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“परवीन बाबी को लगता था अमिताभ बच्चन उनकी हत्या करना चाहते हैं” – पूजा भट्ट का बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा की सबसे ग्लैमरस और चर्चित अभिनेत्रियों में गिनी जाने वाली परवीन बाबी की जिंदगी जितनी चमकदार पर्दे पर नजर आती थी उतनी ही दर्द और अकेलेपन से भरी हुई असल जिंदगी में थी। अब अभिनेत्री पूजा भट्ट ने परवीन बाबी को लेकर कुछ ऐसे खुलासे किए हैं जिन्होंने एक बार फिर बॉलीवुड के उस दर्दनाक दौर की याद दिला दी है। महेश भट्ट की बेटी और अभिनेत्री पूजा भट्ट ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में परवीन बाबी के आखिरी दिनों को याद करते हुए कहा कि वह मानसिक रूप से बेहद परेशान थीं। पूजा ने बताया कि उन्हें आज भी वह समय याद है जब परवीन बाबी को यह डर सताने लगा था कि अमिताभ बच्चन उन्हें मारना चाहते हैं। पूजा भट्ट ने पत्रकार विक्की लालवानी को दिए इंटरव्यू में कहा कि जब परवीन बाबी विदेश से लौटकर आई थीं तब वह स्टारडस्ट मैगजीन के ऑफिस में बैठकर लगातार जेरॉक्स मशीन का इस्तेमाल कर रही थीं और अमिताभ बच्चन के खिलाफ इंटरव्यू दे रही थीं। पूजा के मुताबिक परवीन बाबी को लगता था कि अमिताभ बच्चन अभी भी उनकी हत्या करना चाहते हैं। इतना ही नहीं पूजा ने यह भी खुलासा किया कि परवीन बाबी खाने-पीने की चीजों को लेकर बेहद डरी हुई रहती थीं। उन्हें शक था कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग उनके खाने में जहर मिला रहे हैं। यही वजह थी कि वह सिर्फ अंडे खाती थीं क्योंकि उन्हें वही सुरक्षित लगता था। हालांकि पूजा भट्ट ने यह भी साफ कहा कि वह डॉक्टर नहीं हैं इसलिए किसी बीमारी को लेकर दावा नहीं कर सकतीं लेकिन इतना जरूर था कि परवीन बाबी मानसिक रूप से ठीक नहीं थीं। बाद में जांच में सामने आया था कि वह सिजोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी से जूझ रही थीं। परवीन बाबी और अमिताभ बच्चन ने साथ में कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया था जिनमें दीवार अमर अकबर एंथोनी काला पत्थर शान और नमक हलाल जैसी फिल्में शामिल हैं। दोनों की ऑनस्क्रीन जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया था। एक समय उनके अफेयर की अफवाहें भी उड़ी थीं लेकिन दोनों कलाकारों ने इन खबरों को कभी स्वीकार नहीं किया। 1980 के दशक में परवीन बाबी ने अमिताभ बच्चन के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि अमिताभ बच्चन एक अंतरराष्ट्रीय गैंग का हिस्सा हैं और उनका अपहरण कर उनके कान में माइक्रोचिप लगाने की कोशिश की गई है। हालांकि जांच के दौरान अमिताभ बच्चन के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। पूजा भट्ट ने परवीन बाबी के व्यक्तित्व को याद करते हुए कहा कि वह बेहद खूबसूरत और दिलदार इंसान थीं। पूजा ने बताया कि जब उनके पिता महेश भट्ट उन्हें परवीन बाबी के घर लेकर जाते थे तब वह हमेशा उन्हें प्यार से मिलती थीं और गिफ्ट दिया करती थीं। पूजा आज भी वह परफ्यूम नहीं भूल पाईं जो परवीन बाबी ने उन्हें दिया था। जनवरी 2005 में परवीन बाबी का निधन हो गया था। वह सिर्फ 50 साल की थीं। उनकी मौत ने पूरे फिल्म जगत को झकझोर दिया था। बताया जाता है कि उनका शव कई दिनों तक मुंबई के कूपर अस्पताल के मुर्दाघर में लावारिस पड़ा रहा था। बाद में महेश भट्ट आगे आए और उन्होंने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई। परवीन बाबी की कहानी आज भी बॉलीवुड की सबसे दर्दनाक कहानियों में गिनी जाती है जहां शोहरत के पीछे छिपा अकेलापन और मानसिक संघर्ष साफ दिखाई देता है।

