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Aaj Ka Ank Jyotish 11 March 2026: मूलांक 1 से 9 तक के लोगों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन? पढ़ें आज का अंक राशिफल

नई दिल्ली। 11 मार्च 2026। अंक ज्योतिष के अनुसार किसी भी व्यक्ति की जन्मतिथि से उसका मूलांक (Root Number) निकाला जाता है। यह मूलांक 1 से 9 के बीच होता है और इससे व्यक्ति के स्वभाव, करियर, आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य और रिश्तों के बारे में कई संकेत मिलते हैं। आज 11 मार्च 2026 का दिन अलग-अलग मूलांक वाले लोगों के लिए अलग ऊर्जा और अवसर लेकर आया है। उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति का जन्म किसी भी महीने की 11 तारीख को हुआ है, तो 1+1=2 होने के कारण उसका मूलांक 2 होगा।अगर आपको अपना मूलांक पता है, तो आइए जानते हैं कि आज का दिन आपके लिए क्या संदेश लेकर आया है। मूलांक 1आज का दिन मूलांक 1 वालों के लिए सकारात्मक रहने वाला है। कामकाज के क्षेत्र में आपकी प्रभावशाली छवि देखने को मिलेगी और लोग आपकी बातों को महत्व देंगे। नई ऊर्जा के साथ आप कई कार्यों को तेजी से पूरा कर सकते हैं। हालांकि कोई बड़ा निर्णय लेने से पहले पूरी योजना जरूर बनाएं, क्योंकि जल्दबाजी छोटी गलतियों का कारण बन सकती है।टीमवर्क से बेहतर परिणाम मिलेंगे। मानसिक थकान से बचने के लिए बीच-बीच में छोटे ब्रेक लें और खानपान का विशेष ध्यान रखें। मूलांक 2आज आपकी अंतरात्मा की आवाज काफी मजबूत रहेगी और आप कार्यस्थल की परिस्थितियों को गहराई से समझ पाएंगे। रिसर्च, काउंसलिंग या गंभीर चर्चा से जुड़े कामों में सफलता मिल सकती है।भावनात्मक रूप से थोड़ा उतार-चढ़ाव संभव है, इसलिए खुद को सकारात्मक माहौल में रखें। परिवार और करीबी लोगों के साथ समय बिताना अच्छा रहेगा। अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त करें, लेकिन जरूरत से ज्यादा संवेदनशील होने से बचें। मूलांक 3मूलांक 3 के लिए आज आत्मविश्वास से भरा दिन रहेगा। किसी नए प्रोजेक्ट या रचनात्मक काम की शुरुआत करने के लिए समय अनुकूल है। आपकी सकारात्मक सोच दूसरों को भी प्रभावित करेगी।हालांकि उत्साह में आकर जरूरत से ज्यादा वादे करने से बचें। खानपान और पानी पीने की आदतों का ध्यान रखें। प्रेम संबंधों में बातचीत सहज रहेगी, लेकिन गंभीर विषयों पर मजाक करने से बचें। मूलांक 4आज का दिन जीवन और काम को व्यवस्थित करने का संकेत दे रहा है। यह समय मजबूत नींव तैयार करने और लंबे लक्ष्यों पर काम शुरू करने के लिए अच्छा है।जरूरी कामों को प्राथमिकता देकर एक-एक करके पूरा करें। नियमितता और अनुशासन आपको भविष्य में बड़ी सफलता दिला सकते हैं।मानसिक तनाव से बचने के लिए गहरी सांस लेने वाले व्यायाम करें और पार्टनर के साथ संवाद बनाए रखें। मूलांक 5आज मूलांक 5 वालों के लिए अंतर्ज्ञान काफी मददगार साबित होगा। कई बार दिल की आवाज दिमाग से ज्यादा सही रास्ता दिखाती है। अचानक मिलने वाले अवसरों को पहचानने में आपकी समझ काम आएगी।आज जीवन में मिलने वाले छोटे-छोटे संकेतों पर ध्यान दें। ये आपको सही दिशा की ओर ले जा सकते हैं।स्वास्थ्य के लिए ताजे फल, हरी सब्जियां और पर्याप्त पानी का सेवन करें। मूलांक 6आज आपका अलग और रचनात्मक काम करने का तरीका पुरानी समस्याओं का समाधान निकाल सकता है। टीम के साथ मिलकर काम करना फायदेमंद रहेगा।प्रेजेंटेशन या क्लाइंट मीटिंग्स में सफलता मिल सकती है। भावनात्मक संतुलन बनाए रखें और मन को शांत रखने के लिए हल्का संगीत सुनें।रिश्तों में रोमांस बढ़ेगा। अपने प्रियजनों की सराहना करें और छोटे-छोटे सरप्राइज रिश्तों को मजबूत बना सकते हैं। मूलांक 7आज की ऊर्जा मूलांक 7 वालों के पक्ष में रहेगी। आपकी गहरी सोच और योजनाएं आपको सफलता की ओर ले जा सकती हैं।हालांकि अपने विचारों को केवल मन में रखने के बजाय उन्हें दूसरों के सामने भी रखें। ताजी हवा में समय बिताने से मन शांत रहेगा।आज आप ज्ञानवर्धक चर्चाओं में रुचि ले सकते हैं और पार्टनर के साथ खुलकर संवाद करना बेहतर रहेगा। मूलांक 8आज का दिन भविष्य की योजना और आर्थिक मामलों पर ध्यान देने के लिए अच्छा है। आपकी व्यवहारिक सोच आपको सही फैसले लेने में मदद करेगी।हालांकि काम का तनाव खुद पर हावी न होने दें और जीवन में संतुलन बनाए रखें।रिश्तों में थोड़ी भावनात्मक बातचीत जरूरी है। अपनों के साथ अपनी सच्ची भावनाएं साझा करें। मूलांक 9आज आपका काम करने का अलग अंदाज दूसरों को प्रेरित कर सकता है। नेतृत्व क्षमता मजबूत रहेगी, लेकिन कोई बड़ा कदम उठाने से पहले तैयारी की जांच जरूर करें।ऊर्जा में थोड़ा उतार-चढ़ाव संभव है, इसलिए संतुलित आहार और पर्याप्त पानी जरूरी है।पुरानी भावनाएं या विवाद सामने आ सकते हैं, इसलिए कड़वाहट रखने के बजाय बातचीत के जरिए समाधान निकालें। अंक ज्योतिष के अनुसार आज का दिन कई मूलांक वालों के लिए नई संभावनाएं और आत्मचिंतन का अवसर लेकर आया है। सही योजना, सकारात्मक सोच और संतुलित जीवनशैली अपनाकर आप दिन को और बेहतर बना सकते हैं।

