2033 तक भारत के ऊर्जा सेक्टर में बड़ा बदलाव, भंडारण क्षमता में होगा जबरदस्त इज़ाफा

नई दिल्ली भारत का स्थिर ऊर्जा भंडारण सेक्टर (स्थिर ऊर्जा भंडारण) तेजी से उभर रहा है। औद्योगिक रिपोर्ट के अनुसार, बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईएसएस) प्रोजेक्ट्स की कुल पाइपलाइन क्षमता 92 गीगावाट-घंटा (जीडब्ल्यूएच) के रिकॉर्ड स्तर पर उपलब्ध है। अभी जहां स्थापित क्षमता 1 गीगावॉट से भी कम है, वहीं 2033 तक यह क्षमता 346 गीगावॉट तक पहुंच सकती है। विशेषज्ञ का मानना है कि अगर सरकार की सहायक नीतियाँ जारी हैं, तो यह पात्र 544 GWh तक भी पहुँच सकता है। ## बीएसएस सेक्टर में तेजीपिछले एक साल में BESS सेक्टर में जबरदस्त गति देखने को मिली। 69 नए टेंडर जारी किए गए, आर्किटेक्चर कुल क्षमता 102 GWh है, जो 2024 की तुलना में 35 प्रतिशत अधिक है। यह निवेशक है कि व्यापारी और उद्योग दोनों ही इस क्षेत्र में बढ़ते अवसरों को पहचान रहे हैं। ## पंपल्ड ऑटोमोबाइल स्टोरेज का विस्तारकेवल बैटरियों तक ही नहीं, बल्कि पंपल्ड सिलिकॉन एनर्जी स्टोरेज में भी बड़ा विस्तार होगा। अनुमान है कि इसकी क्षमता 2025 में 7 GW से बढ़कर 2033 तक 107 GW तक पहुंच जाएगी। इस बिजली से बिजली की मांग में उछाल- बिजली की आपूर्ति को बढ़ावा देना आसान होगा और बिजली की स्थिरता मजबूत होगी। ## लागत में कमी और नीति का समर्थनबेरोजगार इंडिया के सुपरस्टार और एमडी, एस. सी. सक्सेना के अनुसार, बिजली की मांग में बदलाव के लिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडार की अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि बैटरी और पंपल्ड स्टोरेज की लागत में लगातार कमी और सरकार की सहायक कंपनियों के कारण इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ## गैर-जीवाश्मा जीवला लक्ष्य में सहायकएआईएसए के अध्यक्ष देबमाल्य सेन ने कहा कि यह भारत को 2030 से 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन (गैर-जीवाश्म ईंधन) क्षमता हासिल करने के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करेगा। ऊर्जा भंडारण इस लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगा। ##सरकारी निगम का योगदानइस सेक्टर की बिक्री में कई सरकारी अहम भूमिका निभा रही हैं। इनमें एनर्जी स्टोरेज ऑब्लिगेशन, वायबिलिटी गैप फंडिंग, और लाइब्रेरी चार्ज में छूट जैसी सुविधाएं शामिल हैं। औद्योगिक निवेश आकर्षित हुआ है और सेक्टर में तेजी से विस्तार का अवसर मिला है। ## 2026 में नई क्षमता का उद्घाटनरिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2026 में करीब 5 GWh नई क्षमता शुरू होने की उम्मीद है। इससे भारत के ऊर्जा भंडारण सेक्टर का तेजी से विस्तार होगा और देश को वैश्विक ऊर्जा भंडारण बाजार में मजबूत खिलाड़ी बनाया जाएगा। भारत का ऊर्जा सेक्टर सेक्टर अब विकास की ऊंचाइयों की ओर है। अगले दशक में प्रौद्योगिकी, सरकारी उद्यमों और उपभोक्ताओं के समर्थन से यह क्षेत्र देश के ऊर्जा लक्ष्य में अहम भूमिका निभाएगा और वैश्विक स्तर पर भारत को बढ़त मिलेगी।
टेक्नोलॉजी शिक्षा में बड़ा कदम, Indian Institutes of Technology के नए पाठ्यक्रम लॉन्च

नई दिल्ली। देश के प्रमुख तकनीकी विद्यार्थियों में से एक IIT मद्रास ने भविष्य की पीढ़ियों को ध्यान में रखते हुए सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और सिमुलेशन जैसे उभरते क्षेत्रों में नए पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स लॉन्च किए हैं। इन कोर्स का उद्देश्य छात्रों को आधुनिक तकनीक, रिसर्च और इंडस्ट्री की मांग के अनुरूप तैयार करना है। सेमीकंडक्टर और रोबोटिक्स पर खास फोकससंस्थान ने सेमीकंडक्टर मैटेरियल्स टेक्नोलॉजी में M.Tech प्रोग्राम शुरू किया है, जो भारत के बढ़ते सेमीकंडक्टर सेक्टर को मजबूत करने में मदद करेगा। इसके साथ ही रोबोटिक्स में M.Tech कोर्स के जरिए छात्रों को इंटेलिजेंट ऑटोमेशन और एडवांस्ड रोबोटिक सिस्टम्स की ट्रेनिंग दी जाएगी, जिससे वे मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर और ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों में योगदान दे पाएंगे। सिमुलेशन और कंप्यूटेशनल इंजीनियरिंग का समावेशकंप्यूटेशनल इंजीनियरिंग फॉर मैकेनिकल सिस्टम्स प्रोग्राम के तहत छात्रों को मशीन लर्निंग, हाई-परफॉर्मेंस क्षमताओं और सिमुलेशन तकनीकों की गहराई से जानकारी दी जाएगी। यह कोर्स कॉम्प्लेक्स इंजीनियरिंग समस्याओं के समाधान के लिए डेटा और फिजिक्स-बेस्ड दृष्टिकोण विकसित करेगा। पब्लिक पॉलिसी में भी नया अवसरतकनीकी कोर्स के साथ-साथ संस्थान ने पब्लिक पॉलिसी में एम.ए प्रोग्राम भी शुरू किया है। इसमें छात्रों को सरकारी नीतियां, सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां और उनके समाधान की समझ दी जाएगी। पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे विषय भी इस कोर्स का हिस्सा हैं। उद्योग और देश की फसलों के अनुरूप पहलसंस्थान के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि के अनुसार, ये पाठ्यक्रम वर्तमान और भविष्य की औद्योगिक फसलों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। इनका मकसद छात्रों को बहु-विषयक ज्ञान और व्यावहारिक कौशल से लैस करना है, ताकि वे तकनीक, अनुसंधान और नीति-निर्माण में अहम भूमिका निभा सकें।
देश की आईफोन फैक्ट्रियों में युवतियों की बढ़ती भागीदारी, रोजगार के नए अवसर..

