Holi 2026 Date: 3 या 4 मार्च, कब मनाई जाएगी होली? जानें पंडित के द्वारा होली से जुड़े सभी पर्वों की सही तिथि व मुहूर्त

Holi 2026 Date: नई दिल्ली । Holi 2026 Date: हर साल की तरह इस बार भी होली और होलिका दहन की तिथि को लेकर कंफ्यूजन बना हुआ है. कुछ लोगों के अनुसार, होली 3 मार्च को मनाई जाएगी और कुछ लोगों का मानना है कि 4 मार्च को मनाई जाएगी. तो आइए जानते हैं कि होली और होलिका दहन की सही तिथि क्या है. कब है होली, यहां से दूर करें तिथि का कंफ्यूजन होली का पर्व देशभर में बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. हिंदू धर्म में होली का पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण कहलाता है. पंचांग के अनुसार, चैत्र मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को होली का पर्व मनाया जाता है और इससे ठीक एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है. लेकिन, इस बार लोगों में होली और होलिका दहन की तारीख को लेकर काफी ज्यादा कंफ्यूजन बना हुआ है. तो आइए पंडित अरुणेश कुमार शर्मा जी से जानते हैं कि किस दिन रंगों का पर्व होली खेली जाएगी और किस दिन होलिका दहन होगा. 3 मार्च या 4 मार्च, कब मनाई जाएगी होली? हर पंचांग में होली और होलिका दहन की तिथि व डेट अलग अलग लिखी है, कुछ लोगों का मानना है कि होली इस बार 3 मार्च को मनाई जाएगी तो कुछ लोगों का मानना है कि होली का पर्व 4 मार्च को मनाया जाएगा. वहीं, पंडित अरुणेश कुमार शर्मा से बात करते हुए बताया कि होली इस बार 4 मार्च 2026, बुधवार को मनाई जाएगी. होलिका दहन 3 मार्च 2026, मंगलवार को अर्धरात्रि में किया जाएगा. पंडित अरुणेश कुमार शर्मा के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च को शाम 5 बजकर 55 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 3 मार्च को शाम 4 बजकर 40 मिनट पर होगा. इसी के साथ भद्रा की भी शुरुआत हो जाएगी. यानी 2 मार्च 2026, सोमवार को भद्रा शाम 5 बजकर 55 मिनट पर शुरू हो जाएगी, जिसका समापन 3 मार्च की सुबह 5 बजकर 32 मिनट पर होगा. ऐसे में होलिका दहन का सही समय 3 मार्च को किया जाएगा. 3 मार्च को होलिका दहन का मुहूर्त शाम 6 बजकर 22 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 50 मिनट के बीच होगा. क्या 4 मार्च को मनाई जाएगी होली? पंचांग की तिथि के अनुसार, 3 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा और उसी दिन चंद्रग्रहण भी लग रहा है. यह चंद्रग्रहण 3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 21 मिनट से शुरू होकर शाम 06 बजकर 46 मिनट तक रहेगा, जो कि भारत में भी दृश्यमान होगा. 3 मार्च की शाम को लगने जा रहे इस चंद्र ग्रहण का सूतक काल सुबह 6 बजकर 20 मिनट से शुरू होकर शाम 6 बजकर 46 बजे तक रहेगा. ऐसे में रंगभरी होली 4 मार्च 2026, बुधवार को ही खेली जाएगी. क्या है होलाष्टक और रंगभरी एकादशी की तिथि पंडित अरुणेश कुमार शर्मा के मुताबिक, इस बार होलाष्टक की शुरुआत 24 फरवरी 2026, मंगलवार से होगी और इसका समापन 3 मार्च 2026 को होगा. वहीं, रंगभरी एकादशी 27 फरवरी 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी. कैसे किया जाता है होलिका दहन? फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका दहन से पूर्व होलिका माई की विधि-विधान से पूजा की जाती है. इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. शाम के समय पूजा की थाली लेकर होलिका दहन स्थल पर जाएं और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें. सबसे पहले होलिका को उपलों से बनी माला अर्पित करें. इसके बाद रोली, अक्षत, फल, फूल, माला, हल्दी, मूंग, गुड़, गुलाल, रंग, सतनाजा, गेहूं की बालियां, गन्ना और चना आदि अर्पित कर पूजा संपन्न करें.