आखिर क्यों महादेव ने काटा ब्रह्मा जी का पांचवां सिर? सृष्टि के रचयिता की एक भूल और पौराणिक कथा का रहस्य

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और शिव का विशेष महत्व माना जाता है। इनमें ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है। आम तौर पर हम उन्हें चार मुखों वाले चतुर्मुख रूप में देखते हैं, लेकिन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुरुआत में ब्रह्मा जी के पांच मुख हुआ करते थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार उनकी एक भूल के कारण भगवान शिव ने उनका पांचवां सिर कटवा दिया, जिसके बाद वे चतुर्मुख रूप में ही पूजे जाने लगे। इस कथा का उल्लेख Shiva Purana में मिलता है। इसके अनुसार सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा जी ने Satarupa नाम की एक अत्यंत सुंदर स्त्री की रचना की। सतरूपा अत्यंत तेजस्वी और मनमोहक रूप वाली थीं। कथा के अनुसार उनके सौंदर्य को देखकर स्वयं ब्रह्मा जी भी आकर्षित हो गए। बताया जाता है कि जब सतरूपा को यह आभास हुआ कि ब्रह्मा जी की दृष्टि उन पर है, तो उन्होंने उनसे बचने के लिए अलग-अलग दिशाओं में जाना शुरू कर दिया। सतरूपा जब जिस दिशा में जातीं, ब्रह्मा जी उन्हें देखने के लिए उसी दिशा में अपना एक मुख प्रकट कर लेते। इस तरह उन्होंने चारों दिशाओं में देखने के लिए चार मुख बना लिए। लेकिन जब सतरूपा आकाश की ओर बढ़ीं, तब ब्रह्मा जी ने ऊपर की ओर देखने के लिए अपना पांचवां मुख भी प्रकट कर लिया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह आचरण मर्यादा के विरुद्ध माना गया, क्योंकि सतरूपा उनकी ही रचना थीं और उन्हें मानस पुत्री के समान माना जाता था। यह सब देखकर Shiva अत्यंत क्रोधित हो गए। धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए उन्होंने अपने उग्र स्वरूप Kala Bhairava को प्रकट किया और ब्रह्मा जी को दंड देने का आदेश दिया। महादेव के आदेश पर काल भैरव ने तुरंत ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया, जो ऊपर की ओर था। इसी घटना के बाद से ब्रह्मा जी के केवल चार मुख ही रह गए और वे चतुर्मुख रूप में ही जाने जाने लगे। बाद में ब्रह्मा जी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस घटना का एक और प्रभाव यह भी माना जाता है कि ब्रह्मा जी की पूजा अन्य देवताओं की तुलना में बहुत कम होती है। कहा जाता है कि बाद में Saraswati के श्राप के कारण भी उनकी व्यापक पूजा नहीं हो पाई। हालांकि भारत में एक ऐसा स्थान है जहां ब्रह्मा जी का प्रमुख और प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर ब्रह्मा मंदिर में है, जो पुष्कर, राजस्थान में स्थित है। यह मंदिर ब्रह्मा जी के सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक माना जाता है, जहां हर साल हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस तरह यह पौराणिक कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग ही नहीं, बल्कि मर्यादा, संयम और धर्म के महत्व का संदेश भी देती है।

