चीन ने 6G ट्रायल को दी मंजूरी: 6GHz बैंड पर शुरू होगा टेस्ट, भारत भी रेस में तेज़ी से बढ़ा रहा कदम

नई दिल्ली। चीन ने 6G तकनीक की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए मोबाइल संचार सिस्टम के लिए ट्रायल फ्रीक्वेंसी के उपयोग को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। चीन के उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MIIT) ने IMT-2030 (6G) प्रमोशन ग्रुप को 6GHz बैंड पर परीक्षण की अनुमति दी है, जिससे देश के चुनिंदा क्षेत्रों में 6G ट्रायल शुरू किए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य 6G टेक्नोलॉजी पर रिसर्च को बढ़ावा देना और इसे औद्योगिक स्तर पर विकसित करना है। इन ट्रायल्स में इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (ITU) द्वारा निर्धारित प्रमुख फीचर्स जैसे अल्ट्रा-हाई डेटा स्पीड, बेहद कम लेटेंसी, बड़े पैमाने पर कनेक्टिविटी और इंटीग्रेटेड सेंसिंग पर काम किया जाएगा। इस चरण में शोधकर्ता तकनीकी चुनौतियों को हल करने के लिए R&D और वेरिफिकेशन टेस्टिंग करेंगे। चीन का IMT-2030 प्रमोशन ग्रुप, जिसमें टेलीकॉम कंपनियां, रिसर्च इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटीज शामिल हैं, 6G विकास को तेज करने में अहम भूमिका निभा रहा है। यह कदम 5G और 5G-एडवांस्ड डिप्लॉयमेंट के बाद अगला बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है। उधर भारत भी 6G तकनीक पर तेजी से काम कर रहा है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के अनुसार, 6G केवल तेज इंटरनेट नहीं होगा, बल्कि यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इमर्सिव टेक्नोलॉजी और इंटेलिजेंट इंटरनेट ऑफ एवरीथिंग की दिशा में बड़ा बदलाव लाएगा। भारत इस क्षेत्र में पेटेंट और रिसर्च के स्तर पर मजबूत स्थिति बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि 6G स्पेक्ट्रम आवंटन और वैश्विक मानकों को लेकर अंतिम निर्णय अभी ITU और 3GPP द्वारा लिया जाना बाकी है। ऐसे में चीन की यह तेज़ प्रगति वैश्विक 6G रेस को और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बना रही है, जिसमें भारत भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में है।
BSNL का धमाकेदार 225 रुपये वाला प्लान: 30 दिन की वैलिडिटी में रोज 2.5GB डेटा, अनलिमिटेड कॉलिंग और SMS फ्री

नई दिल्ली। सरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल ने अपने यूजर्स के लिए एक किफायती और हाई डेटा बेनिफिट वाला नया प्रीपेड प्लान लॉन्च किया है। 225 रुपये की कीमत वाले इस प्लान में यूजर्स को 30 दिनों की वैलिडिटी के साथ रोजाना 2.5GB हाई-स्पीड डेटा, सभी नेटवर्क पर अनलिमिटेड कॉलिंग और प्रतिदिन 100 SMS की सुविधा दी जा रही है। इस प्लान की खास बात यह है कि कम बजट में ज्यादा डेटा इस्तेमाल करने वालों के लिए यह काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। औसतन हिसाब से देखें तो यूजर को प्रतिदिन करीब 7.5 रुपये का खर्च आता है, जिससे यह छात्रों, वर्क फ्रॉम होम यूजर्स और स्ट्रीमिंग करने वालों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन जाता है। हालांकि कंपनी ने इसमें किसी भी तरह का ओटीटी या एंटरटेनमेंट सब्सक्रिप्शन शामिल नहीं