रणवीर सिंह के डॉन-3 से बाहर होने पर बढ़ा विवाद, FWICE ने स्पष्ट किया- यह बैन नहीं बल्कि असहयोग नोटिस

नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह के फिल्म डॉन-3 से जुड़े विवाद ने फिल्म इंडस्ट्री में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। अभिनेता के अचानक प्रोजेक्ट से बाहर होने की खबर सामने आने के बाद जहां सोशल मीडिया और मनोरंजन जगत में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं, वहीं अब फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज ने इस पूरे मामले पर अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट कर दी है। संस्था की ओर से कहा गया है कि रणवीर सिंह पर किसी प्रकार का बैन नहीं लगाया गया है और उनके खिलाफ चल रही खबरें गलत और भ्रामक हैं। संस्था के मुख्य सलाहकार अशोक पंडित ने बयान जारी करते हुए कहा कि FWICE कोई न्यायिक संस्था नहीं है और न ही यह किसी कलाकार पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार रखती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन की ओर से केवल असहयोग नोटिस जारी किया गया है, जिसका अर्थ है कि मौजूदा परिस्थितियों में सदस्यों को संबंधित अभिनेता के साथ काम करने से फिलहाल परहेज करने की सलाह दी गई है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह कोई स्थायी फैसला नहीं है और परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव संभव है। यह विवाद उस समय सामने आया जब रणवीर सिंह के डॉन-3 से अचानक अलग होने की खबरें सामने आईं। बताया जा रहा है कि फिल्म से जुड़े कई प्री-प्रोडक्शन कार्य पूरे हो चुके थे और बड़े स्तर पर शूटिंग की तैयारियां भी शुरू हो चुकी थीं। ऐसे में अभिनेता के प्रोजेक्ट छोड़ने के फैसले ने निर्माताओं और पूरी टीम को असमंजस की स्थिति में डाल दिया। इस बदलाव के कारण आर्थिक और प्रोडक्शन स्तर पर असर पड़ने की बात भी सामने आई है, जिससे इंडस्ट्री में चिंता बढ़ गई है। FWICE ने अपने बयान में यह भी कहा कि इस तरह की परिस्थितियां फिल्म निर्माण प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती पैदा करती हैं। बड़े बजट की फिल्मों में जब प्रमुख कलाकार अचानक किसी प्रोजेक्ट से हटते हैं तो इसका असर केवल फिल्म तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे कई विभागों की योजनाएं प्रभावित होती हैं। संस्था ने इसे उद्योग के लिए संवेदनशील मुद्दा बताया है और संतुलित समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है। संस्था ने यह भी दावा किया कि इस मामले को लेकर रणवीर सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली। वहीं दूसरी ओर अभिनेता की टीम ने इस मुद्दे को FWICE के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया है। इसके बावजूद संगठन का कहना है कि बातचीत के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं और आपसी समझौते की संभावना बनी हुई है। बॉलीवुड में अनुबंध और पेशेवर प्रतिबद्धता को हमेशा महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि बड़े प्रोजेक्ट्स में कई स्तरों पर निवेश और तैयारी शामिल होती है। ऐसे में किसी भी बड़े बदलाव का असर पूरी टीम पर पड़ता है। यही कारण है कि यह मामला केवल एक फिल्म से जुड़ा विवाद न रहकर इंडस्ट्री स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले समय में यह विवाद सुलझता है या और आगे बढ़ता है।
बॉलीवुड के ‘मैं तेरा’ गानों का जादू बरकरार, रोमांस से लेकर मस्ती तक हर दौर में बना दर्शकों की पहली पसंद

