Chambalkichugli.com

Chrome का बड़ा अपडेट: यूज़र्स की Exact Location होगी सुरक्षित

नई दिल्ली। Google Chrome का नया प्राइवेसी फीचर अब Android यूजर्स के लिए जारी किया गया है जिसमें वेबसाइट्स को आपकी सटीक लोकेशन की जगह केवल अनुमानित लोकेशन दिखाई देगी। इस बदलाव के बाद जब भी कोई यूजर किसी वेबसाइट को लोकेशन एक्सेस देगा तो वह खुद चुन सकेगा कि उसे Exact Location शेयर करनी है या Approximate Location, जिससे यूजर की प्राइवेसी पहले से ज्यादा सुरक्षित हो जाएगी। यह फीचर खास तौर पर इसलिए लाया गया है क्योंकि कई वेबसाइट्स को पूरी सटीक लोकेशन की जरूरत नहीं होती जैसे मौसम या लोकल जानकारी वाली साइट्स। इस अपडेट का मुख्य उद्देश्य यूजर्स की प्राइवेसी को मजबूत करना और अनावश्यक डेटा शेयरिंग को कम करना है। अब वेबसाइट्स केवल आपका आसपास का एरिया या शहर जान पाएंगी, पूरा एड्रेस या GPS लोकेशन नहीं। इसके बावजूद कुछ जरूरी सेवाओं जैसे नेविगेशन या डिलीवरी ऐप्स में जरूरत पड़ने पर Exact Location का विकल्प भी उपलब्ध रहेगा। यह फीचर फिलहाल Android Chrome में शुरू किया गया है और आने वाले समय में इसे अन्य डिवाइस पर भी लाया जा सकता है। इस बदलाव से यूजर्स को कई फायदे मिलेंगे जैसे कि उनकी लोकेशन की सुरक्षा बढ़ेगी, ट्रैकिंग कम सटीक होगी और उन्हें यह कंट्रोल मिलेगा कि वे कितना डेटा शेयर करना चाहते हैं। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह फीचर लोकेशन को पूरी तरह बंद नहीं करता बल्कि सिर्फ उसकी सटीकता को कम करता है। कुल मिलाकर Google Chrome का यह नया प्राइवेसी फीचर यूजर्स को ज्यादा सुरक्षित और नियंत्रित ब्राउजिंग अनुभव देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है जिससे इंटरनेट इस्तेमाल पहले से अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बन जाएगा।

RO Filter Scam Alert: बिना जांच हर 6 महीने फिल्टर बदलवाना पड़ सकता है बड़ा नुकसान