किया है। यह पूरी तरह से कॉलिंग, SMS और इंटरनेट उपयोग पर आधारित प्लान है। BSNL ने यह भी स्पष्ट किया है कि डेटा लिमिट खत्म होने के बाद इंटरनेट स्पीड कम हो जाएगी, जो कंपनी की फेयर यूज पॉलिसी के तहत लागू होगा। साथ ही नेटवर्क और 4G सेवा की उपलब्धता अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है, क्योंकि कंपनी अभी देशभर में अपने 4G नेटवर्क का विस्तार कर रही है। इस प्लान को यूजर्स BSNL की आधिकारिक वेबसाइट, मोबाइल ऐप या अन्य अधिकृत रिचार्ज प्लेटफॉर्म्स के जरिए आसानी से एक्टिवेट कर सकते हैं।
रील्स स्क्रॉलिंग: डिजिटल आदत बन रही ‘दिमाग का जंक फूड’, याददाश्त और फोकस पर पड़ रहा सीधा असर

नई दिल्ली। आज के डिजिटल दौर में इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगातार रील्स स्क्रॉल करने की आदत तेजी से बढ़ती जा रही है। यह सिर्फ टाइमपास नहीं रह गया, बल्कि विशेषज्ञों के अनुसार यह एक ऐसी डिजिटल आदत बनती जा रही है जो दिमाग की कार्यक्षमता, ध्यान और याददाश्त को धीरे-धीरे प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सोच-विचार के लगातार रैंडम रील्स देखना ठीक वैसे ही है जैसे शरीर के लिए जंक फूड जो तुरंत आनंद देता है लेकिन लंबे समय में नुकसान पहुंचाता है। कई रिसर्च, जिनमें कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की स्टडी भी शामिल है, यह संकेत देती हैं कि इस तरह का कंटेंट ब्रेन की फोकस करने की क्षमता को कमजोर कर सकता है और मेमोरी प्रोसेसिंग पर असर डाल सकता है। इस आदत का सबसे चिंताजनक पहलू बच्चों में बढ़ती स्क्रीन लत है। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चे अक्सर अपने माता-पिता को देखकर ही डिजिटल व्यवहार सीखते हैं। अगर घर में बड़े लगातार फोन पर व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों में भी वही पैटर्न तेजी से विकसित होता है। यूसी सैन फ्रांसिस्को के विशेषज्ञ जेसन नागाटा जैसे शोधकर्ता इस स्थिति की तुलना नशे की आदत से करते हैं। उनका कहना है कि जब स्क्रीन टाइम रिश्तों, पढ़ाई और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को प्रभावित करने लगे, तो यह सिर्फ आदत नहीं बल्कि एक गंभीर डिजिटल एडिक्शन बन जाता है। इस समस्या से बचने के लिए विशेषज्ञ ‘फैमिली मीडिया प्लान’ की सलाह देते हैं। इसमें घर के सभी सदस्यों के लिए नियम बनाए जाते हैं, जैसे खाना खाते समय फोन का इस्तेमाल न करना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी रखना और बेडरूम को नो-फोन जोन बनाना। कुल मिलाकर, रील्स स्क्रॉलिंग अगर सीमित न रहे तो यह धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य, ध्यान क्षमता और पारिवारिक रिश्तों पर गहरा असर डाल सकती है, इसलिए डिजिटल बैलेंस बनाए रखना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
Apple AirPods में आएगा कैमरा? AI फीचर्स के साथ बदल सकता है ईयरबड्स इस्तेमाल करने का पूरा तरीका