गर्मी में स्टाइल भी, सुरक्षा भी! UV कपड़े बन रहे नया फैशन ट्रेंड

नई दिल्ली । भीषण गर्मी, चिलचिलाती धूप और लगातार बढ़ती हीटवेव के बीच अब लोगों को राहत देने का नया तरीका फैशन ट्रेंड बनता जा रहा है। पहले जहां लोग धूप से बचने के लिए सनस्क्रीन, दुपट्टा, ग्लव्स और छाते का सहारा लेते थे, वहीं अब बाजार में ऐसे खास कपड़े तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं जिनमें “सनस्क्रीन” जैसी सुरक्षा पहले से मौजूद है। UV-प्रोटेक्टिव क्लोदिंग यानी अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने वाले कपड़े अब फैशन और हेल्थ दोनों का कॉम्बिनेशन बन चुके हैं। इन खास कपड़ों की मांग खासतौर पर उन लोगों में तेजी से बढ़ रही है जो रोजाना बाइक, स्कूटी, साइकिल या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करते हैं। लंबे समय तक धूप में रहने से होने वाली टैनिंग, सनबर्न और स्किन डैमेज से बचने के लिए लोग अब UV-सुरक्षा वाले जैकेट, शर्ट, ट्राउजर, टोपी, ग्लव्स और स्कार्फ खरीद रहे हैं। UV-प्रोटेक्टिव कपड़े सामान्य फैब्रिक से अलग तकनीक से तैयार किए जाते हैं। इनमें धागों की बुनाई काफी घनी होती है ताकि सूरज की हानिकारक किरणें आसानी से कपड़े के आर-पार न जा सकें। इसके अलावा इनमें पॉलिएस्टर, नायलॉन और हाई-टेक कॉटन ब्लेंड जैसे फैब्रिक का इस्तेमाल किया जाता है, जो UV किरणों को बेहतर तरीके से ब्लॉक करते हैं। कई कंपनियां इन कपड़ों पर खास मिनरल या केमिकल कोटिंग भी करती हैं, जिसमें जिंक ऑक्साइड और टाइटेनियम डाइऑक्साइड जैसे तत्व शामिल होते हैं। ये UV किरणों को रिफ्लेक्ट करने में मदद करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जैसे सनस्क्रीन में SPF रेटिंग होती है, वैसे ही इन कपड़ों में UPF यानी अल्ट्रावायलेट प्रोटेक्शन फैक्टर होता है। यह बताता है कि कपड़ा कितनी UV किरणों को रोक सकता है। UPF 15 से 20 वाले कपड़े सामान्य सुरक्षा देते हैं, जबकि UPF 30 से 40 अच्छी सुरक्षा माने जाते हैं। वहीं UPF 50 वाले कपड़े लगभग 98 प्रतिशत तक UV किरणों को ब्लॉक कर सकते हैं। फैशन और स्किन प्रोटेक्शन का यह कॉम्बिनेशन लोगों को खूब पसंद आ रहा है। पहले जहां लोग गर्मी में चेहरा ढंककर निकलते थे, वहीं अब स्टाइलिश UV जैकेट और फुल स्लीव कपड़े नया स्टाइल स्टेटमेंट बनते जा रहे हैं। खासतौर पर युवाओं और आउटडोर एक्टिविटी करने वाले लोगों में इसका क्रेज तेजी से बढ़ा है। बढ़ती गर्मी और सन डैमेज का डर भी इस ट्रेंड के पीछे बड़ी वजह माना जा रहा है। डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक तेज धूप में रहने से स्किन एजिंग, पिग्मेंटेशन और स्किन कैंसर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में UV कपड़े एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी साफ करते हैं कि UV-प्रोटेक्टिव कपड़े पहनने का मतलब यह नहीं है कि सनस्क्रीन की जरूरत खत्म हो गई। चेहरे, हाथों और शरीर के खुले हिस्सों पर सनस्क्रीन लगाना अब भी जरूरी है। साथ ही धूप का चश्मा और हाइड्रेशन भी बेहद जरूरी माना जाता है। जानकारों के मुताबिक अगर ये कपड़े गीले हो जाएं तो उनकी UPF क्षमता कम हो सकती है। इसलिए धूप में लंबे समय तक रहने पर अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी है। फिलहाल फैशन इंडस्ट्री में UV-प्रोटेक्टिव क्लोदिंग तेजी से अपनी जगह बना रही है। स्टाइल, आराम और सुरक्षा का यह नया फॉर्मूला आने वाले समय में गर्मियों की जरूरत बन सकता है।

DNA बदलकर दिल की बीमारी खत्म करने का दावा! एक इंजेक्शन से 62% घटा खराब कोलेस्ट्रॉल