नई दिल्ली। घर-घर में RO (रिवर्स ऑस्मोसिस) वॉटर प्यूरीफायर आज एक जरूरत बन चुका है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है क्या हर 6 महीने में RO फिल्टर बदलना सच में जरूरी है या फिर यह एक सर्विस स्कैम है? कई बार सर्विस टेक्नीशियन बिना किसी जांच के फिल्टर बदलने की सलाह देते हैं और लोगों को डराते हैं कि पुराना फिल्टर इस्तेमाल करने से बीमारी हो सकती है। लेकिन सच्चाई यह है कि हर बार फिल्टर बदलना जरूरी नहीं होता, यह पूरी तरह पानी की क्वालिटी और मशीन की स्थिति पर निर्भर करता है। RO सिस्टम में मुख्य रूप से सेडिमेंट फिल्टर, कार्बन फिल्टर, RO मेम्ब्रेन और कभी-कभी UF फिल्टर लगे होते हैं। सेडिमेंट फिल्टर पानी में मौजूद धूल और मिट्टी के कण रोकता है, जबकि कार्बन फिल्टर गंध और क्लोरीन हटाता है। RO मेम्ब्रेन सबसे अहम हिस्सा होता है, जो पानी से घुले हुए साल्ट्स, भारी धातु और हानिकारक तत्व हटाता है। इन सभी की लाइफ अलग-अलग होती है और इन्हें समय से पहले बदलना हमेशा जरूरी नहीं होता। अक्सर देखा गया है कि कुछ कंपनियां या सर्विस एजेंट हर 5–6 महीने में पूरे फिल्टर सेट बदलने का दबाव बनाते हैं। अगर ग्राहक सवाल न करे तो अतिरिक्त पैसे वसूले जाते हैं। जबकि असलियत यह है कि फिल्टर बदलने का सही तरीका जांच पर आधारित होना चाहिए, न कि तय समय पर। आप खुद भी आसानी से जांच सकते हैं कि फिल्टर बदलने की जरूरत है या नहीं। इसके लिए सबसे जरूरी टूल है TDS मीटर। अगर RO से निकलने वाले पानी का TDS 50 से 150 के बीच है, तो इसका मतलब है कि मेम्ब्रेन ठीक काम कर रही है और पानी पीने योग्य है। ऐसे में तुरंत फिल्टर बदलने की कोई जरूरत नहीं होती। दूसरा तरीका है पानी के स्वाद और गंध को समझना। अगर पानी का स्वाद अचानक बदल जाए, उसमें बदबू आने लगे या रंग में बदलाव दिखे, तभी फिल्टर खराब होने की संभावना होती है। इसके अलावा अगर RO से पानी बहुत धीमी गति से आने लगे या टंकी भरने में ज्यादा समय लगे, तो यह सेडिमेंट फिल्टर या मेम्ब्रेन जाम होने का संकेत हो सकता है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्विस के दौरान हमेशा पुराने फिल्टर को खुद देखकर ही बदलने दें। अगर फिल्टर बहुत ज्यादा काला या जाम दिखे तभी उसे बदलना सही है। कई बार हल्के गंदे फिल्टर भी बदले जाते हैं, जो अभी काम कर सकते हैं। कंपनी के सर्विस मैनुअल में भी हर फिल्टर की लाइफ दी होती है। उसी के आधार पर फैसला लेना चाहिए। अगर कोई टेक्नीशियन बिना जांच के जल्दी-जल्दी बदलाव की सलाह दे रहा है, तो उससे सवाल जरूर करें। RO की लाइफ बढ़ाने के लिए समय-समय पर टैंक की सफाई करें, इनपुट पानी अगर ज्यादा गंदा है तो प्री-फिल्टर लगवाएं और मशीन को लगातार 24 घंटे चालू न रखें। इससे फिल्टर लंबे समय तक चलते हैं और अनावश्यक खर्च से बचा जा सकता है। निष्कर्ष यही है कि RO फिल्टर बदलना एक तकनीकी जरूरत है, न कि तय समय पर होने वाला नियम। सही जानकारी और थोड़ी सावधानी से आप फर्जी सर्विस और बेवजह खर्च से खुद को बचा सकते हैं।

QR कोड बनाम CAPTCHA: गूगल का नया वेरिफिकेशन सिस्टम कितना सुरक्षित, प्राइवेसी को लेकर उठे सवाल