नई दिल्ली । सहित पूरे देश में बॉलीवुड संगीत की लोकप्रियता समय के साथ लगातार बदलती रही है, लेकिन कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्होंने हर दौर में अपनी खास पहचान बनाए रखी है। इन्हीं में से एक है ‘मैं तेरा’, जो सिर्फ एक वाक्यांश नहीं बल्कि हिंदी फिल्म संगीत में भावनाओं, रिश्तों और मनोरंजन की एक पूरी श्रृंखला का प्रतीक बन चुका है। 90 के दशक से लेकर आज तक इस थीम पर आधारित कई गाने अलग-अलग अंदाज में सामने आए और दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाने में सफल रहे। इन गीतों की खासियत यह रही कि हर बार इनका अंदाज नया रहा, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव हमेशा बरकरार रहा। बॉलीवुड के शुरुआती दौर में ‘मैं तेरा’ जैसी पंक्तियों पर आधारित गीतों ने हल्के-फुल्के रोमांस और मस्ती भरे संगीत को दर्शकों तक पहुंचाया। उस समय के गानों में सरल शब्दों और आकर्षक धुनों का प्रयोग किया जाता था, जिससे वे आसानी से लोगों की जुबान पर चढ़ जाते थे। धीरे-धीरे जैसे फिल्मी संगीत ने आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाया, वैसे ही इन शब्दों का उपयोग भी अधिक विविध और रचनात्मक रूप में होने लगा। यह बदलाव न केवल संगीत की शैली में दिखा, बल्कि गीतों के विषय और प्रस्तुति में भी स्पष्ट रूप से नजर आया। समय के साथ जब युवा दर्शकों की पसंद बदली तो ‘मैं तेरा’ थीम पर आधारित गानों में भी तेज म्यूजिक, पार्टी वाइब और आधुनिक लिरिक्स का समावेश हुआ। इन गानों ने न केवल रोमांस को नए अंदाज में पेश किया बल्कि दोस्ती, जुनून और मनोरंजन के रंगों को भी साथ जोड़ा। कुछ गीतों ने प्रेम और समर्पण को केंद्र में रखा, तो कुछ ने हल्के-फुल्के मजाकिया अंदाज में रिश्तों की गहराई को दिखाया। इसी विविधता के कारण ये गाने हर पीढ़ी के दर्शकों के बीच लोकप्रिय होते चले गए। फिल्मी दुनिया में जब डिजिटल युग की शुरुआत हुई, तब इन गानों की लोकप्रियता और भी बढ़ गई। सोशल प्लेटफॉर्म और म्यूजिक प्लेलिस्ट के दौर में ‘मैं तेरा’ जैसे गानों को नई पहचान मिली और ये युवाओं के बीच ट्रेंड करने लगे। इन गीतों की खास बात यह रही कि इनमें इस्तेमाल होने वाले शब्द सरल होने के बावजूद भावनात्मक रूप से बहुत प्रभावशाली थे, जिससे लोग आसानी से उनसे जुड़ पाते थे। आज भी जब पुराने और नए बॉलीवुड संगीत की बात होती है तो ‘मैं तेरा’ थीम पर आधारित गीतों को विशेष रूप से याद किया जाता है। ये गाने केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहे, बल्कि प्रेम, अपनापन और रिश्तों की गहराई को व्यक्त करने का एक मजबूत माध्यम भी बने हैं। समय बदलने के बावजूद इन गीतों की लोकप्रियता यह साबित करती है कि सरल और भावनात्मक शब्द हमेशा दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखते हैं और लंबे समय तक संगीत की दुनिया में अपनी छाप छोड़ते हैं।
छोटे कद पर तानों ने तोड़ी रिश्ते की डोर, दो साल बाद मंगेतर ने छोड़ा साथ, पहली बार छलका अब्दू रोजिक का दर्द

नई दिल्ली । लोकप्रिय सिंगर और टीवी स्टार अब्दू रोजिक ने पहली बार अपनी निजी जिंदगी के उस दर्दनाक अध्याय का खुलासा किया है, जिसने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था। अपनी पहचान, लोकप्रियता और सफलता के बावजूद अब्दू को निजी रिश्तों में ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जिसने उन्हें लंबे समय तक मानसिक तनाव और अकेलेपन में धकेल दिया। हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी टूटी सगाई और उससे जुड़े भावनात्मक संघर्षों को लेकर खुलकर बातचीत की। अब्दू रोजिक ने बताया कि उनकी सगाई लगभग दो वर्षों तक चली, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी कठिन होती गईं कि रिश्ता टूटने की नौबत आ गई। