दो राज्यों की आर्थिक जीवनरेखा पर संकट
यह पुल केवल आम लोगों के आवागमन के लिए ही नहीं, बल्कि औद्योगिक गतिविधियों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। कोयला खदानों से लेकर जैतहरी स्थित मोजरबेयर पावर प्लांट तक कच्चे माल की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। बिलासपुर और भिलाई से आने वाला लौह अयस्क और कोयला इसी पुल के जरिए मध्यप्रदेश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचता है। ऐसे में इस पुल की खराब स्थिति से दो राज्यों की आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।
सतह उखड़ी, सरिए बाहर खतरे की घंटी
पुल की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि इसकी ऊपरी सतह पूरी तरह उखड़ गई है और कंक्रीट के अंदर से लोहे के सरिए बाहर दिखाई दे रहे हैं। रेलिंग और साइड वॉल कई जगह से टूट चुकी हैं, जिससे वाहन चालकों के लिए जोखिम और बढ़ गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि लोक निर्माण विभाग केवल औपचारिक मरम्मत करता है, जो भारी ट्रैफिक के चलते कुछ ही दिनों में फिर खराब हो जाती है।
1980 में रखी गई थी नींव, अब तक नहीं हुआ ठोस जीर्णोद्धार
इस पुल की आधारशिला 1980 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने रखी थी और 1982 में इसका लोकार्पण हुआ था। चार दशक बीत जाने के बाद भी इसका स्थायी समाधान नहीं किया गया है। स्थानीय नागरिक अब केवल मरम्मत नहीं, बल्कि नए और मजबूत पुल के निर्माण की मांग कर रहे हैं।
अधिकारियों का आश्वासन जल्द शुरू होगा काम
मामले की गंभीरता को देखते हुए पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने सेतु निगम को पुल की स्थिति का निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं। विभाग का कहना है कि एक-दो दिनों में मरम्मत कार्य शुरू कर दिया जाएगा। हालांकि, लोगों का कहना है कि अस्थायी मरम्मत के बजाय स्थायी समाधान जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी बड़ी जनहानि से बचा जा सके।