शीतला अष्टमी 2026 कल: भूलकर भी न करें ये गलतियां, मां शीतला की कृपा से मिलती है रोगों से रक्षा

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र माह की शीतला अष्टमी का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से मां शीतला की पूजा के लिए समर्पित होता है जिन्हें रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। साल 2026 में शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु मां शीतला की पूजा अर्चना कर परिवार के स्वास्थ्य सुख और रोगों से मुक्ति की कामना करते हैं। मान्यता है कि मौसम बदलने के समय कई प्रकार की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है ऐसे में मां शीतला की पूजा करने से परिवार को रोगों से सुरक्षा और आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। शीतला अष्टमी से एक दिन पहले शीतला सप्तमी मनाई जाती है। इस दिन घरों में अलग अलग प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। परंपरा के अनुसार दाल भात पूरी दही लस्सी और हरी सब्जियां जैसे कई व्यंजन तैयार किए जाते हैं। खास बात यह है कि इन सभी पकवानों को अगले दिन यानी शीतला अष्टमी के दिन ठंडा और बासी रूप में खाया जाता है। इस दिन घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाया जाता। धार्मिक मान्यता के अनुसार ठंडा और बासी भोजन मां शीतला को प्रिय होता है और इससे शरीर को ठंडक भी मिलती है। इसलिए अष्टमी के दिन सबसे पहले इन व्यंजनों का भोग मां शीतला को लगाया जाता है और उसके बाद परिवार के लोग प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करते हैं। शीतला अष्टमी के दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी जरूरी माना गया है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और उसके बाद मां शीतला के मंदिर जाकर दर्शन करने चाहिए। पूजा के दौरान मां शीतला को हल्दी दही और बाजरे का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर नीम के पत्तों का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नीम स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है और यह कई रोगों से बचाने में सहायक होता है। इसलिए पूजा के दौरान नीम की पत्तियां चढ़ाने की भी परंपरा है। धार्मिक दृष्टि से यह पर्व केवल पूजा अर्चना तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमें स्वास्थ्य और स्वच्छता का संदेश भी देता है। मान्यता है कि शीतला अष्टमी के दिन आखिरी बार बासी भोजन किया जाता है और इसके बाद लंबे समय तक बासी भोजन करने से बचना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि अधिक समय तक बासी भोजन करने से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह पर्व हमें मौसम बदलने के समय साफ सफाई संतुलित भोजन और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की सीख भी देता है। इसके अलावा शीतला अष्टमी के दिन घर में पूजा करने के साथ साथ शीतला माता के मंदिर जाकर दर्शन करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। कई जगहों पर इस दिन भगवान शिव की पूजा करने का भी विधान बताया गया है। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से की गई पूजा से मां शीतला प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को रोगों से रक्षा का आशीर्वाद देती हैं। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में यह पर्व बड़ी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार व्रत कैसे करें: पुण्य और आध्यात्मिक लाभ के लिए जरूरी नियम