नई दिल्ली। दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Apple अपने आने वाले AirPods को लेकर ऐसी तकनीक पर काम कर रही है, जो वियरेबल टेक्नोलॉजी की दुनिया को पूरी तरह बदल सकती है। नई रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी ऐसे AI-पावर्ड AirPods की टेस्टिंग कर रही है, जिनमें छोटे कैमरा या विजुअल सेंसर दिए जा सकते हैं। खास बात यह है कि ये कैमरे फोटो या वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए नहीं, बल्कि आसपास के माहौल को समझने और AI को ज्यादा स्मार्ट बनाने के लिए इस्तेमाल होंगे। बताया जा रहा है कि Apple अपने पूरे इकोसिस्टम में AI और स्मार्ट असिस्टेंस को अगले स्तर तक ले जाना चाहता है। इसी दिशा में कंपनी ऐसे AirPods तैयार कर रही है, जो यूजर के आसपास की चीजों को समझकर तुरंत मदद कर सकें। कैसे काम करेंगे नए AI AirPods?रिपोर्ट्स के अनुसार, इन AirPods में लो-रिजॉल्यूशन विजुअल सेंसर लगाए जा सकते हैं। ये सेंसर आसपास के वातावरण से जानकारी इकट्ठा करेंगे और फिर उसे Siri और Apple Intelligence सिस्टम के जरिए प्रोसेस किया जाएगा। यानी आने वाले समय में यूजर बिना फोन निकाले सिर्फ AirPods के जरिए आसपास की चीजों से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकेगा। उदाहरण के तौर पर अगर कोई यूजर किचन में मौजूद सब्जियों को देखकर रेसिपी पूछे, तो Siri तुरंत सुझाव दे सकती है। वहीं किसी अनजान रास्ते पर चलते समय AirPods लाइव नेविगेशन और दिशा बताने में भी मदद कर सकते हैं। कंपनी का फोकस कैमरा फीचर से ज्यादा “Contextual AI Experience” पर बताया जा रहा है, ताकि डिवाइस इंसानों की तरह माहौल को समझकर प्रतिक्रिया दे सके। डिजाइन में हो सकते हैं छोटे बदलावजानकारी के मुताबिक नए AirPods का डिजाइन काफी हद तक मौजूदा AirPods Pro जैसा ही रह सकता है। हालांकि अतिरिक्त सेंसर और हार्डवेयर के लिए इनके स्टेम थोड़े लंबे किए जा सकते हैं। इसके अलावा Apple एक LED इंडिकेटर सिस्टम की भी टेस्टिंग कर रहा है। यह लाइट यूजर को बताएगी कि डिवाइस कब विजुअल डेटा प्रोसेस कर रहा है या AI सिस्टम के साथ जानकारी शेयर की जा रही है। प्राइवेसी पर बढ़ सकती है बहसAI और कैमरा जैसे फीचर्स के आने के बाद प्राइवेसी को लेकर चिंता बढ़ना तय माना जा रहा है। दुनियाभर में AI वियरेबल्स को लेकर पहले से ही बहस चल रही है कि ऐसे डिवाइस यूजर की निजी जानकारी कितनी सुरक्षित रख पाएंगे। इसी वजह से Apple इस तकनीक को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरत सकता है। LED इंडिकेटर का मकसद भी यूजर्स को यह समझाना होगा कि डिवाइस कब एक्टिव विजुअल प्रोसेसिंग कर रहा है। WWDC 2026 में हो सकते हैं बड़े ऐलानपहले उम्मीद की जा रही थी कि कंपनी इन स्मार्ट AirPods को 2026 की पहली छमाही में लॉन्च कर सकती है, लेकिन अपग्रेडेड Siri प्लेटफॉर्म में देरी के कारण लॉन्च टाइमलाइन आगे बढ़ सकती है। टेक रिपोर्ट्स के अनुसार, Apple अपने आगामी WWDC 2026 इवेंट में iOS 27, iPadOS 27 और macOS अपडेट्स के साथ कई बड़े AI फीचर्स पेश कर सकता है। माना जा रहा है कि नई Siri और Visual Intelligence तकनीक इन AI AirPods का सबसे अहम हिस्सा होगी। अगर ये तकनीक सफल होती है, तो भविष्य में ईयरबड्स सिर्फ गाने सुनने या कॉल करने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे यूजर के लिए एक स्मार्ट AI असिस्टेंट की तरह काम करेंगे, जो आसपास की दुनिया को समझकर तुरंत मदद कर सकेगा।
Robot Buddha: अब AI देगा धर्म का ज्ञान, दक्षिण कोरिया से जापान तक रोबोट भिक्षुओं की बढ़ती चर्चा