Holashtak 2026: 24 फरवरी से शुरू होलाष्टक, 8 दिनों तक वर्जित होंगे विवाह और मांगलिक कार्य

Holashtak 2026: नई दिल्ली । हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि यानी 24 फरवरी 2026 से होलाष्टक का काल शुरू हो रहा है। यह अवधि होली पर्व से आठ दिन पूर्व की मानी जाती है और 3 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा तक चलेगी। इस समय विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्य करने की मनाही होती है। ज्योतिषाचारियों के अनुसार इस आठ दिन के दौरान ग्रहों की स्थिति उग्र होती है, इसलिए इस समय शुभ कार्यों में सफलता नहीं मिलती। होलाष्टक के दिनों में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु जैसे प्रमुख ग्रह उग्र माने जाते हैं। इनके प्रभाव के कारण मांगलिक कार्य टाल दिए जाते हैं। हालांकि यह समय आत्मशुद्धि, संयम, जप-तप और ईश्वर आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस अवधि में धार्मिक क्रियाओं, ध्यान और साधना करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय के अनुसार, सभी पंचांगों में होलाष्टक का उल्लेख मिलता है। शास्त्रों के अनुसार इस समय किसी भी प्रकार के शुभ कार्य नहीं किए जाते। होलिका दहन के बाद वातावरण शुद्ध हो जाता है और इसके साथ ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो सकती है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और इसे धार्मिक विश्वास के साथ निभाया जाता है। इस वर्ष होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा तिथि के अनुसार 3 मार्च 2026 को भोग 04:57 बजे किया जाएगा। पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 शाम 05:18 से 3 मार्च 2026 शाम 04:33 तक रहेगी। होलिका दहन के लिए लगभग 1 घंटा 4 मिनट का समय मिलेगा। इसके बाद 4 मार्च को रंगों वाली होली मनाई जाएगी। होलाष्टक के आठ दिनों में कार्यों में बाधा और ग्रहों के उग्र प्रभाव के कारण मांगलिक कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय संयम और तपस्या को अपनाना चाहिए। इस दौरान घर की सफाई, पूजा, जप, ध्यान और दान-पुण्य के कार्य करने से परिवार में शांति और सौभाग्य आता है। इस काल में शुभ कार्यों को रोकना और साधना में समय देना जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने का माध्यम माना जाता है। इसलिए 24 फरवरी से 3 मार्च तक के होलाष्टक काल में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य टालकर ध्यान, पूजा और आत्मशुद्धि पर ध्यान दें। होलाष्टक समाप्त होने के बाद ही मांगलिक कार्य करने से सफलता और शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।
रविवार का अंक ज्योतिष राशिफल: 22 फरवरी को किस मूलांक को मिलेगा लाभ, किसे रहना होगा सतर्क

Mulank Rashifal 22 फरवरी 2026 के अनुसार आज का दिन अंक ज्योतिष की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। आज की तिथि 22/02/2026 के सभी अंकों को जोड़ने पर योग 16 बनता है और 1+6 करने पर मूल अंक 7 प्राप्त होता है। अंकशास्त्र में 7 का स्वामी केतु को माना गया है, जो आत्मचिंतन, रहस्य, आध्यात्मिकता और गहराई का प्रतीक है। इसी आधार पर आज का अंक राशिफल तैयार किया गया है। आप इसे अपने मूलांक के अनुसार पढ़ें।