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भामाशाहों के सहयोग से चल रही सरकारी शिक्षा अब समय है स्थायी समाधान तलाशने का


नई दिल्ली ।
सरकारी शिक्षा किसी भी देश के विकास की सबसे मजबूत नींव मानी जाती है। जब सरकार स्वयं शिक्षा को प्राथमिकता देती है तभी समाज का हर वर्ग समान अवसर प्राप्त कर पाता है। लेकिन यदि सरकारी स्कूलों की बुनियादी जरूरतें भी दानदाताओं के भरोसे पूरी होने लगें तो यह केवल सहयोग की कहानी नहीं बल्कि व्यवस्था की गंभीर कमजोरी का संकेत भी बन जाती है। राजस्थान में वर्षों से चल रही भामाशाह योजना इसी सवाल को फिर से चर्चा के केंद्र में ले आई है।

सरकारी स्कूलों में फर्नीचर कंप्यूटर कक्षाओं का निर्माण रंग रोगन बिजली पानी खेल सामग्री और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए बड़ी संख्या में समाजसेवी और दानदाता आगे आते हैं। सरकार ऐसे दानदाताओं को सम्मानित भी करती है जो शिक्षा के लिए एक निश्चित राशि का योगदान देते हैं। समाज के प्रति उनका यह समर्पण निश्चित रूप से प्रेरणादायक है लेकिन यह भी उतना ही बड़ा प्रश्न है कि आखिर सरकारी स्कूलों को अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी दूसरों का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है।

आज कई सरकारी विद्यालय ऐसे हैं जहां रखरखाव के लिए मिलने वाला वार्षिक बजट बेहद कम है। इतनी सीमित राशि से भवनों की मरम्मत बिजली पानी साफ सफाई इंटरनेट और अन्य आवश्यक खर्च पूरे करना लगभग असंभव हो जाता है। यही कारण है कि स्कूल प्रबंधन को हर छोटी बड़ी जरूरत के लिए भामाशाहों की ओर देखना पड़ता है। कई बार शिक्षक स्वयं अपनी जेब से भी खर्च उठाते हैं ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

यह परंपरा केवल दानदाताओं तक सीमित नहीं है। शिक्षा व्यवस्था में ऐसे हजारों लोग भी हैं जो बिना उचित वेतन के वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। बीएड और बीएसटीसी के विद्यार्थी शिक्षण प्रशिक्षण के दौरान बिना किसी मानदेय के स्कूलों में पढ़ाते हैं। विद्यार्थी मित्र विद्यालय सहायक पैरा टीचर प्रबोधक और अन्य संविदाकर्मी भी कम वेतन और अस्थिर भविष्य के बावजूद शिक्षा व्यवस्था को संभाले हुए हैं। निजी स्कूलों में कार्यरत लाखों शिक्षक भी बेहद कम वेतन पर बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं। यदि देखा जाए तो ये सभी अपने श्रम और समर्पण से शिक्षा जगत के वास्तविक भामाशाह हैं।

समाज का सहयोग हमेशा स्वागत योग्य होता है लेकिन किसी भी सार्वजनिक व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी समाज पर नहीं छोड़ी जा सकती। यदि सरकारी शिक्षा लगातार दान और अस्थायी संसाधनों पर निर्भर होती गई तो भविष्य में सरकारी स्कूल निजी संस्थानों की प्रतिस्पर्धा में और कमजोर होते जाएंगे। इसका सबसे अधिक नुकसान गरीब और मध्यम वर्ग के उन परिवारों को होगा जिनकी उम्मीदें आज भी सरकारी शिक्षा पर टिकी हैं।

समय की मांग है कि सरकार शिक्षा बजट में पर्याप्त वृद्धि करे। स्कूलों के रखरखाव के लिए स्थायी और पर्याप्त राशि उपलब्ध कराई जाए। शिक्षकों और कर्मचारियों की नियमित भर्ती सुनिश्चित हो तथा सभी विद्यालयों में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। भामाशाहों का योगदान हमेशा सम्माननीय रहेगा लेकिन सरकारी शिक्षा व्यवस्था की असली ताकत मजबूत नीतियां पर्याप्त बजट और स्थायी संसाधन ही हो सकते हैं। जब सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी मजबूती से निभाएगी तभी सरकारी स्कूल वास्तव में देश के भविष्य को नई दिशा देने में सक्षम बन पाएंगे।

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