नई दिल्ली। रोबोट बुद्ध आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ ऑफिस, फैक्ट्री और टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं रह गया है। AI अब धर्म और आध्यात्म की दुनिया में भी अपनी जगह बना रहा है। हाल ही में दक्षिण कोरिया और जापान में रोबोट भिक्षुओं की एंट्री ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। इन AI रोबोट्स ने न सिर्फ धार्मिक प्रवचन दिए, बल्कि पारंपरिक बौद्ध रीति-रिवाजों का पालन करते हुए आध्यात्मिक संदेश भी सुनाए। इसके बाद यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या आने वाले समय में AI रोबोट धर्मगुरु की भूमिका निभा सकते हैं? दक्षिण कोरिया में ‘गाबी’ बना रोबोट भिक्षुदक्षिण कोरिया की राजधानी Seoul के प्रसिद्ध Jogyesa Temple में ‘गाबी’ नाम के ह्यूमनॉइड रोबोट भिक्षु को पेश किया गया। करीब 130 सेंटीमीटर लंबे इस AI रोबोट ने पारंपरिक बौद्ध वस्त्र पहने और बौद्ध परंपरा के अनुसार दीक्षा भी ली। रोबोट ने लोगों के सामने प्रार्थना की और कहा, “मैं बौद्ध धर्म के लिए खुद को समर्पित करता हूं।” तकनीक और आध्यात्म के इस अनोखे संगम ने लोगों को हैरान भी किया और उत्साहित भी। कई लोग इसे धर्म को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आधुनिक तरीका मान रहे हैं। जापान के 400 साल पुराने मंदिर में AI प्रवचनसिर्फ दक्षिण कोरिया ही नहीं, बल्कि Japan में भी AI आधारित रोबोट भिक्षुओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है। Kyoto के एक 400 साल पुराने बौद्ध मंदिर में ‘Android Kannon’ नाम का रोबोट लोगों को धार्मिक शिक्षा और प्रवचन दे रहा है। यह रोबोट जापानी भाषा में बौद्ध धर्म की बातें समझाता है और उसके संदेशों का दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी किया जा सकता है। माना जा रहा है कि इन AI रोबोट्स का मकसद युवाओं को धर्म और आध्यात्म से जोड़ना है, क्योंकि आधुनिक दौर में युवा पारंपरिक धार्मिक गतिविधियों से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। क्या AI रोबोट बन जाएंगे भविष्य के धर्मगुरु?AI आधारित ‘Buddharoid’ जैसे रोबोट्स को बौद्ध ग्रंथों और धार्मिक शिक्षाओं के बड़े डेटा पर ट्रेन किया गया है। ये रोबोट लोगों के सवालों के जवाब दे सकते हैं और आध्यात्मिक सलाह भी देने लगे हैं। जापान समेत कई देशों में बौद्ध भिक्षुओं की घटती संख्या भी इसकी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि रोबोट ज्ञान और जानकारी तो दे सकते हैं, लेकिन वे इंसानों जैसी भावनाएं, करुणा और आध्यात्मिक अनुभव महसूस नहीं कर सकते। AI केवल उसी डेटा और प्रोग्रामिंग के आधार पर जवाब देता है, जो उसे सिखाया गया है। इसके बावजूद तकनीक और धर्म का यह मेल आने वाले समय में दुनिया के धार्मिक ढांचे और आध्यात्मिक तरीकों को बदल सकता है
कार के शीशे पर बनी काली बिंदियां सिर्फ डिजाइन नहीं! जान बचाने वाली इस Hidden Technology का जानिए बड़ा राज