मूलांक 1आज नेतृत्व क्षमता उभरकर सामने आएगी। लंबे समय से लंबित कार्यों की शुरुआत के लिए दिन अनुकूल है। कार्यक्षेत्र में वरिष्ठों से प्रशंसा मिल सकती है। आर्थिक मामलों में सोच-समझकर निर्णय लें। परिवार में आपकी सलाह को महत्व मिलेगा। मूलांक 2भावनात्मक संतुलन बनाए रखना जरूरी है। किसी करीबी से छोटी गलतफहमी हो सकती है, जिसे आप समझदारी से सुलझा सकते हैं। रचनात्मक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। मानसिक शांति के लिए ध्यान या प्रार्थना लाभकारी रहेगी। मूलांक 3ज्ञान और योजना बनाने के लिए उत्तम समय है। शिक्षा, लेखन या प्रशासन से जुड़े लोगों को सफलता मिल सकती है। मित्रों से विचार-विमर्श नई दिशा देगा। आर्थिक स्थिति स्थिर रहेगी। सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। मूलांक 4आत्मविश्लेषण और दीर्घकालिक योजनाओं पर काम करने का दिन है। कार्यक्षेत्र में जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं, लेकिन आप उन्हें कुशलता से निभाएंगे। वाहन चलाते समय सावधानी रखें। परिवार में आपका निर्णय अहम रहेगा। मूलांक 5महत्वपूर्ण निर्णय में जल्दबाजी न करें। व्यापार में नई रणनीति बनाने का समय है। यात्रा की संभावना बन सकती है। संचार कौशल से लाभ होगा। मित्रों का सहयोग मिलेगा। मूलांक 6पारिवारिक और सामाजिक जीवन में सामंजस्य रहेगा। प्रेम संबंधों में स्पष्टता आएगी। कला, फैशन या सजावट से जुड़े लोगों के लिए दिन लाभकारी है। आर्थिक स्थिति संतुलित रहेगी। मूलांक 7आज का दिन आत्मचिंतन और आध्यात्मिकता की ओर झुकाव बढ़ाएगा। शोध और अध्ययन में प्रगति होगी। एकांत में समय बिताना लाभदायक रहेगा। स्वास्थ्य का ध्यान रखें और पर्याप्त नींद लें। मूलांक 8कर्म और जिम्मेदारी का दिन है। कार्यक्षेत्र में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। कानूनी मामलों में प्रगति संभव है। निवेश सोच-समझकर करें। बुजुर्गों का आशीर्वाद लाभ देगा। मूलांक 9ऊर्जा और उत्साह से भरा दिन रहेगा। सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी बढ़ेगी। पुराने विवाद सुलझ सकते हैं। स्वास्थ्य सामान्य रहेगा, लेकिन क्रोध पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।
Karthigai Deepam 2026: 23 फरवरी को मनाया जाएगा दीपों का भव्य त्योहार, जानें तिथि, पूजा और तिरुवन्नमलाई महादीपम की खासियत

नई दिल्ली । तमिल हिंदू समुदाय के लिए कार्तिगई दीपम त्योहार का विशेष महत्व है। इस साल यह पर्व सोमवार 23 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा। कार्तिगई दीपम मासिक कार्तिकेई नक्षत्र यानी कृत्तिका नक्षत्र के समय आता है और भगवान शिव को समर्पित होता है। यह प्राचीन हिंदू त्योहार तमिल परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव है जिसमें घर मंदिर और सड़कों को तेल के दीयों से रोशन किया जाता है। दीपों की यह कतार अंधकार पर दिव्य प्रकाश की विजय का प्रतीक मानी जाती है। कार्तिगई नक्षत्र हिंदू ज्योतिष के 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक है। जब यह नक्षत्र चंद्र दिवस के साथ मेल खाता है भक्त घरों और दुकानों के बाहर दीपक जलाकर भगवान शिव की पूजा करते हैं। मासिक कार्तिगई नक्षत्र के दिन अनुष्ठान करना आध्यात्मिक रूप से पुण्यकारी होता है लेकिन साल का कार्तिगई दीपम पर्व विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन पूजा में तेल के दीयों की कतारें लगाई जाती हैं पूजा स्थल सजाए जाते हैं और भक्त भगवान शिव की आराधना करते हैं। दीपक जलाने का अर्थ केवल रोशनी नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा शुभता और दिव्य आशीर्वाद को आमंत्रित करना है। इसके साथ ही भक्त शांति समृद्धि और आध्यात्मिक विकास की कामना करते हैं। कार्तिगई दीपम का भव्यतम उत्सव तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई में होता है। यहां अन्नमलैयार मंदिर के प्रांगण और तिरुवन्नमलाई पहाड़ी की चोटी पर महादीपम नामक विशाल दीपक प्रज्वलित किया जाता है। इसकी लौ कई किलोमीटर दूर तक दिखाई देती है और भगवान शिव के अनंत प्रकाश स्वरूप का प्रतीक मानी जाती है। हजारों भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से