नई दिल्‍ली । धर्मग्रंथों में व्रत को तप का सरल और प्रभावी रूप बताया गया है। व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म को शुद्ध रखने का संकल्प भी है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे आत्मशुद्धि, संकल्प शक्ति की दृढ़ता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग माना। धर्म सिंधु में कहा गया है कि व्रत करते समय शुद्ध होना अत्यंत आवश्यक है। गरुड़ पुराण में सत्य बोलने, क्रोध से दूर रहने और संयमित जीवन जीने की सलाह दी गई है। मनुस्मृति में उल्लिखित है कि हिंसा, झूठ, चोरी या चुगली व्रत को भंग कर देती हैं। स्कंद पुराण में व्रत के दिन केवल एक समय भोजन या फलाहार करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। पद्म पुराण में संकल्प, पूजा-विधि और मंत्र-जाप का महत्व बताया गया है। इस प्रकार श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत ही आध्यात्मिक लाभ और मनोकामना पूर्ति का कारण बनता है। व्रत के मुख्य नियम और सावधानियां भोजन और फलाहार: व्रत के दिन बार-बार अन्न या फलाहार करना उचित नहीं माना गया। सामान्यतः एक या दो बार फलाहार करना पर्याप्त है। सावधानी और संयम: दिन में सोने से बचना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार इससे व्रत का पुण्यफल कम हो जाता है। मौन और ध्यान: व्रत के समय कम बोलना और अधिकतर मौन रहना श्रेष्ठ माना गया है। इससे मन जप और ध्यान में एकाग्र रहता है। स्वच्छता और संकल्प: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, सुपारी और दक्षिणा लेकर व्रत का संकल्प करें। मन और कर्म की शुद्धि: व्रत के दौरान काम, क्रोध, लोभ, मोह और आलस्य से दूर रहें। झूठ बोलने या किसी की निंदा-चुगली करने से बचें। पूजा और अर्पण: शिव-पार्वती से जुड़े व्रतों में भगवान शिव को बिल्वपत्र, धतूरा, चंदन और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। मां गौरी को श्रृंगार अर्पित करने की परंपरा है। उद्यापन: यदि व्रत किसी निश्चित अवधि के लिए किया गया हो, तो उसके पूर्ण होने पर उद्यापन करना आवश्यक माना गया है। इस प्रकार, व्रत केवल आत्मसंयम का अभ्यास नहीं है, बल्कि यह मन, वाणी और कर्म की शुद्धि के साथ आध्यात्मिक उन्नति और पुण्य की प्राप्ति का मार्ग है। शास्त्रों के बताए नियमों का पालन कर श्रद्धा और संकल्प के साथ किया गया व्रत निश्चित रूप से फलदायी होता है।

Sheetala Ashtami 2026: कब है शीतला अष्टमी और क्यों लगाया जाता है माता को बासी भोजन का भोग

नई दिल्‍ली । भारत में होली के आठ दिन बाद, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इसे बसौड़ा भी कहा जाता है। यह पर्व माता शीतला की पूजा के लिए समर्पित है, जिन्हें संक्रामक और त्वचा रोगों से बचाने वाली देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने वाले व्यक्तियों को चेचक, खसरा और अन्य त्वचा रोगों से सुरक्षा मिलती है। कब है शीतला अष्टमी 2026  पंचांग के अनुसार इस वर्ष शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च 2026, बुधवार को रखा जाएगा। अष्टमी तिथि 11 मार्च को प्रातः 01:54 बजे से शुरू होकर अगले दिन भोर 04:19 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत उसी दिन ही मनाया जाएगा। पूजा का शुभ मुहूर्त माता शीतला की पूजा के लिए प्रातःकाल 06:36 बजे से सायंकाल 06:27 बजे तक का समय शुभ माना गया है। इसी अवधि में भक्त विधिपूर्वक पूजा-अर्चना और व्रत का पालन करते हैं। पर्व का महत्व माता शीतला को रोगों से सुरक्षा देने वाली देवी माना जाता है। खासतौर पर चेचक, खसरा और अन्य संक्रामक रोगों से बचाव के लिए उनकी पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता शीतला को ठंडी वस्तुओं का भोग अर्पित करने से वह प्रसन्न होती हैं और भक्तों को रोगों से सुरक्षा प्रदान करती हैं। क्यों लगाया जाता है बासी भोजन का भोग बसौड़ा के दिन घर में चूल्हा जलाने और ताजा भोजन बनाने की परंपरा नहीं होती। इसलिए एक दिन पहले बनाया गया भोजन माता शीतला को अर्पित किया जाता है। यह भोजन प्रसाद के रूप में बाद में ग्रहण किया जाता है। मान्यता है कि माता शीतला को ठंडा या बासी भोजन प्रिय होता है। इससे शरीर में भी शीतलता बनी रहती है। यह पर्व विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र और उत्तर भारत के कई हिस्सों में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन घर-घर में बसौड़ा और बासी भोजन की परंपरा निभाई जाती है, जिससे परिवार के सदस्य भी गर्मियों की बीमारियों और संक्रामक रोगों से सुरक्षित रहते हैं।

