शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर के वैज्ञानिकों ने इस पहल की शुरुआत की है। प्रोजेक्ट के तहत 7 से 8 महीने की उम्र वाली 20 मादा और 4 नर सानेन बकरियां स्विट्जरलैंड से लाई गई हैं। यह पहली बार है जब किसी सरकारी संस्थान ने इस विदेशी नस्ल को भारत में संगठित तरीके से शामिल किया है।
इस बकरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी दूध देने की क्षमता है। सानेन बकरी एक दिन में करीब 7 लीटर तक दूध दे सकती है जो इसे अन्य बकरियों से अलग बनाता है। यही वजह है कि इसे दूध की रानी भी कहा जाता है। खास बात यह भी है कि इसका दूध A2 कैटेगरी में आता है जो पोषण के लिहाज से काफी बेहतर माना जाता है और बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है।
इस नस्ल का संबंध महात्मा गांधी से भी जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि गांधी जी इस बकरी को भारत लेकर आए थे और इसकी खासियत को देखते हुए इसे गरीब आदमी की गाय कहा था। कम लागत में अधिक दूध उत्पादन करने की क्षमता के कारण यह छोटे किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए बेहद फायदेमंद मानी जाती है।
गाय के मुकाबले सानेन बकरी का पालन करना आसान होता है। इसे कम जगह की जरूरत होती है और इसका खानपान भी अपेक्षाकृत सस्ता होता है। यही वजह है कि सीमित संसाधनों वाले किसान भी इसे आसानी से पाल सकते हैं और अच्छी कमाई कर सकते हैं।
फिलहाल इन बकरियों को सीधे किसानों को नहीं दिया जाएगा। पहले जम्मू कश्मीर की जलवायु में इनके अनुकूलन का अध्ययन किया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह नस्ल यहां के वातावरण में बेहतर प्रदर्शन कर सके। इसके बाद ही इन्हें बड़े स्तर पर किसानों और युवाओं में वितरित किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो सानेन बकरी जम्मू कश्मीर में डेयरी सेक्टर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।