इस अनुष्ठान में शामिल होते हैं। महादीपम प्रज्वलित करना तमिल हिंदू परंपरा में सबसे आध्यात्मिक और उत्थानकारी क्षणों में से एक माना जाता है। मासिक कार्तिक नक्षत्र भी हर महीने कृत्तिका नक्षत्र पर आता है लेकिन कार्तिगई दीपम का पर्व वर्ष में एक बार विशेष रूप से मनाया जाता है। भक्त इसे आध्यात्मिक शांति समृद्धि और जीवन में शुभता लाने का अवसर मानते हैं। इस दिन दीप जलाने पूजा करने और तिरुवन्नमलाई महादीपम देखने से भक्तों का मनोबल और भक्ति भाव बढ़ता है। इस प्रकार 23 फरवरी 2026 को कार्तिगई दीपम का त्योहार केवल दीपों का उत्सव नहीं बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भगवान शिव के प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का पर्व है। यह दिन तमिल हिंदू समाज के लिए विशेष रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।
Skanda Sashti 2026: संतान प्राप्ति और खुशहाल जीवन के लिए आज रखें व्रत

नई दिल्ली । आज 22 फरवरी 2026 को हिंदू धर्म में विशेष व्रत संकद षष्ठी का दिन है। इसे संतान प्राप्ति और संतान के सुख-समृद्ध जीवन के लिए श्रेष्ठ व्रत माना जाता है। फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर यह व्रत रखा जाता है। स्कंद षष्ठी के दिन माता गौरी और भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकेय, जिन्हें हम भगवान स्कंद, मुरुगन या सुब्रह्मणयम के नाम से जानते हैं, की पूजा की जाती है। खासकर माताएं इस व्रत का पालन संतान की कामना और उसके सुख-समृद्ध जीवन के लिए करती हैं। पंचांग के अनुसार, आज सुबह 11:09 बजे से षष्ठी तिथि प्रारंभ होगी और कल 23 फरवरी को सुबह 09:09 बजे तक रहेगी। पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त हैं। सुबह 05:12 से 06:03 बजे तक पूजा का शुभ मुहूर्त है, दोपहर 12:12 से 12:58 बजे तक अभिजीत मुहूर्त, दोपहर 02:29 से 03:14 बजे तक विजय मुहूर्त और शाम 06:14 से 06:39 बजे तक गोधूलि मुहूर्त। इस समय के दौरान पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। स्कंद षष्ठी पूजा की विधि सरल लेकिन नियमबद्ध होती है। सुबह उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। सूर्य देव को जल अर्पित करें और फिर पूजाघर में पूजा की तैयारी करें। एक चौकी पर भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। सबसे पहले गंगाजल से भगवान को स्नान कराएं, फिर चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद पीले फूल, फल, भोग, धूप और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करें। भगवान स्कंद के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करें। व्रत के दौरान कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है। पूरे दिन सात्विक भोजन करें, जैसे फल, दूध और मेवे। अनाज और तामसिक चीजों से परहेज करें। व्रत के दौरान किसी की बुराई या निंदा न करें। अगले दिन विधिपूर्वक व्रत का पारण करें। यह नियम व्रत की सफलता और मनोकामना पूर्ण होने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। स्कंद षष्ठी व्रत का महत्व केवल संतान प्राप्ति तक सीमित नहीं है। यह व्रत माता-पिता की भक्ति, परिवार में खुशहाली और संतान के जीवन में स्वास्थ्य और सफलता की कामना से भी जुड़ा है। श्रद्धा और नियम के साथ व्रत करने से इसे रखन वाले परिवार को मानसिक संतोष और आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है। इसलिए आज 22 फरवरी को अगर आप संतान सुख या संतान के सुख-समृद्ध जीवन की कामना रखते हैं, तो स्कंद षष्ठी का व्रत श्रद्धापूर्वक रखें, पूजा विधि और नियमों का पालन करें और लाभ प्राप्त करें।
मार्च 2026 में 'रवि' और 'सोम' प्रदोष व्रत का अद्भुत संयोग: महादेव की कृपा पाने के लिए नोट कर लें शुभ मुहूर्त और तिथि