नई दिल्ली । दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही दिल की बीमारियों के बीच वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई थेरेपी विकसित करने का दावा किया है, जो भविष्य में हार्ट अटैक के खतरे को हमेशा के लिए कम कर सकती है। खास बात यह है कि इस इलाज में रोज दवाइयां खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि सिर्फ एक इंजेक्शन शरीर के डीएनए में बदलाव कर लंबे समय तक खराब कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रख सकता है। यह नई तकनीक जीन-एडिटिंग यानी डीएनए में बदलाव करने वाली थेरेपी पर आधारित है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The New England Journal of Medicine में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक इस थेरेपी ने शुरुआती ट्रायल में बेहद उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर आगे के बड़े अध्ययनों में भी ऐसे ही नतीजे मिले तो यह दिल की बीमारी के इलाज में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इस रिसर्च का नेतृत्व बायोटेक कंपनी Verve Therapeutics के सीईओ और वैज्ञानिक Dr. Sekar Kathiresan ने किया। अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों के अनुसार यह थेरेपी शरीर में मौजूद खराब कोलेस्ट्रॉल यानी LDL को लंबे समय तक कम रखने में सक्षम दिखाई दी है। रिसर्च के दौरान 85 मरीजों पर ट्रायल किया गया, हालांकि फिलहाल 35 मरीजों के डेटा का विश्लेषण सामने आया है। ये सभी मरीज आनुवंशिक रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल या दिल की बीमारी से जूझ रहे थे। जिन मरीजों को इस नई दवा की सबसे ज्यादा डोज दी गई, उनमें सिर्फ एक इंजेक्शन के बाद LDL कोलेस्ट्रॉल में करीब 62 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। सबसे बड़ी बात यह रही कि जिन मरीजों को 18 महीने पहले यह थेरेपी दी गई थी, उनमें भी कोलेस्ट्रॉल का स्तर लगातार कम बना हुआ है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह थेरेपी शरीर में एक खास जीन-एडिटिंग “मशीन” की तरह काम करती है। इंजेक्शन के जरिए इसे शरीर में पहुंचाया जाता है, जहां यह खून के रास्ते सीधे लिवर तक पहुंचती है। इसके बाद यह लिवर सेल के डीएनए में मौजूद PCSK9 नाम के जीन को टारगेट करती है। यही जीन खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। थेरेपी इस जीन में बदलाव कर LDL को नियंत्रित कर देती है। दिल के विशेषज्ञ Dr. John H. P. Alexander ने इस शोध को बेहद महत्वपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि यदि कोलेस्ट्रॉल और दिल की बीमारी का स्थायी इलाज संभव हो जाता है तो यह मेडिकल साइंस में गेम चेंजर साबित होगा। हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और इसे पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी साबित करने के लिए बड़े स्तर पर और अध्ययन किए जाएंगे। इसके बावजूद शुरुआती नतीजों ने दुनियाभर के मेडिकल समुदाय का ध्यान खींचा है। आमतौर पर जीन थेरेपी बेहद महंगी मानी जाती है, लेकिन रिसर्च टीम का दावा है कि भविष्य में इस दवा को आम लोगों की पहुंच में लाने की कोशिश की जाएगी। कंपनी इसे सिर्फ दुर्लभ इलाज नहीं बल्कि सामान्य हार्ट ट्रीटमेंट का हिस्सा बनाना चाहती है। भारत जैसे देश के लिए यह शोध बेहद अहम माना जा रहा है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल करीब 28 लाख लोगों की मौत दिल की बीमारियों से होती है। ऐसे में अगर यह थेरेपी सफल होती है तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है और हार्ट अटैक के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

45°C की आग उगलती गर्मी में ऐसे बचाएं खुद को, नौतपा में भूलकर भी न करें ये गलतियां

नई दिल्ली । नौतपा के नौ दिन साल के सबसे गर्म दिनों में गिने जाते हैं। इस दौरान सूरज की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं और तापमान कई शहरों में 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। तेज धूप, गर्म हवाएं और लू शरीर पर तेजी से असर डालती हैं। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी डीहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं की वजह बन सकती है। खासकर उन लोगों के लिए खतरा ज्यादा बढ़ जाता है जिन्हें रोजमर्रा के काम, नौकरी, व्यापार या यात्रा के कारण घर से बाहर निकलना पड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक नौतपा में सबसे जरूरी है कि शरीर को ज्यादा गर्म होने से बचाया जाए और पानी की कमी न होने दी जाए। डॉक्टरों का कहना है कि अगर सही सावधानी बरती जाए तो इस भीषण गर्मी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। घर से बाहर निकलते समय कुछ जरूरी चीजें हमेशा साथ रखनी चाहिए। पानी की बोतल, ORS या ग्लूकोज, छाता या टोपी, सनग्लास, गमछा या कॉटन कपड़ा, हल्का स्नैक और जरूरी दवाइयां साथ रखना बेहद जरूरी माना गया है। धूप में निकलते समय सिर और चेहरे को ढंकना लू से बचाने में काफी मदद करता है। नौतपा के दौरान सुबह 6 बजे से 10 बजे तक और शाम 5 बजे के बाद बाहर निकलना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक का समय सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। इस दौरान गर्म हवाएं और तेज धूप शरीर का तापमान तेजी से बढ़ा देती हैं। यदि जरूरी काम न हो तो इस समय बाहर निकलने से बचना चाहिए। पैदल चलने वालों और बाइक सवारों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। बाइक चलाते समय फुल स्लीव कपड़े, ग्लव्स और हेलमेट का इस्तेमाल करें। हेलमेट के अंदर कॉटन का कपड़ा लगाने से सिर जल्दी गर्म नहीं होता। वहीं पैदल चलने वाले लोग बीच-बीच में छांव में रुककर आराम करें और हर 20 से 30 मिनट में पानी पीते रहें। खाली पेट बाहर निकलना भी खतरनाक हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार कुछ शारीरिक संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, ज्यादा पसीना आना या अचानक पसीना बंद हो जाना, तेज कमजोरी, उल्टी, सांस लेने में दिक्कत, शरीर का तापमान बढ़ना, बेहोशी या दिल की धड़कन तेज होना हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत छांव या ठंडी जगह पर जाएं और मेडिकल मदद लें। नौतपा में सिर्फ पानी पीना काफी नहीं होता। शरीर से पसीने के साथ जरूरी मिनरल्स भी निकल जाते हैं। इसलिए ORS, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी और बेल या आम पना जैसे देसी पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं। बहुत ज्यादा चाय, कॉफी, शराब और कोल्ड ड्रिंक्स से बचना चाहिए क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकते हैं। बच्चों और बुजुर्गों को इस मौसम में खास देखभाल की जरूरत होती है। बच्चों को धूप में खेलने से बचाएं और उन्हें बार-बार पानी या तरल पदार्थ देते रहें। वहीं बुजुर्गों को लंबे समय तक गर्मी में न रहने दें। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट या सांस की बीमारी है उन्हें अतिरिक्त सतर्क रहने की जरूरत है। नौतपा के दौरान लाइफस्टाइल में भी बदलाव जरूरी है। हल्का और सुपाच्य भोजन करें। तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और मौसमी फल डाइट में शामिल करें। ढीले और सूती कपड़े पहनें ताकि शरीर में हवा का संचार बना रहे। पर्याप्त नींद और आराम भी शरीर को गर्मी से लड़ने की ताकत देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नौतपा को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। सही सावधानी और जागरूकता ही इस भीषण गर्मी में सबसे बड़ा बचाव है।

