मंदिर की वास्तुकला भी इसकी विशेष पहचान है। नागर शैली में निर्मित इस मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी और चित्रकारी श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के दिव्य प्रेम प्रसंगों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है। मंदिर का मंडप गुंबदाकार संरचना और जालीदार खिड़कियों के साथ एक विशिष्ट शैली का परिचय देता है। यह संरचना इसे अन्य धार्मिक स्थलों से अलग और विशेष बनाती है। द्वारकाधीश मंदिर से इसकी दूरी अधिक नहीं है और यह गोमती नदी के समीप स्थित होने के कारण धार्मिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यहां चढ़ाए जाने वाले जल प्रसाद से जुड़ी है। भक्त यहां देवी को जल अर्पित करते हैं और इसे ही प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। इस परंपरा को जीवन और पवित्रता से जोड़कर देखा जाता है। इसके पीछे एक प्राचीन कथा का उल्लेख मिलता है जिसमें कहा जाता है कि एक बार यात्रा के दौरान रुक्मिणी देवी ने एक ऋषि को तुरंत जल नहीं दिया था। इस घटना से संबंधित मान्यता के अनुसार इसके बाद द्वारका क्षेत्र में जल की कमी की स्थिति बनी रही। इसी कारण यहां जल दान और जल ग्रहण को अत्यंत पुण्यकारी और महत्वपूर्ण माना जाता है।
रुक्मिणी देवी का संबंध श्रीकृष्ण से जुड़ी प्रेम और विवाह की गाथा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार रुक्मिणी विदर्भ राज्य के शासक की पुत्री थीं और उन्होंने बाल्यकाल से ही श्रीकृष्ण को अपने जीवन साथी के रूप में स्वीकार कर लिया था। उनके विवाह से जुड़ी घटनाएं द्वारका और उसके आसपास के क्षेत्रों में विशेष महत्व रखती हैं। कहा जाता है कि कठिन परिस्थितियों के बीच श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का साथ स्वीकार कर विवाह किया और इस प्रकार दिव्य प्रेम की एक अमर कथा स्थापित हुई।
समय के साथ यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व का भी प्रतीक बन गया। यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर भक्ति संगीत और धार्मिक अनुष्ठानों से गूंज उठता है। भक्त यहां दर्शन के साथ-साथ आध्यात्मिक अनुभव की प्राप्ति के लिए आते हैं।