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके छोटे कद और बीमारी को लेकर लगातार होने वाली टिप्पणियों और सामाजिक तानों का असर केवल उन पर ही नहीं, बल्कि उनकी मंगेतर पर भी पड़ा। समय के साथ यह दबाव इतना बढ़ गया कि दोनों के रिश्ते में दूरियां आने लगीं। उन्होंने कहा कि लोगों की सोच और समाज का रवैया कई बार किसी इंसान की निजी जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर देता है। अब्दू के मुताबिक, उनकी मंगेतर लगातार इस बात से परेशान रहने लगी थीं कि लोग उनके रिश्ते को लेकर मजाक बनाते थे। सार्वजनिक जीवन में रहने के कारण यह स्थिति और ज्यादा कठिन हो गई थी। हर जगह होने वाली चर्चा, ट्रोलिंग और व्यक्तिगत टिप्पणियों ने रिश्ते की मजबूती को कमजोर कर दिया। आखिरकार दोनों ने अलग होने का फैसला लिया। अब्दू ने यह भी स्वीकार किया कि सगाई टूटने के बाद वह मानसिक रूप से काफी टूट गए थे। उन्होंने लंबे समय तक खुद को अकेला महसूस किया और डिप्रेशन जैसी स्थिति से गुजरना पड़ा। हालांकि उन्होंने अपने परिवार और करीबी लोगों के सहयोग से धीरे-धीरे खुद को संभाला। उन्होंने कहा कि जिंदगी में सफलता मिलने के बावजूद इंसान भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ सकता है और रिश्तों का टूटना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि लोग अक्सर किसी व्यक्ति के बाहरी रूप या शारीरिक स्थिति को देखकर राय बना लेते हैं, जबकि असली संघर्ष और दर्द को समझने की कोशिश बहुत कम लोग करते हैं। अब्दू ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि समाज को संवेदनशील होने की जरूरत है, क्योंकि मजाक और ताने कई बार किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास और निजी जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। अब्दू रोजिक की यह कहानी केवल एक सेलिब्रिटी के टूटे रिश्ते की नहीं, बल्कि उन लोगों की भावनाओं को भी सामने लाती है जो शारीरिक चुनौतियों के बावजूद सामान्य और सम्मानजनक जीवन जीने की कोशिश करते हैं। उनका मानना है कि प्यार और रिश्तों में सबसे ज्यादा जरूरी समझ, सम्मान और भावनात्मक सहयोग होता है। यदि समाज बाहरी चीजों के बजाय इंसानियत को महत्व दे, तो कई रिश्ते टूटने से बच सकते हैं। अपने संघर्षों के बावजूद अब्दू ने सकारात्मक सोच बनाए रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि कठिन समय इंसान को मजबूत बनाता है और अब वह अपने करियर तथा भविष्य पर पूरा ध्यान देना चाहते हैं। उनकी इस भावुक कहानी ने उनके प्रशंसकों को भी भावुक कर दिया है और कई लोग सोशल मीडिया पर उनके साहस और ईमानदारी की सराहना कर रहे हैं।
मोहम्मद रफी के गीत ने बदली इंदिरा गांधी की भावनाएं टैक्स फ्री हुई फिल्म नौनिहाल

नई दिल्ली । भारत के सिनेमा इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी रही हैं जो आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। ऐसी ही एक कहानी जुड़ी है महान गायक मोहम्मद रफी की मखमली और भावनाओं से भरी आवाज से। यह किस्सा फिल्म नौनिहाल से जुड़ा है जिसे सुनकर उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भावुक हो उठी थीं और उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। इसी भावनात्मक अनुभव के बाद फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री कर दिया गया था। साठ के दशक का समय हिंदी सिनेमा में संगीत का स्वर्ण युग माना जाता है। इस दौर में मोहम्मद रफी की आवाज ने लाखों दिलों पर राज किया। उनकी गायकी में ऐसा दर्द और ऐसा जादू था जो सीधे दिल को छू