नई दिल्ली ।हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए प्रदोष व्रत को सर्वोत्तम माना गया है। पौराणिक मान्यताओं और शिव पुराण के अनुसार, त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष काल में महादेव स्वयं शिवलिंग में साक्षात विराजमान होते हैं। मार्च 2026 का महीना शिव भक्तों के लिए विशेष होने वाला है, क्योंकि इस महीने में दो अत्यंत फलदायी प्रदोष व्रत पड़ रहे हैं। पहला व्रत जहाँ रविवार को होने के कारण “रवि प्रदोष” कहलाएगा, वहीं दूसरा व्रत सोमवार को होने की वजह से “सोम प्रदोष” के नाम से जाना जाएगा। शास्त्रों में इन दोनों ही वारों पर पड़ने वाले प्रदोष व्रत का विशेष महत्व बताया गया है, जो साधक को आरोग्य और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। मार्च महीने के पहले प्रदोष व्रत की शुरुआत फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी तिथि से हो रही है। पंचांग के अनुसार, यह तिथि 28 फरवरी की रात 08 बजकर 43 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 1 मार्च, रविवार को रात 09 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि प्रदोष व्रत की पूजा शाम के समय यानी प्रदोष काल में की जाती है, इसलिए 1 मार्च को “रवि प्रदोष व्रत” रखा जाएगा। इस दिन महादेव की पूजा के लिए शाम 06 बजकर 21 मिनट से लेकर 07 बजकर 09 मिनट तक का समय सबसे शुभ रहेगा। रविवार को प्रदोष व्रत रखने से सूर्य देव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे व्यक्ति को मान-सम्मान और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। वहीं, मार्च का दूसरा प्रदोष व्रत चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को पड़ेगा। इसकी तिथि 16 मार्च 2026 को सुबह 09:40 बजे प्रारंभ होकर 17 मार्च की सुबह 09:23 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल की गणना के अनुसार, यह व्रत 16 मार्च को रखा जाएगा। सोमवार का दिन होने के कारण यह “सोम प्रदोष” कहलाएगा, जिसे शिवजी का सबसे प्रिय दिन माना जाता है। इस दिन पूजा का मुहूर्त शाम 06:30 बजे से रात 08:54 बजे तक रहेगा। सोम प्रदोष का व्रत करने से वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं और चंद्रमा की शुभता बढ़ती है। प्रदोष व्रत केवल एक उपवास नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग है। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन निराहार रहकर शिवलिंग पर जल, दूध और विशेष रूप से “बेलपत्र” अर्पित करते हैं, उनके जीवन से दरिद्रता और दुखों का नाश होता है। यह व्रत क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकारों से मुक्ति दिलाकर मन में सकारात्मकता का संचार करता है। यदि आप भी महादेव की असीम अनुकंपा प्राप्त करना चाहते हैं और अपने घर में सुख-शांति की कामना रखते हैं, तो मार्च के इन दो विशेष तिथियों को अपनी डायरी में जरूर नोट कर लें।
फरवरी के अंत में आसमान में सजेगी ‘ग्रहों की परेड’, 6 ग्रह एक साथ; इन राशियों के लिए खुलेगा भाग्य का द्वार

नई दिल्ली । फरवरी माह का अंतिम चरण एक बेहद खास और दुर्लभ खगोलीय घटना का साक्षी बनने जा रहा है। इस दौरान आकाश में छह प्रमुख ग्रह एक साथ विशेष स्थिति में नजर आएंगे। पृथ्वी से देखने पर ये ग्रह एक सीध में कतारबद्ध दिखाई देंगे जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘ग्रहों की परेड’ कहा जाता है। इस अद्भुत नजारे में बुध शुक्र बृहस्पति शनि यूरेनस और नेपच्यून शामिल होंगे। अंतरिक्ष एजेंसी NASA के अनुसार सूर्यास्त के तुरंत बाद ये ग्रह क्षितिज के पास दिखाई देंगे। हालांकि साफ मौसम होने पर भी इनमें से केवल चार ग्रह