नई दिल्ली। गाड़ी की विंडशील्ड पर बने छोटे-छोटे काले डॉट्स को ज्यादातर लोग सिर्फ डिजाइन का हिस्सा समझते हैं, लेकिन असल में ये कार की सुरक्षा और मजबूती से जुड़ी बेहद अहम तकनीक का हिस्सा होते हैं। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में इन्हें ‘फ्रिट्स’ कहा जाता है और इनका काम सिर्फ कार को स्टाइलिश दिखाना नहीं बल्कि विंडशील्ड को सुरक्षित और मजबूत बनाए रखना भी होता है। ऑटो एक्सपर्ट्स के मुताबिक, विंडशील्ड के किनारों पर बने ये ब्लैक डॉट्स खास तरह के सिरेमिक पेंट से तैयार किए जाते हैं, जिन्हें कांच पर बेहद ऊंचे तापमान में बेक किया जाता है। यही वजह है कि ये लंबे समय तक टिके रहते हैं और आसानी से मिटते नहीं हैं। दरअसल कार की विंडशील्ड को फ्रेम से जोड़ने के लिए यूरेथेन सीलेंट नाम की खास गोंद का इस्तेमाल किया जाता है। तेज धूप और गर्मी में यह सीलेंट कमजोर पड़ सकता है, लेकिन फ्रिट्स सूरज की सीधी किरणों को रोककर इस गोंद को सुरक्षित रखते हैं। इससे विंडशील्ड मजबूती से अपनी जगह पर टिकी रहती है और ढीली होने का खतरा कम हो जाता है। इन काली बिंदियों का एक और बड़ा फायदा तापमान को संतुलित बनाए रखना है। जब धूप सीधे कांच पर पड़ती है तो अलग-अलग हिस्सों का तापमान तेजी से बदल सकता है, जिससे ‘लेंसिंग’ नाम की समस्या पैदा होती है। इस स्थिति में सड़क या आसपास की चीजें टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देने लगती हैं। फ्रिट्स गर्मी को समान रूप से फैलाने में मदद करते हैं, जिससे ऑप्टिकल डिस्टॉर्शन कम हो जाता है और ड्राइविंग ज्यादा सुरक्षित बनती है। इतना ही नहीं, ये ब्लैक डॉट्स कांच की सतह को हल्का खुरदरा भी बनाते हैं। इस प्रक्रिया को ‘Etching’ कहा जाता है। इसकी वजह से विंडशील्ड और कार फ्रेम के बीच पकड़ और मजबूत हो जाती है। यही कारण है कि तेज झटकों या हादसों के दौरान भी शीशा अपनी जगह पर बना रहता है। ऑटोमोबाइल कंपनियां इस तकनीक को यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी मानती हैं। अगर किसी वजह से ये काली बिंदियां घिसने लगें, धुंधली पड़ जाएं या टूट जाएं तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि खराब फ्रिट्स की वजह से विंडशील्ड कमजोर हो सकती है और लंबे समय में यह बड़ा खतरा बन सकती है। आज की आधुनिक कारों में फ्रिट टेक्नोलॉजी को सुरक्षा मानकों का अहम हिस्सा माना जाता है। यही वजह है कि अगली बार जब आप अपनी कार की विंडशील्ड पर बने ये छोटे-छोटे काले डॉट्स देखें, तो समझ जाइए कि ये सिर्फ डिजाइन नहीं बल्कि आपकी सुरक्षा की एक मजबूत ढाल हैं।
छत नहीं तो क्या हुआ! अब बालकनी में लगाएं सोलर पैनल, बिजली बिल में होगी बड़ी बचत

नई दिल्ली। बढ़ते बिजली बिलों के बीच अब बिना बड़ी छत वाले घरों में भी Solar Energy का इस्तेमाल आसान होता जा रहा है। दुनिया के कई देशों की तरह अब छोटे फ्लैट और किराए के घरों में रहने वाले लोग भी बालकनी सोलर सिस्टम या प्लग-इन सोलर सिस्टम की मदद से बिजली बचाने लगे हैं। बालकनी सोलर सिस्टम छोटे आकार का सोलर सेटअप होता है, जिसमें सोलर पैनल, माइक्रो इन्वर्टर और प्लग सिस्टम शामिल होता है। यह सूर्य की रोशनी से बिजली बनाकर सीधे घर के इलेक्ट्रिक सॉकेट से जुड़ सकता है। इसकी खास बात यह है कि इसे लगाने के लिए भारी निर्माण कार्य या जटिल वायरिंग की जरूरत नहीं पड़ती। विशेषज्ञों के अनुसार यह सिस्टम खास तौर पर फ्लैट, छोटे घर और किराए के मकानों में रहने वालों के लिए फायदेमंद माना जा रहा है। अगर बालकनी में पर्याप्त धूप आती है, तो इससे पंखा,लाइट इमिटिंग डायोड लाइट, टीवी, वाई-फाई राउटर, मोबाइल