नवरात्रि में मुख्य द्वार पर करें ये आसान वास्तु उपाय, घर में आएगी सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि

नई दिल्‍ली । चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म में शक्ति साधना और मां दुर्गा की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू हो रही है और नौ दिनों तक भक्त पूरे श्रद्धा भाव से देवी की पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय न केवल पूजा और व्रत का होता है बल्कि घर के वातावरण को शुद्ध और सकारात्मक बनाने का भी उत्तम अवसर माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का मुख्य द्वार ऊर्जा के प्रवेश का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है। यहीं से सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की ऊर्जा घर में प्रवेश करती हैं। इसलिए नवरात्रि के दौरान मुख्य द्वार को साफ सुथरा पवित्र और शुभ प्रतीकों से सजाना विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। नवरात्रि के दिनों में घर के मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों का तोरण लगाना बेहद शुभ माना जाता है। हिंदू परंपरा में तोरण को मंगल और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि आम के पत्तों का तोरण लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश रुक जाता है। इसके साथ ही मुख्य द्वार को नियमित रूप से साफ रखना और उसे सजाकर रखना भी जरूरी माना जाता है क्योंकि स्वच्छता को भी शुभता का प्रतीक माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार नवरात्रि के दौरान स्नान के बाद मुख्य द्वार के दोनों ओर कुमकुम या हल्दी से स्वास्तिक का चिन्ह बनाना भी अत्यंत शुभ होता है। स्वास्तिक को सनातन परंपरा में मंगल सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही एक ओर शुभ और दूसरी ओर लाभ लिखने की परंपरा भी है। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और परिवार में सुख समृद्धि का वातावरण बनता है। नवरात्रि के नौ दिनों में मुख्य द्वार के अंदर की ओर आते हुए माता लक्ष्मी के छोटे छोटे चरण चिह्न बनाना भी शुभ माना जाता है। यह प्रतीकात्मक रूप से इस बात का संकेत देता है कि घर में धन सौभाग्य और समृद्धि का आगमन हो रहा है। कई लोग चावल के आटे कुमकुम या रंगोली से ये चरण चिह्न बनाते हैं जिससे घर का वातावरण और भी पवित्र और आकर्षक बन जाता है। इसके अलावा वास्तु शास्त्र में एक और सरल उपाय बताया गया है। एक तांबे के बर्तन में साफ पानी भरकर उसमें गुलाब की पंखुड़ियां डालकर मुख्य द्वार के पास रखना शुभ माना जाता है। गुलाब की सुगंध और जल दोनों मिलकर वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और घर में शांति तथा सुख का भाव बढ़ाते हैं। नवरात्रि के दौरान सूर्यास्त के बाद मुख्य द्वार के पास घी का दीपक जलाने की परंपरा भी बहुत शुभ मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दीपक का प्रकाश नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और घर में दिव्यता तथा सकारात्मकता का वातावरण बनाता है। कहा जाता है कि जब घर का मुख्य द्वार शुभ प्रतीकों दीपक की रोशनी और स्वच्छता से सुसज्जित रहता है तो वहां मां दुर्गा और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और परिवार में सुख शांति तथा समृद्धि का वास होता है।

Jupiter Transit 2026: 11 मार्च से गुरु होंगे मार्गी, धनु-मीन और कर्क राशि के लिए खुलेंगे सफलता के नए द्वार

