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How To Get Glowing skin: चेहरे पर चाहिए नेचुरल चमक? ये 2 चीज लगाने से स्किन होगी रेशम जैसी मुलायम

नई दिल्ली।सर्दियों त्वचा के लिए यह किसी परीक्षा से कम नहीं होता. ठंडी और शुष्क हवाएं स्किन की नमी को धीरे-धीरे सोख लेती हैं, जिससे चेहरे का कुदरती निखार कहीं खो जाता है. अक्सर इस मौसम में चेहरा काला, बेजान और पपड़ीदार दिखने लगता है. जब हवा में नमी की कमी होती है तो हमारी त्वचा के प्राकृतिक तेल सूखने लगते हैं जिससे बारीक रेखाएं और झुर्रियां उभरने लगती हैं. महिलाएं अक्सर इस रूखेपन को छिपाने के लिए ढेर सारा मेकअप या केमिकल वाली क्रीम लगाती हैं. ऐसे में हम यहां आपको बाजार के महंगे प्रोडक्ट्स के बजाय रसोई में मौजूद केला और मलाई का कॉम्बो वाले पैक की जानकारी दे रहे हैं जो आपकी स्किन के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. केला विटामिन और पोटैशियम से भरपूर होता है जो त्वचा को पोषण देता है, वहीं मलाई एक नेचुरल मॉइस्चराइजर का काम करती है जो चेहरे पर कुदरती चमक और गुलाबी निखार लाती है. केले और मलाई का फेस पैक कैसे बनाएं?बनाने का तरीका: एक पका हुआ आधा केला लें और उसे अच्छी तरह मैश (मसल) लें. अब इसमें एक बड़ा चम्मच ताजी दूध की मलाई मिलाएं. अगर आपकी स्किन ज्यादा ड्राई है, तो इसमें आधा चम्मच शहद भी डाल सकते हैं. लगाने का तरीका: इस स्मूथ पेस्ट को चेहरे और गर्दन पर अच्छी तरह लगाएं. इसे 15-20 मिनट तक लगा रहने दें जब तक यह हल्का सूख न जाए. साफ करने का तरीका: चेहरे को गुनगुने पानी से हल्के हाथों से मसाज करते हुए धो लें. टॉवल से चेहरा पोंछने के बाद आप महसूस करेंगे कि आपकी त्वचा रेशम जैसी मुलायम और चमकदार हो गई है.

यात्रा से पहले दिखने वाले संकेत:भारतीय लोकमान्यताओं में शुभ और अशुभ संकेतों का इतिहास

नई दिल्ली।भारत में यात्रा को केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने तक सीमित नहीं माना गया बल्कि इसे निर्णय जोखिम और परिणाम से जुड़ी प्रक्रिया समझा गया है। यही वजह है कि परंपरागत समाज में यात्रा के समय आसपास घटने वाली घटनाओं और दृश्य संकेतों को विशेष महत्व दिया गया। समय के साथ इन संकेतों को शुभ और अशुभ में वर्गीकृत किया गया जो आज भी जनमानस में प्रचलित हैं। समाजशास्त्रियों के अनुसार जब वैज्ञानिक जानकारी और पूर्वानुमान के साधन सीमित थे तब मनुष्य अपने अनुभवों के आधार पर प्रकृति और जीव-जंतुओं के व्यवहार को समझने की कोशिश करता था। यात्रा के दौरान बार-बार घटने वाली घटनाओं से लोगों ने निष्कर्ष निकाले और इन्हें संकेतों का रूप दिया। यही प्रक्रिया आगे चलकर शकुन परंपरा के रूप में स्थापित हुई। लोक मान्यताओं में कुछ पशु और पक्षियों को सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया। यात्रा के समय मोर नीलगाय या नेवले का दिखना कई क्षेत्रों में शुभ संकेत माना जाता रहा। ग्रामीण समाज में आज भी इन दृश्यों को यात्रा की सफलता और कार्य में लाभ से जोड़ा जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे विश्वास व्यक्ति को मानसिक रूप से निश्चिंत करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। कुछ संकेत सीधे मानव जीवन और सामाजिक मूल्यों से जुड़े हैं। जैसे घर से निकलते समय किसी शांत व्यक्ति गाय या जल से भरे पात्र का दिखना संतुलन स्थिरता और समृद्धि का संकेत माना गया। इतिहासकार बताते हैं कि ये प्रतीक उस समय के सामाजिक और धार्मिक मूल्यों को दर्शाते हैं जब शुद्धता और संतुलन को जीवन का आधार माना गया। भारतीय लोक परंपरा में पक्षियों की आवाज़ और दिशा पर भी ध्यान दिया जाता रहा। शांत स्वर में बोलती चिड़िया या स्थिर बैठे पक्षी को लाभकारी माना गया जबकि अचानक घबराहट में उड़ते पक्षियों को सतर्कता का संकेत माना गया। यह पर्यावरणीय बदलावों को समझने की मानवीय कोशिश भी हो सकती है।कुछ मान्यताओं में यह देखा गया कि संकेत किस दिशा से दिखाई दे रहे हैं। दाईं ओर दिखने वाली गतिविधियों को कई क्षेत्रों में सकारात्मक माना गया। ये विश्वास क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार विकसित हुए हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसे संकेत व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर असर डालते हैं। सकारात्मक संकेत आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और बेहतर निर्णय में मदद करते हैं जबकि नकारात्मक संकेत सतर्कता और जोखिम कम करने में सहायक साबित होते हैं।आधुनिक समय में शहरों और तकनीकी समाज में इन संकेतों को अब व्यक्तिगत आस्था के रूप में देखा जाता है। हालांकि ये पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन्हें अंधविश्वास न मानकर सांस्कृतिक विरासत और व्यवहारिक मनोविज्ञान के संदर्भ में समझना चाहिए।