लेता था। जब भी किसी फिल्म में गहरे भावनात्मक गीत की जरूरत होती थी तो निर्माता और संगीतकार सबसे पहले रफी साहब को याद करते थे। उनकी आवाज में वह शक्ति थी जो कहानी को जीवंत बना देती थी। फिल्म नौनिहाल के निर्माता सावन कुमार टाक थे। वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बहुत प्रभावित थे। जब 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन की खबर आई तो वे गहरे दुख में डूब गए। उन्होंने तय किया कि वे नेहरू को श्रद्धांजलि देने के लिए एक फिल्म बनाएंगे। इस सोच से फिल्म नौनिहाल की शुरुआत हुई। इस फिल्म की कहानी एक अनाथ बच्चे के इर्द गिर्द घूमती है जो अपने जीवन में एक बड़ी यात्रा पर निकलता है और भावनात्मक मोड़ से गुजरता है। फिल्म के लिए एक ऐसा गीत चाहिए था जो दर्शकों के दिल को झकझोर दे। गीतकार कैफी आजमी ने इस भावनात्मक गीत को लिखा। जब इस गीत को आवाज देने की बात आई तो मोहम्मद रफी का नाम चुना गया। रफी साहब ने जब इस गीत को अपनी आवाज दी तो उसमें एक गहरी संवेदना और दर्द समा गया। फिल्म रिलीज से पहले सावन कुमार टाक ने इसे टैक्स फ्री कराने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की। इंदिरा गांधी ने फिल्म देखने से पहले कहा कि वे कोई गीत सुनना चाहेंगी। इसके बाद सावन कुमार ने टेप रिकॉर्डर पर रफी की आवाज में वह गीत सुनाया। जैसे ही गीत बजना शुरू हुआ पूरा माहौल भावनाओं से भर गया। गीत की पंक्तियां सुनते सुनते इंदिरा गांधी अपने पिता जवाहरलाल नेहरू की यादों में खो गईं। उनकी आंखें नम हो गईं और वे कुछ देर के लिए बहुत भावुक हो गईं। कुछ समय बाद वे अपने केबिन में चली गईं। इस भावनात्मक अनुभव के बाद फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री करने का निर्णय लिया गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनाओं की गहराई तक पहुंचने वाली शक्ति है और मोहम्मद रफी की आवाज उस शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण रही है।
बिना डायलॉग वाली हॉरर फिल्म ने, सोशल मीडिया पर मचाया तहलका

नई दिल्ली । अगर आप हॉरर फिल्मों के शौकीन हैं और कुछ बिल्कुल अलग और नया देखने की तलाश में हैं तो साल 2023 में आई फिल्म नो वन विल सेव यू आपके लिए एक अलग अनुभव बन सकती है यह फिल्म इस वजह से खास है क्योंकि इसमें लगभग कोई डायलॉग नहीं है और पूरी कहानी खामोशी एक्सप्रेशन और बैकग्राउंड साउंड के जरिए आगे बढ़ती है यह एक साइंस फिक्शन हॉरर फिल्म है जिसमें कहानी एक अकेली लड़की के इर्द गिर्द घूमती है जो अपने घर में अचानक घुसे एलियंस का सामना करती है फिल्म में डर पैदा करने के लिए किसी भूत या पारंपरिक हॉरर ट्रिक्स का इस्तेमाल नहीं किया गया है बल्कि सस्पेंस और साइलेंस को ही सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका विजुअल नैरेटिव है जहां एक्ट्रेस अपने चेहरे के हावभाव और बॉडी लैंग्वेज से पूरी कहानी को दर्शकों तक पहुंचाती है बिना बोले भी डर अकेलापन और संघर्ष को इतने प्रभावी तरीके से दिखाया गया है कि दर्शक खुद को कहानी का हिस्सा महसूस करने लगते हैं इस फिल्म की कहानी सिर्फ एलियंस और सर्वाइवल तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें मुख्य किरदार के अतीत के दर्द अकेलेपन और मानसिक संघर्ष को भी दिखाया गया है जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है वैसे वैसे यह सिर्फ एक हॉरर फिल्म नहीं रह जाती बल्कि एक इमोशनल और साइकोलॉजिकल थ्रिलर का रूप ले लेती है सोशल मीडिया पर इस फिल्म की चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि यह पारंपरिक हॉरर फिल्मों से बिल्कुल अलग है आमतौर पर जहां डराने के लिए