकर 5,200 रुपए कर दिया है, जो पहले 6,000 रुपए था। हालांकि, इसके बावजूद ब्रोकरेज ने स्टॉक पर अपनी बाय रेटिंग बरकरार रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा वैश्विक हालात और यात्रा क्षेत्र में अनिश्चितता के चलते कंपनी के आय के अनुमान कमजोर हो गए हैं और निकट भविष्य में प्रदर्शन दबाव में रह सकता है। वित्त वर्ष 27 में मुनाफे की उम्मीद नहीं, आय पर संकटविश्लेषकों ने साफ कहा है कि लगातार बदलती कच्चे तेल की कीमतें एयरलाइन सेक्टर के लिए सबसे बड़ा जोखिम बनी हुई हैं। इसी वजह से IndiGo के लिए वित्त वर्ष 2027 में मुनाफा होने की संभावना बेहद कम है। कंपनी के शेयर में उतार चढ़ाव जारी रहने की भी चेतावनी दी गई है। जून तिमाही के लिए अंतरराष्ट्रीय उड़ान क्षमता के अनुमान, खासकर मिडिल ईस्ट रूट्स पर, घटा दिए गए हैं। खाड़ी देशों में बार बार हवाई क्षेत्र बंद होने से उड़ानों पर असर पड़ा है, जिससे यात्रियों की संख्या और राजस्व दोनों प्रभावित हो सकते हैं। जेट ईंधन महंगा, लागत बढ़ने से दबावएयरलाइन उद्योग में जेट ईंधन सबसे बड़ा खर्च होता है और मौजूदा हालात में इसकी कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद आपूर्ति संबंधी जोखिम और निर्यात प्रतिबंधों के कारण प्रोसेस्ड ईंधन की कीमतें कच्चे तेल से भी ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा असर इंडिगो की लागत पर पड़ रहा है। यही वजह है कि गोल्डमैन सैक्स ने कंपनी के परिचालन आय यानी ईबीआईटीडीआर के अनुमानों में भी भारी कटौती की है। वित्त वर्ष 2026 के लिए यह अनुमान घटाकर 13,700 करोड़ रुपए और 2027 के लिए 15,900 करोड़ रुपए कर दिया गया है, जो पहले क्रमशः 18,300 करोड़ और 25,800 करोड़ रुपए था। प्रति शेयर आय के अनुमान में भी तेज गिरावट दर्ज की गई है। शेयर में गिरावट, निवेशकों की नजर भविष्य परबाजार में भी इस रिपोर्ट का असर साफ दिखाई दिया। इंडिगो का शेयर दोपहर कारोबार में करीब 5.75 प्रतिशत गिरकर 3,910 रुपए पर आ गया। बीते एक महीने में यह शेयर लगभग 20 प्रतिशत तक टूट चुका है। हालांकि, ब्रोकरेज का मानना है कि लंबी अवधि में कंपनी की मजबूती उसके लागत नियंत्रण और बैलेंस शीट प्रबंधन पर निर्भर करेगी। निवेशकों के लिए फिलहाल सबसे बड़ा फोकस आय में स्थिरता और वैश्विक हालात में सुधार पर रहेगा।