बुध शुक्र बृहस्पति और शनि नंगी आंखों से स्पष्ट दिख सकेंगे जबकि यूरेनस और नेपच्यून को देखने के लिए दूरबीन की जरूरत पड़ सकती है। यह घटना वैज्ञानिक दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार उतनी ही प्रभावशाली भी मानी जा रही है। जब कई बड़े ग्रह एक ही दिशा में सक्रिय होते हैं तो उसका असर सभी 12 राशियों पर पड़ता है। वर्तमान ग्रह स्थिति के अनुसार गुरु मिथुन राशि में शनि मीन राशि में और बुध-शुक्र राहु के साथ कुंभ राशि में स्थित बताए जा रहे हैं। फरवरी के अंत तक मंगल और चंद्रमा के भी कुंभ राशि में पहुंचने से ऊर्जा उत्साह और भावनात्मक शक्ति में वृद्धि के संकेत हैं। ग्रहों की यह विशेष व्यवस्था सोच निर्णय धन जिम्मेदारी और भाग्य से जुड़े मामलों में तेजी से बदलाव ला सकती है। कई लोगों को अचानक अवसर नए संपर्क और आर्थिक लाभ मिलने के योग बन रहे हैं। सही दिशा में किया गया प्रयास उल्लेखनीय सफलता दिला सकता है। मेष राशि के जातकों के लिए यह समय करियर में तेजी से उछाल लेकर आ सकता है। आय के नए स्रोत बनने की संभावना है और परिवार का सहयोग मनोबल को मजबूत करेगा। मिथुन राशि वालों के लिए भाग्य का साथ मिलने के संकेत हैं। गुरु का प्रभाव दृष्टिकोण को व्यापक बनाएगा नए संपर्क लाभदायक सिद्ध होंगे और नई नौकरी या पदोन्नति के अवसर मिल सकते हैं। सिंह राशि के जातकों के लिए यह समय नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने वाला है। व्यापार में विस्तार साझेदारी से लाभ और प्रभावशाली लोगों से सहयोग मिलने की संभावना है। वहीं कन्या राशि वालों को अपनी मेहनत का सकारात्मक परिणाम मिल सकता है। स्वास्थ्य में सुधार पुराने विवादों का समाधान और निवेश से अच्छे रिटर्न के योग बन रहे हैं। फरवरी के अंत में बनने वाला यह दुर्लभ ग्रह संयोग न केवल आकाश में एक मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करेगा बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से कई राशियों के जीवन में नई ऊर्जा और संभावनाओं का संचार भी कर सकता है। सूर्यास्त के बाद साफ आसमान में इस अद्भुत नजारे को देखने का अवसर विशेष रहेगा।
Braj Holi Celebration: फूलों की होली से गूंजा मथुरा, भक्तिमय रंग में रंगी ब्रजभूमि

नई दिल्ली।ब्रजभूमि में होली का रंग अब पूरी तरह चढ़ने लगा है। उत्तर प्रदेश के Mathura स्थित Raman Reti Ashram में 21 फरवरी से भव्य होली महोत्सव की शुरुआत हो चुकी है। यहां पारंपरिक अंदाज में फूलों और गुलाल के साथ होली खेली जा रही है। देश-विदेश से आए श्रद्धालु, स्थानीय भक्त और पर्यटक इस आयोजन का हिस्सा बनकर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव का आनंद ले रहे हैं। फूलों की होली बनी आकर्षण का केंद्ररमणरेती आश्रम में आयोजित होली महोत्सव की सबसे बड़ी खासियत है फूलों की होली। यहां रंगों के साथ-साथ पुष्पवर्षा की जाती है, जिससे पूरा परिसर भक्तिमय और रंगीन वातावरण में डूब जाता है। हल्के गुलाल की बौछार और रंग-बिरंगे फूलों की बारिश के बीच भजन-कीर्तन का आयोजन माहौल को और भी आध्यात्मिक बना देता है। श्रद्धालु भगवान के जयकारों के साथ रंगों में सराबोर हो रहे हैं। ढोल, मंजीरे और भजनों की धुन पर पूरा आश्रम होली के उल्लास में झूमता नजर आ रहा है।