   Jupiter Transit 2026:  नई दिल्ली । वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, सौभाग्य, समृद्धि और वैवाहिक सुख का कारक ग्रह माना जाता है। जब भी गुरु अपनी चाल बदलते हैं तो उसका असर सभी राशियों के जीवन पर अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। इसी क्रम में 11 मार्च 2026 को बृहस्पति अपनी वक्री चाल को समाप्त कर मार्गी होने जा रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र में गुरु का मार्गी होना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे जीवन के कई क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन आने की संभावना बढ़ जाती है। खासतौर पर तीन राशियों के लिए यह खगोलीय परिवर्तन विशेष रूप से लाभकारी माना जा रहा है। ज्योतिषियों के अनुसार गुरु की सीधी चाल से करियर, शिक्षा, धन और पारिवारिक जीवन में नई संभावनाएं बनती हैं। इस बार गुरु का मार्गी गोचर विशेष रूप से धनु, मीन और कर्क राशि के जातकों के लिए काफी शुभ संकेत दे रहा है। इन राशियों के लोगों के जीवन में लंबे समय से चल रही बाधाएं दूर हो सकती हैं और नई उपलब्धियों के रास्ते खुल सकते हैं। सबसे पहले बात करें धनु राशि की, तो इस राशि के स्वामी स्वयं गुरु ग्रह हैं। ऐसे में गुरु का मार्गी होना धनु राशि के जातकों के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकता है। 11 मार्च के बाद से रुके हुए कार्यों में तेजी आने की संभावना है। नौकरीपेशा लोगों को पदोन्नति या नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। जो छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें उनकी मेहनत का सकारात्मक परिणाम मिल सकता है। आर्थिक दृष्टि से भी यह समय मजबूत रहने वाला है और आय के नए स्रोत बनने के योग बन सकते हैं। प्रेम संबंधों में मधुरता आएगी और जीवनसाथी के साथ रिश्ते पहले से अधिक मजबूत हो सकते हैं। मीन राशि के जातकों के लिए भी गुरु का मार्गी होना भाग्य में बड़ा बदलाव ला सकता है। चूंकि इस राशि के स्वामी भी गुरु ग्रह ही हैं, इसलिए इसका प्रभाव अधिक सकारात्मक हो सकता है। रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को अच्छे अवसर मिल सकते हैं और करियर में नई दिशा मिल सकती है। कार्यस्थल पर आ रही समस्याओं को सुलझाने में वरिष्ठों और अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन काफी मददगार साबित होगा। यदि किसी ने पहले से निवेश कर रखा है तो इस दौरान लाभ मिलने की संभावना है। विवाह योग्य लोगों के लिए अच्छे रिश्ते आने के योग बन सकते हैं और पारिवारिक माहौल भी खुशहाल रहेगा। वहीं कर्क राशि के जातकों के लिए भी गुरु का मार्गी होना शुभ फल देने वाला माना जा रहा है। इस दौरान उनके व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है और समाज में मान-सम्मान बढ़ सकता है। व्यापार से जुड़े लोगों के लिए यह समय विस्तार और नई योजनाओं को सफल बनाने वाला हो सकता है। कार्यस्थल पर आपकी मेहनत और कार्यक्षमता की सराहना होगी। लंबे समय से अटके हुए काम पूरे होने के योग बनेंगे। आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, जिससे घर में सुख-सुविधाओं में वृद्धि हो सकती है। परिवार में मांगलिक कार्यों के आयोजन की संभावना भी बन सकती है और जीवनसाथी का पूरा सहयोग मिलेगा। ज्योतिष के अनुसार गुरु का यह मार्गी गोचर कई लोगों के जीवन में नई उम्मीद और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आ सकता है। हालांकि किसी भी ग्रह के प्रभाव का सटीक परिणाम व्यक्ति की जन्म कुंडली और ग्रह स्थितियों पर भी निर्भर करता है, फिर भी इन तीन राशियों के लिए यह समय विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है।

अज्ञातवास का रहस्य: क्यों बने अर्जुन ‘बृहन्नला’, उर्वशी के श्राप ने कैसे बना दिया पांडवों के लिए वरदान