दिल्ली का दूसरा साइड तो आपने देखा ही नहीं…5 ऐसी जगह जो राजधानी को दिखाती हैं औरों से अलग

नई दिल्ली । दिल्ली में हर मूड के इंसान के लिए कुछ ना कुछ है आप यहां इतिहास देख लें या यहां की संस्कृति सब कुछ एकदम अलग लगता है। दिल्ली केवल सैकड़ों साल पुराने किलों और इमारतों तक सीमित नहीं है बल्कि यहां पक्षियों से भरे वेटलैंड्स शांति-सुकून देने वाले पार्क और सलीके से बनाए गए गार्डन्स भी हैं जो टूरिस्ट ही नहीं बल्कि लोकल लोगों को भी बार-बार खींच लाते हैं। दिल्ली को देखना चाहते हैं तो चलिए जानते हैं यहां की कुछ ऐसी जगहों के बारे में जो उसे दूसरे शहरों से अलग बनाती हैं। ओखला बर्ड सैंक्चुरी अगर लगता है कि बर्ड वॉचिंग वाली जगहों पर देखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है तो ओखला बर्ड सैंक्चुरी आपकी सोच बदल सकती है। ये शहर के बीच मौजूद एक खास वैटलैंड है जहां कंक्रीट की इमारतों के बैकग्राउंड आपको हैरान कर देंगे। यमुना के फ्लडप्लेन्स में फैली इस सैंक्चुरी में 300 से ज्यादा तरह के पक्षी पाए जाते हैं खासकर सर्दियों के मौसम में। यहां आप सुबह जा सकते हैं क्योंकि इस दौरान माइग्रेटरी बर्ड्स जैसे पेंटेड स्टॉर्क पेल्किन और कई तरह के शिकारी पक्षी आसानी से दिख जाते हैं। हौज खास विलेज अगर दोस्तों के साथ यादगार शाम बिताना चाहते हैं तो हौज खास विलेज से बेहतर ऑप्शन मिलना काफी मुश्किल है। ये वो जगह है जहां पुराने जमाने का इतिहास और आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल एक साथ देखने को मिलती है। यहां 13वीं सदी का हौज तालाब कब्रें और मदरसे के खंडहर हैं जो एक खूबसूरत झील को देखते हुए बनाए गए हैं। यहां कैफे बूटीक शॉप्स और आर्ट स्पेसेज की भरमार है।दिल्ली रिज जंगल ट्रेल दिल्ली रिज को अक्सर शहर की ग्रीन लंग्स कहते हैं यहां आते ही सच में खुलकर सांस लेने का एहसास होता है। यह जगह आपको कुछ देर के लिए शहर की भीड़-भाड़ और शोर से दूर जंगल जैसे माहौल में ले जाती है। सेंट्रल रिज और नॉर्थ रिज के आसपास के इलाके नेचर वॉक बर्ड वॉचिंग और शांत ट्रेक के लिए काफी पसंद किए जाते हैं। यहां के जमीन और रास्ते थोड़े आपको ऑफबीट लगेंगे। दिल्ली हाट दिल्ली हाट राजधानी में घूमने वाली बेहतरीन जगहों में शामिल है। ये एक ऐसी एयर मार्केट है जहां आपको भारत की कला शिल्प और खाने की झलक एक ही जगह पर मिल जाती है। यहां अलग राज्यों से आए कारीगर अपनी दुकानें लगाते हैं जिनमें हैंडलूम कपड़े जूलरी मिट्टी के बर्तन और लोक कला की चीजें मिलती हैं। खाने के शौकीनों के लिए भी ये जगह किसी जन्नत से कम नहीं। मोमोज लिट्टी-चोखा डोसा से लेकर कबाब तक हर राज्य के फेमस स्वाद यहां चखने को मिल जाएंगे। लाल किला लाल किला दिल्ली की पहचान और भारत के सबसे मजबूत ऐतिहासिक प्रतीकों में से एक है। ये यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाया गया था। इसकी ऊंची-ऊंची लाल पत्थर की दीवारों के अंदर महल दीवाने आम दीवाने खास और म्यूजियम हैं जो भारत के इतिहास के कई अहम किस्से बताते हैं।