नई दिल्ली। वेबसाइट्स पर अब तक इंसान और बॉट में फर्क करने के लिए CAPTCHA (जैसे कार, साइकिल पहचानना या कोड भरना) का इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन अब एक नए तरीके की चर्चा तेज हो गई है जिसमें QR कोड स्कैन करके यूजर को वेरिफाई किया जाएगा। इस नए सिस्टम में यूजर को अपने मोबाइल से QR कोड स्कैन करना होगा, जिसके बाद गूगल प्ले सर्विसेज के जरिए डिवाइस की जानकारी वेरीफिकेशन के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह प्रक्रिया CAPTCHA की जगह एक आसान विकल्प के रूप में लाई जा सकती है, लेकिन इसके साथ प्राइवेसी को लेकर चिंताएं भी बढ़ गई हैं। आशंका जताई जा रही है कि QR कोड स्कैन करने के बाद यूजर की डिवाइस और एक्टिविटी डेटा गूगल सिस्टम से लिंक हो सकता है, जिससे यह पता चल सकता है कि यूजर कौन सी वेबसाइट्स विजिट कर रहा है। हालांकि अभी तक गूगल की ओर से इस फीचर को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन टेक कम्युनिटी में चर्चा है कि इसके लिए एंड्रॉयड डिवाइस में गूगल प्ले सर्विस का अपडेटेड वर्जन जरूरी हो सकता है। इससे यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या यह सिस्टम वाकई सुरक्षा बढ़ाएगा या यूजर की प्राइवेसी पर असर डालेगा। कुल मिलाकर, यह नया सिस्टम अगर लागू होता है तो इंटरनेट सिक्योरिटी में बड़ा बदलाव ला सकता है, लेकिन इसके साथ डेटा प्राइवेसी और ट्रैकिंग को लेकर बहस भी तेज होना तय है।

AI को अब सिखाई जाएगी नैतिकता! धर्मगुरुओं की शरण में पहुंचीं OpenAI और Anthropic, इंसानों जैसा ‘सही-गलत’ सिखाने की तैयारी

नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ तकनीक का नहीं, बल्कि नैतिकता और मानवीय मूल्यों का भी बड़ा विषय बनता जा रहा है। यही वजह है कि दुनिया की दिग्गज AI कंपनियां अब धर्म और अध्यात्म की ओर रुख कर रही हैं। OpenAI और Anthropic जैसी कंपनियां हिंदू, सिख और बौद्ध धर्मगुरुओं के साथ मिलकर यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि AI को सही और गलत का फर्क कैसे सिखाया जाए, ताकि भविष्य का AI इंसानी समाज के लिए सुरक्षित और जिम्मेदार बन सके। हाल ही में न्यूयॉर्क में आयोजित ‘Faith-AI Covenant Roundtable’ में हिंदू टेंपल सोसाइटी ऑफ नॉर्थ अमेरिका, सिख कोएलिशन और बौद्ध समुदाय के प्रतिनिधियों समेत कई धार्मिक नेताओं ने हिस्सा लिया। इस बैठक का आयोजन जिनेवा स्थित इंटरफेथ एलायंस ने किया था। चर्चा का मुख्य उद्देश्य यह था कि धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्य AI के व्यवहार और निर्णय लेने की क्षमता को किस तरह बेहतर बना सकते हैं। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि AI अब केवल डेटा और एल्गोरिद्म तक सीमित नहीं रह गया है। आने वाले समय में AI इंसानी जीवन के हर हिस्से में शामिल होगा, इसलिए उसे नैतिक फैसले लेने की समझ भी होनी चाहिए। यही कारण है कि Anthropic जैसी कंपनियों ने दार्शनिकों और धर्मगुरुओं की मदद से अपने AI मॉडल के लिए “Claude Constitution” जैसे नैतिक नियम तैयार किए हैं। कंपनियों का मानना है कि हजारों वर्षों से धर्म मानव समाज को नैतिकता, करुणा, संतुलन और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाते आए हैं। ऐसे में AI को भी इन मूल्यों से जोड़ना जरूरी हो गया है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अलग-अलग धर्मों के मूल्य और दृष्टिकोण अलग हो सकते हैं, इसलिए AI के लिए सार्वभौमिक नैतिक नियम तैयार करना आसान नहीं होगा। धार्मिक संगठनों ने भी साफ किया है कि AI कभी इंसानी चेतना या ईश्वरीय ज्ञान की जगह नहीं ले सकता, लेकिन यह शिक्षा, मार्गदर्शन और समाज कल्याण का मजबूत माध्यम जरूर बन सकता है। न्यूयॉर्क के बाद अब बीजिंग, नैरोबी और अबू धाबी में भी ऐसी चर्चाओं की तैयारी की जा रही है, ताकि AI तकनीक को अधिक जिम्मेदार, सुरक्षित और मानवता के हित में विकसित किया जा सके।

