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कच्चे तेल में नरमी के बावजूद तुरंत नहीं घटेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें, सरकार ने बताया 12,000 करोड़ रुपये के बोझ और वैश्विक हालात का पूरा गणित

नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हालिया गिरावट के बाद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम कम होने की उम्मीदें बढ़ी हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल कच्चे तेल के सस्ता होने से उपभोक्ताओं को तुरंत राहत मिलना संभव नहीं है। सरकार का कहना है कि घरेलू ईंधन कीमतों का निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें वैश्विक बाजार की स्थिति के साथ-साथ आयात, परिवहन, कर व्यवस्था और तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल होते हैं।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से दिए गए बयान में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय बाजार तक पहुंचने में समय लगता है। कम कीमत पर खरीदा गया कच्चा तेल तुरंत रिफाइनरियों तक नहीं पहुंचता, बल्कि इसके आयात, परिवहन और प्रसंस्करण की पूरी प्रक्रिया में कई सप्ताह लग सकते हैं। ऐसे में वैश्विक बाजार में आई तात्कालिक नरमी का सीधा प्रभाव घरेलू खुदरा कीमतों पर तुरंत दिखाई नहीं देता।

सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी थी। इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला, जिससे आयात लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ डालने के बजाय सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने अतिरिक्त वित्तीय दबाव अपने ऊपर लिया।

सरकारी आकलन के अनुसार, बढ़ी हुई लागत का असर सीमित रखने के प्रयास में केंद्र को लगभग 12,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा। सरकार का मानना है कि इस आर्थिक दबाव की भरपाई और बाजार संतुलन बनाए रखने के लिए मूल्य निर्धारण में सावधानी बरतना आवश्यक है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ी गिरावट आते ही खुदरा ईंधन दरों में तत्काल कटौती करना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव से निर्धारित नहीं होतीं। इसमें रिफाइनिंग लागत, फ्रेट चार्ज, बीमा, मुद्रा विनिमय दर, केंद्रीय और राज्य कर तथा विपणन खर्च भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें से किसी एक क्षेत्र में लागत बढ़ती है तो उसका असर अंतिम कीमतों पर पड़ सकता है।

इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुरुवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड करीब 78 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड भी नरम रुख के साथ 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कूटनीतिक प्रयासों में प्रगति के संकेतों ने निवेशकों की चिंताओं को कुछ हद तक कम किया है, जिससे तेल कीमतों पर दबाव घटा है।

हालांकि ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि वैश्विक बाजार अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। भू-राजनीतिक घटनाक्रम, आपूर्ति श्रृंखला की स्थिति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे कारक आने वाले समय में तेल कीमतों की दिशा तय करेंगे। ऐसे में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर किसी भी त्वरित निर्णय की संभावना फिलहाल सीमित दिखाई देती है।

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