चारधाम यात्रा पर भारी पड़ रही ऊंचाई और गर्मी, 39 दिन में 105 श्रद्धालुओं की मौत

नई दिल्ली । उत्तराखंड की चारधाम यात्रा इस बार आस्था के साथ-साथ चिंता का विषय भी बनती जा रही है। यात्रा शुरू होने के महज 39 दिनों के भीतर 105 से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौत हो चुकी है। इनमें ज्यादातर मौतें हार्ट अटैक, हाई एल्टीट्यूड सिकनेस, सांस की तकलीफ और पुरानी बीमारियों के कारण हुई हैं। पिछले साल के मुकाबले इस बार मौतों का आंकड़ा कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और यात्रा प्रबंधन पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल 14 मई तक 40 श्रद्धालुओं की मौत हुई थी, लेकिन इसके बाद बढ़ती गर्मी और लगातार बढ़ती भीड़ के बीच सिर्फ 14 दिनों में 65 और लोगों ने जान गंवा दी। सबसे ज्यादा 50 मौतें केदारनाथ धाम में हुई हैं, जबकि बद्रीनाथ में 30, यमुनोत्री में 15 और गंगोत्री-गौमुख क्षेत्र में 10 श्रद्धालुओं की मौत दर्ज की गई है। हाल ही में टिहरी जिले के देवप्रयाग में महाराष्ट्र से आए दो श्रद्धालुओं की हार्ट अटैक से मौत हो गई। मृतकों में 49 वर्षीय किशन नरहरि और 81 वर्षीय विमल ज्ञानोबा शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि ज्यादातर श्रद्धालु ऊंचाई वाले इलाकों में शरीर पर पड़ने वाले दबाव को नजरअंदाज कर देते हैं, जिसका खामियाजा जान गंवाकर भुगतना पड़ रहा है। चारधाम यात्रा में इस बार रिकॉर्ड भीड़ देखने को मिल रही है। अब तक 23 लाख से ज्यादा श्रद्धालु गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम पहुंच चुके हैं, जबकि रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा 42 लाख के पार पहुंच गया है। सबसे ज्यादा भीड़ केदारनाथ धाम में उमड़ी है, जहां 9 लाख से ज्यादा श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। बद्रीनाथ में 6 लाख 42 हजार, यमुनोत्री और गंगोत्री में 4-4 लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। सरकार लगातार दावा कर रही है कि यात्रा मार्ग पर पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। मेडिकल कैंप, डॉक्टर, एम्बुलेंस और स्वास्थ्य टीमों की तैनाती की गई है। यात्रा शुरू होने से पहले एडवाइजरी जारी कर बुजुर्गों, हृदय रोगियों, हाई ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीजों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह भी दी गई थी। बावजूद इसके लगातार बढ़ रही मौतों ने यात्रा की चुनौतियों को उजागर कर दिया है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सुबोध उनियाल ने कहा कि कई श्रद्धालु अति उत्साह में शरीर के संकेतों को नजरअंदाज कर तेजी से यात्रा पूरी करने की कोशिश करते हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी और लगातार चढ़ाई की वजह से हार्ट अटैक और हाई एल्टीट्यूड सिकनेस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उन्होंने यात्रियों से अपील की कि अगर सांस लेने में दिक्कत, सीने में दर्द या कमजोरी महसूस हो तो तुरंत यात्रा रोककर चिकित्सकीय मदद लें। चारधाम यात्रा की शुरुआत 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ हुई थी। इसके बाद 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। कपाट खुलने के बाद से ही चारों धामों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। आस्था के इस महापर्व में जहां करोड़ों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं, वहीं लगातार बढ़ती मौतों ने यह साफ कर दिया है कि पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों की यात्रा को हल्के में लेना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

‘अल्फा’ में आलिया भट्ट के एक्शन ने मचाया असर, बॉबी देओल बोले- मेहनत ने हर सीन को खास बनाया

