क्षणिक लोकप्रियता की दौड़ में सिमटता साहित्यिक मूल्य

– डॉ. प्रियंका सौरभ डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति के स्वरूप को अभूतपूर्व गति और विस्तार दिया है। आज हर व्यक्ति के हाथ में एक मंच है—एक ऐसा मंच, जहाँ वह अपनी बात तुरंत लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। यह लोकतंत्रीकरण अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। परंतु हर शक्ति के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। दुर्भाग्यवश, इस जिम्मेदारी का संतुलन कई बार बिगड़ता हुआ दिखाई देता है, विशेषकर तब जब उद्देश्य अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि केवल लोकप्रियता रह जाता है। रील संस्कृति इसी असंतुलन का एक प्रमुख उदाहरण है। कुछ सेकंड के वीडियो में प्रभाव पैदा करने की होड़ ने अभिव्यक्ति को त्वरित, संक्षिप्त और कई बार सतही बना दिया है। साहित्य, जो मूलतः धैर्य, गहराई और चिंतन की मांग करता है, वह इस त्वरित उपभोग की संस्कृति में स्वयं को असहज महसूस कर रहा है। अधूरी पंक्तियाँ, संदर्भहीन उद्धरण और बनावटी भाव—ये सब मिलकर साहित्य को एक “उत्पाद” में बदल रहे हैं, जिसका उद्देश्य केवल ध्यान आकर्षित करना है। आज “वायरल होना” ही सफलता का पैमाना बन गया है। इस मानसिकता ने सृजन की प्रक्रिया को प्रभावित किया है। लेखक अब यह सोचकर लिखता है कि क्या यह सामग्री लोगों को तुरंत आकर्षित करेगी, न कि यह कि क्या यह विचार समाज के लिए सार्थक है। परिणामस्वरूप, गहराई की जगह चटकपन और संवेदना की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। यह प्रवृत्ति न केवल साहित्य के साथ अन्याय है, बल्कि समाज के बौद्धिक स्तर को भी प्रभावित करती है। साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। वह समाज का दर्पण है, जो उसकी वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है और उसके अंतर्विरोधों को उजागर करता है। कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया, तुलसीदास ने आस्था और मर्यादा का संदेश दिया, प्रेमचंद ने समाज के यथार्थ को उजागर किया और महादेवी वर्मा ने संवेदनाओं की सूक्ष्मता को शब्द दिए। इन सभी रचनाकारों की कृतियाँ समय की कसौटी पर इसलिए खरी उतरीं क्योंकि उनमें गहराई, ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता थी। इसके विपरीत, आज का एक बड़ा वर्ग साहित्य को केवल प्रस्तुति का माध्यम मान बैठा है। शब्दों की सुंदरता से अधिक महत्व उनके प्रदर्शन को दिया जा रहा है। रील्स में प्रस्तुत की जाने वाली कविताएँ कई बार न तो मौलिक होती हैं और न ही उनमें कोई गहन भाव होता है। वे केवल इस उद्देश्य से बनाई जाती हैं कि दर्शक कुछ क्षणों के लिए आकर्षित हों और “लाइक” या “शेयर” कर दें। रील संस्कृति का एक और चिंताजनक पहलू है—अभिव्यक्ति की शालीनता में गिरावट। भाषा का स्तर, उच्चारण की स्पष्टता और प्रस्तुति की गरिमा—ये सभी तत्व किसी भी साहित्यिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण अंग होते हैं। लेकिन जब इनकी अनदेखी की जाती है, तो साहित्य का स्वरूप विकृत हो जाता है। कई बार तो स्थिति यह होती है कि मूल रचना का भाव ही पूरी तरह बदल जाता है। परिधान और दृश्यात्मक प्रस्तुति को लेकर भी बहस तेज हो गई है। यह स्वीकार करना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन हर अधिकार के साथ मर्यादा और जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। जब साहित्य जैसे गंभीर विषय को प्रस्तुत किया जाता है, तो उसमें एक संतुलन और शालीनता अपेक्षित होती है। दुर्भाग्यवश, कई बार यह संतुलन केवल दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश में खो जाता है, जिससे साहित्य की गंभीरता प्रभावित होती है। हालाँकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम इस पूरी स्थिति को एकांगी दृष्टिकोण से न देखें। सोशल मीडिया ने कई ऐसे प्रतिभाशाली रचनाकारों को मंच दिया है, जो पारंपरिक प्रकाशन व्यवस्था तक नहीं पहुँच पाते थे। आज छोटे-छोटे शहरों और गाँवों से भी लोग अपनी रचनाएँ साझा कर रहे हैं और पहचान बना रहे हैं। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। दरअसल, समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके उपयोग के तरीके में है। रील्स भी एक प्रभावी माध्यम हो सकती हैं, यदि उनका उपयोग सार्थक साहित्य प्रस्तुत करने के लिए किया जाए। कुछ रचनाकार इस दिशा में अच्छा कार्य भी कर रहे हैं—वे संक्षिप्तता में भी गहराई बनाए रखते हैं और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। यह दर्शाता है कि यदि नीयत सही हो, तो कोई भी माध्यम साहित्य के प्रसार का सशक्त उपकरण बन सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाएँ। हमें न तो रील संस्कृति को पूरी तरह खारिज करना चाहिए और न ही उसे बिना किसी आलोचना के स्वीकार करना चाहिए। इसके बजाय, हमें यह समझने की जरूरत है कि किस प्रकार इस माध्यम का उपयोग साहित्य के उत्थान के लिए किया जा सकता है। शिक्षा संस्थानों की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि छात्रों को प्रारंभ से ही साहित्य की गहराई और उसकी सामाजिक भूमिका के बारे में जागरूक किया जाए, तो वे केवल सतही सामग्री से प्रभावित नहीं होंगे। साहित्यिक संगठनों और मंचों को भी चाहिए कि वे डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हुए गुणवत्ता युक्त सामग्री को बढ़ावा दें और रचनाकारों को सही दिशा प्रदान करें। इसके साथ ही, दर्शकों और पाठकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब तक दर्शक सतही सामग्री को बढ़ावा देते रहेंगे, तब तक उसका उत्पादन भी जारी रहेगा। यदि वे गुणवत्ता और गहराई को प्राथमिकता देंगे, तो स्वाभाविक रूप से रचनाकार भी उसी दिशा में प्रयास करेंगे। अंततः, यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है—रचनाकारों, दर्शकों, शिक्षकों और समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की। हमें यह तय करना होगा कि हम साहित्य को क्षणिक लोकप्रियता की भेंट चढ़ाना चाहते हैं या उसे उसकी गरिमा और गहराई के साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं। रील संस्कृति को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे दिशा दी जा सकती है। यदि हम सजग रहें और संतुलन बनाए रखें, तो यही माध्यम साहित्य के प्रसार का एक प्रभावी साधन भी बन सकता है। साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं है; यह समाज की चेतना, उसकी संवेदनाओं और उसके मूल्यों का प्रतिबिंब है। यदि यह प्रतिबिंब धुंधला पड़ जाएगा, तो समाज की सोच भी अस्पष्ट हो जाएगी। इसलिए यह समय है सजग होने का, साहित्य की गरिमा को पहचानने का और उसे डिजिटल युग में भी उसी सम्मान के साथ आगे
क्या डिजिटल राजनैतिक प्रचार की कोई नैतिक सीमा है?