एथलीट पेरेंट्स की दुविधा: जब बच्चे का मन न लगे मैदान में, तो दबाव नहीं 'डायरेक्शन' बदलें

नई दिल्ली । अक्सर देखा जाता है कि जिन घरों में माता-पिता खुद खेल की दुनिया के दिग्गज रहे हैं, वहां समाज और परिवार को उम्मीद होती है कि उनका बच्चा भी उसी विरासत को आगे बढ़ाएगा। लेकिन हकीकत इससे अलग हो सकती है। अगर आप एक एथलीट हैं और आपका बेटा स्पोर्ट्स में रुचि नहीं ले रहा, तो यह आपके लिए निराशाजनक हो सकता है, लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि ‘जबरदस्ती का खेल’ कभी चैंपियन पैदा नहीं करता। रुचि न होने के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक कारण अक्सर माता-पिता बच्चे की अरुचि को उसका ‘आलस’ मान लेते हैं, जबकि इसके पीछे कई गहरे मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा कारण ‘परफॉर्मेंस प्रेशर’ होता है। जब बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता खेल में सफल रहे हैं, तो उसे हारने से डर लगने लगता है। उसे लगता है कि अगर वह अच्छा नहीं खेला, तो वह अपने माता-पिता के नाम को छोटा कर देगा। इसके अलावा, खेल के मैदान पर होने वाला सोशल जजमेंट या एंग्जाइटी भी उसे पीछे धकेलती है। कभी-कभी कारण शारीरिक भी होते हैं, जैसे लो-एनर्जी लेवल या किसी खेल विशेष में रुचि की कमी। सख्त कोच का व्यवहार या साथी खिलाड़ियों से लगातार तुलना भी बच्चे के मन में खेल के प्रति नफरत पैदा कर सकती है। फोर्स करना क्यों हो सकता है खतरनाक? यदि आप बच्चे को उसकी इच्छा के विरुद्ध मैदान पर भेजते हैं, तो इसके परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं। जबरदस्ती करने से बच्चा न केवल खेल से दूर होगा, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी डगमगा सकता है। दबाव में खेलने से उसमें चिड़चिड़ापन, तनाव और माता-पिता के प्रति विद्रोह की भावना पैदा हो सकती है। खेल जो खुशी और मानसिक शांति का माध्यम होना चाहिए, वह उसके लिए एक ‘बोझ’ बन जाता है। लॉन्ग टर्म में, यह आपके और बच्चे के बीच के भावनात्मक रिश्ते को भी कमजोर कर सकता है। क्या करें कि वह खेलों में रुचि ले? बतौर पेरेंट्स आपकी पहली जिम्मेदारी यह पहचानना है कि बच्चा किस चीज में ‘बेस्ट’ है। यदि उसे क्रिकेट या फुटबॉल पसंद नहीं, तो शायद उसे तैराकी, बैडमिंटन या चेस जैसा कोई अन्य खेल पसंद आ सकता है। उसे विभिन्न खेलों के विकल्प दें और खुद फैसला करने का मौका दें। घर का माहौल ऐसा रखें जहाँ खेल केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि आनंद और सेहत के लिए खेला जाए। याद रखें, सही पेरेंटिंग का अर्थ बच्चे को अपनी परछाई बनाना नहीं, बल्कि उसे उसकी अपनी चमक खोजने में मदद करना है। अगर वह खेल में करियर नहीं बनाना चाहता, तो भी उसे फिजिकल एक्टिविटी के अन्य तरीकों जैसे डांस या योग के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उसे स्पोर्ट्स के फायदे बताएं, लेकिन उसे अपनी विरासत ढोने के लिए मजबूर न करें। जब बच्चा खुद को सुरक्षित और बिना किसी जजमेंट के महसूस करेगा, तभी वह अपनी असली प्रतिभा को निखार पाएगा।