नई दिल्‍ली । भारतीय महाकाव्य महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग हैं जिनमें श्राप भी अंततः वरदान बनकर सामने आते हैं। ऐसा ही एक रहस्यमय प्रसंग उस समय का है जब पांडवों को अपने वनवास के अंतिम वर्ष में अज्ञातवास बिताना पड़ा। इस दौरान महान धनुर्धर अर्जुन ने बृहन्नला नाम से किन्नर का रूप धारण किया था। दिलचस्प बात यह है कि यह रूप उन्हें स्वर्गलोक में मिली एक घटना के कारण प्राप्त हुआ था जिसने आगे चलकर पांडवों की रक्षा में अहम भूमिका निभाई। कथा के अनुसार एक समय अर्जुन अपने दिव्य अस्त्र शस्त्रों की प्राप्ति के लिए स्वर्गलोक गए थे जहां उनके पिता इंद्र का निवास था। वहां अर्जुन की वीरता तेज और सौंदर्य से प्रभावित होकर प्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी उन पर मोहित हो गईं। उन्होंने अर्जुन के सामने प्रेम प्रस्ताव रखा लेकिन अर्जुन ने अत्यंत विनम्रता के साथ उसे अस्वीकार कर दिया। अर्जुन ने कहा कि वह उर्वशी को माता के समान मानते हैं क्योंकि वह उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी रह चुकी थीं। इस कारण वह उन्हें मातृभाव से देखते हैं। अर्जुन की यह बात सुनकर उर्वशी को गहरा अपमान महसूस हुआ। क्रोधित होकर उन्होंने अर्जुन को श्राप दे दिया कि वह नपुंसक यानी किन्नर बन जाएंगे। यह श्राप सुनकर अर्जुन व्यथित हो गए और उन्होंने अपनी पीड़ा इंद्रदेव को बताई। तब इंद्रदेव ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि यह श्राप स्थायी नहीं रहेगा बल्कि केवल एक वर्ष के लिए प्रभावी होगा। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में यही श्राप उनके लिए उपयोगी सिद्ध होगा। समय बीता और वह अवसर भी आ गया जब पांडवों को 12 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास बिताना था। अज्ञातवास के दौरान यदि उनकी पहचान उजागर हो जाती तो उन्हें फिर से वनवास भुगतना पड़ता। ऐसे में अर्जुन के लिए उर्वशी का श्राप वास्तव में वरदान बन गया। उन्होंने बृहन्नला नाम से किन्नर का रूप धारण किया और विराट नगरी में रहने लगे। इस दौरान अर्जुन ने राजा विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य और संगीत की शिक्षा देने का कार्य किया। बृहन्नला के रूप में अर्जुन ने न केवल अपनी पहचान छिपाए रखी बल्कि पांडवों के अज्ञातवास को सफलतापूर्वक पूरा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अज्ञातवास के समय अन्य पांडवों ने भी अपनी पहचान छिपाने के लिए अलग अलग रूप धारण किए थे। युधिष्ठिर कंक नाम से राजसभा में सलाहकार बने भीम बल्लव नाम से रसोइया बने नकुल अस्तबल की देखभाल करने लगे और सहदेव गायों की सेवा में लग गए। वहीं द्रौपदी सैरंध्री बनकर रानी सुदेष्णा की दासी के रूप में केश सजाने का कार्य करने लगीं। इस प्रकार उर्वशी का दिया हुआ श्राप अंततः पांडवों के लिए वरदान साबित हुआ और अर्जुन के बृहन्नला रूप ने महाभारत की कथा में एक अनोखा और प्रेरणादायक अध्याय जोड़ दिया।

खरमास 2026: 15 मार्च से मांगलिक कार्यों पर विराम, अप्रैल-मई में विवाह के शुभ मुहूर्त