तेज आवाजें भूतिया दृश्य और अचानक आने वाले ट्विस्ट इस्तेमाल किए जाते हैं वहीं इस फिल्म में खामोशी ही सबसे बड़ा डर बन जाती है हालांकि हर दर्शक के लिए यह फिल्म आसान नहीं है कुछ लोगों को इसकी धीमी गति और बिना डायलॉग वाली शैली थोड़ी अजीब लग सकती है खासकर वे दर्शक जो स्पष्ट कहानी और लगातार संवाद वाली फिल्में पसंद करते हैं उनके लिए यह अनुभव थोड़ा अलग और चुनौतीपूर्ण हो सकता है फिल्म का क्लाइमेक्स भी काफी प्रतीकात्मक रखा गया है जहां निर्देशक ने कई चीजें दर्शकों की समझ और कल्पना पर छोड़ दी हैं यही वजह है कि इसके अंत को लेकर अलग अलग राय देखने को मिलती है यह फिल्म Hulu पर रिलीज की गई थी और भारत में इसे Disney Plus प्लेटफॉर्म पर देखा जा सकता है IMDb पर इसकी रेटिंग लगभग 6.2 है जबकि Rotten Tomatoes पर इसे बेहतर रिस्पॉन्स मिला है कुल मिलाकर नो वन विल सेव यू एक ऐसी हॉरर फिल्म है जो शोर नहीं बल्कि खामोशी से डर पैदा करती है और यही इसे भीड़ से अलग बनाता है
CM DISTRIBUTED E-CYCLE: लाड़ली बहनों को फ्री ई-साइकिल! CM मोहन यादव ने दी बड़ी सौगात

HIGHLIGHTS: उज्जैन में आशा, ANM और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मिली ई-साइकिल CM मोहन यादव बोले- पेट्रोल-डीजल के दौर में उपयोगी विकल्प CSR फंड के जरिए वितरित की गईं इलेक्ट्रिक साइकिलें PM मोदी के 12 साल पूरे होने पर CM ने गिनाईं उपलब्धियां महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सुविधा पर सरकार का जोर CM DISTRIBUTED E-CYCLE: मध्यप्रदेश। उज्जैन में मंगलवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को इलेक्ट्रिक साइकिल वितरित की। यह ई-साइकिल कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व निधि के तहत उपलब्ध कराई गई है। बता दें कि कार्यक्रम में अलग-अलग जिलों और विधानसभा क्षेत्रों से आई महिलाओं को ई-साइकिल दी गई। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे बहनों को अपने रोज के कार्यों को करने आसानी होगी। भीषण गर्मी की चपेट में उत्तर भारत, बांदा बना देश का सबसे गर्म शहर, कई राज्यों में हीटवेव का अलर्ट बढ़ती महंगाई में ई-साइकिल होंगी मददगार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि आज के दौर में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच ई-साइकिल एक बेहतर और उपयोगी विकल्प बनकर सामने आई है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली बहनों को अक्सर काम के सिलसिले में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में यह पहल उनके लिए काफी मददगार साबित होगी। केंद्र सरकार के 12 साल पुरे होने की खुशी कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार के 12 साल पूरे होने का भी जिक्र किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि देश ने विकास और सुशासन के नए आयाम स्थापित किए हैं। साथ ही मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है और आने वाले समय में भी उनका नेतृत्व देश को और मजबूती देगा। MP: भोपाल में IPS अधिकारी की नाबालिग बेटी की लगाई फांसी…. जांच में जुटी पुलिस महिलाओं को दी शुभकामनाएं मुख्यमंत्री ने सभी लाभार्थी महिलाओं को बधाई देते हुए कहा कि यह ई-साइकिल केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि महिलाएं समाज और स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत कड़ी हैं और सरकार उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का लगातार प्रयास कर रही है। माननीय मुख्यमंत्री @DrMohanYadav51 जी ने आज उज्जैन में एएनएम, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को निःशुल्क ई-साइकिल वितरित की। pic.twitter.com/9kjKmXvYcg — Office of Dr. Mohan Yadav (@drmohanoffice51) May 26, 2026