– डॉ. शैलेश शुक्ला राजनीतिक प्रचार उतना ही पुराना है जितनी कि राजनीति स्वयं। प्राचीन रोम में दीवारों पर संदेश लिखे जाते थे। मध्यकाल में राजा अपनी शक्ति का प्रदर्शन भव्य स्मारकों और अनुष्ठानों के माध्यम से करते थे। बीसवीं सदी में रेडियो, टेलीविज़न और समाचार पत्र राजनीतिक प्रचार के मुख्य माध्यम बने। लेकिन इन सभी युगों में एक बात साझी थी — प्रचार की एक सार्वजनिक दृश्यता और उसके साथ एक निहित जवाबदेही। आज, डिजिटल राजनीतिक प्रचार ने इस जवाबदेही की अवधारणा को ही उलट दिया है। जब प्रचार अदृश्य हो, व्यक्तिगत हो, तात्कालिक हो, और किसी भी तथ्यात्मक जाँच से मुक्त हो — तो प्रश्न उठता है कि क्या इसकी कोई नैतिक सीमा है? और यदि है, तो उसे कौन तय करेगा और कौन लागू करेगा? नैतिकता के प्रश्न पर विचार करने से पहले यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राजनीतिक प्रचार और राजनीतिक संवाद के बीच की रेखा स्पष्ट नहीं है। हर राजनेता अपने विचारों को श्रेष्ठ और विरोधी के विचारों को निकृष्ट प्रस्तुत करता है — यह राजनीति का स्वाभाविक अंग है। नैतिक समस्या तब शुरू होती है जब प्रचार झूठ पर आधारित हो, जब वह लोगों को हेरफेर करे बजाय सूचित करने के, और जब वह समाज में नफरत, विभाजन, या हिंसा को बढ़ावा दे। डिजिटल राजनीतिक प्रचार की नैतिक समस्याओं की पहली श्रेणी है — असत्य और भ्रामक जानकारी का जानबूझकर प्रसार। जब कोई राजनीतिक दल या उसका समर्थक यह जानते हुए कि कोई बात असत्य है, उसे सोशल मीडिया पर फैलाता है ताकि मतदाताओं की राय को प्रभावित किया जा सके — यह नैतिक दृष्टि से स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है। एमआईटी के 2018 के अध्ययन ने प्रमाणित किया कि असत्य सूचनाएँ ट्विटर पर 70 प्रतिशत अधिक रीट्वीट होती हैं। यह लोकतंत्र की उस बुनियाद पर सीधा हमला है जिसके अनुसार नागरिक सही जानकारी के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें। दूसरी नैतिक समस्या है व्यक्तिगत डेटा का बिना सहमति के राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ प्रकरण इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। इस कंपनी ने करीब 87 मिलियन फेसबुक उपयोगकर्ताओं के डेटा का उपयोग करके लोगों के मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाए और उनकी कमज़ोरियों को लक्षित करने वाले राजनीतिक विज्ञापन दिखाए। यह केवल गोपनीयता का उल्लंघन नहीं था — यह मानवीय स्वायत्तता और स्वतंत्र इच्छा पर हमला था। जब एक प्रणाली यह तय करने लगती है कि आपके मन में कौन सा डर है और फिर उसी डर को और गहरा करने वाला राजनीतिक संदेश आप तक पहुँचाती है, तो आपकी ‘स्वतंत्र पसंद’ वास्तव में कितनी स्वतंत्र है? तीसरी नैतिक समस्या है सांप्रदायिक या जातीय विद्वेष को भड़काने के लिए डिजिटल प्रचार का उपयोग। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध 2017 में हुई हिंसा में फेसबुक की भूमिका को संयुक्त राष्ट्र की तथ्य-अन्वेषण टीम ने अपनी 2018 की रिपोर्ट में ‘निर्णायक’ बताया। 700,000 से अधिक रोहिंग्या को बांग्लादेश भागना पड़ा। 2022 में एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक विस्तृत रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि मेटा के एल्गोरिदम ने रोहिंग्या-विरोधी नफरत भरी सामग्री को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। यह एक चरम उदाहरण है, लेकिन यह दर्शाता है कि डिजिटल राजनीतिक प्रचार में ‘नफरत’ एक हथियार बन सकती है जिसके परिणाम जीवन और मृत्यु की रेखा तक पहुँच सकते हैं। नैतिक सीमाओं के प्रश्न पर तीन मुख्य दृष्टिकोण हैं। पहला ‘बाज़ार-आधारित’ दृष्टिकोण यह मानता है कि सूचना के मुक्त बाज़ार में अच्छे विचार बुरे विचारों को हरा देंगे। दूसरा ‘सरकार-नियंत्रण’ का दृष्टिकोण मानता है कि सरकार को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। तीसरा ‘मंच-उत्तरदायित्व’ का दृष्टिकोण मानता है कि डिजिटल मंचों को स्वयं अपने नैतिक मानक तय करने और लागू करने चाहिए। इन तीनों दृष्टिकोणों की अपनी-अपनी सीमाएँ और जोखिम हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अत्यधिक नियंत्रण सत्ताधारी दलों को विपक्षी आवाज़ों को दबाने का अवसर दे सकता है — यह जोखिम भारत जैसे देश में विशेष रूप से प्रासंगिक है। ‘माइक्रोटार्गेटिंग’ की नैतिकता पर विशेष विचार आवश्यक है। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ के पूर्व सीईओ अलेक्जेंडर निक्स ने 2016 में एक साक्षात्कार में बताया था कि उनकी कंपनी के पास अमेरिका के 230 मिलियन वयस्कों पर 4,000 से 5,000 ‘डेटा पॉइंट’ थे और वे हर व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रोफाइल बनाते थे। यदि इस डेटा का उपयोग केवल लोगों को उनकी पहचानी गई कमज़ोरियों पर प्रहार करके एक निश्चित तरीके से वोट देने के लिए प्रेरित करने में किया जाए, तो यह सूचना नहीं, मनोवैज्ञानिक हेरफेर है — जो नैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य है। डिजिटल मंचों की नैतिक ज़िम्मेदारी भी इस प्रश्न का एक केंद्रीय हिस्सा है। फेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ्रांसेस हाउजेन ने अपनी सीनेट गवाही में कहा था, “फेसबुक ने बार-बार अपने मुनाफे और लोगों की सुरक्षा के बीच टकराव में मुनाफे को चुना। परिणाम एक ऐसी प्रणाली है जो विभाजन, उग्रवाद और ध्रुवीकरण को बढ़ाती है।” जब ये कंपनियाँ राजनीतिक विज्ञापनों से अरबों डॉलर कमाती हैं, तो उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ‘तटस्थ मंच’ का तर्क खोखला है — जब कोई मंच अपने एल्गोरिदम के माध्यम से तय करता है कि कौन सी सामग्री करोड़ों लोगों तक पहुँचेगी, तो वह संपादकीय निर्णय ले रहा है। नागरिक समाज और पत्रकारिता की भूमिका भी नैतिक सीमाओं को परिभाषित और लागू करने में महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र तथ्य-परीक्षण संस्थाएँ, निगरानी समूह, और खोजी पत्रकार डिजिटल प्रचार के दुरुपयोग को उजागर करने में अपरिहार्य भूमिका निभाते हैं। भारत में ऑल्ट न्यूज़, बूम, और अन्य संस्थाएँ यह काम करती हैं। यूरोपीय संघ के ‘कोड ऑफ प्रैक्टिस ऑन डिसइन्फर्मेशन’ और यूनेस्को की ‘इंटरनेट यूनिवर्सलिटी इंडिकेटर्स’ जैसे दस्तावेज़ नैतिक सिद्धांतों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को रेखांकित करते हैं — जैसे पारदर्शिता, सत्यता, और नफरत की अपील के लिए कोई स्थान नहीं। अंतिम और शायद सबसे महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न यह है — क्या राजनीतिक दलों में स्वयं नैतिक प्रचार का संकल्प होना चाहिए? कानून और नियामक संस्थाएँ अपना काम करें लेकिन अंततः एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि राजनेता स्वयं यह तय करें कि वे क्या करेंगे और क्या नहीं — केवल इसलिए नहीं कि कानून मना करता है, बल्कि इसलिए कि यह सही है। डिजिटल राजनीतिक प्रचार की कोई भी नैतिक सीमा तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक कि राजनीतिक नेता, दल, और उनके समर्थक
भारत: अस्थिर दुनिया में आत्म निर्भरता जरूरी

– प्रो. महेश चंद गुप्तादुनिया अब अलग-अलग बिखरे देशों का नक्शा मात्र नहीं रही है। यह एक ऐसा तंत्र बन गई है जिसमें कहीं भी हलचल होती है तो उसकी तरंगें दुनिया के हर कोने तक पहुंचती हैं। हाल में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच टकराव की स्थिति के बाद पैदा हुए तनाव ने इस सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है। इससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध से भी यह सबक मिल चुका है कि जंग किसी एक भूभाग तक सीमित नहीं रहती। उसके असर सीमाओं से परे जाते हैं। इस बात को हम लागू होते देख रहे हैं। भारत इस अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष का हिस्सा नहीं है लेकिन उसका असर हमारे यहां साफ दिखाई दे रहा है। पेट्रोल और एलपीजी की आपूर्ति में अस्थिरता, छोटे उद्योगों का ठप पड़ना, निर्यात पर असर—ये सब संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक अस्थिरता का बोझ हम भी ढो रहे हैं। दुनिया इतनी छोटी हो चुकी है कि कई लोग इसकी तुलना एक गांव से भी करते हैं। मानना ही होगा कि यह एक ऐसा साझा घर बन चुकी है, जिसकी एक दीवार पर आग लगे तो दूसरी दीवार पर बैठे लोग भी उसकी आंच महसूस करते हैं। यही वजह है कि ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। उसकी छाया हमारे रसोईघर, बाजार