नई दिल्ली । बॉलीवुड में बदलते समय के साथ एक्शन फिल्मों का स्वरूप भी लगातार विकसित हो रहा है और इसी कड़ी में फिल्म ‘अल्फा’ को एक नए प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। इस फिल्म में महिला केंद्रित एक्शन को बड़े स्तर पर प्रस्तुत किया गया है, जिसमें आलिया भट्ट और शरवरी वाघ मुख्य भूमिकाओं में नजर आने वाली हैं। फिल्म में बॉबी देओल भी एक महत्वपूर्ण किरदार निभा रहे हैं और रिलीज से पहले उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए फिल्म की टीम और विशेषकर आलिया भट्ट की परफॉर्मेंस की खुलकर सराहना की है। बॉबी देओल ने कहा कि उनके लिए यह अनुभव बेहद खास रहा क्योंकि उन्हें लंबे समय से आलिया भट्ट और रणबीर कपूर दोनों के साथ काम करने की इच्छा थी। उन्होंने बताया कि पहले उन्हें रणबीर कपूर के साथ एक फिल्म में काम करने का अवसर मिला था और अब आलिया के साथ काम करना भी उनके करियर का एक यादगार अनुभव बन गया है। उन्होंने कहा कि दोनों कलाकार अपने काम को लेकर बेहद गंभीर हैं और सेट पर एक सकारात्मक माहौल बनाए रखते हैं, जिससे हर सीन को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। आलिया भट्ट की कार्यशैली की तारीफ करते हुए बॉबी देओल ने कहा कि वह अपने किरदार को समझने और उसे जीवंत बनाने के लिए पूरी मेहनत करती हैं। उनके अनुसार आलिया शूटिंग के दौरान हर सीन को बहुत ध्यान से समझती थीं और पूरी तैयारी के साथ सेट पर आती थीं। बॉबी ने यह भी बताया कि एक्शन फिल्मों में केवल शारीरिक ताकत ही नहीं बल्कि मानसिक तैयारी भी उतनी ही जरूरी होती है और आलिया ने इस चुनौती को पूरी गंभीरता के साथ निभाया है। उन्होंने आगे कहा कि एक्शन सीन करना जितना स्क्रीन पर आसान दिखता है, असल में उतना ही कठिन होता है। इसमें लगातार अभ्यास, सही टाइमिंग और मानसिक संतुलन की आवश्यकता होती है। आलिया भट्ट ने हर सीन में खुद को पूरी तरह झोंक दिया और उनके समर्पण ने सभी को प्रभावित किया। बॉबी देओल के अनुसार यह फिल्म इस बात का उदाहरण है कि कैसे कलाकार अपने किरदार को वास्तविकता के करीब लाने के लिए मेहनत करते हैं। फिल्म ‘अल्फा’ को लेकर बॉबी देओल ने कहा कि भारतीय सिनेमा में इस तरह की फिल्में कम ही देखने को मिलती हैं, जहां महिला कलाकार बड़े पैमाने पर एक्शन करती नजर आएं। उन्होंने कहा कि यह फिल्म दर्शकों को एक नया अनुभव देने वाली है क्योंकि इसमें केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक मजबूत कहानी और नए विजुअल्स का मिश्रण है। उन्होंने यह भी कहा कि आज का दर्शक नई कहानियों और नए प्रयोगों को स्वीकार कर रहा है और ‘अल्फा’ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। फिल्म में एक्शन के साथ-साथ भावनात्मक गहराई भी देखने को मिलेगी, जो इसे सामान्य एक्शन फिल्मों से अलग बनाती है। फिल्म का निर्देशन एक युवा निर्देशक द्वारा किया गया है और इसमें अनुभवी तथा नए कलाकारों का संतुलन देखने को मिलता है। यह फिल्म आगामी महीनों में सिनेमाघरों में रिलीज होगी और इससे दर्शकों को एक नई शैली और प्रस्तुति का अनुभव मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

नेहा धूपिया की अमृतसर यात्रा चर्चा में, स्वर्ण मंदिर दर्शन के साथ लोकल खाने का उठाया लुत्फ

नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेत्री नेहा धूपिया इन दिनों अपनी निजी और आध्यात्मिक यात्रा को लेकर सुर्खियों में हैं। हाल ही में वह पंजाब के अमृतसर पहुंचीं, जहां उन्होंने प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में श्रद्धा के साथ मत्था टेका। यह यात्रा उनके लिए न केवल आध्यात्मिक अनुभव रही, बल्कि सांस्कृतिक और खानपान के लिहाज से भी बेहद खास साबित हुई। इस दौरान उनकी कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, जिनमें वह पूरी श्रद्धा और सादगी के साथ नजर आ रही हैं। अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में नेहा धूपिया ने सिर पर दुपट्टा ओढ़कर पवित्र सरोवर के पास खड़े होकर प्रार्थना की। उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली शांति और भाव स्पष्ट रूप से उनकी आध्यात्मिक अनुभूति को दर्शाते हैं। मंदिर परिसर में बिताए गए इन पलों को उन्होंने बेहद निजी और भावनात्मक अनुभव के रूप में महसूस किया। इस दौरान ली गई तस्वीरों में उनकी सादगी और श्रद्धा साफ झलकती है, जिसे उनके प्रशंसकों ने भी काफी सराहा है। स्वर्ण मंदिर दर्शन के बाद नेहा धूपिया ने अमृतसर के स्थानीय स्वाद का भी आनंद लिया। उन्होंने शहर के मशहूर छोले-भटूरे का स्वाद चखा, जिसे वहां की पहचान माना जाता है। एक वीडियो में वह स्थानीय दुकान पर बैठकर पारंपरिक पंजाबी व्यंजन का आनंद लेते हुए दिखाई दीं। उनके चेहरे की मुस्कान और सहजता इस बात का संकेत देती है कि उन्हें यह अनुभव बेहद पसंद आया। इसके अलावा उन्होंने शहर की गलियों में घूमते हुए अन्य स्थानीय व्यंजनों और माहौल को भी करीब से महसूस किया। अपनी इस यात्रा को उन्होंने खास बताते हुए कहा कि हर पल यादगार रहा। तस्वीरों और वीडियो में वह कभी गंभीर भाव में प्रार्थना करती नजर आती हैं, तो कभी हल्के-फुल्के अंदाज में पोज देती दिखाई देती हैं। यह संतुलन उनकी यात्रा को और भी प्राकृतिक और वास्तविक बनाता है, जिससे दर्शकों को भी उनकी यह यात्रा जुड़ी हुई महसूस होती है। यह पहली बार नहीं है जब नेहा धूपिया किसी धार्मिक स्थल पर पहुंची हों। इससे पहले भी वह विभिन्न आध्यात्मिक स्थानों पर दर्शन और सेवा कार्यों में भाग ले चुकी हैं। उनकी यह यात्राएं अक्सर उनके निजी जीवन में शांति और संतुलन के पहलू को दर्शाती हैं। नेहा धूपिया ने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2002 में मॉडलिंग से की थी और मिस इंडिया का खिताब जीतने के बाद उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों और टेलीविजन प्रोजेक्ट्स में काम कर अपनी अलग पहचान बनाई। अभिनय के साथ-साथ वह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी सक्रिय हैं और विभिन्न शो के माध्यम से दर्शकों से जुड़ी रहती हैं। उनकी यह अमृतसर यात्रा एक बार फिर यह दिखाती है कि व्यस्त फिल्मी जीवन के बावजूद वह अपने लिए आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभवों को भी महत्व देती हैं। स्वर्ण मंदिर में उनका यह दौरा और पंजाबी व्यंजनों के प्रति उनका आकर्षण दोनों ही उनकी इस यात्रा को यादगार बनाते हैं।

