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GWALIOR COURT: जेसी मिल प्रकरण में हाईकोर्ट सख्त, परिसमापक से मांगे डाक-कूरियर के पुख्ता सबूत

GWALIOR COURT

HIGHLIGHTS:

  • हाईकोर्ट ने परिसमापक की कार्यप्रणाली पर जताई आपत्ति
  • केवल डिस्पैच रजिस्टर को माना अपर्याप्त
  • डाक रसीद और प्राप्ति पावती पेश करने के निर्देश
  • कूरियर सेवा पर ‘प्रेजम्पशन’ का कानूनी आधार मांगा
  • अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित
GWALIOR COURT
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GWALIOR COURT: ग्वालियर। वर्ष 1997 से लंबित जेसी मिल कंपनी पिटीशन मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर एकल पीठ ने आधिकारिक परिसमापक की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है। बता दें कि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल डिस्पैच रजिस्टर प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि डाक और कूरियर से भेजे गए पत्रों की विधिवत रसीदें एवं प्राप्ति पावती भी रिकॉर्ड पर पेश करना अनिवार्य है।

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केवल रजिस्टर से नहीं चलेगा काम

सुनवाई के दौरान परिसमापक की ओर से डिस्पैच रजिस्टर तो प्रस्तुत किया गया, लेकिन उसमें डाक रसीदें संलग्न नहीं थीं और न ही संबंधी पावती दर्ज थी। जिन पत्रों को कूरियर से भेजा जाना बताया गया, उनके संबंध में भी कोई प्रमाण न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया गया। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की।

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न्यायालय ने 10 दिन का समय देते हुए निर्देश दिया कि सभी डाक रसीदें, प्राप्ति पावती और कूरियर से संबंधित दस्तावेज अनिवार्य रूप से रिकॉर्ड पर पेश किए जाएं।

कूरियर सेवा पर ‘प्रेजम्पशन’ किस धारा में?

अदालत ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि कूरियर के माध्यम से भेजे गए पत्रों के मामले में सेवा की धारणा किस कानूनी प्रावधान के तहत मानी जा सकती है। न्यायालय ने संकेत दिया कि केवल उल्लेख के आधार पर सेवा मान लेना उचित नहीं होगा, जब तक विधिसम्मत प्रमाण उपलब्ध न हो।

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कई पक्षकार रहे मौजूद

सुनवाई के दौरान एमपीआईडीसी, State Bank of India, UCO Bank, राज्य शासन, कर्मचारियों और श्रमिकों की ओर से अधिवक्ता उपस्थित रहे। बैंकों ने लंबित याचिका में अपने आवेदन भी प्रस्तुत किए हैं। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित की गई है।

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1997 से लंबित है कंपनी पिटीशन

जेसी मिल से जुड़ी कंपनी पिटीशन वर्ष 1997 से विचाराधीन है। मजदूरों की देनदारी को लेकर विवाद जारी है। राज्य शासन ने मिल की संपत्ति की नीलामी कर बकाया भुगतान की पहल की थी, लेकिन मामला न्यायालय में लंबित होने के कारण अंतिम निर्णय नहीं हो सका।

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