और छोटे-छोटे काम-धंधों तक आ पहुंची है। भारत की नीति स्पष्ट रूप से शांति की है लेकिन वैश्विक व्यवस्था में उसकी भागीदारी इतनी गहरी है कि किसी भी तनाव के असर से बचना संभव नहीं है। शहरों में ठेले पर चाय बेचने वाला हो या मिठाई की दुकान चलाने वाला हलवाई, हर किसी के काम पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। गैस सिलेंडर की बुकिंग में देरी अब सिर्फ एक असुविधा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कमाई पर चोट बनती जा रही है। इसका बड़ा कारण मूलभूत जरूरतों के लिए हमारा अन्य देशों पर निर्भर होना है। बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए इतने अधिक बाहरी स्रोतों पर निर्भर हो चुके हैं कि कहीं भी हलचल हो और हमारी जमीन हिलने लगे? यह सच है कि हमारी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आज भी आयात किए गए तेल और गैस से पूरा होता है। खाड़ी क्षेत्र में तनातनी बढ़ते ही सप्लाई चेन पर दबाव पड़ता है और उसका सीधा असर हमारे घरों तक पहुंचता है। यह निर्भरता केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि रणनीतिक कमजोरी भी है। लेकिन बात केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। भारत का औद्योगिक और कृषि ढांचा भी कई मायनों में वैश्विक आपूर्ति पर टिका हुआ है। खाद्य तेल से लेकर उर्वरकों तक, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर रक्षा उपकरणों तक कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें हम पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हैं। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब वैश्विक संकट लंबा खिंचने लगता है। तीन दशक पहले सद्दाम हुसैन को काबू करने के लिए मित्र देशों द्वारा इराक पर हमलों से डीजल-पेट्रोल के लिए हमारे देश में लगी लंबी कतारें हमें याद हैं। अब हम कमोबेश वैसी ही स्थिति की आशंका देख रहे हैं। बात केवल आयात की नहीं है, निर्यात भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है। बीकानेर का भुजिया, महाराष्ट्र के केले, कपड़ा उद्योग और समुद्री उत्पाद आदि सबका अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचना अब पहले जैसा सहज नहीं रहा। जलगांव से रोजाना दो से तीन हजार टन केला खाड़ी देशों व यूरोप को निर्यात होता है लेकिन इस युद्ध ने निर्यात को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। केले से भरे सैकड़ों कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं। इसी प्रकार बीकानेर से भुजिया का निर्यात भी प्रभावित हुआ है। समुद्री रास्तों में असुरक्षा और लागत बढ़ने से कई व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह केवल माल की आवाजाही का संकट नहीं है, बल्कि इन उद्योगों से जुड़े लाखों लोगों की रोजी-रोटी का भी सवाल है। भारत की आत्मनिर्भरता की बहस में सूचना एवं प्रौद्योगिकी का क्षेत्र अक्सर नजरअंदाज हो जाता है जबकि यह आज की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बेहद अहम है। भारत डिजिटल रूप से तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन इस डिजिटल ढांचे की बुनियाद अब भी काफी हद तक विदेशी तकनीक पर टिकी है। मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, क्लाउड सेवाएं, सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बाहरी कंपनियों के नियंत्रण में हैं। ऐसे में वैश्विक तनाव या प्रतिबंधों की स्थिति में यह निर्भरता गंभीर जोखिम बन सकती है। इंटरनेट के क्षेत्र में भी हालात अलग नहीं हैं। सोशल मीडिया, सर्च इंजन और डेटा स्टोरेज जैसे प्लेटफॉर्म विदेशी स्वामित्व में हैं जिससे डेटा सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता पर सवाल उठते हैं। यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक चुनौती भी है। इसके साथ ही, भारत में मौलिक आविष्कारों की कमी भी चिंता का विषय है। आईटी सेवाओं में मजबूती के बावजूद, शोध और पेटेंट के मामले में भारत अभी पीछे है। रिसर्च और डवलपमेंट पर कम निवेश इसकी वजह हैं। ऐसे में आत्मनिर्भरता के लिए तकनीकी नवाचार को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है। यह परिदृश्य हमें बाध्य कर रहा है कि हम आत्मनिर्भरता के उस विचार की ओर लौटें जिसे हम अक्सर नारे के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं लेकिन उसे व्यवहार में पूरी तरह उतार नहीं पाए हैं। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है, बल्कि इतना सक्षम बनना है कि वैश्विक उथल-पुथल का असर सीमित किया जा सके। मौजूदा समय में सवाल यह नहीं है कि भारत को वैश्विक व्यापार से दूरी बनानी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारी अपनी नींव इतनी मजबूत है कि बाहरी झटकों को सह सके? समय की मांग है कि हमें ऊर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक रास्तों की ओर तेजी से बढ़ना चाहिए। सौर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहे हैं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का आधार भी बन चुके हैं। इसी प्रकार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करना, छोटे उद्योगों को तकनीक और वित्तीय सहायता देना और कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग को बढ़ावा देना जरूरी है क्योंकि ऐसे कदम ही भारत को भीतर से सशक्त बना सकते हैं। इस बीच, कुछ ऐसे सवाल भी हैं जिनका उत्तर हमें खोजना चाहिए। बड़ा सवाल है कि क्या हमने
वैश्विक भारत : उद्योगों की रफ्तार, अर्थव्यवस्था का विस्तार

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक ऐसी शक्ति के रूप में उभर रहा है, जिसकी गति, स्थिरता और विविधता ये तीनों ही उसे विशेष बनाती हैं। इस संबंध में सामने आए आर्थिक आंकड़े इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि देश विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है। विशेष रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में दर्ज प्रगति इस व्यापक आर्थिक मजबूती का स्पष्ट संकेत है। फरवरी 2026 में भारत की औद्योगिक वृद्धि दर बढ़कर 5.2 प्रतिशत हो गई, जोकि जनवरी के 4.8 प्रतिशत से अधिक है। कहना होगा कि यह वृद्धि आर्थिक गतिविधियों में निरंतरता और विस्तार का प्रमाण है। इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा योगदान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का रहा, जिसने छह प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की। चूंकि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 75 प्रतिशत है, इसलिए इसका मजबूत प्रदर्शन पूरी औद्योगिक अर्थव्यवस्था को गति देता है। वस्तुत: मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की यह प्रगति आज कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह उत्पादन क्षमता में वृद्धि को तो दर्शाती ही है, साथ में रोजगार सृजन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत जैसे युवा देश में, जहां हर वर्ष लाखों छात्र इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर कार्यक्षेत्र में प्रवेश करते हैं, वहां यह क्षेत्र गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराने का प्रमुख माध्यम बनता जा रहा है। फरवरी 2026 में मैन्युफैक्चरिंग के 23 उद्योग समूहों में से 14 में सकारात्मक वृद्धि दर्ज होना इस क्षेत्र की व्यापक मजबूती को दर्शाता है। विशेष रूप से बुनियादी धातु, मोटर वाहन और मशीनरी एवं उपकरण जैसे क्षेत्रों में दोहरे अंकों की वृद्धि यह संकेत देती है कि भारत का औद्योगिक ढांचा अब अधिक परिपक्व और प्रतिस्पर्धी हो रहा है। बुनियादी धातु क्षेत्र में वृद्धि से निर्माण और अवसंरचना को बल मिलता है, जबकि ऑटोमोबाइल और मशीनरी क्षेत्र कृषि, परिवहन और उद्योगों की उत्पादकता को बढ़ाते हैं। खनन और बिजली क्षेत्र भी इस विकास यात्रा में पीछे नहीं हैं। फरवरी में खनन क्षेत्र में 3.1 प्रतिशत और बिजली उत्पादन में 2.