विभाजन के बाद सीमा निर्धारण के कारण माधोपुर और फिरोजपुर जैसे महत्वपूर्ण हेडवर्क्स भारत के हिस्से में आए। इन संरचनाओं से उन नहरों का संचालन होता था जिनके माध्यम से पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र के बड़े हिस्से में सिंचाई होती थी। अंतरिम व्यवस्था की अवधि समाप्त होने और नया समझौता नहीं होने के बाद पूर्वी पंजाब सरकार ने 1 अप्रैल 1948 से पानी की आपूर्ति रोकने का निर्णय लिया। उस समय यह कदम राज्य स्तर पर उठाया गया था और इसका उद्देश्य अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध जल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना बताया गया।
इतिहासकारों और जल नीति विशेषज्ञों के अनुसार, इस निर्णय के बाद पाकिस्तान के सामने गंभीर चुनौती उत्पन्न हुई क्योंकि उसकी कृषि भूमि का एक हिस्सा इन नहरों पर निर्भर था। उस समय दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए सैन्य विकल्प के बजाय वार्ता को प्राथमिकता दी गई। इसी कारण दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू हुई और समाधान तलाशने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण इस विषय पर पूर्वी पंजाब सरकार से अलग माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, नेहरू ने इस कदम के मानवीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने माना कि कृषि के लिए पानी रोकना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता और ऐसे कदम केवल असाधारण परिस्थितियों, जैसे युद्ध, में ही विचारणीय हो सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि इस प्रकार की कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, पूर्वी पंजाब के नेतृत्व का तर्क था कि विभाजन के बाद नई परिस्थितियों में राज्य को अपने क्षेत्र से बहने वाले जल पर कानूनी अधिकार प्राप्त था और बिना किसी नए समझौते के पूर्व व्यवस्था को जारी रखना आवश्यक नहीं था। इस प्रकार केंद्र और राज्य के दृष्टिकोण में प्राथमिकताओं का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। जहां राज्य सरकार स्थानीय परिस्थितियों और संसाधनों के नियंत्रण पर जोर दे रही थी, वहीं केंद्र सरकार व्यापक कूटनीतिक और मानवीय पहलुओं को भी समान महत्व दे रही थी।
करीब पांच सप्ताह तक चले इस विवाद का समाधान मई 1948 में नई दिल्ली में आयोजित अंतर-डोमिनियन सम्मेलन के दौरान निकला। बातचीत के बाद भारत ने पाकिस्तान की ओर पानी की आपूर्ति दोबारा शुरू कर दी। इसी प्रक्रिया ने भविष्य में दोनों देशों के बीच स्थायी जल व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आधार तैयार किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि 1948 का यह विवाद दक्षिण एशिया के जल इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। बाद के वर्षों में दोनों देशों के बीच नदी जल प्रबंधन को लेकर जो संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई, उसकी प्रारंभिक पृष्ठभूमि इसी घटनाक्रम से जुड़ी मानी जाती है। यह प्रकरण आज भी सीमा-पार जल संसाधनों के प्रबंधन, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है।