Chocolate Day Special: चॉकलेट डे पर चाहिए दमकती त्वचा तो स्किन केयर में करें चॉकलेट का इस्तेमाल

नई दिल्ली । वैलेंटाइन वीक तीसरे दिन यानी कि 9 फरवरी को चॉकलेट डे मनाया जाता है ऐसे में इस दिन कपल्स एक-दूसरे को चॉकलेट तोहफे में देते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि इसी खाने वाली चॉकलेट से आप अपने चेहरे को दमका भी सकते हैं। जी हां आपको ये जानने की जरूरत है कि डार्क चॉकलेट त्वचा के लिए किसी वरदान से कम नहीं है? दरअसल इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स फ्लेवोनॉयड्स और मिनरल्स स्किन को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं और नेचुरल ग्लो लाने में मदद करते हैं। खासतौर पर आजकल नेचुरल और होम रेमेडीज की डिमांड तेजी से बढ़ रही है ऐसे में चॉकलेट फेस पैक एक ट्रेंडिंग ब्यूटी हैक बन चुका है।तो अगर आप केमिकल प्रोडक्ट्स से दूर रहकर नेचुरल तरीके से ग्लोइंग स्किन पाना चाहती हैं तो चॉकलेट का सही इस्तेमाल जानना बेहद ज़रूरी है। आइए इस लेख में आपको इसी बारे में जानकारी देते हैं। चॉकलेट फेस पैक डार्क चॉकलेट में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो त्वचा को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं। जब इसमें शहद और दूध मिलाया जाता है तो यह स्किन को गहराई से मॉइश्चराइज करता है। ये फेस पैक ड्राई और डल स्किन के लिए बेहद फायदेमंद है। हफ्ते में 1–2 बार इसका इस्तेमाल करने से चेहरे पर नेचुरल ग्लो आता है और स्किन सॉफ्ट व स्मूद बनती है। चॉकलेट स्क्रब चॉकलेट और ब्राउन शुगर से बना स्क्रब त्वचा की ऊपरी परत पर जमी डेड स्किन को हटाने में मदद करता है। ये ब्लड सर्कुलेशन को भी बेहतर बनाता है जिससे चेहरे पर तुरंत फ्रेशनेस नजर आती है। इस स्क्रब को हफ्ते में सिर्फ एक बार ही इस्तेमाल करें ताकि त्वचा को नुकसान न पहुंचे। चॉकलेट और कॉफी मास्क कॉफी में मौजूद कैफीन और चॉकलेट के पोषक तत्व मिलकर टैनिंग पिग्मेंटेशन और डार्क स्पॉट्स को हल्का करने में मदद करते हैं। गुलाब जल त्वचा को ठंडक देता है और पोर्स को टाइट करता है। ये मास्क ऑयली और कॉम्बिनेशन स्किन वालों के लिए खास तौर पर फायदेमंद है। बरतें ये सावधानी चेहरे पर लगाने से पहले हमेशा पैच टेस्ट करें ताकि किसी तरह की एलर्जी या जलन से बचा जा सके। स्किन के लिए केवल डार्क चॉकलेट का ही इस्तेमाल करें क्योंकि दूध या फ्लेवर वाली चॉकलेट में ज्यादा शुगर और केमिकल होते हैं।फेस पैक को 15–20 मिनट से अधिक समय तक चेहरे पर न रखें और स्क्रब करते समय त्वचा को जोर से न रगड़ें।अगर आपकी त्वचा सेंसिटिव या एक्ने-प्रोन है तो इसका इस्तेमाल सीमित मात्रा में करें। खुले घाव कट या एक्टिव मुंहासों पर चॉकलेट न लगाएं।

लेट मैरिज: मजबूरी नहीं, आज के युवाओं का सोच-समझकर लिया गया फैसला..