ब्रज में 40 दिनों तक चलता है रंगोत्सवब्रज क्षेत्र में होली का उत्सव करीब 40 दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत बसंत पंचमी से ही हो जाती है। ब्रज मंडल के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में यह पर्व केवल रंगों का नहीं बल्कि भक्ति, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। इसी कड़ी में मथुरा का रमणरेती आश्रम हर साल विशेष होली महोत्सव आयोजित करता है, जहां श्रद्धालु रंगों के साथ आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करते हैं। आने वाले दिनों में बरसाना और नंदगांव में लठमार होली जैसे आयोजन भी उत्साह को चरम पर पहुंचाएंगे। श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़21 फरवरी से शुरू हुए इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। सुबह से ही आश्रम परिसर में भक्तों की भीड़ दिखाई दे रही है। आरती, भजन और रंग-गुलाल के बीच श्रद्धालु उत्सव का आनंद ले रहे हैं। सुरक्षा और व्यवस्थाएंआयोजन को देखते हुए आश्रम प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए हैं। आगंतुकों से शांति और अनुशासन बनाए रखने की अपील की गई है ताकि उत्सव की गरिमा बनी रहे। ब्रज की यह होली केवल रंगों का उत्सव नहीं बल्कि श्रद्धा, प्रेम और परंपरा का अद्भुत संगम है। आने वाले दिनों में ब्रज की गलियां और अधिक रंगों और उल्लास से भर उठेंगी।
मंगल का कुंभ राशि में महागोचर: ग्रहों के अनूठे संयोग से चमकेगी इन 4 राशियों की किस्मत, बरसेगा धन और वैभव

नई दिल्ली/भोपाल। अंतरिक्ष में ग्रहों की चाल एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। आगामी 23 फरवरी 2026 को सुबह 7:27 बजे ऊर्जा, साहस और पराक्रम का कारक माना जाने वाला मंगल ग्रह कुंभ राशि में प्रवेश करने जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंभ राशि में पहले से ही ग्रहों का एक दुर्लभ जमावड़ा लगा हुआ है। वर्तमान में यहाँ सुख-वैभव के प्रदाता शुक्र, बुद्धि के देवता बुध और छाया ग्रह राहु विराजमान हैं। ऐसे में मंगल का आगमन न केवल ‘अंगारक योग’ जैसी स्थितियां बनाएगा, बल्कि शुक्र और मंगल की युति आर्थिक समृद्धि के द्वार भी खोलेगी। ज्योतिष में मंगल की ऊर्जा और शुक्र के ऐश्वर्य का मिलन भौतिक सुखों में वृद्धि करने वाला माना जाता है। इस गोचर का सबसे सकारात्मक प्रभाव मिथुन राशि के जातकों पर देखने को मिलेगा। मिथुन राशि वालों के लिए यह समय किसी वरदान से कम नहीं है। इन्हें न केवल परिवार का भरपूर सहयोग मिलेगा, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी नए और सुनहरे अवसर प्राप्त होंगे। धन आवक के नए स्रोत खुलने से बैंक बैलेंस में बढ़ोतरी होगी और प्रेम संबंधों में मधुरता आएगी। हालांकि, इन जातकों को सलाह दी गई है कि वे अति उत्साह में अपनी सेहत को नज़रअंदाज न करें और व्यर्थ के विवादों से दूरी बनाए रखें। वहीं, वृश्चिक राशि के जातकों के लिए मंगल का यह परिवर्तन कार्यक्षेत्र में बड़ी सफलता लेकर आ रहा है। नौकरीपेशा लोगों को अपने वरिष्ठ अधिकारियों से प्रशंसा और पदोन्नति मिल सकती है। प्रोफेशनल लाइफ में आपका दबदबा बढ़ेगा और सामाजिक दायरे में भी विस्तार होगा। इस दौरान बनने वाले नए संपर्क भविष्य में बड़े आर्थिक लाभ का कारण बन सकते हैं। दोस्तों की मदद से आपके रुके हुए कठिन कार्य भी आसानी से पूरे हो जाएंगे। मकर राशि के जातकों के लिए यह गोचर आत्मविश्वास और जोश का संचार करने वाला साबित होगा। विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए यह समय बेहद अनुकूल है, उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में आशातीत सफलता मिलेगी। धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों की ओर आपका झुकाव बढ़ेगा। शिक्षा या ट्रेनिंग के सिलसिले में की गई यात्राएं सुखद और परिणामी रहेंगी। कुल मिलाकर मकर राशि वालों के लिए यह सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर समय है। अंततः, चूंकि यह गोचर कुंभ राशि में ही हो रहा है, इसलिए इस राशि के जातकों को इसका सीधा और सर्वाधिक लाभ मिलना तय है। कारोबारियों के लिए नए व्यावसायिक समझौते लाभकारी सिद्ध होंगे और समाज में आपकी प्रतिष्ठा में चार चांद लगेंगे। मान-सम्मान की प्राप्ति के साथ-साथ आपका स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहेगा। हालांकि, मंगल की तप्त ऊर्जा को संतुलित करने के लिए ज्योतिषियों ने कुंभ राशि वालों को पर्याप्त जल सेवन करने की सलाह दी है। ग्रहों का यह अद्भुत मेल अगले कुछ दिनों तक इन चार राशियों के जीवन में खुशहाली और सफलता की नई इबारत लिखेगा।
