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50 गुना फीस की डिमांड और फिर पलटी बाजी: जब ‘मुगल-ए-आज़म’ के गाने में आया ट्विस्ट


नई दिल्ली।  भारतीय सिनेमा की सबसे भव्य और ऐतिहासिक फिल्मों में गिनी जाने वाली Mughal-e-Azam सिर्फ अपनी कहानी और भव्य सेट्स के लिए ही नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी दिलचस्प कहानियों के लिए भी मशहूर है। इस फिल्म के एक खास गाने को लेकर जो घटनाक्रम हुआ, वह आज भी फिल्म इतिहास में एक प्रेरणादायक किस्सा माना जाता है।

कहा जाता है कि जब फिल्म में तानसेन की तरह एक शास्त्रीय संगीत आधारित गीत को सलीम और अनारकली पर फिल्माया जाना था, तब सवाल उठा कि इस गाने को आखिर गाएगा कौन। संगीत निर्देशक नौशाद और निर्देशक के. आसिफ ने तय किया कि अगर अतीत में तानसेन ने यह परंपरा निभाई थी, तो आज के दौर में उनकी आत्मा को जीवंत करने के लिए सबसे उपयुक्त आवाज उस्ताद Ustad Bade Ghulam Ali Khan की होगी।

लेकिन जब टीम उस्ताद साहब के पास पहुंची, तो उन्होंने गाने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्होंने पहले कभी फिल्मी गाना नहीं गाया और न ही आगे गाने का इरादा है। उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

इसके बाद भी के. आसिफ हार नहीं माने। उन्होंने लगातार उस्ताद साहब को मनाने की कोशिश की। इस बीच उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ने एक तरह से मजाक या परीक्षा लेते हुए ऐसी फीस मांगी, जो उस समय के हिसाब से सामान्य गायक की फीस से लगभग 50 गुना ज्यादा थी—यानी करीब 25 हजार रुपये, जबकि उस दौर में गायक 400-500 रुपये लेते थे।

उम्मीद के विपरीत, के. आसिफ ने इस मांग को तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा कि “आप अनमोल हैं, कीमत की बात ही नहीं है।” यह सुनकर उस्ताद साहब भी हैरान रह गए और धीरे-धीरे सहमत हो गए।

हालांकि कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब रिकॉर्डिंग की बात आई, तो उस्ताद साहब ने शर्त रख दी कि वह गाना तभी गाएंगे जब उन्हें पूरा सीन दिखाया जाएगा, जिस पर यह गीत फिल्माया जाना है। उस समय सीन पूरी तरह तैयार भी नहीं था।

के. आसिफ ने तुरंत व्यवस्था की और Mughal-e-Azam के सलीम और अनारकली वाले रोमांटिक दृश्य को विशेष रूप से शूट करवाया। दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच फिल्माए गए इस दृश्य को एडिट कर तुरंत उस्ताद साहब को दिखाया गया।

सीन देखने के बाद उस्ताद साहब प्रभावित हुए और उन्होंने गाना रिकॉर्ड करने के लिए हामी भर दी। इतना ही नहीं, उन्होंने इस गाने को तीन बार रिकॉर्ड किया ताकि सबसे बेहतरीन वर्जन चुना जा सके।

इस पूरी प्रक्रिया ने साबित किया कि Mughal-e-Azam सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उस दौर की कलात्मक पराकाष्ठा थी, जिसमें संगीत, अभिनय और निर्देशन तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिला।

फिल्म के निर्माण में भी भव्यता का कोई मुकाबला नहीं था। देशभर से कारीगर, ज्वेलरी डिजाइनर, टेलर और कलाकार बुलाए गए थे। विशाल युद्ध दृश्यों के लिए हजारों घोड़े, ऊंट और सैनिकों का इस्तेमाल किया गया, जिससे यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी और भव्य परियोजनाओं में से एक बन गई।

आज भी जब यह किस्सा दोहराया जाता है, तो यह साफ हो जाता है कि जुनून, सम्मान और कला के प्रति समर्पण ही किसी रचना को अमर बनाता है।

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