प्रखर राष्ट्रवाद में ओझल सावरकर का भाषाई योगदान

-प्रो. एस.के.सिंहदुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां पर किसी व्यक्ति का जब एक विशेष पक्ष लोकप्रियता के शिखर पर होता है तो उसकी छाया में व्यक्ति की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषतायें ओझल हो जाती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की पहचान वैश्विक स्तर पर एक महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद् के रूप में है, किंतु इन उपलब्धियों की छाया में उनकी एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता पेंटिंग (चित्रकला) की प्रतिभा दबकर रह गई एवं उसकी पर्याप्त चर्चा नहीं हो पायी। वस्‍तुत: इसी तरह प्रखर क्रांतिकारी रणनीतिकार एवं कालापानी की कठोर यातनायें सहने वाले स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की क्रांतिकारी छवि एवं उनके व्यापक संघर्षों की छाया में उनका महत्वपूर्ण ‘भाषाशुद्धि आन्दोलन’ जन-मानस में उतनी ख्याति नहीं पा सका, जिसका कि वह आन्दोलन हकदार था। उन्होंने देवनागरी लिपि को आधुनिक मुद्रण एवं टंकण के अनुरूप बनाने हेतु अनेक व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किये। इतना ही नहीं, इसके अलावा इतिहास लेखन के माध्यम से औपनिवेशिक दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए भारतीय इतिहास की तार्किक एवं गौरवपूर्ण पुनर्व्‍याख्‍या प्रस्तुत की। सावरकर के प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्तित्व के प्रभाव में उनका गंभीर अकादमिक एवं बौद्विक योगदान प्रायः ओझल ही रहा। एतिहासिक दृष्टि एवं तथ्‍यों के आधार पर देखें तो मुगलकाल में फारसी-अरबी का प्रभुत्व तथा औपनिवेशक काल में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण भारत को भाषाई स्तर पर भारी चुनौतियों और उथल-पुथल का सामना करना पड़ा है। 17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज की ‘राजभाषा नीति’ और 20वीं शताब्दी में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा चलाए गए ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं, जिनके माध्यम से भाषाई अतिक्रमण की चुनौतियों का प्रतिकार किया गया। सावरकर की 1926 में प्रकाशित पुस्तक ‘भाषाशुद्वि’ उनके आंदोलन की वैचारिक आधारशिला बनी। यह केवल व्याकरण संबंधी पुस्तक नहीं बल्कि सावरकर जी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। अत्यधिक विदेशी शब्दों के प्रयोग को वे बौद्विक गुलामी का प्रतीक मानते थे। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने मराठी में घर कर गये उर्दू, अरबी एवं फारसी के शब्दों के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ और प्राकृतिक मूल के शब्दों के प्रयोग का आव्हान किया। वस्‍तुत: उनका मानना था कि भारतीय भाषाओं को अधिक सामथ्र्यवान तथा मौलिक बनाने के लिये उन्हें अपनी मूल जड़ संस्कृत से जुड़ना होगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाषाशुद्वि का लक्ष्य किसी का अंधा विरोध नहीं बल्कि शब्दों का विवेकपूर्ण चयन करना है। उन्होंने कहा कि अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ शब्द अपनाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए, लेकिन जहां देशी शब्द उपलब्ध हों वहां विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। सावरकर जी ने न केवल पूर्णतः नवीन शब्दों का निर्माण किया बल्कि उन्होंने भाषा में पहले से मौजूद शब्दों को पुनर्जीवित तथा पुनः परिभाषित भी किया। उन्होंने मेयर के लिये ‘महापौर’, टेलीग्राम के लिये ‘तार’, लाउडस्पीकर के लिये ‘ध्वनिवर्धक’, कॉलेज के लिये ‘महाविद्यालय’, कॉलम के लिये ‘स्तम्भ’, स्पेशल इश्यू के लिए ‘विशेषांक’ और प्रोफेसर के लिये ‘प्राध्यापक’ जैसे शब्दों का सृजन किया। इसके अतिरिक्त भाषाशुद्वि के लिहाज से सावरकर जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उन शब्दों को पुनःस्थापित करना माना जाना चाहिये जो व्यवहार से लुप्त हो चुके थे। उन्होंने बहुत से संस्कृत और मराठी शब्दों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रचारित एवं प्रतिस्थापित किया। उदाहरण के लिये उन्होंने स्कूल के लिये ‘शाला’, गवर्नेन्स के लिये ‘शासन’, हेडमास्टर के लिये ‘मुख्याध्यापक’ जैसे पहले से मौजूद शब्दों को आधुनिक संस्थागत प्रयोग में लाने का आव्हान किया। उनका मानना था कि भाषाशुद्वि का अर्थ केवल नये शब्दों का निर्माण करना ही नहीं, बल्कि पहले से मौजूद शब्दों को पुनःस्थापित करना और भाषा की खोई हुई जीवंतता को पुनः प्राप्त करना भी है। विश्रामगृह, प्रशिक्षण, संसद, न्यायालय, जनपद, आरक्षण, विशेषाधिकार, अभियंता, अनुमोदन, प्रतिवेदन, परिषद, राजदूत, दिनांक, दिग्दर्शक जैसे शब्दों को पुनः प्रतिस्थापित करने का श्रेय सावरकर जी को ही जाता है। उन्होंने सैद्धांतिक पक्ष से अधिक व्यवहारिक क्रियान्वयन पर बल दिया तथा अपने भाषणों, ग्रन्थों में उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया। अत: आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा में शिक्षण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा पर विशेष बल दे रही है, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित किया जा सके। इन परिस्थितियों में सावरकर जी का ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ और भी महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक हो जाता है। वर्तमान समय में इसे नये संदर्भ में देखा जाना चाहिये। आज जब भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम ज्ञान का सृजन अपनी भाषाओं में करें। हमें केवल अनुवाद पर निर्भर नहीं रहना चाहिये। इसके लिये शिक्षण संस्थानो में ‘भाषा नियोजन’ को एक स्वतंत्र अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित किया जाना आवश्यक है। सावरकर जी के अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि वैचारिक स्वायत्तता, सांस्कृतिक स्वावलंबन, स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान का प्रतीक भी होती है। स्वदेशी शब्दावली के पुनरूत्थान में सावरकर जी का अद्वितीय योगदान है। उनका दर्शन एवं साहित्यक कृतियां आज भी भारतीय बौद्विक और अकादमिक जगत के लिये एक महत्वपूर्ण आधार हैं। उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और भाषाई योगदान उन्हें एक महान विचारक और शिक्षाविद के रूप में स्थापित करता है। उनके द्वारा गढ़े गये प्रशासनिक, तकनीकी एवं संसदीय शब्द आज भी हमारी लोकतांत्रिक और अकादमिक शब्दावली में जीवंत हैं। (लेखक जीवाजी विश्वविद्यालय में वाणिज्य एवं व्यवसाय अध्ययनशाला विभागाध्यक्ष हैं)