Gmail में Username डालते ही कैसे पता चलता है Already Taken Google की हाई-स्पीड टेक्नोलॉजी का पूरा सच

नई दिल्ली। जब भी आप नया जीमेल अकाउंट बनाने के लिए कोई यूजरनेम डालते हैं और तुरंत उपयोगकर्ता नाम पहले ही लिया जा चुका है का मैसेज आ जाता है, तो यह किसी जादू से कम नहीं लगता। लेकिन इसके पीछे गूगल की बेहद एडवांस टेक्नोलॉजी और हाई-स्पीड सिस्टम काम करता है, जो कुछ ही मिलीसेकंड में रिजल्ट दिखा देता है। असल में गूगल आपके यूज़रनेम  को पूरे सिस्टम में ढूंढने के लिए अलग-अलग हिस्सों में बंटे बड़े डेटाबेस का इस्तेमाल करता है। इसे वितरित डेटाबेस प्रणाली कहा जाता है, जिसमें डेटा एक ही जगह नहीं बल्कि दुनिया भर के कई सर्वर (Data Centers) में स्टोर रहता है। जैसे ही आप कोई नाम डालते हैं, कई सर्वर एक साथ काम शुरू कर देते हैं और तुरंत चेक कर लेते हैं कि वह नाम पहले से मौजूद है या नहीं। Cache सिस्टम कैसे करता है कामगूगल बार-बार इस्तेमाल होने वाले usernames को Cache Memory में भी रखता है। यह एक तरह की सुपर फास्ट मेमोरी होती है, जहां अक्सर सर्च किए जाने वाले नाम पहले से सेव रहते हैं। इससे सिस्टम को हर बार पूरे डेटाबेस में खोज करने की जरूरत नहीं पड़ती और रिजल्ट तुरंत मिल जाता है। स्मार्ट इंडेक्सिंग का कमालGoogle अपने पूरे डेटा को एक स्मार्ट इंडेक्स सिस्टम की तरह मैनेज करता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी लाइब्रेरी में किताबें अलग-अलग सेक्शन में रखी होती हैं। इससे सिस्टम सीधे सही जगह पहुंच जाता है, और पूरा डेटा स्कैन नहीं करना पड़ता। कुछ नाम पहले से ब्लॉक क्यों होते हैंटेक एक्सपर्ट्स के मुताबिक, Google कुछ usernames को पहले से रिजर्व या ब्लॉक भी कर देता है। इसमें बड़े ब्रांड्स के नाम, सेलिब्रिटी नाम और स्पैम से जुड़े शब्द शामिल होते हैं, ताकि फर्जी अकाउंट और धोखाधड़ी को रोका जा सके। इतनी तेजी कैसे संभव हैगूगल के हजारों डेटा सेंटर और करोड़ों सर्वर मिलकर एक साथ काम करते हैं, जिससे Gmail जैसे प्लेटफॉर्म पर username चेकिंग एक सेकंड से भी कम समय में हो जाती है। यही वजह है कि यूजर को तुरंत पता चल जाता है कि नाम उपलब्ध है या नहीं।जीमेल में पहले से ही लिया जा चुका है मैसेज किसी साधारण चेकिंग का नतीजा नहीं है, बल्कि यह गूगल के बेहद तेज, स्मार्ट और मल्टी-लेयर डेटा सिस्टम का कमाल है, जो अरबों यूजर्स को बिना किसी देरी के सेवा देता है।

YouTube Shorts पर बड़ा कंट्रोल: नई सेटिंग से मोबाइल फीड से हट सकते हैं शॉर्ट वीडियो, ऐसे करें बंद