नई दिल्ली। आज की युवा पीढ़ी के लिए शादी अब केवल एक सामाजिक रिवाज़ भर नहीं रही। लेट मैरिज यानी 30 वर्ष की उम्र के बाद विवाह करना धीरे-धीरे एक सामान्य और स्वीकार्य ट्रेंड बनता जा रहा है। इसकी जड़ में करियर की महत्वाकांक्षा व्यक्तिगत आज़ादी और जीवन को अपने तरीके से जीने की चाह छिपी है।जहाँ पहले समय पर शादी को सफलता का पैमाना माना जाता था वहीं अब युवा खुद को पहले मानसिक आर्थिक और भावनात्मक रूप से तैयार करना ज़रूरी समझते हैं। आखिर क्यों बढ़ रहा है लेट मैरिज का चलनकरियर को प्राथमिकता आज के युवा पहले अपनी पढ़ाई नौकरी बिज़नेस या स्टार्टअप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं। वे मानते हैं कि मजबूत करियर एक स्थिर पारिवारिक जीवन की नींव है। आर्थिक स्वतंत्रता की चाहशादी से पहले आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना अब एक सामान्य सोच बन गई है। युवाओं का मानना है कि वित्तीय स्थिरता रिश्तों में तनाव को कम करती है। व्यक्तिगत आज़ादी और आत्मनिर्भरतासमाजिक दबाव अब पहले जैसा नहीं रहा। शादी को अब “ज़रूरी कदम” नहीं बल्कि एक व्यक्तिगत चुनाव के रूप में देखा जाने लगा है। सही साथी की तलाशआज की पीढ़ी भावनात्मक समझ मानसिक मेल और समान सोच को रिश्ते की सबसे बड़ी नींव मानती है। जल्दबाज़ी की जगह समझदारी को महत्व दिया जा रहा है। समाज का बदला नजरियाजहाँ कभी 25 से 28 की उम्र तक शादी को आदर्श माना जाता था वहीं अब परिवार और माता-पिता भी धीरे-धीरे इस बदलाव को स्वीकार कर रहे हैं। सोशल मीडिया सेलेब्रिटी लाइफस्टाइल और वैश्विक सोच ने इस ट्रेंड को सामान्य बनाने में अहम भूमिका निभाई है। चुनौतियाँ भी हैं लेकिन सोच और मजबूतलेट मैरिज के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं जैसे जैविक सीमाएं पारिवारिक दबाव और सामाजिक टिप्पणियां। इसके बावजूद युवा इसे किसी समझौते की बजाय जीवन की प्राथमिकताओं से जुड़ा फैसला मान रहे हैं।लेट मैरिज आज केवल करियर का परिणाम नहीं बल्कि एक जागरूक स्वतंत्र और संतुलित निर्णय बन चुका है। यह दर्शाता है कि आज के युवा अपनी ज़िंदगी में सुकून स्थिरता और समझदारी को सबसे ऊपर रख रहे हैं।

दो दीवाने सहर में' का ट्रेलर रिलीज, 20 फरवरी को सिनेमाघरों में देगी दस्तक

ज़ी स्टूडियोज और भंसाली प्रोडक्शंस की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘दो दीवाने सहर में’ का ट्रेलर रिलीज़ हो गया है। टीजर ने जहां भावनात्मक माहौल बनाया था, वहीं ट्रेलर इस कहानी की दुनिया को और गहराई से दिखाता है। सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर स्टारर यह फिल्म रोमांस को किसी सपनीली परीकथा की तरह नहीं, बल्कि असल जिंदगी के अनुभव की तरह पेश करती नजर आ रही है। यह फिल्म 20 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी। फिल्म की कहानी शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच पनपते एक रिश्ते पर आधारित है। ट्रेलर में दो ऐसे किरदारों की मुलाकात दिखाई गई है, जो एक-दूसरे को बदलने नहीं, बल्कि समझने की कोशिश करते हैं। उनकी नज़दीकियां शोर-शराबे से नहीं, बल्कि खामोश पलों, अधूरी बातों और छोटी-छोटी भावनात्मक झलकियों से बनती हैं। यह रिश्ता धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और हर मोड़ पर अपने साथ एक नया एहसास छोड़ जाता है। सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री ट्रेलर की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती है। दोनों ऐसे किरदार निभा रहे हैं जो खुद को समझने की प्रक्रिया में हैं, और इसी सफर में एक-दूसरे से जुड़ते हैं। फिल्म का निर्देशन रवि उद्यावर ने किया है, जबकि संजय लीला भंसाली, प्रेरणा सिंह, उमेश कुमार बंसल और भारत कुमार रंगा इसके निर्माता हैं।