व्रत-त्योहारों का विशेष संगम बनेगा जून 2026, निर्जला एकादशी और कामाख्या अंबुबाची मेला रहेंगे मुख्य आकर्षण

नई दिल्ली । जून 2026 का महीना धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इस दौरान कई प्रमुख व्रत, पर्व और धार्मिक आयोजन एक साथ देखने को मिलेंगे। पूरे महीने श्रद्धालुओं के लिए उपवास, पूजा-पाठ और तीर्थ से जुड़े अवसरों की श्रृंखला रहेगी, जिससे यह अवधि भक्ति और परंपरा का विशेष संगम बन जाएगी। इस महीने का धार्मिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसमें कई ऐसे व्रत और पर्व शामिल हैं जिनका पालन देशभर में बड़ी आस्था के साथ किया जाता है। जून की शुरुआत से ही विभिन्न मासिक व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम शुरू हो जाएगा। श्रद्धालु इस दौरान उपवास रखकर भगवान की आराधना करेंगे और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होगा। महीने के मध्य में एकादशी, प्रदोष व्रत और अमावस्या जैसे महत्वपूर्ण पर्वों का संयोग देखने को मिलेगा, जिन्हें हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इन अवसरों पर भक्तगण आध्यात्मिक शुद्धि और मन की शांति के लिए विशेष साधना करते हैं। मध्य जून में ज्येष्ठ मास से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का विशेष महत्व रहेगा, जिसमें दान-पुण्य और व्रत का पालन प्रमुख रूप से किया जाता है। इस अवधि में विभिन्न देवताओं की आराधना के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं और धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। यह समय आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मचिंतन और साधना का माना जाता है, जिसमें लोग अपने जीवन में सकारात्मकता और संतुलन लाने का प्रयास करते हैं। जून 2026 का सबसे महत्वपूर्ण व्रत निर्जला एकादशी रहेगा, जिसे वर्ष की सबसे कठिन एकादशियों में से एक माना जाता है। इस व्रत में श्रद्धालु बिना जल ग्रहण किए उपवास रखते हैं और भगवान विष्णु की विशेष आराधना करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के पालन से सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन कई स्थानों पर भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। इसी महीने असम के गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर में प्रसिद्ध अंबुबाची मेला भी आयोजित होगा, जो शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यह मेला 22 जून से 26 जून तक आयोजित होने की संभावना है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होते हैं। मान्यता के अनुसार इस दौरान देवी कामाख्या का वार्षिक रजस्वला काल माना जाता है, जिसके चलते मंदिर कुछ दिनों के लिए बंद रहता है और बाद में विशेष पूजा के साथ पुनः दर्शन शुरू होते हैं। यह आयोजन तांत्रिक साधना और शक्ति आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। महीने के अंत में वट पूर्णिमा व्रत और शनि प्रदोष जैसे कई अन्य धार्मिक पर्व भी मनाए जाएंगे, जिनका विशेष महत्व परिवारिक सुख-समृद्धि और आस्था से जुड़ा होता है। वट पूर्णिमा विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला व्रत है, जिसमें वे वट वृक्ष की पूजा कर अपने परिवार की दीर्घायु और खुशहाली की कामना करती हैं। इस दौरान मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा-अर्चना का माहौल रहता है। इस प्रकार जून 2026 का पूरा महीना धार्मिक गतिविधियों, व्रत-त्योहारों और आध्यात्मिक आयोजनों से परिपूर्ण रहेगा, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था, परंपरा और भक्ति का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगा।