Ganga Dussehra 2026: शिप्रा के शुद्ध जल से होगा सिंहस्थ स्नान, उज्जैन में CM मोहन यादव का बड़ा ऐलान

HIGHLIGHTS: CM मोहन यादव बोले- शुद्ध शिप्रा जल से होगा सिंहस्थ स्नान पहले नर्मदा-शिप्रा लिंक से लाया जाता था पानी रामघाट पर मां शिप्रा को 351 फीट लंबी चुनरी अर्पित मैथिली ठाकुर की भजन संध्या बनी आकर्षण का केंद्र विक्रमोत्सव 2026 के लिए CM को गोल्ड और सिल्वर अवॉर्ड मिला Ganga Dussehra 2026: मध्यप्रदेश। उज्जैन में गंगा दशहरा के अवसर पर मां शिप्रा तीर्थ परिक्रमा यात्रा का भव्य समापन हुआ। इस दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मां शिप्रा को 351 फीट लंबी चुनरी अर्पित कर पूजा-अर्चना की। बता दें कि कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि सिंहस्थ 2028 में श्रद्धालुओं को शिप्रा के शुद्ध जल से स्नान कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार जल संरक्षण और घाटों के विकास पर करीब 10 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। साथ ही शिप्रा नदी के दोनों किनारों पर 30 किलोमीटर लंबे घाटों का निर्माण भी कराया जा रहा है। पहले लाया जाता था नर्मदा का पानी दरअसल, पिछले सिंहस्थ और बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान शिप्रा नदी में पानी की कमी होने पर नर्मदा नदी का पानी पाइपलाइन के जरिए उज्जैन लाया गया था। यह काम नर्मदा-शिप्रा लिंक परियोजना के तहत किया गया था, ताकि घाटों पर जलस्तर बना रहे और श्रद्धालुओं को स्नान में परेशानी न हो। हालांकि उस समय विपक्ष और कई संतों ने सवाल उठाए थे कि सिंहस्थ में स्नान प्राकृतिक शिप्रा जल से ही होना चाहिए न कि दूसरी नदी के पानी से। ऐसे में CM मोहन यादव का यह बयान अहम माना जा रहा है। बकरीद का अवकाश 27 या 28 मई को…. जानिए किस दिन रहेगी बैंक की छुट्टी? रामघाट पर मैथिली ठाकुर के भजनों ने बांधा समां गंगा दशहरा के मौके पर रामघाट पर श्रद्धालुओं भरी भीड़ देखने को मिली। लोगों ने दीपदान कर मां शिप्रा के प्रति अपनी आस्था प्रकट की। साथ ही कार्यक्रम में भारतीय नौसेना ने बैंड की प्रस्तुति भी की। वहीं भाजपा विधायक और लोक गायिका मैथिलि ठाकुर की भजन संध्या ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। उनके साथ कई लोक कलाकारों ने भी प्रस्तुतियां दीं जिससे आयोजन में सांस्कृतिक रंग देखने को मिले। CM को मिला राष्ट्रीय सम्मान मां शिप्रा तीर्थ परिक्रमा यात्रा सोमवार से शुरू हुई थी, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। यात्रा रामघाट से शुरू होकर कालभैरव, मंगलनाथ, सांदीपनि आश्रम और भर्तृहरि गुफा जैसे धार्मिक स्थलों से होकर निकली गयी। इसी दौरान विक्रमोत्सव 2026 के सफल आयोजन के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को कल्चरल लाइव इवेंट ऑफ द ईयर से गोल्ड अवॉर्ड और बेस्ट गवर्नमेंट इंटीग्रेशन फॉर ए लाइव इवेंट से सिल्वर अवॉर्ड के साथ सम्मानित किया गया।
पद्मिनी एकादशी आज….. तीन साल में एक बार आता है ये व्रत… जानें इसके नियम एवं विधि