नई दिल्ली: केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोमवार को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के चलते देश में महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खोल रहा है। आईफोन फैक्ट्रियों में ही अब एक लाख से अधिक महिलाएं काम कर रही हैं। अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ पहल महिलाओं को सशक्त बना रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर रहा है। मंत्री ने आगे बताया कि कई कारखानों में आधे से अधिक कर्मचारी महिलाएं हैं और महिला कर्मचारी सेमीकंडक्टर संयंत्र जैसी अत्यधिक जटिल इकाइयों में भी अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। देश में आईफोन मैन्युफैक्चरिंग एप्पल फॉक्सकॉन और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के माध्यम से पांच फैक्ट्रियों में होती है। पीक प्रोडक्शन साइकिल में इन फैक्ट्रियों में कुल 1,40,000 कर्मचारियों को रोजगार मिलता है, जिनमें से 1,00,000 महिलाएं हैं। अधिकांश महिलाएं 19-24 वर्ष की हैं और इनमें से कई के लिए यह पहली नौकरी है। कर्मचारियों को काम शुरू करने से पहले छह हफ्तों का निशुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे असेंबली लाइन पर जाने से पहले सभी बारीकियों को समझ सकें। एप्पल ने भारत में अपने उत्पादन को 2025 में लगभग 53 प्रतिशत बढ़ाया है। इस दौरान देश में करीब 5.5 करोड़ आईफोन यूनिट्स की असेंबली की गई, जबकि पिछली वर्ष यह संख्या 3.6 करोड़ थी। एप्पल यह कदम अमेरिका में चीनी उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ से बचने के लिए उठा रहा है और अब भारत में अपने वैश्विक उत्पादन का एक चौथाई हिस्सा बना रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव PLIयोजना और युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने के प्रयासों से महिलाओं को तकनीकी उद्योग में अधिक रोजगार और सशक्तिकरण मिल रहा है।
नींद नहीं आती? नासा के बताए 7 तरीके बदल सकते हैं आपकी लाइफस्टाइल

नई दिल्ली। अंतरिक्ष में काम करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए अच्छी और पूरी नींद लेना आसान नहीं होता। International Space Station पर अंतरिक्ष यात्रियों को हर 90 मिनट में सूर्योदय और सूर्यास्त दिखाई देता है। इससे शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी यानी Circadian Rhythm प्रभावित हो जाती है। जब यह प्राकृतिक चक्र बिगड़ता है तो नींद की कमी, थकान, ध्यान में कमी और गंभीर गलतियों का खतरा बढ़ जाता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों ने कुछ खास तरीके विकसित किए हैं, जो न केवल अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले आम लोगों के लिए भी बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये तरीके शिफ्ट में काम करने वाले लोगों, लगातार यात्रा करने वालों और नींद की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए खास तौर पर मददगार हो सकते हैं। 1. सोने और जागने का समय तय करेंनियमित नींद का सबसे बड़ा नियम है कि रोज एक ही समय पर सोना और जागना। इससे शरीर को पहले से पता होता है कि कब आराम करना है और कब सक्रिय रहना है। अगर समय तय हो तो शरीर धीरे-धीरे उसी लय में ढल जाता है और अनिद्रा या थकान की समस्या कम होने लगती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अपनी दिनचर्या में रोशनी, व्यायाम और भोजन का समय भी व्यवस्थित रखें। 2. नींद के बारे में जागरूकता बढ़ाएंअच्छी नींद के लिए यह समझना जरूरी है कि कौन-सी आदतें नींद को प्रभावित करती हैं। शाम के समय मोबाइल, लैपटॉप या टीवी से निकलने वाली ब्लू लाइट कम करनी चाहिए। साथ ही देर रात भारी भोजन से बचें और नियमित व्यायाम करें। ये आदतें शरीर की प्राकृतिक लय को संतुलित रखती हैं और नींद की गुणवत्ता बेहतर बनाती हैं। 3. सोने के लिए सही वातावरण बनाएंअच्छी नींद के लिए शांत, अंधेरा और ठंडा कमरा सबसे बेहतर माना जाता है। अंतरिक्ष में भी अंतरिक्ष यात्रियों को अलग-अलग सोने के छोटे कमरे दिए जाते हैं, जहां आंखों पर मास्क और कान में प्लग का उपयोग किया जाता है। पृथ्वी पर भी शोर कम रखें, कमरे का तापमान 18 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच रखें और आरामदायक बिस्तर का इस्तेमाल करें। इससे शरीर जल्दी आराम की स्थिति में पहुंचता है। 