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ये दोनों क्षेत्र औद्योगिक गतिविधियों की रीढ़ माने जाते हैं और इनमें वृद्धि का अर्थ है कि उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल और ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित हो रही है। इसके अलावा उपयोग-आधारित वर्गीकरण के आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था के भीतर हो रहे संरचनात्मक परिवर्तन को उजागर करते हैं। पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में 12.5 प्रतिशत की वृद्धि यह दर्शाती है कि उद्योगों में निवेश बढ़ रहा है। मशीनों और उपकरणों का अधिक उत्पादन इस बात का संकेत है कि उद्योग विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिससे भविष्य में उत्पादन, आय और रोजगार में और वृद्धि होगी। इसी प्रकार उपभोक्ता वस्तुओं, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक सामान, रेफ्रिजरेटर और टीवी के उत्पादन में 7.3 प्रतिशत की वृद्धि यह स्पष्ट करती है कि देश में मांग का स्तर बढ़ रहा है। यह बढ़ती आय, मध्यम वर्ग के विस्तार और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। जब उपभोक्ता खर्च बढ़ता है, तब यह पूरे आर्थिक चक्र को गति देता है, उत्पादन बढ़ता है, रोजगार सृजित होते हैं और निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। यहां उल्लेखित है कि भारत की आर्थिक मजबूती का एक अन्य प्रमुख आधार सरकार द्वारा अवसंरचना क्षेत्र में किया जा रहा भारी निवेश है। राजमार्गों, बंदरगाहों और रेलवे परियोजनाओं में लगातार बढ़ते निवेश के कारण अवसंरचना और निर्माण सामग्री क्षेत्र में फरवरी में 11.5 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। निश्चित ही यह उस दीर्घकालिक दृष्टि का परिणाम है, जिसके तहत सरकार देश को एक मजबूत लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी नेटवर्क प्रदान कर रही है। इन परियोजनाओं का प्रभाव बहुआयामी है। एक ओर ये बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करती हैं, वहीं दूसरी ओर उद्योगों के लिए लागत कम करती हैं और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाती हैं। बेहतर सड़क और रेल नेटवर्क से माल परिवहन तेज और सस्ता होता है, जिससे निर्यात को भी बढ़ावा मिलता है। यदि व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो भारत की अर्थव्यवस्था कई अन्य सकारात्मक संकेत भी दे रही है। देश की जीडीपी वृद्धि दर विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय संस्थान जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक भी भारत को आने वाले वर्षों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में देख रहे हैं। भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का प्रवाह लगातार बना हुआ है, जो वैश्विक निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘पीएलआई (उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन)’ जैसी योजनाओं ने मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात को नई दिशा दी है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में भारत तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। साथ में देखने में आ रहा है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था भी भारत की ताकत का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरी है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) जैसे प्लेटफॉर्म ने लेन-देन को सरल और पारदर्शी बनाया है। इससे न सिर्फ वित्तीय समावेशन बढ़ा है, बल्कि छोटे और मध्यम उद्यमों को भी नई ऊर्जा मिली है। महंगाई पर नियंत्रण और वित्तीय अनुशासन भी भारत की आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाते हैं। सरकार द्वारा संतुलित राजकोषीय नीति और भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियों ने अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि वैश्विक स्तर पर कई चुनौतियां मौजूद हैं, जैसे भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव फिर भी यहां अच्छी बात यह है कि भारत ने अपनी नीतिगत दृढ़ता और आंतरिक मांग के बल पर इनका प्रभाव सीमित रखा है। अंततः, फरवरी 2026 के भारत का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) आंकड़े सिर्फ एक महीने की उपलब्धि न होकर यह उस निरंतर प्रयास और नीति-निर्माण का परिणाम हैं, जोकि भारत को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग की गति, पूंजीगत निवेश में वृद्धि, उपभोक्ता मांग का विस्तार और अवसंरचना पर फोकस, कहना होगा कि ये सभी मिलकर आज एक ऐसे आर्थिक परिदृश्य का निर्माण कर रहे हैं, जोकि आने वाले वर्षों में भारत को विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्तियों में स्थापित कर सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत वर्तमान में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और
नई उम्मीद वाली ‘आप पार्टी’ अपनों के हाशिये पर क्यों ?

– सौरभ वार्ष्णेयआम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति में एक नई उम्मीद जगाई थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से उपजी पार्टी पारदर्शिता, ईमानदारी और जनभागीदारी के वादों के साथ आजादी वाले तेवर के साथ नायक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप ने दिल्ली में शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी जैसे मुख्य मुद्दों पर उल्लेखनीय काम कर लोगों का विश्वास जीता। लेकिन समय के साथ कई ऐसे कारण सामने आए हैं, जिनसे जनता के एक वर्ग में आप पार्टी मोहभंग की स्थिति बनी है। शुरुआत में ‘आप’ ने ‘नई राजनीति’ का दावा किया था, लेकिन समय के साथ वही परंपरागत राजनीतिक रणनीतियां अपनाने के आरोप लगे। दल-बदल, राजनीतिक समझौते और सत्ता बनाए रखने की प्राथमिकता ने इसके मूल आदर्शों पर सवाल खड़े किए। जिस पार्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से शुरुआत की, उसी पर अब विभिन्न घोटालों के आरोप लगे हैं। खासकर दिल्ली की शराब नीति को लेकर उठे विवाद ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया। इससे जनता के बीच भरोसे में कमी आई है। समय-समय पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का बाहर होना या निष्कासन, जैसे कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण का अलग होना, संगठन के भीतर असहमति और केंद्रीकरण की ओर इशारा करता है। धीरे -धीरे यह नई उम्मीद वाली पार्टी अपनों के हाशिये पर क्यों हैं यह चिंतन का विषय है। दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी और उसके युवा चेहरे राज्यसभा राघव चड्ढा के बीच उभरे विवाद ने फिर एक बार पुरानी बोतल में नई शराब वाली स्थिति व इसको लेकर आम आदमी पार्टी पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल एक व्यक्ति और पार्टी के बीच मतभेद का नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों में अनुशासन, पारदर्शिता और नेतृत्व शैली की भी परीक्षा है। इसका जीता जागता उदाहरण पहले भी सामने आए हैं जिनमें प्रसिद्व कवि कुमार विश्वास सहित अन्य चेहरे अलग हो गए। कुमार आप पार्टी के वह नेता थे जो अरविंद केजरीवाल के साथ उस दौर से थे जब उन्होंने अपनी नौकरी सहित सब कुछ दांव पर लगाकर साथ दिया था। उनके बाद आम आदमी पार्टी में कई दौर ऐसे आ चुके हैं जिनमें अन्य कद्दावर नेतागण योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शाजिया इल्मी, आशुतोष, कपिल मिश्रा, अलका लांबा, कैलाश गहलोत, मयंक गांधी, अंजलि दमानिया, सुभाष वारे, आनंद कुमार सहित अन्य नाम भी साथ छोड़ चुके हैं व स्वाति मालीवाल आम आमदी पार्टी को छोड़ चुके हैं। अब एक नाम और शामिल हो रहा है वह हैं राघव चड्ढा, जो कि प्रमुख युवा नेताओं में गिने जाते हैं, कम समय में राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच खिंचाव की स्थिति को उजागर मनभेद को उजागर किया है। आरोप-प्रत्यारोप, निर्णय प्रक्रिया में मतभेद और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा—ये सभी तत्व इस विवाद को जटिल बनाते हैं। राजनीतिक दल किसी एक व्यक्ति से बड़े होते हैं। आप ने हमेशा सामूहिक नेतृत्व और पारदर्शिता की बात की है। ऐसे में यदि पार्टी का कोई वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से अलग रुख अपनाता है, तो यह संगठनात्मक अनुशासन पर प्रश्नचिह्न लगाता है। दूसरी ओर, लोकतंत्र में व्यक्तिगत विचारों की अभिव्यक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।