1 अप्रैल से एटीएम नियमों में होगा बड़ा बदलाव, निकासी सीमा और चार्ज पर पड़ेगा असर

नई दिल्ली। अगले महीने 1 अप्रैल 2026 से बैंकिंग नियमों में बड़े बदलाव लागू होने जा रहे हैं, जो सीधे एटीएम इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को प्रभावित करेंगे। इन बदलावों के तहत एचडीएफसी बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बंधन बैंक ने कैश निकासी सीमा, फ्री ट्रांजैक्शन लिमिट और चार्ज को लेकर नई व्यवस्था तैयार की है। एचडीएफसी बैंक ने फ्री ट्रांजैक्शन लिमिट में किया बदलावएचडीएफसी बैंक ने घोषणा की है कि अब एटीएम कैश विथड्रॉल UPI आधारित फ्री ट्रांजैक्शन लिमिट से जोड़ा जाएगा। इसका मतलब है कि तय फ्री लिमिट पार होने के बाद हर अतिरिक्त एटीएम ट्रांजैक्शन पर ग्राहकों को 23 रुपये और टैक्स देना होगा। नए नियम मेट्रो शहरों में तीन फ्री ट्रांजैक्शन और नॉन-मेट्रो शहरों में पांच फ्री ट्रांजैक्शन तक ही लागू होंगे। इसके बाद किए जाने वाले हर लेनदेन पर अतिरिक्त शुल्क लगेगा। PNB ने घटाई ATM निकासी सीमाPunjab National Bank ने अपने कुछ डेबिट और प्रीमियम कार्ड्स पर कैश निकासी सीमा घटाने का फैसला किया है। चुनिंदा डेबिट कार्ड्स पर अब ग्राहक पहले की तुलना में आधी राशि, यानी 50,000 रुपये प्रतिदिन, ही निकाल सकेंगे। वहीं कुछ प्रीमियम कार्ड्स पर दैनिक निकासी सीमा घटाकर 75,000 रुपये कर दी गई है। पहले यह सीमा 1.5 लाख रुपये तक थी। यह बदलाव 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगा। बंधन बैंक ने भी बदले नियमबंधन बैंक ने भी अपने ग्राहकों के लिए ATM ट्रांजैक्शन से जुड़े नियमों में बदलाव किया है। अब ग्राहक बैंक के अपने एटीएम पर महीने में सिर्फ 5 फ्री फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन कर सकेंगे। अन्य बैंकों के एटीएम से यह सीमा घटाकर 3 फ्री ट्रांजैक्शन कर दी गई है। तय सीमा पार होने पर हर अतिरिक्त लेनदेन पर 23 रुपये का चार्ज लागू होगा।

मिडिल ईस्ट तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 60% से ज्यादा उछला

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में तीव्र हलचल पैदा कर दी है। ईरान से संबद्ध युद्ध जैसे हालातों के बाद अंतरराष्ट्रीय पैनल ब्रेंट क्रूड के द्वीप में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। करीब 70 डॉलर प्रति डॉलर का कारोबार ब्रेंट अब 112 डॉलर प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया है। वहीं, भारत के मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में कच्चे तेल के लिए 3 फीसदी से ज्यादा उछाल 9,310 रुपये प्रति शेयर तक पहुंच गया। पिछले एक महीने में ही जिले में 56 प्रतिशत की तेजी ने बाजार की चमक को साफ तौर पर शामिल कर दिया है। अमेरिका का वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट भी करीब 98.75 डॉलर प्रति शेयर पर पहुंच गया, जिसमें कोडो सत्र में 2 फीसदी से ज्यादा की तेजी देखी गई। होर्मुज पर खतरा, अल्ट्रासाउंड बाधित होने का डरपश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा मंडरा रहा है। इस समुद्री मार्ग से वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा शामिल है, लेकिन स्थिर बंदरगाहों में यहां से बाधा उत्पन्न हो रही है। कई तेल उत्पादक संयंत्रों में उत्पादन की नौबत आ गई है, जिससे बाजार में ऑक्सफोर्ड को लेकर चिंता बढ़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस मार्ग से तेल की आपूर्ति सामान्य स्तर के केवल 5 प्रतिशत तक सीमित रह सकती है और स्थिति सामान्य होने में कम से कम एक महीने का समय लग सकता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार दबाव बना हुआ है। अमेरिका-ईरान माजी से बड़ी चिंतायह संकट और गंभीर बना हुआ है अमेरिका और ईरान के बीच भारी संकट। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य में 48 घंटे के भीतर पूरी तरह से चेतावनी दी थी। उन्होंने साफ कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो ईरान के पावर प्लांट्स को बंद कर दिया जाएगा। दूसरी ओर, ईरान ने भी पलटवार करते हुए खाड़ी देशों के ऊर्जा पर्यावरण पर हमले को खतरनाक बना दिया है। हालाँकि ईरान का दावा है कि होर्मुज़ पूरी तरह से बंद नहीं है और साथियों की छुट्टी जारी है, लेकिन सुरक्षा के दावे से सख्त कदम उठाए गए हैं, जिससे स्थिति बेहद खराब हो गई है। आगे और बढ़ोतरी संभावित है, उत्पादन में भारी गिरावट का अनुमान हैवैश्विक वित्तीय संस्था गोल्डमैन सैक्स ने भी इस संकट को देखते हुए अपने अनुमान में बदलाव किया है। संस्था ने 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड का औसत अनुमान 77 डॉलर से 85 डॉलर प्रति आँकड़ा कर दिया है, जबकि मार्च-अप्रैल के दौरान लगभग 110 डॉलर प्रति आँकड़े के आसपास रहने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में कच्चे तेल के उत्पादन में नुकसान 1.1 करोड़ कोटा प्रति दिन से लेकर 1.7 करोड़ कोटा प्रति दिन तक पहुंच सकता है। हालाँकि, एक राहत की बात यह है कि अमेरिका और यूरोप में अभी भी कच्चे तेल का भंडार है, जिससे संकेत मिलता है कि संघर्ष पहले ही शुरू हो चुका है, जो कि विश्वव्यापी राक्षस माँग से अधिक है।