4. रोशनी का सही उपयोग करेंनासा के वैज्ञानिक बताते हैं कि रोशनी का हमारी नींद पर सीधा असर पड़ता है। अंतरिक्ष स्टेशन पर खास लाइटिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है जिससे दिन और रात का एहसास कराया जा सके। घर पर भी सुबह प्राकृतिक धूप लेना और शाम को तेज रोशनी व स्क्रीन टाइम कम करना फायदेमंद होता है। इससे शरीर को संकेत मिलता है कि अब आराम का समय है। 5. जरूरत पड़ने पर मेलाटोनिन या कैफीन का उपयोगकुछ स्थितियों में डॉक्टर की सलाह से मेलाटोनिन या सीमित मात्रा में कैफीन का उपयोग भी मददगार हो सकता है। Melatonin एक प्राकृतिक हार्मोन है जो शरीर को नींद के लिए तैयार करता है। जेट लैग या अनियमित दिनचर्या की स्थिति में इसका उपयोग सर्कैडियन रिदम को संतुलित करने में मदद कर सकता है। 6. कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी अपनाएंनींद की समस्या का एक बड़ा कारण मानसिक तनाव भी होता है। ऐसे में स्लीप कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) काफी प्रभावी मानी जाती है। इस तकनीक के जरिए व्यक्ति सोने से पहले मन को शांत करना, नकारात्मक विचारों को नियंत्रित करना और अच्छी आदतें विकसित करना सीखता है। 7. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेंअगर अन्य उपायों से राहत न मिले तो डॉक्टर की सलाह से कुछ दवाइयों का उपयोग किया जा सकता है। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बिना सलाह के कोई भी दवा लेना सुरक्षित नहीं होता।उचित मार्गदर्शन के साथ दवाइयों का उपयोग किया जाए तो वे नींद की समस्या को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती हैं। अच्छी नींद क्यों है जरूरीविशेषज्ञों के अनुसार लगातार नींद की कमी से मेटाबॉलिज्म गड़बड़ी, हृदय रोग, पाचन समस्याएं और मानसिक तनाव जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसीलिए वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि नियमित दिनचर्या, सही खान-पान और बेहतर नींद की आदतों को अपनाकर न केवल नींद सुधारी जा सकती है बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन भी पाया जा सकता है।
जब काम खत्म हो जाता है तो कहां जाते हैं सैटेलाइट? समझिए Graveyard Orbit का अनोखा विज्ञान

नई दिल्ली। अंतरिक्ष में आज हजारों उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं। ये उपग्रह मौसम की जानकारी प्रदान करते हैं, सौर गैसों का अध्ययन करते हैं, ग्रह-तारों की निगरानी करते हैं और संचार सेवाओं को बेहतर बनाते हैं जैसे कई महत्वपूर्ण काम करते हैं। लेकिन हर मशीन की तरह इन सैटेलाइट की भी एक सीमित आयु होती है। कुछ वर्षों तक काम करने के बाद ये तकनीक रूप से पुरानी या ख़राब हो गई हैं। ऐसे में सबूतों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि इन सैटेलाइट सैटेलाइट का क्या किया जाए ताकि अंतरिक्ष में खतरनाक सामान न बदले। लो अर्थ ऑर्बिट वाले सैटेलाइट को ऐसे ख़त्म कर दिया गया हैकैथेड्रल के पास के पुराने उपग्रहों को हटाने के लिए दो मुख्य तरीके होते हैं, जो उनकी विचारधारा पर प्रतिबंध लगाते हैं। कम पाइपलाइन वाली कक्षा को लो अर्थ ऑर्बिट कहा जाता है। इस क्लास में मौजूद सैटेलाइट को हटाने का तरीका आसान होता है।इंजीनियर सैटेलाइट में बैचलर जेल का उपयोग करके अपनी गति को धीरे-धीरे कम कर देते हैं। जैसे ही उसकी गति कम होती है, उपग्रह अपनी कक्षा से नीचे आता हुआ प्रतीत होता है और अंततः पृथ्वी के द्वीपों में प्रवेश कर जाता है। बस्ती में प्रवेश करते समय हवा के झोंके से इतनी तेज़ गर्मी पैदा होती है कि अधिकांश उपग्रह जलकर पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। छोटे उपग्रह के लिए यह विधि सबसे सुरक्षित मानी जाती है, क्योंकि इनका कोई मालबा जमीन तक अवलोकन नहीं है। बिग स्पेस यानों को ‘स्पेस फ़्रांसीसी कब्रिस्तान’ में स्थापित किया गया हैहालाँकि सभी उपग्रह संपूर्ण प्रकार के जलकर समाप्त नहीं हुए। बड़े अंतरिक्ष यान, पुराने अंतरिक्ष स्टेशन या भारी उपग्रह के कुछ हिस्सों में ज्वालामुखी के बाद भी बच सकते हैं। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक उन्हें नियंत्रित तरीके से पृथ्वी पर गिराते हैं ताकि मालबा क्षेत्र पर सुरक्षित रहे।इसके लिए प्रशांत महासागर में एक खास जगह चुनी गई है, जिसे ‘स्पेस क्राफ्ट कब्रिस्तान’ कहा जाता है। यह क्षेत्र प्वाइंट निमो के आसपास स्थित है। यह पृथ्वी का सबसे घना समुद्री तट माना जाता है, जहां से किसी भी दिशा में लगभग 2,600 किलोमीटर दूर है। यहां विकलांगों और मानव अपराध की संख्या बेहद कम है, इसलिए किसी भी दुर्घटना का खतरा भी बहुत कम रहता है। इतिहास में कई बड़े अंतरिक्ष यान, जैसे मीर स्पेस स्टेशन और सैल्यूट श्रृंखला के स्टेशन इसी क्षेत्र में गिरे हुए थे। ‘ग्रेवयार्ड ऑर्बिट’ में भेजे गए उपग्रह उपग्रह कक्षा वाले हैंदूसरी ओर, बहुत से कक्षा में मौजूद उपग्रह को पृथ्वी पर वापस लाना आसान नहीं होता। उदाहरण के लिए भूस्थैतिक कक्षा में विद्यमान उपग्रह पृथ्वी से लगभग 36 हजार किमी की भूमि पर स्थित हैं। इतने सारे प्लांट से उन्हें वापस लाने के लिए भारी मात्रा में जंगल की आवश्यकता होती है, जो अक्सर उपलब्ध नहीं होता है।ऐसे में साइंटिस्ट उन्हें लिटिल और ऊपर भेजते हैं, जिसे ग्रेवयार्ड ऑर्बिट कहा जाता है। यह क्लास सामान्य जियोस्टोरी क्लास से करीब 200 से 300 किमी ऊपर है। यहां पर सैटेलाइट सैटेलाइट हो जाने के बाद सैटेलाइट से कनेक्ट होने का खतरा कम हो जाता है। कई पुराने हज़ारों वर्षों तक इसी तरह के ‘अंतरिक्ष कब्रिस्तान’ में चक्करदार रह सकते हैं। अंतरिक्ष में जंगल की स्थापना क्यों है चिंता का विषयपुराने को उपग्रह सेट करना भी जरूरी है क्योंकि पृथ्वी के वर्ग में अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष डेबरी तेजी से बढ़ रही है। नासा के अनुसार आज पृथ्वी के चारों ओर हजारों सक्रिय उपग्रहों के साथ-साथ लाखों छोटे-बड़े टुकड़ों के टुकड़े भी मौजूद हैं।ये टुकड़े बहुत तेज गति से पाए जाते हैं और अगर कोई सैटेलाइट एक्टिवेटिड या स्पेस यान से अलग हो जाए तो भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे टकराव से और अधिक मालबा बनता है और यह एक खतरनाक चेन प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है, जिसे केसलर सिंड्रोम कहा जाता है। यदि यह स्थिति गंभीर हो जाए तो कुछ स्पेस फ़्लोरिडा के उपयोग की गुंजाइश नहीं है, जिनमें से कोई भी नहीं है। इसी कारण से साइंटिफिक पुराने सैटेलाइट को सुरक्षित तरीकों से हटाने के लिए कॉन्स्टैंट नए सैटेलाइट और समुद्र तट पर काम कर रहे हैं, ताकि अंतरिक्ष को साफ और सुरक्षित रखा जा सके।
Satya Nadella ने Shantanu Narayen के इस्तीफे पर कहा- आपने दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर कंपनियों में से एक बनाई

नई दिल्ली। टेक जगत की दिग्गज कंपनी एडोब के लंबे समय तक सीईओ रहे शांतनु नारायण के पद से हटने की घोषणा के बाद उद्योग जगत से उन्हें कॉन्स्टैंट एजेंट मिल रही है। सत्या नडेला ने भी उनके योगदान की सराहना करते हुए कहा कि वे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण प्राइवेट लिमिटेड में से एक को नई ऊंचाई तक हासिल कर चुके हैं। लगभग दो दशक तक कंपनी का नेतृत्व करने के बाद नारायण के पद छोड़ने की खबर ने ग्लोबल टेक इंडस्ट्री का ध्यान खींचा है। नडेला बोले-आपने बनाया दुनिया की अहम कंपनी में से एकमाइक्रोसॉफ्ट के सीईओ और सीईओ सत्य नडेला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए शांतनु नारायण को उनके शानदार पद के लिए बधाई दी। नेडेला ने लिखा है कि एडोब में उनके नेतृत्व का दौर बेहद प्रभावशाली रहा है और उन्होंने ऐसी सॉफ्टवेयर कंपनी का निर्माण किया है जो दुनिया भर के निर्माता, प्रशिक्षण और उद्यम के लिए नई स्टैमिना के दरवाजे खोल रहे हैं। नेडेला ने यह भी कहा कि शांतनु की उत्तेजित सोच और नेतृत्व शैली उन्हें हमेशा प्रेरित करती रहती है। उन्होंने कहा कि एक लीडर के रूप में नारायण ने जिस तरह का उदाहरण पेश किया, वह पूरे उद्योग के लिए मार्गदर्शक है। करीब दो दशक बाद सीईओ पद से विदाईएडोब ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि शांतनु नारायण 18 साल तक कंपनी का नेतृत्व करने के बाद सीईओ पद से हट रहे हैं। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट कर दिया है कि नए सीईओ की नियुक्ति नारायण की भूमिका में होगी। इसके बाद वह कंपनी से जुड़े सहयोगियों और बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया में सहयोग करेंगे।कंपनी ने नए सीईओ की खोज के लिए एक विशेष समिति का गठन किया है, जिसमें आंतरिक और बाहरी दोनों मिलकर विचार करेंगे। इस प्रक्रिया की निगरानी कंपनी के बोर्ड का होना। बोर्ड ने भी की अगुवाई और बदलाव की जिम्मेदारी संभालीएडोब के प्रमुख स्वतंत्र निदेशक फ्रैंक काल्डेरोनी ने कहा कि शांतनु नारायण ने पिछले कई वर्षों में कंपनी को परिवर्तन के दौर से आसानी से आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि नारायण ने एडोब को पारंपरिक सॉफ्टवेयर कंपनी से लेकर आधुनिक डिजिटल और आर्किटेक्चर आधारित प्लेटफॉर्म में अहम भूमिका निभाई है।उनके नेतृत्व वाली कंपनी ने फ्यूचर की टेक्नॉलजी को बोल्ट और डिजिटल टैलेंट और कस्टमर एक्सपीरियंस के क्षेत्र में खुद को ग्लोबल लीडर के रूप में स्थापित किया। थिएटर स्टूडियो से क्लाउड प्लेटफ़ॉर्म तक का सफरशांतनु नारायण के नेतृत्व में एडोब ने अपने बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव किया। कंपनी ने पारंपरिक सैद्धांतिक सॉफ़्टवेयर की रणनीति से हटकर प्लॉट आधारित क्लाउड प्लेटफ़ॉर्म की दिशा में कदम बढ़ाया। इस बदलाव से कंपनी की आय और बाजार में दोनों की स्थिति मजबूत हुई।कंपनी के प्रमुख उत्पाद जैसे Adobe Photoshop, Adobe Acrobat और Adobe Creative Cloud आज दुनिया भर में क्रिएटर्स, डिज़ाइनर, कंपनी और डिजिटल प्रकाशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण टूल बन गए हैं। 3,000 से 30,000 तक कर्मचारीअपने लंबे कार्यकाल को याद करते हुए शांतनु नारायण ने कहा था कि जब उन्हें कंपनी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, तब एडोब में करीब 3,000 कर्मचारी थे, जो अब लगभग 30,000 हो गए हैं। उन्होंने बताया कि इस दौरान कंपनी का राजस्व 1 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 25 अरब डॉलर तक पहुंच गया।नारायण ने कहा कि एडोब ने अपने उद्देश्य के लिए ऐसी तकनीक विकसित नहीं की, बल्कि उनके द्वारा बनाए गए डिजिटल उपकरणों से अरबों लोग प्रभावित हुए। यही कारण है कि आज एडोब डिजिटल प्रतिभा और ग्राहक अनुभव के क्षेत्र में दुनिया की अग्रणी कंपनी गिनी है।
ऑनलाइन पायरेसी पर कार्रवाई, सरकार ने Telegram के 3,100+ चैनलों को किया चिन्हित

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने पायरेटेड कंटेंट के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Telegram को नोटिस जारी किया है। Ministry of Information and Broadcasting ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत यह नोटिस जारी कर प्लेटफॉर्म से कॉपीराइट का उल्लंघन करने वाली सामग्री हटाने और पायरेसी के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की शिकायत के बाद कार्रवाईयह कदम कई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की शिकायतों के बाद उठाया गया है। इनमें JioCinema और Amazon Prime Video जैसे प्लेटफॉर्म्स शामिल हैं, जिन्होंने आरोप लगाया कि उनकी फिल्मों और वेब सीरीज की पायरेटेड कॉपियां टेलीग्राम पर बड़े पैमाने पर साझा की जा रही हैं। 3,142 चैनलों की पहचानशिकायतों की जांच के बाद अधिकारियों ने कुल 3,142 ऐसे टेलीग्राम चैनलों की पहचान की, जो कथित तौर पर फिल्मों, वेब सीरीज और अन्य कॉपीराइट सामग्री की अवैध कॉपियां शेयर कर रहे थे। सरकार ने टेलीग्राम से इन चैनलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और पायरेटेड कंटेंट हटाने को कहा है। टेलीग्राम फीचर्स का दुरुपयोगरिपोर्ट्स के अनुसार टेलीग्राम की कुछ सुविधाओं, जैसे बड़ी फाइल शेयरिंग की सीमा और यूजर्स की पहचान छिपाने की क्षमता का कुछ लोगों ने गलत इस्तेमाल किया। इन सुविधाओं का उपयोग कर बड़ी संख्या में पायरेटेड कंटेंट को साझा किया गया, जिससे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को भारी नुकसान होने की आशंका जताई गई है।हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी कार्रवाईयह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अश्लील कंटेंट स्ट्रीम करने के आरोप में पांच ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाया था। इनमें मूडएक्सवीआईपी, कोयल प्लेप्रो, डिजी मूवीप्लेक्स, फील और जुगनू जैसे प्लेटफॉर्म शामिल थे। पहले भी ब्लॉक किए गए कई प्लेटफॉर्मइससे पहले जुलाई 2025 में भी सरकार ने 25 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की वेबसाइट और ऐप्स को ब्लॉक करने का आदेश दिया था। इन प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील, अभद्र या पोर्नोग्राफिक कंटेंट स्ट्रीम करने के आरोप लगे थे। आईटी नियमों के तहत सख्त प्रावधानInformation Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 के तहत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को अश्लील, पोर्नोग्राफिक, गोपनीयता का उल्लंघन करने वाले, लैंगिक या जातीय आधार पर अपमानजनक और हिंसा या नफरत फैलाने वाले कंटेंट को होस्ट या प्रकाशित करने की अनुमति नहीं है। ऑनलाइन पायरेसी पर रोक की कोशिशसरकार की यह नई कार्रवाई ऑनलाइन पायरेसी पर रोक लगाने और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अवैध या आपत्तिजनक कंटेंट को नियंत्रित करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा मानी जा रही है। सरकार का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को कानून के अनुसार जिम्मेदारी निभानी होगी और कॉपीराइट नियमों का पालन करना होगा।
Antarctica की बर्फ के नीचे अनोखी अन्टर-सी झील, वैज्ञानिकों को मिले प्राचीन जीवन के संकेत

नई दिल्ली। धरती के सबसे ठंडे और रहस्यमयी महाद्वीप Antarctica में स्थित Lake Untersee दुनिया की सबसे अनोखी झीलों में से एक मानी जाती है। यह झील Queen Maud Land के ग्रुबर पर्वतों के पास अनुचिन ग्लेशियर के किनारे स्थित है। अत्यधिक ठंड के कारण यह झील पूरे साल मोटी बर्फ की परत से ढकी रहती है। यहां का औसत वार्षिक तापमान शून्य से लगभग 10 डिग्री सेल्सियस नीचे रहता है। कठिन और बेहद ठंडे वातावरण के बावजूद यह झील वैज्ञानिकों के लिए किसी प्राकृतिक प्रयोगशाला से कम नहीं है, क्योंकि इसके अंदर ऐसे जीवन के संकेत मिलते हैं जो अरबों साल पुराने हो सकते हैं। उपग्रह से मिली झील की नई तस्वीरहाल ही में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA के Landsat 9 उपग्रह में लगे ओएलआई सेंसर ने 16 फरवरी 2026 को अंटार्कटिका की गर्मियों के दौरान इस झील की तस्वीर ली। इस तस्वीर में बर्फ से ढकी झील और उसके आसपास का ठंडा व बंजर परिदृश्य साफ दिखाई देता है। वैज्ञानिकों के अनुसार झील का अधिकांश पानी पास स्थित अनुचिन ग्लेशियर के मौसमी पिघलाव से आता है। सूरज की रोशनी बर्फ की परत से होकर नीचे पानी तक पहुंचती है और उसे थोड़ा गर्म करती है, लेकिन तेज हवाएं और बेहद ठंडी सतह वाष्पीकरण और सब्लिमेशन की प्रक्रिया को तेज कर देती हैं। इसी कारण झील की सतह पर बर्फ ज्यादा नहीं पिघलती। झील की गहराई और अनोखी रासायनिक संरचनानासा की वेबसाइट के अनुसार इस झील की अधिकतम गहराई लगभग 558 फीट तक मापी गई है। इसकी सबसे खास बात इसके पानी की अनोखी रासायनिक संरचना है। झील में घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर काफी ज्यादा है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बहुत कम पाई जाती है। इसके अलावा झील का पीएच स्तर काफी एल्कलाइन यानी क्षारीय है। दुनिया में बहुत कम झीलें ऐसी हैं जो पूरे साल जमी रहती हैं और जिनमें बड़े आकार के स्ट्रोमेटोलाइट्स पाए जाते हैं। यही वजह है कि यह झील वैज्ञानिकों के लिए विशेष महत्व रखती है। 3 अरब साल पुराने जीवन का संकेतइस झील में पाए जाने वाले स्ट्रोमेटोलाइट्स दरअसल सूक्ष्मजीवों द्वारा बनाई गई संरचनाएं होती हैं। इन्हें फोटोसिंथेटिक साइनोबैक्टीरिया बनाते हैं, जो चिपचिपी सतह पर तलछट को फंसा कर कैल्शियम कार्बोनेट की परतें बनाते हैं। समय के साथ ये संरचनाएं ऊपर की ओर बढ़ती जाती हैं और ऑक्सीजन छोड़ती हैं। वर्ष 2011 में Dale Andersen और उनकी टीम ने यहां इन विशाल स्ट्रोमेटोलाइट्स की खोज की थी। इनकी ऊंचाई लगभग आधा मीटर तक हो सकती है, जबकि अंटार्कटिका की अन्य झीलों जैसे Lake Joyce में ये केवल कुछ सेंटीमीटर ऊंचे पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये संरचनाएं पृथ्वी पर 3 अरब साल पहले मौजूद शुरुआती जीवन की झलक दिखाती हैं। कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने वाले जीवइस झील में बड़े जीवों के रूप में टार्डिग्रेड्स पाए जाते हैं, जिन्हें दुनिया के सबसे मजबूत जीवों में गिना जाता है। ये बेहद कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि झील के साफ पानी, कम तलछट, सीमित रोशनी और बर्फ की मोटी परत के कारण यहां स्ट्रोमेटोलाइट्स असामान्य रूप से बड़े आकार में विकसित हो पाते हैं। यही कारण है कि यह झील सूक्ष्मजीवों के अध्ययन के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भी अहमएस्ट्रोबायोलॉजिस्ट इस झील को अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाओं को समझने के लिए एक मॉडल के रूप में देखते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह झील Europa और Enceladus जैसे बर्फीले चंद्रमाओं या Mars पर कभी मौजूद रही प्राचीन बर्फीली झीलों के अध्ययन के लिए उपयोगी उदाहरण हो सकती है। इन जगहों पर भी बर्फ के नीचे पानी और सूक्ष्मजीवी जीवन की संभावना जताई जाती है। झील में अचानक आने वाले बदलावहालांकि यह झील बाहर से स्थिर दिखाई देती है, लेकिन इसके भीतर कभी-कभी बड़े बदलाव भी होते हैं। वर्ष 2019 में University of Ottawa के वैज्ञानिकों की एक टीम ने यहां विस्तृत फील्ड रिसर्च की थी। ICESat-2 के डेटा से पता चला कि पास की Lake Obersee के फटने से लगभग 1.75 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी अचानक इस झील में आ गया था। इस घटना से झील के पीएच स्तर और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बदलाव आया, जिससे सूक्ष्मजीवी जीवन की गतिविधियों में वृद्धि देखी गई। पर्यावरण के लिए चेतावनी भीवैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियल झीलों के अचानक फटने से आने वाली ऐसी बाढ़ अंटार्कटिका के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए इस क्षेत्र में लगातार निगरानी और शोध की जरूरत है। इसके बावजूद लेक अन्टरसी आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्यमयी और अनमोल प्राकृतिक प्रयोगशाला बनी हुई है, जहां पृथ्वी के शुरुआती जीवन के रहस्यों को समझने की नई संभावनाएं छिपी हुई हैं।
एलन मस्क का मास्टरस्ट्रोक, अब सोशल मीडिया पर ही आएगी सैलरी!

वाशिंगटन। क्या आपने कभी सोचा है कि जिस ऐप पर आप दुनिया भर की खबरें पढ़ते हैं उसी ऐप से अपने दोस्तों को पैसा भेज सकेंगे या अपनी ग्रोसरी का पेमेंट कर सकेंगे? दुनिया के सबसे अमीर आदमी एलन मस्क ने जिस एवरीथिंग ऐप का सपना ट्विटर खरीदते समय देखा था, वह अब हकीकत बनने जा रहा है. मस्क अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर नया फीचर X Money लाने जा रहे हैं. Visa जैसी दिग्गज कंपनी के साथ हाथ मिलाकर मस्क ने साबित कर दिया है कि X अब केवल एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं बल्कि एक फाइनेंशियल पावरहाउस बनने की राह पर है. अगले महीने से शुरू हो रहे इसके पब्लिक एक्सेस के साथ ही डिजिटल पेमेंट की दुनिया में बड़ा बदलाव होने की उम्मीद है. क्या है X Money? X Money एक इन-ऐप पेमेंट सिस्टम है. यानी अब आपको पैसे भेजने या पेमेंट करने के लिए X से दूसरे ऐप पर जाने की जरूरत नहीं होगी. इस सर्विस के जरिए यूजर्स एक-दूसरे को पैसे ट्रांसफर कर सकेंगे और प्लेटफॉर्म पर ही पैसों का लेनदेन कर सकेंगे. मस्क अपने प्लेटफॉर्म X के साथ-साथ बैंकिंग और पेमेंट फीचर्स को एक ही जगह लाना चाहते हैं. Visa के साथ मिलाया हाथ पेमेंट सर्विस को सेफ और ग्लोबल स्टैंडर्ड के अनुसार बनाने के लिए X ने पेमेंट कंपनी Visa के साथ हाथ मिलाया है. इस पार्टनरशिप से यह फायदा होगा कि एवरीथिंग ऐप बनाना चाहते हैं मस्क एलन मस्क ने 2022 में 44 अरब डॉलर में ट्विटर खरीदने के बाद से ही इस प्लेटफॉर्म को चैटिंग ऐप तक सीमित नहीं रखना चाहते थे. वे इसे चीन के वीचैट की ही तरह बनाना चाहते हैं जहां मैसेजिंग, वीडियो, स्ट्रीमिंग और बैंकिंग सब कुछ एक ही जगह हो. X Money इसी विजन का एक हिस्सा माना जा रहा है. X का यूजर बेस पूरी दुनिया में फैला है इसलिए X Money का आना ग्लोबल रेमिटेंस यानी विदेशों से पैसा भेजने के तरीके को भी पूरी तरह से बदल सकता है. भारत जैसे देश में जहां UPI पहले से लोकप्रिय है, X के लिए अपनी जगह बनाना चुनौतीपूर्ण होगा.
