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इंदौर नवकारसी विवाद गरमाया: सोशल मीडिया पर ‘कोल्ड वॉर’, संतों की एंट्री के बाद भी नहीं थमा टकराव


नई दिल्ली। इंदौर में महावीर जन्म कल्याणक के अवसर पर आयोजित नवकारसी कार्यक्रम से शुरू हुआ विवाद अब गहराता जा रहा है। लगभग एक महीने बाद भी यह मामला शांत होने के बजाय और उलझता नजर आ रहा है। श्वेतांबर जैन समाज के विभिन्न गुटों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं और यह विवाद अब सोशल मीडिया तक फैल गया है, जहां आरोप-प्रत्यारोप और प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है।
विवाद को और हवा तब मिली जब महासंघ की ओर से 29 दिन बाद जारी स्पष्टीकरण को समाज के कई वर्गों ने असंतोषजनक बताया। लोगों का मानना है कि इस बयान में संतुलन और संवेदनशीलता की कमी रही, जिससे स्थिति साफ होने के बजाय और अधिक सवाल खड़े हो गए। इस बीच, मानहानि नोटिस दिए जाने से मामला और अधिक गंभीर हो गया है।
विवाद को शांत करने के प्रयास में जैन संत आचार्य मुक्तिसागर सूरि ने हस्तक्षेप किया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से समाज के दोनों पक्षों से संयम और संवाद बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर के सिद्धांत—क्षमा, सहिष्णुता और अहिंसा ही इस स्थिति से बाहर निकलने का मार्ग दिखा सकते हैं। उनका सवाल था कि “आखिर कब तक हम इस तरह आपस में उलझते रहेंगे?”
आचार्य ने अपने संदेश में यह भी कहा कि मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उसका समाधान टकराव नहीं बल्कि संवाद और समझ से होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे शरीर के अंग आपस में टकराने पर भी हम उन्हें दंडित नहीं करते, उसी तरह समाज में भी सहनशीलता जरूरी है। उन्होंने सभी जैन संप्रदायों से भविष्य में एकजुट होकर आयोजन करने का सुझाव दिया, ताकि समाज में एकता का संदेश जाए।
दरअसल, यह पूरा विवाद नवकारसी कार्यक्रम के दौरान ट्रैक्टर खड़े होने से शुरू हुआ था, जिसे बाद में इवेंट कंपनी की गलती बताया गया। कंपनी संचालक ने लिखित में माफी भी मांग ली थी, लेकिन इसके बावजूद मामला शांत नहीं हुआ। उल्टा, बाद में जारी पत्र और आरोपों को लेकर नई बहस छिड़ गई।
इस बीच, श्री नाकोड़ा जैन कॉन्फ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अक्षय जैन द्वारा महासंघ को 50 लाख रुपए का मानहानि नोटिस भेजे जाने से विवाद और बढ़ गया है। समाज के कई वरिष्ठों का मानना है कि यह विवाद कुछ लोगों के अहंकार और नेतृत्व में समन्वय की कमी के कारण इतना लंबा खिंच गया।
समाज के भीतर गुटबाजी और आंतरिक राजनीति की चर्चा भी अब खुलकर होने लगी है। कई लोग इसे संगठनात्मक वर्चस्व की लड़ाई बता रहे हैं, जिससे सामाजिक समरसता प्रभावित हो रही है।
वरिष्ठ नागरिकों और बुद्धिजीवियों ने भी दोनों पक्षों से अपील की है कि वे अहंकार छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाएं। उनका कहना है कि यह विवाद केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब पूरे जैन समाज की एकता और सौहार्द पर असर डाल रहा है।
फिलहाल, संतों की अपील के बावजूद विवाद थमता नजर नहीं आ रहा, लेकिन उम्मीद अब भी बनी हुई है कि संवाद और समझ के जरिए समाधान निकलेगा और समाज एक बार फिर एकजुट होकर आगे बढ़ेगा।

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