नई दिल्ली। अगर आप यूट्यूब पर लगातार शॉर्ट्स  देखकर समय बर्बाद करने की आदत से परेशान हैं, तो अब इसका समाधान मिल सकता है। यूट्यूब ने एक नया फीचर या सेटिंग विकल्प दिया है, जिसकी मदद से यूजर्स अपने मोबाइल ऐप पर शॉर्ट्स को सीमित या लगभग बंद कर सकते हैं। इस सेटिंग का उद्देश्य डिजिटल वेल-बीइंग को बढ़ावा देना है, ताकि यूजर्स अनावश्यक स्क्रॉलिंग से बच सकें। कई यूजर्स खासकर पैरेंट्स इस फीचर को बच्चों की स्क्रीन टाइम आदत नियंत्रित करने के लिए उपयोगी मान रहे हैं। कैसे काम करता है यह फीचरYouTube ऐप में शॉर्ट्स फ़ीड लिमिट या समान नाम का विकल्प दिया गया है, जिसमें यूजर अपने शॉर्ट्स देखने के समय को मैनेज कर सकता है। इसमें डेली लिमिट सेट करने का विकल्प होता है, जिसे कम या जीरो तक सेट करने पर Shorts फीड काफी हद तक बंद हो सकती है। सेटिंग बदलने के बाद ऐप को रीस्टार्ट करना जरूरी होता है, ताकि बदलाव लागू हो सके। पैरेंट्स के लिए खास सुविधायह फीचर गूगल और YouTube फ़ैमिली सेंटर से जुड़े टीन अकाउंट्स में और ज्यादा कंट्रोल देता है। पैरेंट्स बच्चों के अकाउंट में Shorts देखने की लिमिट सेट कर सकते हैं, जिसे बच्चे आसानी से बदल नहीं सकते। किन डिवाइस पर उपलब्धयह फीचर फिलहाल केवल यूट्यूब मोबाइल ऐप (Android और iOS) पर ही उपलब्ध है। अभी तक इसे डेस्कटॉप और स्मार्ट टीवी वर्जन पर लागू नहीं किया गया है। नई यूट्यूब सेटिंग उपयोगकर्ता को शॉर्ट्स की आदत पर बेहतर कंट्रोल देती है और अनावश्यक स्क्रॉलिंग को कम करने में मदद कर सकती है। हालांकि इसका असर यूजर सेटिंग और ऐप वर्जन पर निर्भर करता है।

MacBook Neo पर बड़ा ऑफर: Apple का सबसे सस्ता लैपटॉप हुआ और सस्ता, Amazon सेल में मिल रही भारी छूट

नई दिल्ली। एप्पल का एंट्री-लेवल मैकबुक नियो अब पहले से भी सस्ता हो गया है। मार्च में लॉन्च हुए इस लैपटॉप पर पहली बार बड़ा डिस्काउंट देखने को मिल रहा है, जिससे यूजर्स को हजारों रुपये की सीधी बचत का मौका मिल रहा है। ऑनलाइन सेल में यह ऑफर खासतौर परअमेज़न पर उपलब्ध है। कंपनी ने मैकबुक नियो को बजट सेगमेंट में उतारते हुए इसे हल्का, तेज और पावरफुल बनाने की कोशिश की है। इसमें Apple का A18 Pro चिपसेट दिया गया है, जो 5-कोर GPU के साथ आता है। Apple का दावा है कि यह कई Intel Core Ultra 5 लैपटॉप्स की तुलना में करीब 50% तक बेहतर परफॉर्मेंस देता है। इस लैपटॉप में 13 इंच का Liquid Retina डिस्प्ले, 1080p FaceTime HD कैमरा, डुअल माइक्रोफोन और डॉल्बी एटमॉस सपोर्ट वाले स्पीकर दिए गए हैं। इसके अलावा इसमें Magic Keyboard, बड़ा ट्रैकपैड और Touch ID जैसी प्रीमियम सुविधाएं भी मिलती हैं। इसका वजन सिर्फ 1.23 किलोग्राम है, जिससे यह काफी पोर्टेबल बन जाता है। Amazon पर ऑफर डिटेलभारत में मैकबुक नियो के 256GB वेरिएंट की शुरुआती कीमत करीब ₹69,900 है, लेकिन Amazon सेल में यह लैपटॉप ₹61,990 में उपलब्ध है। यानी लगभग ₹8,000 की सीधी छूट मिल रही है। इसके अलावा चुनिंदा क्रेडिट कार्ड्स पर अतिरिक्त ₹4,000 तक का डिस्काउंट भी दिया जा रहा है, जिससे कुल मिलाकर करीब ₹12,000 तक की बचत हो सकती है। इस ऑफर के बाद यह Apple का सबसे सस्ता MacBook और भी किफायती हो गया है। दूसरे ब्रांड्स पर भी ऑफरसिर्फ एप्पल ही नहीं, बल्कि फ्लिपकार्ट और अमेज़न दोनों प्लेटफॉर्म्स पर सैमसंग, आसुस और डैल जैसे ब्रांड्स के लैपटॉप पर भी भारी छूट मिल रही है। उदाहरण के तौर पर सैमसंग गैलेक्सी बुक 4 i7 को भी काफी कम कीमत में उपलब्ध कराया गया है, जिससे यह सेल टेक यूजर्स के लिए आकर्षक बन गई है।