नई दिल्ली। पद्मिनी एकादशी (Padmini Ekadashi 2026)/ कमला एकादशी (Kamala Ekadashi) का व्रत अधिक मास में किया जाता है। पुरुषोत्तम मास (Purushottam month) में एकादशी तिथि होने के कारण पद्मिनी एकादशी का व्रत तीन साल में एक बार ही आता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की अधिक कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत की महिमा का वर्णन पद्म पुराण में भी किया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा भाव से जो कोई भी इस व्रत को करेगा उसे जन्म जन्म के पापों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही वह व्यक्ति अक्षय पुण्य प्राप्त करता है। इस व्रत को करने वालों को विशेष नियमों का पालन करना चाहिए। साथ ही इस दिन दान पुण्य करने से व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूरी होती हैं। आइए जानते हैं पद्मिनी एकादशी पर किन किन चीजों का दान करना चाहिए साथ ही जानें व्रत का नियम। पद्मिनी एकादशी व्रत के नियमपद्म पुराण में बताया गया है कि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। साथ ही हाथ में थोड़ा जल लेकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन विशेष रुप से पीले रंग के वस्त्र धारण करें। एकादशी के दिन अन्न का त्याग करना चाहिए। इस दिन सात्विक भोजन ही करना शुभ फलदायी माना गया है। एकादशी के व्रत में नमक नहीं खाना चाहिए। पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस दिन बाल आदि कटवाना नहीं चाहिए। पद्म पुराण में बताया गया है कि पद्मिनी एकादशी के दिन जो व्यक्ति घर पर भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करता है उसे एक गुना फल मिलता है। वहीं, नदी के तट पर जप करने से दो गुना, गोशाला में जाकर जप करने से सहस्त्र गुना, अग्निहोत्र गृहं में जप करने से एक हजार गुना, भगवान शिव के मंदिर में जप करने और तुलसी के पास जप करने से लाख गुना फल मिलता है। पद्मिनी एकादशी पर क्या दान करेंपद्मिनी एकादशी के दिन अन्न और फल का दान करना बहुत ही पुण्य फलदायी माना गया है। इस दिन अन्न और फल का दान करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास के दौरान अधिक गर्मी के चलते जल से भरा घड़ा, मौसमी फल जैसे आम, खरबूजा, तरबूज और बाकी फलों का दान करना चाहिए। अधिक मास के दौरान गुड़ और तिल का दान करना भी सर्वोत्तम माना गया है। इस दिन जरुरतमंद लोगों को चप्पल, वस्त्र और छाता आदि चीजों का दान करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद बना रहता है। पुरुषोत्तम मास की यह पद्मिनी एकादशी तीन साल में एक बार आती है इसलिए इस दिन दान के अलावा मंदिरों में दीप दान भी करना चाहिए। मंदिर में घी के कम से कम पांच दीपक जरुर जलाने चाहिए।
बकरीद (ईद-उल-अज़हा): त्याग, आस्था और इंसानियत का सबसे पवित्र पर्व

ईद-उल-अज़हा जिसे भारत में आमतौर पर बकरीद या बक्रीद कहा जाता है, इस्लाम धर्म का एक अत्यंत पवित्र और भावनात्मक पर्व है। यह त्योहार हर साल दुनिया भर में करोड़ों लोगों द्वारा गहरी आस्था, श्रद्धा और समर्पण के साथ मनाया जाता है। बकरीद केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि यह त्याग, भरोसे और इंसानियत का संदेश देने वाला पर्व है। बकरीद का इतिहास पैगंबर हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) की उस महान परीक्षा से जुड़ा है, जिसमें अल्लाह ने उनकी आस्था की परीक्षा ली थी। मान्यता के अनुसार, उन्हें अपने सबसे प्रिय पुत्र को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का आदेश दिया गया था। हज़रत इब्राहिम ने बिना किसी हिचकिचाहट के अल्लाह के आदेश को स्वीकार किया और अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए। उनकी इस अटूट आस्था और समर्पण को देखकर अल्लाह ने उनके पुत्र की जगह एक दुम्बा (भेड़) को कुर्बानी के लिए भेज दिया। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में बकरीद मनाई जाती है। इस पर्व का असली उद्देश्य केवल कुर्बानी देना नहीं है, बल्कि अपने अंदर की बुराइयों, लालच और अहंकार की कुर्बानी देना भी है। बकरीद हमें यह सिखाती है कि सच्चा धर्म वही है जिसमें त्याग, सेवा और इंसानियत हो। इस दिन लोग सुबह विशेष नमाज अदा करते हैं, जिसे ईद की नमाज कहा जाता है, और उसके बाद कुर्बानी की रस्म निभाई जाती है। कुर्बानी के बाद मांस को तीन हिस्सों में बांटा जाता है, जिसमें एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए रखा जाता है और तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए उपयोग किया जाता है। यह परंपरा समाज में समानता और भाईचारे को मजबूत बनाती है। बकरीद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि इंसान को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के लिए जीना चाहिए। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि असली खुशी केवल पाने में नहीं, बल्कि बांटने में है। आज के समय में जब समाज में दूरी और असमानता बढ़ रही है, बकरीद का संदेश और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। यह त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि विश्वास और समर्पण से हर कठिन परीक्षा को पार किया जा सकता है। हज़रत इब्राहिम की कहानी आज भी हर इंसान को यह प्रेरणा देती है कि सच्चा ईमान वही है जिसमें बिना शर्त समर्पण हो। अंत में बकरीद केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानियत, करुणा और एकता का जीवंत संदेश है, जो हमें एक बेहतर समाज और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। -बकरीद (ईद-उल-अज़हा)
ChatGPTने 80 साल पुराना गणित का सवाल हल किया, AI की ताकत से वैज्ञानिक जगत हैरान

नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ जानकारी देने या सवालों के जवाब तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अब जटिल समस्याओं को हल करने और नए तर्क विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ता दिख रहा है। इसका ताजा उदाहरण ChatGPT द्वारा 80 साल पुराने अनसुलझे गणितीय सवाल को हल करने के रूप में सामने आया है। यह सवाल 1946 में मशहूर गणितज्ञ पॉल एर्डोश ने पूछा था, जिसमें यह समझना था कि किसी समतल सतह पर बने कई बिंदुओं में कितने जोड़े ऐसे हो सकते हैं जिनके बीच की दूरी ठीक 1 यूनिट हो। दशकों तक इस समस्या का कोई सर्वमान्य समाधान नहीं मिल पाया था। ChatGPT ने इस समस्या पर काम करते हुए ऐसे नए गणितीय पैटर्न और उदाहरण खोजे, जिनमें पहले से अधिक यूनिट डिस्टेंस जोड़े संभव हो सकते हैं। खास बात यह रही कि AI ने केवल पुरानी जानकारी नहीं दोहराई, बल्कि अलग-अलग गणितीय क्षेत्रों को जोड़कर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। विशेषज्ञों के अनुसार, इस समाधान में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि AI ने अल्जेब्रिक नंबर थ्योरी जैसे जटिल सिद्धांतों का उपयोग किया और उन्हें ज्यामितीय समस्या से जोड़कर एक नया समाधान रास्ता तैयार किया। गणितज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि AI की रीजनिंग क्षमता का बड़ा प्रमाण है, जहां मशीनें केवल गणना नहीं बल्कि गहराई से सोचकर नए निष्कर्ष निकालने में सक्षम हो रही हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी साफ करते हैं कि AI इंसानों की जगह नहीं लेगा। यह केवल समाधान सुझा सकता है, लेकिन यह तय करना कि कौन सा सवाल महत्वपूर्ण है और उसका वास्तविक अर्थ क्या है, यह भूमिका अभी भी इंसानों के पास ही रहेगी। कुल मिलाकर यह उपलब्धि दिखाती है कि AI आने वाले समय में विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और रिसर्च के क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।