आप ने खुद को एक वैकल्पिक और स्वच्छ राजनीति के प्रतीक के रूप में स्थापित किया था। इस तरह के विवाद पार्टी की उस छवि को धक्का पहुंचा सकते हैं। विपक्ष के लिए यह एक अवसर बन जाता है कि वह पार्टी की आंतरिक एकता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। यह विवाद आप नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती भी है—कैसे वे असहमति को संभालते हैं। क्या पार्टी संवाद के जरिए समाधान निकालती है या अनुशासनात्मक कार्रवाई का रास्ता अपनाती है, इससे भविष्य की राजनीति तय होगी। आम आदमी पार्टी और राघव चड्ढा के बीच का यह टकराव भारतीय राजनीति के उस व्यापक सच को सामने लाता है, जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता। यदि इसे समझदारी और संवाद से सुलझाया गया, तो यह पार्टी को और मजबूत बना सकता है; लेकिन अगर विवाद बढ़ता है, तो इसका असर न केवल पार्टी बल्कि उसकी विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा। आप पर यह आरोप भी लगता रहा है कि पार्टी में निर्णय लेने की शक्ति कुछ लोगों तक सीमित होती जा रही है। इससे ‘सामूहिक नेतृत्व’ की अवधारणा कमजोर पड़ी है। हालांकि दिल्ली में कुछ क्षेत्रों में प्रगति हुई है, लेकिन अन्य राज्यों में विस्तार के दौरान आप को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पंजाब में सत्ता मिलने के बावजूद चुनौतियां बरकरार हैं, जिससे पार्टी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं पर असर पड़ा है। आम आदमी पार्टी का उदय भारतीय लोकतंत्र में एक सकारात्मक प्रयोग था, जिसने राजनीति में नई सोच और उम्मीद पैदा की। लेकिन यदि पार्टी को जनता का विश्वास बनाए रखना है, तो उसे अपने मूल सिद्धांतों पर लौटना होगा, पारदर्शिता बढ़ानी होगी और आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना होगा। अन्यथा, ‘आम आदमीÓ की उम्मीदों पर खरा उतरने का दावा धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जाएगा। अगर हम आम आदमी पार्टी राज्यसभा सांसदों पर नजर डाले तो अप्रैल 2026 तक, आम आदमी पार्टी के पास राज्यसभा में 10 सांसद हैं, जो मुख्य रूप से पंजाब और दिल्ली से हैं। हाल ही में हुए बदलावों में, अशोक मित्तल को राघव चड्ढा की जगह राज्यसभा में पार्टी का नया उपनेता नियुक्त किया गया है। अब ऐसे में अगर अरविंद केजरीवाल के पुराने साथियों की बात करें तो अब कुछ ही साथी शेष बचे हैं। ऐसे में क्या पार्टी इस अंतकलह को बचायेगी ? क्या राघव चढ्डा से सुलह हो जायेगा ? आदि ऐसे विषय हैं जिनका हल सिर्फ सिर्फ अरविंद केजरीवाल के पास है।
डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय है अदृश्य भारत की पहचान और उम्मीदों का नया द्वार

– कैलाश चन्द्रभारत की स्वाधीनता को 77 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है—ये हैं डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय, जिन्हें हम डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय के नाम से जानते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि इनकी जनसंख्या आठ से ग्यारह करोड़ के बीच है, पर विडंबना यह है कि भारत की किसी भी राष्ट्रीय जनगणना ने इन्हें कभी अलग श्रेणी में नहीं गिना। इसी कारण 2027 की प्रस्तावित जनगणना को लेकर इन समुदायों में नई आशा जन्मी है, क्योंकि पहली बार उनकी पहचान साफ़-साफ़ दर्ज होने की संभावना बन रही है। इन समुदायों की पीड़ा इतिहास की धूल में दबी पड़ी है। 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने लगभग 150–200 समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया था। 1952 में यह कानून भले ही खत्म हुआ, लेकिन समाज की नज़रों में अपराधीकरण का दाग अब तक नहीं मिटा। आज भी कई जगह पुलिस निगरानी, सामाजिक भेदभाव और अविश्वास का सामना उन्हें करना पड़ता है। स्वतंत्र भारत की जनगणनाओं में इन समुदायों के लिए अलग जगह न होना भी एक और बड़ी कमी रही है। सरकार का तर्क यह रहा कि इनकी पहचान राज्य-वार सूचियों में पहले से मौजूद है, लेकिन विशेषज्ञ इसे नीति की अस्पष्टता और प्रशासनिक सुस्ती बताते हैं। स्थिति इतनी जटिल है कि एक ही समुदाय एक राज्य में अनुसूचति जाति (एससी), दूसरे में अनुसूचित जनजाति (एसटी), तीसरे में ओबीसी और कहीं-कहीं किसी भी सूची में नहीं मिलता। नतीजतन योजनाओं, छात्रवृत्तियों, आरक्षण और पुनर्वास में भारी असमानताएँ पैदा होती हैं। वस्तुत: कई आयोगों ने तो यहाँ तक उल्लेख किया है कि इन समुदायों के नाम पर आने वाला फंड अक्सर उनसे पहले ही किसी और द्वारा खपा लिया जाता है। स्थायी पते की कमी ने इन्हें पहचान-पत्रों, राशन कार्डों, बैंकिंग सुविधाओं और स्वास्थ्य योजनाओं से भी दूर रखा है। ‘रेन्के कमीशन’ ने कहा था कि सरकारी संसाधन इन समुदायों तक शायद ही पहुँच पाते हैं। दो बड़े आयोग, रेनके (2008) और इदाते (2018) ने विस्तृत अध्ययन कर कई महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं, पर उनका क्रियान्वयन आज भी बेहद सीमित है। सुप्रीम कोर्ट भी इस विषय को सरकार की नीति का हिस्सा मानकर हस्तक्षेप से पीछे हट गया है, जिससे इन समुदायों की निगाहें अब पूरी तरह केंद्र सरकार के निर्णय पर टिकी हैं। दुखद यह है कि भारत के मीडिया और राष्ट्रीय विमर्श में भी ये समुदाय लगभग अदृश्य बने हुए हैं। जहाँ सामाजिक न्याय की बहसें अक्सर एससी/एसटी/ओबीसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदायों का उल्लेख मुश्किल से देखने को मिलता है। विशेषज्ञ इसे “भारत का अदृश्य सामाजिक वर्ग” कहते हैं, लेकिन इस अँधेरे में भी आशा की किरण है। 2027 की जनगणना यदि इन्हें अलग पहचान दे दे, तो पहली बार देश को इनके वास्तविक आँकड़े मिलेंगे, नीतियाँ सटीक बनेंगी, फंडिंग का लक्ष्यीकरण बेहतर होगा और सदियों पुरानी उपेक्षा को दूर करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया जा सकेगा। यही कारण है कि इन समुदायों का कहना है, “पहचान ही अधिकार का पहला कदम है।” इन सबके बीच एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घुमंतू–अर्धघुमंतू समुदायों के बीच गहरा और निरंतर काम किया है। संघ के स्वयंसेवकों ने प्रशासन के साथ मिलकर 50,000 से अधिक परिवारों को आधार कार्ड, राशन कार्ड और पहचान-पत्र उपलब्ध कराए, जिससे वे पहली बार सरकारी योजनाओं और जनकल्याण व्यवस्था से जुड़ सके। संघ द्वारा संचालित कौशल विकास कार्यक्रमों, जैसे सिलाई, बढ़ईगीरी, हस्तशिल्प, कृषि तकनीक, मोबाइल रिपेयरिंग और लोककला प्रशिक्षण ने अनेक परिवारों में आत्मनिर्भरता का नया भाव जगाया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति और सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यक्रमों ने समुदायों का आत्मविश्वास बढ़ाया है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस पूरे परिदृश्य में एक बात स्पष्ट है कि भारत का यह बड़ा और बहु-आयामी सामाजिक वर्ग अब भी मान्यता और सम्मान की प्रतीक्षा में है। 2027 की जनगणना उनके लिए सिर्फ आँकड़ों का सवाल नहीं है, यह तो उनकी पहचान और सम्मान की पहली सीढ़ी है। देश यह कदम कब और कैसे उठाता है, यही आने वाले समय में इन समुदायों के भविष्य का निर्धारण करेगा। (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्तम्भकार हैं)
सनातन धर्म: चेतना, परंपरा और लोकसंस्कार

दीपक कुमार द्विवेदी सनातन धर्म केवल एक आस्था का विषय नहीं बल्कि जीवन की सबसे सूक्ष्म अनुभूति है। यह धर्म न तो किसी एक किताब में समाया है न ही किसी एक व्यक्ति की वाणी में न ही किसी एक विचारधारा तक सीमित है। यह तो एक प्रवाह है जो अनादि काल से बहता आ रहा है और अनंत काल तक बहता रहेगा। यह किसी समय विशेष की रचना नहीं बल्कि स्वयं समय से परे एक सनातन सत्य है। भारत में धर्म केवल किसी देवता की मूर्ति तक सीमित नहीं है। यहाँ ईश्वर न केवल मंदिरों में बल्कि कण-कण में समाया हुआ है। वह लोक में भी है शास्त्र में भी मूर्ति में भी निराकार में भी पीपल के वृक्ष में भी बहती नदी में भी खेतों की हरियाली में भी और आकाश में उड़ते पंछियों में भी। यही कारण है कि भारत में केवल ग्रंथों की पूजा नहीं होती बल्कि लोक-परंपराएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। गाँव-गाँव में अलग-अलग लोकदेवता पूजे जाते हैं डीह बाबा डीह चौरा माई संन्यासी बाबा बरम बाबा कुल देवता स्थान देवता ग्राम देवता। यहाँ हर नदी माँ है हर पर्वत देवता है हर वृक्ष में ईश्वर का वास है। और यही सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है वह हर जगह है वह हर किसी के लिए है और वह हर किसी के भीतर है। ऊपर वाला या सर्वव्याप्त परमात्मा? हमने अक्सर सुना होगा ऊपर वाला सब देख रहा है। लेकिन क्या कभी यह विचार आया कि ईश्वर केवल ऊपर ही क्यों? क्या वह केवल आसमान में बैठा कोई शासक है जो वहाँ से हमें नियंत्रित कर रहा है? क्या वह केवल किसी सिंहासन