पश्चिम एशिया युद्ध का बड़ा असर! 40+ तेल-गैस ठिकाने तबाह, IEA अधिकारी का खुलासा

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने अब पूरी दुनिया के ऊर्जा संतुलन को झकझोर कर रख दिया है। International Energy Agency के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर Fatih Birol ने ऑस्ट्रेलिया के Canberra में बताया कि इस संघर्ष के चलते नौ देशों में फैले 40 से अधिक तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर को गंभीर या अत्यंत गंभीर नुकसान हुआ है। इसका सीधा असर वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति पर पड़ा है और हालात ऐसे बन गए हैं कि कोई भी देश इस संकट से अछूता नहीं रह पाएगा। सप्लाई में आई इस बड़ी बाधा ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है और कीमतों में तेज उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है। 1970 के दशक से भी बड़ा खतरा, रिकॉर्ड सप्लाई प्रभावितआईईए प्रमुख ने इस संकट को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि इसकी तुलना 1970 के दशक के तेल संकट और Russia-Ukraine War के बाद आए गैस संकट को मिलाकर की जा सकती है। उन्होंने बताया कि 1970 के दशक में करीब 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन की सप्लाई प्रभावित हुई थी, जबकि मौजूदा हालात में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है। यह स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए खतरे की घंटी है। बढ़ती मांग और घटती सप्लाई के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका भी तेज हो गई है, जिससे आम लोगों के साथ साथ उद्योग जगत पर भी असर पड़ सकता है। तेल ही नहीं, कई जरूरी सेक्टर भी प्रभावितइस युद्ध का असर सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कई अहम उद्योग भी संकट में आ गए हैं। पेट्रोकेमिकल्स, उर्वरक, सल्फर और हीलियम जैसे जरूरी उत्पादों की सप्लाई प्रभावित होने लगी है। इन उत्पादों की कमी का असर कृषि, मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी क्षेत्रों पर पड़ेगा। यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो खाद्य उत्पादन और औद्योगिक गतिविधियों में गिरावट आ सकती है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट की जड़इस पूरे संकट की सबसे बड़ी वजह Strait of Hormuz का लगभग ठप हो जाना है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस का निर्यात होता है। इसके बंद होने से एशिया और यूरोप के कई देशों में ईंधन आपूर्ति पर गहरा असर पड़ा है। हालात को संभालने के लिए आईईए ने अपने सदस्य देशों के आपातकालीन भंडार से रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने का फैसला लिया है और आगे भी जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त तेल जारी करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल अस्थायी समाधान है और स्थायी राहत तभी मिलेगी जब इस समुद्री मार्ग को फिर से सुचारू किया जाएगा।