नई दिल्ली । सनातन धर्म में ग्रहों की चाल और शुभ मुहूर्त का अत्यंत महत्व माना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित गिरिधर गोपाल चौबे के अनुसार जब सूर्य देव बृहस्पति गुरु की राशि मीन में प्रवेश करते हैं तब खरमास का आरंभ होता है। साल 2026 में यह गोचर 14 मार्च की मध्य रात्रि को तड़के 3:07 बजे होगा और 15 मार्च से मीन संक्रांति के साथ ही खरमास शुरू हो जाएगा। खरमास की अवधि में विवाह गृह प्रवेश मुंडन और नए व्यापार जैसी मांगलिक गतिविधियों पर रोक रहती है। पंडित चौबे बताते हैं कि इस समय पूजा पाठ दान और तप अत्यंत शुभ और फलदायी माने जाते हैं। सूर्य जब गुरु की राशियों धनु या मीन में होते हैं तो उनका तेज और प्रभाव विवाह जैसे भौतिक सुखों वाले कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। विवाह के लिए शुक्र और गुरु ग्रह का उदय और शुभ स्थिति जरूरी है। गुरु को कन्या की कुंडली में पति का कारक और शुक्र को वर की कुंडली में पत्नी और दाम्पत्य सुख का प्रतीक माना जाता है। यदि ये ग्रह अस्त हों तो विवाह संपन्न नहीं किया जाता। इस वर्ष 28 फरवरी को शुक्र के मीन राशि में प्रवेश के बाद स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है। विवाह के लिए शुभ नक्षत्र जैसे रोहिणी मृगशिरा और रेवती शुभ तिथि और अनुकूल लग्न का संयोग होना आवश्यक है। रविवार सोमवार बुधवार गुरुवार और शुक्रवार को विशेष रूप से विवाह के लिए अनुकूल दिन माने जाते हैं। खरमास की समाप्ति 14 अप्रैल 2026 को होगी जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश कर मेष संक्रांति मनाएंगे। इसके तुरंत बाद विवाह जैसे मांगलिक कार्य फिर से शुरू किए जा सकते हैं। मिथिला पंचांग के अनुसार अप्रैल में 17 20 26 और 30 तारीखें और बनारसी पंचांग के अनुसार 15 16 20 21 25–30 अप्रैल की तिथियां विवाह के लिए अति शुभ हैं। मई माह में मिथिला पंचांग के अनुसार 1 6 8 10 और 13 मई और बनारसी पंचांग के अनुसार 1–8 12 और 13 मई को विवाह के विशेष योग बन रहे हैं। ग्रीष्मकाल में भी शुभ संयोग मिलते हैं। जून में 19 24–26 28 और 29 जून और जुलाई में 1 2 3 6 9 12 मिथिला पंचांग और 1 2 6–8 11 12 बनारसी पंचांग को विवाह के लिए अनुकूल मुहूर्त हैं। इसके बाद देवशयनी एकादशी के आसपास से पुनः मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा। पंडित चौबे कहते हैं कि जातकों को अपनी कुंडली के अनुसार स्थानीय विद्वान से सलाह लेकर ही लग्न तय करना चाहिए ताकि ग्रहों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। इस प्रकार 15 मार्च से 14 अप्रैल 2026 तक खरमास रहेगा और इसके बाद अप्रैल मई के बीच विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए कई श्रेष्ठ मुहूर्त उपलब्ध हैं।

Papmochani Ekadashi 2026: 16 मार्च को व्रत, शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, पापों और कष्टों से मिले मुक्ति

नई दिल्ली। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पावन तिथि पापमोचनी एकादशी इस वर्ष 16 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु और महादेव की शक्ति के संगम का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन विशेष साधना और शिवलिंग पर कुछ सामग्रियों का अर्पण जीवन के जटिल कष्टों, शनि दोष और पुराने पापों से मुक्ति दिलाने में अत्यंत प्रभावशाली है। पापमोचनी एकादशी पर शिवलिंग साधना का विशेष महत्व है। इस दिन भक्त शिवलिंग पर पांच महत्वपूर्ण चीजें अर्पित करके महादेव को प्रसन्न कर सकते हैं। 1. शमी के पुष्प – रोग और दोषों से मुक्ति:नीलकंठेश्वर महादेव का स्मरण करते हुए शिवलिंग पर शमी के फूल चढ़ाएं। यह उपाय शरीर के रोगों और कुंडली में उपस्थित दोषों को दूर करने में मदद करता है। 2. बिल्वपत्र और शहद – उत्तम स्वास्थ्य का वरदान:शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय बिल्वपत्र पर थोड़ा शहद लगाकर अर्पित करें। शास्त्रों के अनुसार इससे समस्त पाप नष्ट होते हैं और भक्त को उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 3. चावल और काले तिल – शनि दोष से राहत:शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से परेशान लोग इस दिन कच्चे चावल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। पूजन के बाद इसे जरूरतमंद को दान करने से शनि देव की पीड़ा शांत होती है। 4. गाय का शुद्ध घी – संकटों का नाश:शुद्ध गाय के घी से शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। यह उपाय घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है और जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों से सुरक्षा देता है। 5. महामृत्युंजय मंत्र – संकट टालने की शक्ति:पूजा के अंत में महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप अवश्य करें। एकादशी की पवित्र ऊर्जा और मंत्र का प्रभाव मिलकर जीवन के बड़े संकटों और कष्टों को टालने की क्षमता रखता है। पापमोचनी एकादशी का व्रत 16 मार्च 2026 को रखा जाएगा और इसका पारण अगले दिन शुभ मुहूर्त में करना श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन की साधना से न केवल जीवन के कष्ट दूर होते हैं, बल्कि जन्मों के पापों से भी मुक्ति पाने का अद्वितीय अवसर मिलता है।