पर बैठा न्यायाधीश है जो हमें आदेश देता है और हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखता है? नहीं। यह अवधारणा हमारे धर्म की नहीं है। यह धारणा उन अब्राहमिक विचारधारा की है जो ईश्वर को केवल एक राजा के रूप में देखती हैं जो सातवें आसमान में बैठा शासन कर रहा है। लेकिन सनातन धर्म में ईश्वर केवल ऊपर वाला नहीं बल्कि भीतर वाला भी है बाहर वाला भी है आगे वाला भी है पीछे वाला भी है। वह दिशाओं से परे है वह स्थान से परे है वह समय से परे है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अर्थात् मैं प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हूँ। तो फिर यह ऊपर वाला वाली मानसिकता कहाँ से आई? यह हमारी परंपरा में नहीं थी। यह धीरे-धीरे उन अब्राहमिक मतों के प्रभाव से आई जो ईश्वर को केवल एक सत्ताधारी के रूप में देखते हैं। यदि हमारे चित्त में यह बात नहीं उभरती कि ईश्वर केवल ऊपर नहीं बल्कि हर कण-कण में है तो इसका अर्थ यही है कि हिन्दू चित्त पर अहिन्दू प्रभाव पड़ चुका है। लोकपरंपरा: धर्म की आत्मा यह भूमि केवल शास्त्रों की भूमि नहीं यह केवल वेदों और उपनिषदों की भूमि नहीं यह केवल दर्शन और तर्क की भूमि नहीं। यह लोक की भूमि है यह आस्था की भूमि है यह श्रद्धा की भूमि है। यहाँ धर्म केवल गूढ़ ग्रंथों तक सीमित नहीं बल्कि लोकगीतों में गूंजता है नृत्य में थिरकता है मेले-ठेलों में उमड़ता है खेतों-खलिहानों में महकता है। यही कारण है कि लोकपरंपरा में धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं वह जीवन का उत्सव है। गाँवों में देवी-देवताओं की पूजा किसी एक विशेष विधि से नहीं होती। कहीं पीपल के नीचे दीप जलते हैं कहीं नदी किनारे मन्नतें मांगी जाती हैं कहीं किसी वृक्ष को रक्षा सूत्र बांधा जाता है कहीं अनाज की पहली गठरी देवता को अर्पित की जाती है। छठ पूजा हो कांवड़ यात्रा हो गणेशोत्सव हो दुर्गा पूजा हो रामलीला हो ये सब केवल त्योहार नहीं बल्कि धर्म की जीवंत धारा हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी बहती आ रही हैं। विविधता में एकता ही सनातन की पहचानसनातन धर्म किसी एक किताब किसी एक व्यक्ति किसी एक विचारधारा पर निर्भर नहीं। यह विविधताओं का संगम है। यहाँ कोई मूर्ति पूजता है कोई निराकार ब्रह्म की उपासना करता है कोई ध्यान करता है कोई कीर्तन करता है कोई वेदों का अध्ययन करता है कोई लोकदेवताओं की पूजा करता है लेकिन सबका मार्ग एक ही सत्य की ओर जाता है। यही सनातन की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ हर मार्ग स्वीकृत है हर साधना मान्य है हर भक्ति स्वीकार्य है। यहाँ कोई यह नहीं कहता कि यही एकमात्र सत्य है और बाकी सब असत्य। यहाँ हर कोई अपनी प्रकृति के अनुसार अपने मार्ग पर चल सकता है। कोई कर्मयोग से कोई ज्ञानयोग से कोई भक्तियोग से कोई ध्यान से कोई मंत्र से कोई साधना से लेकिन अंततः सबका गंतव्य वही है। अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों को पहचानें। हमें यह समझना होगा कि हिन्दू धर्म केवल कर्मकांडों तक सीमित नहीं बल्कि वह एक जीवंत चेतना है जो हर व्यक्ति के भीतर है। हमें अपने लोकदेवताओं को पुनः स्मरण करना होगा हमें अपनी परंपराओं को पुनः जागृत करना होगा हमें यह समझना होगा कि ईश्वर केवल सातवें आसमान में नहीं बैठा बल्कि वह हमारे चारों ओर है हमारे भीतर है हमारी साँसों में है हमारी चेतना में है। यदि हम अपनी परंपराओं को भूलते गए यदि हमने अपनी लोकपरंपराओं को छोड़ दिया यदि हमने अपने कुलदेवताओं को विस्मृत कर दिया यदि हमने अपने ग्रामदेवताओं का आदर करना बंद कर दिया यदि हमने यह मान लिया कि ईश्वर केवल ऊपर वाला है तो यह हमारी सबसे बड़ी हार होगी। हमें अपनी चेतना को जागृत करना होगा हमें अपनी परंपराओं को पुनः स्थापित करना होगा हमें यह समझना होगा कि हिन्दू धर्म केवल ग्रंथों में नहीं बल्कि जीवन के हर क्षण में है। ईश्वर हर जगह है हर किसी के लिए हैसनातन धर्म की यह व्यापकता ही उसकी महानता है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं यह केवल दर्शन नहीं यह केवल कर्मकांड नहीं यह संपूर्ण जीवन का सत्य है। यह हमें यह नहीं कहता कि ईश्वर केवल ऊपर है यह हमें यह नहीं कहता कि केवल एक ही मार्ग सत्य है यह हमें यह नहीं कहता कि केवल एक ही ग्रंथ अंतिम सत्य है। यह हमें यह सिखाता है कि ईश्वर हर कण में
विदेशी निधि से धर्मांतरण : बदल रही है भारत की नीति

– डॉ. मयंक चतुर्वेदीभारत जैसे विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक देश में गैर-सरकारी संगठन सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण वाहक रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में इन संस्थाओं ने उल्लेखनीय योगदान दिया है, किंतु पिछले कई वर्षों में विदेशी निधि के दुरुपयोग तथा उससे जुड़े धर्मांतरण और सुरक्षा संबंधी मुद्दों ने एक गंभीर बहस को भी जन्म दिया है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने विदेशी अनुदान नियमन कानून (एफसीआइए) को अधिक सख्त और पारदर्शी बनाने की दिशा में निर्णायक कदम आगे बढ़ा दिए हैं। कहना होगा कि इसमें कानूनी संशोधन वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और जवाबदेही सुनिश्चित करने का व्यापक प्रयास है। दरअसल, भारत में विदेशी धन के प्रवाह को लेकर यह देखा जा रहा था कि कई गैर-सरकारी संगठन विदेशी अनुदान प्राप्त कर रहे थे, परंतु उनके उपयोग और उद्देश्य को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आ रही थीं। यही वह पृष्ठभूमि है, जिसने “एफसीआइए” में सख्ती को आवश्यक बना दिया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, केंद्र में मोदी (भाजपा) सरकार आने के बाद से अब तक 20 हजार से अधिक गैर-सरकारी संगठनों के पंजीकरण रद्द या समाप्त किए जा चुके हैं। वर्तमान में लगभग 16 हजार गैर-सरकारी संगठन ही ऐसे हैं, जिन्हें विदेशी निधि प्राप्त करने की अनुमति है और उन्हें हर वर्ष लगभग 22 हजार करोड़ रुपये की विदेशी सहायता मिलती है। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का संकेत देता है कि विदेशी निधि का दायरा कितना व्यापक है। जब इतनी बड़ी मात्रा में धन देश के भीतर आ रहा हो, तो उसके पारदर्शी और वैध उपयोग को सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है। कई मामलों में यह पाया गया कि संस्थाओं ने निर्धारित उद्देश्यों से हटकर धन का उपयोग किया, लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं किया या फिर धन को अन्य गतिविधियों में स्थानांतरित कर दिया। धर्मांतरण के आरोप और सामाजिक संवेदनशीलतागैर-सरकारी संगठनों से जुड़े सबसे संवेदनशील मुद्दों में धर्मांतरण का विषय प्रमुख रहा है। कुछ मामलों में आरोप ही नहीं लगे, प्रमाणों के साथ साक्ष्य रूप में सामने आ गया कि कैसे विदेशी निधि का उपयोग गरीब, आदिवासी और वंचित वर्गों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने में किया गया। सामाजिक सेवा; जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य की आड़ में धार्मिक प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों की शिकायतें विशेष रूप से जनजाति क्षेत्र से लगातार सामने आईं और अब भी आ रही हैं। कुछ संगठनों पर यह आरोप लगे कि उन्होंने सामाजिक कार्यों के माध्यम से धार्मिक उद्देश्य को आगे बढ़ाया। हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि हर मामले में ये आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं, लेकिन इन शिकायतों ने सरकार को सतर्क जरूर किया है। धर्मांतरण का मुद्दा भारत जैसे बहु-धार्मिक समाज में अत्यंत संवेदनशील है, और इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। विवादों में घिरे प्रमुख संगठन पिछले वर्षों में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन जांच के दायरे में आए। कुछ संगठनों पर विदेशी निधि के दुरुपयोग के आरोप लगे, तो कुछ पर नीति-निर्माण को प्रभावित करने या विकास परियोजनाओं का विरोध करने के आरोप सामने आए। उदाहरण के तौर पर, ‘ग्रीनपीस इंडिया’ पर यह आरोप लगा कि उसने विदेशी निधि के माध्यम से भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ अभियान चलाए, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा। इसी प्रकार, ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ को वित्तीय अनियमितताओं के कारण अपने संचालन को सीमित करना पड़ा। नीतिगत संस्थानों में ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ और ‘ऑक्सफैम इंडिया’ जैसे अनेक संगठनों पर अब तक कार्रवाई हुई, जहां विदेशी निधि के उपयोग को लेकर सवाल उठे हैं। राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट के विदेशी अंशदान विनियमन पंजीकरण रद्द किए गए। वस्तुत: सुरक्षा एजेंसियों की नजर में कुछ संगठनों की गतिविधियां अधिक गंभीर पाई गईं। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उससे जुड़े रिहैब इंडिया फाउंडेशन पर कट्टरपंथ और विदेशी निधि के दुरुपयोग के आरोप सिद्ध हुए। वहीं इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन, जिसकी स्थापना जाकिर नाइक ने की थी, पर वैचारिक कट्टरता फैलाने के आरोप सामने आते रहे हैं। सख्ती और पारदर्शिता की दिशा में कदमइन परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार ‘विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव लेकर सामने आई है। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य विदेशी निधि के उपयोग को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नियंत्रित बनाना है। प्रस्तावित संशोधन के तहत यदि किसी गैर-सरकारी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाता है, तो उसके द्वारा विदेशी धन से निर्मित संपत्तियों को जब्त करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, इन संपत्तियों के प्रबंधन के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर एक विशेष प्राधिकरण स्थापित करने की योजना है। साथ ही, पंजीकरण के नवीनीकरण और विदेशी अनुदान के उपयोग के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का भी प्रावधान किया गया है। यदि कोई संस्था समय पर नवीनीकरण नहीं कराती या उसका आवेदन अस्वीकार हो जाता है, तो वह स्वतः विदेशी निधि प्राप्त करने के अधिकार से वंचित हो जाएगी। सरकार का पक्ष और तर्कवस्तुत: गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में इस विधेयक का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि यह कानून उन तत्वों के खिलाफ सख्त कदम है, जो विदेशी निधि का उपयोग व्यक्तिगत लाभ, जबरन धर्मांतरण या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए करते हैं। सरकार का मानना है कि 2010 के विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में कई प्रावधान अस्पष्ट थे, जिनका लाभ उठाकर कुछ संस्थाएं नियमों का उल्लंघन कर रही थीं। नए संशोधन के माध्यम से इन कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया है, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। समग्र रूप से देखा जाए तो विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का महत्वपूर्ण प्रयास है। निश्चित ही विदेशी निधि के दुरुपयोग, धर्मांतरण और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों ने सरकार को सख्त कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। यदि यह कानून लागू किया जाता है, तो यह देश में चल रहीं अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के साथ ही देश में कार्यरत विश्वसनीय और ईमानदार गैर-सरकारी संगठनों के लिए एक स्वच्छ, जवाबदेह और विश्वासपूर्ण वातावरण भी सुनिश्चित करेगा। अंततः, यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की मजबूती का आधार है और इसी पर आज केंद्र की मोदी सरकार प्रखरता के साथ चलती दिखाई
राष्ट्रीय चेतना के कवि माखनलाल चतुर्वेदी

– आचार्य ललित मुनि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जब देश की जनता जाग रही थी, तब साहित्य ने एक अनूठी भूमिका निभाई। वह केवल शब्दों का संग्रह नहीं था, बल्कि एक जीवंत शस्त्र बन गया था, जो गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का आह्वान करता था। उन दिनों, जब ब्रिटिश साम्राज्य की छाया पूरे देश पर छाई हुई थी, तब कवियों, लेखकों और पत्रकारों ने अपनी कलम से जनमानस में राष्ट्रप्रेम की चिंगारी जगाई। साहित्य ने आम आदमी को जागरूक किया, युवाओं को बलिदान के लिए प्रेरित किया और स्वतंत्रता की भावना को घर-घर तक पहुंचाया। ऐसे ही युग के एक महान कवि, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, जिन्हें राष्ट्रीय चेतना के कवि, एक भारतीय आत्मा और युगचारण के नाम से जाना जाता है। उनकी कविताएं सरल भाषा में गहरी राष्ट्रभक्ति और मानवीय संवेदना को समेटे हुए हैं, जो आज भी पाठकों के हृदय को स्पर्श करती हैं। इस आलेख में उनके जीवन, उनकी रचनाओं और स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य की भूमिका का विस्तार से अध्ययन किया गया है, ताकि उस युग की भावना और उनकी प्रेरक कविताओं का सजीव चित्र हमारे सामने उभर सके। माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई गांव में हुआ था। उनके पिता नंदलाल चतुर्वेदी गांव के प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक थे। घर का वातावरण संस्कारों से परिपूर्ण था, जहां संस्कृत, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं का ज्ञान सहज रूप से प्राप्त होता था। मात्र सोलह वर्ष की आयु में वे शिक्षक बन गए और खंडवा के मिडिल स्कूल में पढ़ाने लगे। किंतु उनकी कलम और हृदय की पुकार उन्हें शिक्षण कार्य से आगे ले गई। सन् 1908 में माधवराव सप्रे के ‘हिंदी केसरी’ पत्र ने राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार विषय पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित की। युवा माखनलाल का निबंध प्रथम स्थान पर चुना गया। यह उनके जीवन का पहला महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने उन्हें राष्ट्रसेवा की ओर प्रेरित किया। अप्रैल 1913 में खंडवा से ‘प्रभा’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ और संपादन का दायित्व उन्हें सौंपा गया। सितंबर 1913 में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और पूर्ण रूप से साहित्य, पत्रकारिता तथा राष्ट्रीय आंदोलन को समर्पित कर दिया। उनका जीवन संघर्ष और समर्पण की मिसाल बन गया। सन् 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी, मैथिलीशरण गुप्त और महात्मा गांधी से मुलाकात की। गांधीजी के विचारों से वे गहराई से प्रभावित हुए। सन् 1920 के असहयोग आंदोलन में महाकोशल क्षेत्र से पहली गिरफ्तारी देने वाले वे ही थे। जेल की काली दीवारों के बीच भी उनकी कलम रुकी नहीं। उन्होंने वहां से भी राष्ट्र-जागरण का कार्य जारी रखा। सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी उन्हें पहली गिरफ्तारी का सम्मान मिला। कुल मिलाकर वे तीन बार जेल गए, जहां उन्होंने न केवल यातनाएं सहीं, बल्कि अपनी रचनाओं से साथियों का मनोबल भी बढ़ाया। उनकी पत्रकारिता ब्रिटिश शासन के लिए चुनौती बन गई थी। ‘प्रभा’ के बाद उन्होंने ‘कर्मवीर’ का संपादन संभाला, जो पहले जबलपुर से प्रकाशित होता था। गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने ‘प्रताप’ का संपादन भी किया। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश नीतियों की आलोचना की, स्वदेशी को प्रोत्साहित किया और नई पीढ़ी को गुलामी से बाहर आने का आह्वान किया। उनकी लेखनी सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली थी, जो सीधे जनमानस तक पहुंचती थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जब राजनीतिक नेतृत्व जेलों में बंद था, तब कविताएं, गीत और निबंध जनता के बीच स्वतंत्रता की लहर फैलाते रहे। भारतेन्दु हरिश्चंद्र से प्रारंभ हुई यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रही। मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ ने राष्ट्रप्रेम की ज्वाला प्रज्वलित की, तो सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और जयशंकर प्रसाद की रचनाओं ने छायावादी युग में भावुकता और विद्रोह का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया। माखनलाल चतुर्वेदी का योगदान इस दृष्टि से विशिष्ट था कि उन्होंने साहित्य को जन आंदोलन का सशक्त माध्यम बना दिया। उनकी कविताएं केवल पढ़ी ही नहीं जाती थीं, बल्कि गाई जाती थीं, जेलों में सुनाई जाती थीं और सभाओं में उद्धृत की जाती थीं। साहित्य ने उस समय राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। हिंदू-मुस्लिम एकता, स्वदेशी उत्पादों का प्रचार और अंग्रेजी साम्राज्यवाद का विरोध जैसे विषयों को उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रमुख स्थान दिया। उनकी पत्रकारिता ने साहित्य को एक प्रभावी हथियार