हरियाणा के छात्र ने खोजे UPI के 3 खतरनाक बग, साइबर फ्रॉड रोकने के लिए बनाया नया सिक्योर सिस्टम

नई दिल्ली। हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के तलवाना खेड़ी गांव के बीटेक कंप्यूटर साइंस छात्र अंकित ठाकुर ने साइबर ठगी की एक घटना के बाद डिजिटल पेमेंट सिस्टम को लेकर बड़ा कदम उठाया है। उनके पिता, जो पेशे से ड्राइवर हैं, के साथ 20 हजार रुपये की ऑनलाइन ठगी हुई थी, जिसके बाद अंकित ने UPI सिस्टम की गहराई से स्टडी शुरू की। रिसर्च के दौरान अंकित ने दावा किया कि उन्होंने UPI सिस्टम में तीन गंभीर तकनीकी खामियां (बग्स) खोजी हैं। इनमें क्रोम इंटेंट वल्नरेबिलिटी शामिल है, जिसके जरिए फर्जी वेबसाइट्स बिना अनुमति पेमेंट ऐप खोल सकती हैं। दूसरी खामी ऑथेंटिकेशन बाईपास से जुड़ी है, जिससे कुछ मामलों में लॉक और बायोमेट्रिक सिक्योरिटी को दरकिनार किया जा सकता है। तीसरी और सबसे गंभीर खामी ऑडियो हाईजैक बताई गई है, जिसमें बैकग्राउंड में चल रहे फर्जी ऐप्स यूजर को गलत निर्देश देकर ठगी के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इन खामियों को समझने के बाद अंकित ने एक वैकल्पिक और अधिक सुरक्षित UPI सिस्टम और मोबाइल एप्लिकेशन विकसित करने का दावा किया है। उनका कहना है कि यह नया सिस्टम न केवल साइबर फ्रॉड को रोक सकता है, बल्कि गलत ट्रांजेक्शन से होने वाले नुकसान को भी कम करेगा। अंकित ने अपनी तकनीक को पेटेंट करने की बजाय इसे भारत सरकार को मुफ्त देने की पेशकश की है, ताकि देशभर के UPI यूजर्स को सुरक्षित डिजिटल पेमेंट अनुभव मिल सके। उन्होंने बताया कि उन्होंने कुछ सुरक्षा रिपोर्ट्स गूगल के सिक्योरिटी सिस्टम तक भी भेजी हैं, जिनमें से एक खामी को पहले ही ठीक किया जा चुका है। अंकित का कहना है कि अगर सरकार और सुरक्षा एजेंसियां सहयोग करें तो इस तकनीक का इस्तेमाल बड़े स्तर पर साइबर अपराध रोकने में किया जा सकता है और डिजिटल इंडिया को और सुरक्षित बनाया जा सकता है