चार्जर और छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आसानी से चलाए जा सकते हैं। सोलर पैनल लगाने के लिए सबसे पहले ऐसी जगह चुननी होती है जहां दिनभर अच्छी धूप आती हो। इसके बाद पैनल को मजबूत स्टैंड या रेलिंग पर फिट किया जाता है और माइक्रो इन्वर्टर के जरिए घर के पावर सॉकेट से जोड़ा जाता है। जरूरत पड़ने पर बैटरी स्टोरेज भी लगाया जा सकता है ताकि रात में भी सोलर बिजली इस्तेमाल हो सके। रिपोर्ट्स के मुताबिक 800 से 1200 वॉट तक का छोटा बालकनी सोलर सिस्टम हर महीने बिजली बिल में अच्छी बचत करा सकता है। बचत की वास्तविक राशि शहर की बिजली दर और मिलने वाली धूप पर निर्भर करती है। यूरोप, खासकर जर्मनी में बालकनी सोलर सिस्टम तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। भारत में भी दिल्ली, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे धूप वाले राज्यों में इसकी मांग बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में छोटे Plug-in Solar सिस्टम घरेलू बिजली बचत का बड़ा विकल्प बन सकते हैं।
CTC बनाम इन-हैंड सैलरी: ₹62 लाख की Google नौकरी से ज्यादा बचत कर रहा ₹36 लाख वाला WFH प्रोफेशनल!

नई दिल्ली। बड़ी सैलरी सुनते ही अक्सर लोगों को लगता है कि हर महीने मोटी कमाई हाथ में आती होगी, लेकिन टेक इंडस्ट्री की हकीकत कई बार इससे बिल्कुल अलग होती है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक उदाहरण चर्चा में आया, जिसमें Google में ₹62 लाख CTC पाने वाले कर्मचारी की तुलना एक वर्क फ्रॉम होम कॉन्ट्रैक्टर से की गई, जिसकी सालाना कमाई ₹36 लाख बताई गई। स्टार्टअप Wavelength के फाउंडिंग इंजीनियर देवांश भंडारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि Google के कर्मचारी के पैकेज में बेसिक सैलरी, बोनस और RSU यानी स्टॉक ग्रांट शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ₹62 लाख के पैकेज में करीब ₹22 लाख बेसिक सैलरी, ₹35 लाख RSU और ₹5 लाख बोनस शामिल है। हालांकि RSU तुरंत कैश के रूप में नहीं मिलते, बल्कि कई वर्षों में हिस्सों में जारी किए जाते हैं। इसी वजह से टैक्स कटने के बाद कर्मचारी की मासिक इन-हैंड सैलरी लगभग ₹1.5 लाख से ₹1.8 लाख तक रह जाती है। वहीं दूसरी ओर रिमोट कॉन्ट्रैक्टर की अधिकतर कमाई सीधे कैश में होती है। साथ ही आयकर कानून की धारा 44ADA के तहत टैक्स छूट का फायदा मिलने से उसकी टैक्सेबल इनकम कम हो जाती है। ऐसे में रिपोर्ट के अनुसार टैक्स के बाद उसकी इन-हैंड कमाई करीब ₹2.7 लाख प्रति माह तक पहुंच सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि CTC और इन-हैंड सैलरी में बड़ा अंतर सैलरी स्ट्रक्चर की वजह से होता है। बड़ी कंपनियां बोनस, स्टॉक और अन्य बेनिफिट्स को CTC में जोड़ देती हैं, जबकि कॉन्ट्रैक्ट या रिमोट जॉब में भुगतान अधिकतर सीधे कैश में मिलता है। हालांकि केवल इन-हैंड सैलरी के आधार पर नौकरी का मूल्यांकन करना सही नहीं माना जाता। बड़ी कंपनियों में नौकरी की स्थिरता, हेल्थ बेनिफिट्स, ब्रांड वैल्यू और लंबी अवधि की करियर ग्रोथ जैसे फायदे भी महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि रिमोट जॉब में ज्यादा कैश फ्लो और कम खर्च का लाभ मिलता है।
iPhone Air पर Flipkart Sale में बड़ा ऑफर, करीब ₹24,000 तक की छूट के साथ मिल रहा प्रीमियम iPhone