बनाया। ‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ और ‘प्रताप’ जैसे पत्रों ने न केवल समाचार प्रस्तुत किए, बल्कि राष्ट्रभक्ति की भावना को सुदृढ़ किया। ब्रिटिश सरकार इन पत्रों से इतनी भयभीत थी कि कई बार संपादकों पर मुकदमे चलाए गए और उन्हें जेल भेजा गया। इसके बावजूद माखनलाल चतुर्वेदी जैसे साहित्यकारों ने अपनी लेखनी नहीं छोड़ी। उनकी रचनाएं छायावाद की परंपरा में आती हैं, किंतु उनमें राष्ट्र चेतना का ओज सर्वाधिक प्रमुख है। उन्होंने कविता, निबंध, नाटक और कहानी सभी विधाओं में लेखन किया। उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में ‘हिमकिरीटिनी’, ‘हिमतरंगिणी’, ‘युगचारण’, ‘समर्पण’, ‘मरण-ज्वार’ और ‘वेणु लो गूंजे धरा’ उल्लेखनीय हैं। गद्य साहित्य में ‘कृष्णार्जुन युद्ध’, ‘साहित्य देवता’, ‘समय के पांव’ और ‘अमीर इरादे गरीब इरादे’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सन् 1943 में ‘हिमकिरीटिनी’ पर उन्हें देव पुरस्कार प्राप्त हुआ और सन् 1955 में ‘हिमतरंगिणी’ के लिए उन्हें हिंदी साहित्य अकादमी का प्रथम पुरस्कार मिला। सन् 1959 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया, किंतु सन् 1967 में राजभाषा हिंदी से संबंधित संवैधानिक संशोधन के विरोध में उन्होंने यह सम्मान लौटा दिया। सागर विश्वविद्यालय ने उन्हें 1959 में डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान की। मध्यप्रदेश शासन ने भी उन्हें सम्मानित किया। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ है, जो बलिदान और समर्पण का प्रतीक है। इसमें कवि कहता है कि वह राजसी आभूषणों का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि मातृभूमि के चरणों में अर्पित होना चाहता है। यह कविता स्वतंत्रता सेनानियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थी और युवाओं को देश के लिए बलिदान का संदेश देती थी। इसी प्रकार ‘कैदी और कोकिला’ कविता जेल जीवन के अनुभवों पर आधारित है, जिसमें स्वतंत्रता की आकांक्षा और संघर्ष की भावना व्यक्त होती है। कोयल की आवाज कैदी के मन में आशा का संचार करती है और उसे स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। उनकी अन्य कविताओं में भी राष्ट्रप्रेम, प्रकृति और मानवीय संवेदना का
मध्यप्रदेश में ग्राम पंचायत सचिव की भर्ती, अनुशासन और सेवा शर्तें

– प्रद्युम्न शर्मा मध्यप्रदेश शासन द्वारा हाल ही में ग्राम पंचायत सचिवों से संबंधित नियम अधिसूचित किए गए हैं। मध्यप्रदेश पंचायत सेवा ( ग्राम पंचायत सचिव भर्ती, अनुशासन और सेवा की शर्तें ) नियम, 2026 के नाम से प्रकाशित इन नियमों को पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश पंचायत सेवा ( ग्राम पंचायत सचिव भर्ती और सेवा की शर्तें ) नियम, 2011 को निरस्त कर जारी किया गया है। अधिसूचित नये नियम पूर्ववर्ती नियम के क्रियान्वयन से प्राप्त अनुभवों, ग्राम पंचायत सचिवों की वर्तमान भूमिका और पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज के परिदृश्य को दृष्टि में रखकर बनाए गए हैं। ग्राम पंचायत सचिव का पद पंचायत राज प्रणाली का एक महत्वपूर्ण पद है। मध्यप्रदेश ग्राम पंचायत ( सचिव की शक्तियाँ तथा कृत्य ) नियम, 1999 के अनुसार ग्राम पंचायत के साधारण अधीक्षण तथा नियंत्रण के अधीन ग्राम पंचायत सचिव को 17 प्रकार की कार्यपालक शक्तियाँ, 42 प्रकार के गैर-वित्तीय पदीय कर्त्तव्य तथा 24 प्रकार के वित्तीय तथा कराधान संबंधी कर्त्तव्य सौंपे गए हैं। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पंचायत राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत सचिव की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। ग्राम पंचायत सचिव की भूमिका को देखते हुए ही उसकी भर्ती की पद्धति, अनुशासन एवं नियंत्रण, प्रशिक्षण , सेवा संबंधी अभिलेखों का संधारण तथा अवकाश आदि के प्रचलित नियमों ,आदेशों व निर्देशों को पुनरीक्षित कर नये नियम अधिसूचित किए गए हैं। ग्राम रोजगार सहायकों का कोटा – नये नियमों में ग्राम पंचायत सचिव के पद पर भर्ती हेतु ग्राम रोजगार सहायकों का पचास प्रतिशत कोटा निर्धारित किया गया है। इससे एक तरफ सरकार को ग्राम पंचायत स्तर पर पूर्व से कार्य करने वाले अनुभवी अभ्यर्थी सचिव के पद हेतु मिल सकेंगे वहीं दूसरी ओर ग्राम रोजगार सहायकों को उच्चतर पद पर कार्य करने का अवसर मिल सकेगा। भर्ती मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल द्वारा- नये नियमों के अनुसार ग्राम पंचायत सचिव के पद हेतु मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल पात्रता परीक्षा आयोजित करेगा। पूर्व के नियमों में यह भर्ती मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत द्वारा अभ्यर्थी के हायर सैकेंड्री परीक्षा में प्राप्त अंकों की प्रतिशतता की मेरिट सूची के आधार पर की जाना प्रावधानित था। अब शैक्षणिक अर्हता स्नातक एवं कंप्युटर संबंधी होगी । यद्यपि नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी पूर्ववत मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत ही है। प्रशिक्षण- भर्ती किए गए सचिवों के उन्मुखीकरण एवं आधारभूत प्रशिक्षण आयोजित करने की जिम्मेदारी, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत को सौंपी गई है। प्रशिक्षण को परिवीक्षा अवधि की समाप्ति से जोड़ा गया है। नवनियुक्त सचिवों के लिए दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि प्रावधानित की गई है। नियंत्रण -पूर्व के नियमों में प्रावधान था कि ग्राम पंचायत सचिव, ग्राम पंचायत के प्रशासकीय नियंत्रण के अधीन होगा। नये नियमों में इसे अपने क्रियाकलापों के लिए ग्राम पंचायत के प्रति उत्तरदायी ठहराया गया है साथ ही उसे मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत के माध्यम से जनपद पंचायत के प्रशासनिक नियंत्रण में भी रखा गया है। सेवा संबंधी अभिलेखों का संधारण जनपद-पंचायत स्तर पर – सचिव के सेवा -अभिलेख अब जनपद पंचायत के कार्यालय में रखे जाएंगे जबकि पूर्व के नियमानुसार ऐसे अभिलेख जिला पंचायत के कार्यालय में रखा जाना प्रावधानित था। अवकाश – पूर्व में ग्राम पंचायत सचिव को आकस्मिक अवकाश ग्राम पंचायत द्वारा स्वीकृत किया जाता था, नये नियमों में यह अधिकार सरपंच को दिया गया है । इस प्रकार आकस्मिक अवकाश स्वीकृति की प्रक्रिया का सरलीकरण हुआ है। नये नियमों में महिला सचिव को एक कैलेंडर वर्ष में बीस दिनों के आकस्मिक अवकाश की पात्रता निर्धारित की गई है जबकि पूर्व में महिला सचिवों को भी तेरह दिनों के आकस्मिक अवकाश की पात्रता थी। प्रसूति ,पितृत्व और चिकित्सा अवकाश का भी प्रावधान नये नियमों में किया गया है। वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन- सचिव के कार्य-निष्पादन, आचरण आदि के मूल्यांकन का वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन संधारित करने की प्रणाली को नियमों में शामिल किया गया है जबकि पूर्व में यह प्रणाली प्रशासकीय निर्देशों द्वारा निर्धारित थी। इस प्रतिवेदन में प्रथम मतांकन सरपंच ग्राम पंचायत द्वारा किया जाएगा। मध्यप्रदेश पंचायत सेवा ( ग्राम पंचायत सचिव भर्ती, अनुशासन और सेवा की शर्तें ) नियम, 1026 प्रवृत्त हो गए हैं । इन नियमों के नियम 11 (1) (पांच) में उल्लिखित है कि इन नियमों की अधिसूचना जारी होते ही, राज्य सरकार द्वारा प्रथम बार की भर्ती के लिए रिक्त पदों की सूचना भेजने, आरक्षण रोस्टर अद्यतन तैयार करने और मांगपत्र मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल को भेजने संबंधी अन्य गतिविधियों को संपन्न करने के लिए समय-सीमाएं अधिसूचित की जाएगी । ऐसी अधिसूचना जारी करना और उसके क्रियान्वयन को चुनौती के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। प्रदेश के बेरोजगारों को हजारों की संख्या में रिक्त ग्राम पंचायत सचिव के पदों पर नियुक्ति हेतु आवेदन करने के परिप्रेक्ष्य में इस अधिसूचना का इन्तज़ार रहेगा। साथ ही वर्तमान में जिला पंचायत कार्यालयों में संधारित सचिवों के सेवा अभिलेखों को सुरक्षित और व्यवस्थित रूप से जनपद पंचायतों के कार्यालयों को हस्तांतरित करना भी एक बड़ा कार्य है, जिसके लिए भी समय-सीमा तय करने के साथ आवश्यक अधोसंरचना जनपद पंचायतों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यद्यपि इन सेवा अभिलेखों का डिजिटाइजेशन कराना बेहतर विकल्प है। ( लेखक पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सेवानिवृत्त अतिरिक्त संचालक हैं )