साइबर सुरक्षा अलर्ट: फोटो लीक या अकाउंट हैक हो जाए तो घबराएं नहीं, ये आसान तरीके बचाएंगे आपकी डिजिटल पहचान

नई दिल्ली। नैशनल टेक्नॉलजी डे के मौके पर साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेटर शुभम त्रिपाठी ने बताया कि आज के डिजिटल दौर में फोटो लीक होना या सोशल मीडिया अकाउंट हैक होना आम खतरा बन चुका है, लेकिन सही कदम उठाकर इससे बचा और नुकसान कम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि सबसे पहले अपनी पर्सनल फोटो और वीडियो को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें प्राइवेट गैलरी या हिडन फोल्डर में रखना चाहिए और सोशल मीडिया अकाउंट को लॉक करके रखना जरूरी है ताकि अनजान लोग पहुंच न बना सकें। अगर फोटो या वीडियो लीक हो जाए तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रिपोर्टिंग सिस्टम का इस्तेमाल करें और अलग-अलग अकाउंट्स से रिपोर्ट कर उसे जल्दी हटवाया जा सकता है, वहीं stopncii.org जैसी वेबसाइट पर बिना पहचान बताए भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है। इसके अलावा cybercrime.gov.in पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर गृह मंत्रालय की मदद से कंटेंट हटवाया जा सकता है और गंभीर मामलों में नजदीकी साइबर सेल से भी सहायता ली जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार अकाउंट हैक होने से बचने के लिए Two-Factor Authentication (2FA) जरूर ऑन करें, जिससे पासवर्ड लीक होने पर भी अकाउंट सुरक्षित रहता है। अगर अकाउंट हैक हो जाए तो इंस्टाग्राम या अन्य प्लेटफॉर्म के “/hacked” रिकवरी पेज के जरिए वीडियो KYC और पहचान वेरिफिकेशन करके अकाउंट वापस पाया जा सकता है।

Vivo T5 Pro: 9020mAh बैटरी और 144Hz डिस्प्ले के साथ आया पावरफुल स्मार्टफोन

नई दिल्ली। अगर आप एक ऐसा स्मार्टफोन ढूंढ रहे हैं जिसमें बैटरी, परफॉर्मेंस और डिस्प्ले तीनों मजबूत हों, तो Vivo T5 Pro एक दमदार विकल्प बनकर सामने आता है। यह फोन खासतौर पर उन यूजर्स के लिए डिजाइन किया गया है जिन्हें लंबे समय तक बैटरी बैकअप और स्मूथ एक्सपीरियंस चाहिए। फोन में 6.83-इंच का 1.5K AMOLED डिस्प्ले दिया गया है, जो 144Hz रिफ्रेश रेट के साथ बेहद स्मूथ और शार्प विजुअल्स देता है। परफॉर्मेंस के लिए इसमें Snapdragon 7s Gen 4 प्रोसेसर और 12GB तक RAM का सपोर्ट मिलता है, जिससे मल्टीटास्किंग और गेमिंग आसान हो जाती है। बैटरी इसकी सबसे बड़ी खासियत है, जिसमें 9,020mAh की पावरफुल बैटरी दी गई है। यह 90W फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करती है, जिससे फोन जल्दी चार्ज होकर लंबे समय तक चलता है। कैमरा सेटअप की बात करें तो इसमें 50MP का प्राइमरी कैमरा (OIS सपोर्ट के साथ) और 2MP डेप्थ सेंसर मिलता है। वहीं सेल्फी और वीडियो कॉलिंग के लिए 32MP का फ्रंट कैमरा दिया गया है। कुल मिलाकर, यह फोन बैटरी और परफॉर्मेंस चाहने वाले यूजर्स के लिए एक बैलेंस्ड और पावरफुल पैकेज साबित हो सकता है।