ढुण्ढिराज चतुर्थी 2026: बाधाओं के नाश और मनोकामना पूर्ति का पावन दिन, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

नई दिल्ली । फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाने वाली ढुण्ढिराज चतुर्थी इस वर्ष 21 फरवरी 2026 शनिवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार यह तिथि भगवान श्री गणेश को समर्पित है जिन्हें विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता कहा जाता है। मत्स्य पुराण में इस चतुर्थी को ‘मनोरथ चतुर्थी’ के नाम से भी वर्णित किया गया है क्योंकि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। कहा जाता है कि जीवन में आ रही बाधाओं रुकावटों और मानसिक अशांति को दूर करने के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी होता है। इस बार ढुण्ढिराज चतुर्थी का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि इस दिन शुभ योगों का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दिन शुभ शुक्ल और रवि योग का निर्माण हो रहा है जो धार्मिक कार्यों और पूजन-अर्चन के लिए अत्यंत अनुकूल माने जाते हैं। ऐसे शुभ संयोग में भगवान गणेश की आराधना करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक के जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। पूजा के लिए दिनभर कई शुभ मुहूर्त रहेंगे। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 13 मिनट से 6 बजकर 4 मिनट तक रहेगा जो साधना और जप के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 28 मिनट से 3 बजकर 14 मिनट तक रहेगा जिसमें किए गए कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है। गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 13 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा जो पूजन के लिए शुभ है। वहीं निशिता मुहूर्त रात 12 बजकर 9 मिनट से 1 बजे तक रहेगा जो विशेष साधना और मंत्र जप के लिए उत्तम माना गया है। ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है। गणपति को लाल पुष्प दूर्वा मोदक और सिंदूर अर्पित करना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से दूर्वा और मोदक भगवान को अत्यंत प्रिय हैं। पूजा के दौरान ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जप या गणेश स्तोत्र का पाठ करने से बुद्धि विवेक और सफलता की प्राप्ति होती है। श्रद्धा और एकाग्रता के साथ की गई आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और कार्यों में सफलता मिलने लगती है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से न केवल आर्थिक समृद्धि आती है बल्कि पारिवारिक सुख-शांति भी बनी रहती है। विद्यार्थी वर्ग के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना जाता है क्योंकि भगवान गणेश को बुद्धि और विद्या का देवता कहा गया है। जो व्यक्ति सच्चे मन से इस दिन उपवास रखकर पूजा-अर्चना करता है उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और अधूरे कार्य पूर्ण होने लगते हैं। ढुण्ढिराज चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं बल्कि आत्मविश्वास और आस्था को मजबूत करने का अवसर भी है। शुभ योगों से युक्त इस पावन दिन पर भगवान गणेश की आराधना कर अपने जीवन से विघ्नों को दूर करने और सफलता की ओर कदम बढ़ाने का यह श्रेष्ठ अवसर है।