Moringa Oil Benefits : प्रदूषण और तेज धूप से खराब होती स्किन के लिए आयुर्वेदिक सुरक्षा कवच

नई दिल्ली । बदलती जीवनशैली बढ़ता प्रदूषण तेज धूप मानसिक तनाव और असंतुलित खानपान का सबसे पहला असर चेहरे की त्वचा पर दिखाई देने लगता है। कम उम्र में झुर्रियां एज स्पॉट्स पिगमेंटेशन और रूखी बेजान त्वचा अब आम समस्या बनती जा रही है। ऐसे में लोग महंगे केमिकल युक्त उत्पादों की ओर रुख करते हैं लेकिन लंबे समय में ये त्वचा को और नुकसान पहुंचा सकते हैं। आयुर्वेद में प्राकृतिक तेलों को त्वचा की सेहत के लिए सबसे सुरक्षित और असरदार माना गया है जिनमें मोरिंगा तेल खास स्थान रखता है। मोरिंगा को आयुर्वेद में शोभांजन कहा गया है। इसके पत्ते फल छाल और बीज औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। मोरिंगा के सूखे बीजों से निकाला गया तेल त्वचा के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार यह तेल त्वचा के दोषों को संतुलित करता है और भीतर से स्किन को स्वस्थ बनाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार मोरिंगा तेल में ओलिक एसिड विटामिन ए सी और ई फ्लेवोनॉयड्स और पॉलीफेनॉल जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। ये तत्व त्वचा को पोषण देने के साथ उसे समय से पहले बूढ़ा होने से बचाते हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण त्वचा को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से सुरक्षा प्रदान करते हैं। चेहरे पर पड़ने वाले काले धब्बे और एज स्पॉट्स मुख्य रूप से धूप प्रदूषण और कोलेजन की कमी के कारण होते हैं। मोरिंगा तेल इन समस्याओं पर सीधे काम करता है। विटामिन सी त्वचा में कोलेजन निर्माण को बढ़ावा देता है जिससे स्किन की कसावट बनी रहती है और दाग धब्बे धीरे धीरे हल्के होने लगते हैं। नियमित रूप से चेहरे पर हल्के हाथों से इसकी मालिश करने से यह त्वचा की गहराई तक पहुंचकर असर दिखाता है। आयुर्वेद में एज स्पॉट्स को पित्त दोष के असंतुलन से जोड़ा जाता है। मोरिंगा तेल में ठंडक देने वाले गुण होते हैं जो त्वचा की गर्मी को शांत करते हैं और पित्त दोष को संतुलित करने में सहायक होते हैं। इससे पिगमेंटेशन और सन डैमेज की समस्या में राहत मिलती है। नहाने के बाद या रात में सोने से पहले कुछ बूंदें चेहरे पर लगाने से त्वचा लंबे समय तक मुलायम और चमकदार बनी रहती है। मोरिंगा तेल केवल दाग धब्बों तक सीमित नहीं है। इसके एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटी बैक्टीरियल गुण मुंहासों जलन एलर्जी और लालिमा में भी राहत देते हैं। यह त्वचा की प्राकृतिक नमी को बनाए रखता है जिससे रूखापन और खिंचाव कम होता है। फटे होंठ बेजान त्वचा और धूप से झुलसी स्किन के लिए भी इसे लाभकारी माना जाता है।

आयुष मंत्रालय की सलाह: चियासीड्स से रखें दिल दुरुस्त, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल रहेगा संतुलित