राजस्थान के मांगणियार मुस्लिम कलाकारों की कृष्ण भक्ति परंपरा ने संगीत जगत में रचा सांस्कृतिक एकता का अनोखा अध्याय

नई दिल्ली । राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा में मांगणियार समुदाय का नाम विशेष सम्मान और सांस्कृतिक गौरव के साथ लिया जाता है। यह समुदाय सदियों से अपनी अनोखी संगीत साधना और पारंपरिक गायन शैली के लिए जाना जाता है, जिसने उन्हें न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशिष्ट पहचान दिलाई है। इन कलाकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी संगीत यात्रा की शुरुआत धार्मिक सीमाओं से परे जाकर कृष्ण भजनों और मीराबाई के पदों से होती है, जो भारतीय संस्कृति की गहरी एकता और समरसता को दर्शाती है। मांगणियार समुदाय राजस्थान के उन क्षेत्रों से जुड़ा रहा है जहां लोकसंस्कृति और दरबारी परंपराओं का गहरा प्रभाव रहा है। ऐतिहासिक रूप से ये कलाकार राजपूत शासकों और जमींदार परिवारों के संरक्षण में रहते हुए दरबारी संगीतकार के रूप में अपनी सेवाएं देते थे। उस दौर में अधिकांश संरक्षक परिवार कृष्ण भक्ति से जुड़े थे, जिसके कारण सुबह के समय भजन गायन की परंपरा विकसित हुई। यह परंपरा समय के साथ केवल एक धार्मिक अभ्यास न रहकर एक सांस्कृतिक पहचान बन गई और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही। आज भी यह परंपरा जीवित है जहां मांगणियार कलाकार अपने दैनिक अभ्यास की शुरुआत पारंपरिक रीति से करते हैं। वे अपने वाद्य यंत्रों के साथ जब रियाज शुरू करते हैं, तो सबसे पहले कृष्ण भक्ति और मीरा के पदों की गूंज सुनाई देती है। यह अभ्यास केवल संगीत की तैयारी नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अनुशासन भी माना जाता है, जो उनकी गायकी को गहराई और आत्मीयता प्रदान करता है। इसी परंपरा ने राजस्थान के लोकसंगीत को एक ऐसा स्वरूप दिया है जो धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानी भावनाओं को जोड़ता है। मांगणियार कलाकारों की यह संगीत परंपरा समय के साथ व्यापक मंचों तक पहुंची है। लोकधुनों और पारंपरिक गायकी की यह शैली अब फिल्मी संगीत और आधुनिक प्रस्तुतियों में भी अपनी जगह बना चुकी है। इस समुदाय के कई कलाकारों ने अपनी प्रतिभा के दम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान बनाई है। उनकी गायकी में राजस्थान की मिट्टी की सादगी, लोकधुनों की गहराई और सांस्कृतिक विरासत की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस परंपरा की सबसे बड़ी ताकत इसकी पीढ़ीगत शिक्षा प्रणाली है, जिसमें बच्चे बचपन से ही संगीत की बारीकियां सीखना शुरू कर देते हैं। घरों में ही उन्हें राग, ताल और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की शिक्षा दी जाती है, जिससे उनकी कला में स्वाभाविक निखार आता है। यह निरंतर अभ्यास और पारिवारिक परंपरा ही उनकी गायकी को विशिष्ट बनाती है और उसे वैश्विक मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज मांगणियार संगीत केवल एक क्षेत्रीय परंपरा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता का प्रतीक बन चुका है। कृष्ण भजनों से शुरू होकर आधुनिक मंचों तक पहुंचने वाली यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि संगीत न केवल कला है, बल्कि यह समाज को जोड़ने और एकता का संदेश देने का भी माध्यम है।