नया AC लेने जा रहे हैं तो पहले समझें Inverter और Non Inverter AC का अंतर वरना हो सकता है नुकसान

नई दिल्ली :गर्मी का मौसम नजदीक आते ही घरों और दफ्तरों में एयर कंडीशनर की मांग तेजी से बढ़ने लगती है। तापमान बढ़ने के साथ ही लोग नया AC खरीदने की योजना बनाने लगते हैं। बाजार में इस समय मुख्य रूप से दो तरह के एयर कंडीशनर सबसे ज्यादा बिक रहे हैं जिनमें इनवर्टर AC और नॉन इनवर्टर AC शामिल हैं। अक्सर लोग कीमत या किसी ऑफर को देखकर AC खरीद लेते हैं लेकिन इन दोनों तकनीकों के बीच के असली अंतर को समझ नहीं पाते। यही वजह है कि AC खरीदने से पहले इन दोनों तकनीकों की कार्यप्रणाली और उनके फायदे नुकसान को समझना बेहद जरूरी हो जाता है। इनवर्टर AC को आधुनिक तकनीक पर आधारित एयर कंडीशनर माना जाता है। इस तकनीक में लगा कंप्रेसर कमरे के तापमान के अनुसार अपनी स्पीड को कम या ज्यादा कर सकता है। जब कमरे का तापमान सेट किए गए स्तर के करीब पहुंच जाता है तब कंप्रेसर बंद नहीं होता बल्कि धीमी गति से लगातार चलता रहता है। इससे कमरे का तापमान स्थिर बना रहता है और बार बार मशीन के ऑन ऑफ होने की जरूरत नहीं पड़ती। इस तकनीक की वजह से इनवर्टर AC अधिक स्मूद कूलिंग देता है और बिजली की खपत भी नियंत्रित रहती है। दूसरी ओर नॉन इनवर्टर AC पारंपरिक तकनीक पर आधारित होते हैं। इसमें लगा कंप्रेसर केवल दो स्थितियों में काम करता है या तो वह पूरी तरह चालू रहता है या फिर पूरी तरह बंद हो जाता है। जब तक कमरे का तापमान तय स्तर तक नहीं पहुंचता तब तक कंप्रेसर पूरी क्षमता से चलता रहता है। जैसे ही कमरा ठंडा हो जाता है कंप्रेसर बंद हो जाता है और तापमान बढ़ने पर फिर से चालू हो जाता है। इसी कारण नॉन इनवर्टर AC में बार बार ऑन ऑफ की प्रक्रिया चलती रहती है। बिजली की खपत के मामले में इनवर्टर AC को ज्यादा बेहतर माना जाता है। इसमें कंप्रेसर जरूरत के अनुसार अपनी स्पीड को एडजस्ट करता है जिससे बिजली की खपत कम हो सकती है। अगर किसी घर या ऑफिस में AC का इस्तेमाल लंबे समय तक किया जाता है तो इनवर्टर AC बिजली के बिल को नियंत्रित रखने में मददगार साबित हो सकता है। इसके विपरीत नॉन इनवर्टर AC हर बार पूरी क्षमता से काम करता है इसलिए इसमें बिजली की खपत अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकती है। कूलिंग की बात करें तो दोनों तरह के AC अच्छी कूलिंग देने में सक्षम होते हैं। हालांकि बड़ी जगह को तेजी से ठंडा करने के लिए नॉन इनवर्टर AC बेहतर माना जाता है क्योंकि इसका कंप्रेसर पूरी क्षमता से काम करता है। वहीं इनवर्टर AC लगातार और संतुलित कूलिंग देने में बेहतर होता है जिससे कमरे का तापमान लंबे समय तक स्थिर बना रहता है। AC की लाइफ और मेंटेनेंस के मामले में दोनों ही विकल्प अच्छी अवधि तक चल सकते हैं। हालांकि इनवर्टर AC में कंप्रेसर को नियंत्रित करने के लिए PCB यानी इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल बोर्ड लगा होता है इसलिए अगर इसमें खराबी आती है तो मरम्मत का खर्च थोड़ा ज्यादा हो सकता है। दूसरी ओर नॉन इनवर्टर AC की तकनीक अपेक्षाकृत सरल होती है इसलिए इसके पार्ट्स आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं और इसे ठीक कराना भी आसान और सस्ता माना जाता है। आप बिजली की बचत और लगातार कूलिंग चाहते हैं तो इनवर्टर AC बेहतर विकल्प हो सकता है। वहीं अगर आप कम कीमत में AC खरीदना चाहते हैं और इसका इस्तेमाल सीमित समय के लिए करते हैं तो नॉन इनवर्टर AC भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है।