नई दिल्ली। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म Flipkart की Sasa Lele Sale में Apple का प्रीमियम स्मार्टफोन Apple iPhone Air भारी डिस्काउंट के साथ उपलब्ध कराया जा रहा है। यह सेल चुनिंदा यूजर्स के लिए शुरू हो चुकी है, जबकि बाकी ग्राहकों के लिए ऑफर कुछ दिनों में लाइव होगा। लॉन्च के समय iPhone Air की कीमत लगभग ₹1,19,900 थी, लेकिन सेल में यह फोन करीब ₹99,900 के आसपास लिस्ट किया गया है। इसके अलावा बैंक ऑफर और अतिरिक्त डिस्काउंट जोड़ने पर कुल मिलाकर लगभग ₹24,000 तक की बचत का फायदा मिल रहा है, जिससे इसकी प्रभावी कीमत और भी कम हो जाती है। iPhone Air को अब तक का सबसे स्लिम iPhone बताया जा रहा है, जिसकी मोटाई लगभग 5.6mm है। इसमें 6.5 इंच का डिस्प्ले, A19 Pro चिपसेट और टाइटेनियम फिनिश डिजाइन दिया गया है, जो इसे प्रीमियम लुक और फील देता है। कैमरा सेटअप की बात करें तो इसमें 48MP का रियर कैमरा और 18MP का फ्रंट कैमरा मिलता है, जो डेली फोटोग्राफी और सेल्फी के लिए बेहतर रिजल्ट देने का दावा करता है। वहीं रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें करीब 3149mAh बैटरी दी गई है। टेक मार्केट में यह ऑफर ऐसे समय आया है जब कई फ्लैगशिप स्मार्टफोन की कीमतें बढ़ रही हैं, ऐसे में iPhone Air पर यह डील प्रीमियम फोन खरीदने वालों के लिए एक आकर्षक मौका माना जा रहा है।
AI के दौर में सुरक्षित करियर: लीडरशिप और इमोशनल स्किल्स पर नहीं पड़ेगा असर, नौकरी पर खतरा सीमित

नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी Artificial Intelligence के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने नौकरी बाजार में बड़ा बदलाव शुरू कर दिया है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार अगले 10 सालों में लगभग 25% नौकरियां ऑटोमेशन की वजह से प्रभावित हो सकती हैं, लेकिन कुछ ऐसी महत्वपूर्ण स्किल्स हैं जिन्हें AI पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकता। रिपोर्ट के मुताबिक, कोडिंग, डेटा एनालिसिस और कंटेंट जनरेशन जैसे कई तकनीकी कामों में AI इंसानों की जगह ले सकता है, लेकिन इसके बावजूद लीडरशिप, टीम मैनेजमेंट और इमोशनल स्किल्स पर इसका असर बेहद सीमित रहेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानों की लीडरशिप क्षमता, टीम को प्रेरित करना, विवाद सुलझाना और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना जैसी स्किल्स अभी भी पूरी तरह इंसानों पर निर्भर रहेंगी। AI इनसे जुड़े कुछ टास्क जरूर कर सकता है, लेकिन इंसानी समझ और भावनात्मक जुड़ाव की बराबरी नहीं कर सकता। रिपोर्ट में टीमवर्क को दूसरी सबसे मजबूत स्किल बताया गया है, क्योंकि इसमें भरोसा और लंबे समय तक रिश्ते बनाने की क्षमता शामिल होती है, जिसे मशीनें पूरी तरह समझ नहीं पातीं। इसके अलावा नेगोशिएशन, मेंटरिंग, पब्लिक स्पीकिंग और चेंज मैनेजमेंट जैसी स्किल्स भी AI के प्रभाव से काफी हद तक सुरक्षित मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में नौकरी का स्वरूप जरूर बदलेगा, लेकिन जो लोग मानव-केंद्रित और इमोशनल इंटेलिजेंस वाली स्किल्स विकसित करेंगे, उनके लिए AI खतरा नहीं बल्कि एक सहयोगी तकनीक साबित होगी।