नई दिल्ली । चियासीड्स को आज के समय में पोषण का पावरहाउस माना जाता है। छोटे आकार के ये बीज सेहत के लिए कई तरह से लाभकारी साबित होते हैं। खासतौर पर हृदय स्वास्थ्य के लिहाज से चियासीड्स का नियमित सेवन बेहद उपयोगी माना गया है। फाइबर ओमेगा थ्री फैटी एसिड और प्रोटीन से भरपूर चियासीड्स न केवल दिल को मजबूत बनाते हैं बल्कि पाचन सुधारने और वजन नियंत्रित रखने में भी सहायक होते हैं। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय भी चियासीड्स को हृदय रोगों से बचाव के लिए एक प्रभावी प्राकृतिक विकल्प मानता है। मंत्रालय के अनुसार इन छोटे काले बीजों में मौजूद पोषक तत्व शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं। इनमें प्रचुर मात्रा में ओमेगा थ्री फैटी एसिड पाए जाते हैं जो हृदय की मांसपेशियों को मजबूत बनाने और रक्त संचार को बेहतर करने में अहम भूमिका निभाते हैं। चियासीड्स में मौजूद ओमेगा थ्री फैटी एसिड विशेष रूप से अल्फा लिनोलेनिक एसिड के रूप में पाए जाते हैं। यह फैटी एसिड शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने और खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। इससे धमनियों में जमा होने वाली चर्बी कम होती है और ब्लॉकेज का खतरा घटता है। यही कारण है कि चियासीड्स को हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में उपयोगी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार जो लोग नियमित रूप से चियासीड्स का सेवन करते हैं उनमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर संतुलित बना रहता है। इसके साथ ही ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में भी यह बीज सहायक होता है। चियासीड्स में पोटैशियम मैग्नीशियम और फाइबर की अच्छी मात्रा होती है जो रक्त वाहिकाओं को आराम देने में मदद करती है। इससे दिल पर दबाव कम पड़ता है और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या नियंत्रित रहती है। चियासीड्स का सेवन बेहद आसान है। रोजाना एक से दो चम्मच चियासीड्स पर्याप्त माने जाते हैं। इन्हें रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाली पेट खाया जा सकता है। इसके अलावा दही स्मूदी सलाद दलिया ओट्स या फलों के साथ मिलाकर भी सेवन किया जाता है। पानी में भिगोने पर चियासीड्स जेल जैसी बनावट बना लेते हैं जो पेट के लिए लाभकारी होती है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाती है। इसके साथ ही चियासीड्स में फाइबर प्रोटीन कैल्शियम आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये तत्व शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने ऊर्जा देने और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। संतुलित आहार के साथ चियासीड्स को दिनचर्या में शामिल करना सेहत के लिए एक समझदारी भरा कदम माना जाता है।

क्या हम रिश्तों में ‘यूज़र मैनुअल’ ढूंढने लगे हैं? आधुनिक जीवनशैली में साथी और दोस्त को समझने की कोशिश

नई दिल्ली । आज के तेज़ और डिजिटल जीवन में रिश्तों की परिभाषा बदलती जा रही है। पहले जहाँ भावनाओं, अनुभव और व्यक्तिगत संवाद के भरोसे रिश्ते बनाए जाते थे, वहीं अब लोग साथी या मित्र के व्यवहार, पसंद-नापसंद और प्रतिक्रियाओं को समझने के लिएयूज़र मैनुअल खोजने लगे हैं।जीवन की बढ़ती चुनौतियाँ, करियर के दबाव और सोशल मीडिया पर तुलना की प्रवृत्ति ने लोगों को अपने रिश्तों में स्पष्टता और नियंत्रण की चाह दी है। इसी कारण हर व्यक्ति साथी या मित्र के व्यवहार को समझने के लिए संकेत, नियम और टिप्स ढूँढने लगता है। युवा पीढ़ी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, ब्लॉग्स और सोशल मीडिया की मदद से अपने साथी की मानसिकता और प्राथमिकताओं को जानने की कोशिश कर रही है। इससे छोटे झगड़े कम होते हैं और संवाद अधिक सहज बनता है। कई लोग मानते हैं कि प्रारंभिक गाइडलाइन से रिश्ते तनावमुक्त और समझदार बन सकते हैं।हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि रिश्तों को केवल नियमों और गाइडबुक तक सीमित करना भावनात्मक गहराई को कमजोर कर सकता है। वास्तविक समझ और सामंजस्य समय, संवाद और अनुभव से ही विकसित होते हैं। सामाजिक और मानसिक दृष्टिकोण से इस प्रवृत्ति का सकारात्मक पक्ष यह है कि लोग साथी की भावनाओं और आवश्यकताओं के प्रति अधिक सजग हो रहे हैं। लेकिन नकारात्मक पहलू यह है कि अचानक या अप्रत्याशित भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता घट सकती है, जिससे रिश्तों में spontanity और गहराई कम हो सकती है।इसलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि यूज़र मैनुअल केवल एक शुरुआती सहारा हो सकता है, लेकिन रिश्तों की असली ताकत समय, विश्वास और संवाद में निहित होती है।