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जनपद कार्यालय में हंगामा मंत्री के भाई ने सीईओ को दी जान से मारने की धमकी


नई दिल्ली । मध्य प्रदेश में एक बार फिर सत्ता से जुड़े लोगों के परिजनों की कथित दबंगई को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। इस बार मामला नागर सिंह चौहान के भाई इंदरसिंह चौहान से जुड़ा है, जिन पर जनपद पंचायत कार्यालय में महिला सीईओ को धमकाने और अभद्र व्यवहार करने के गंभीर आरोप लगे हैं। घटना ने प्रशासनिक तंत्र की सुरक्षा और कार्यस्थल पर अधिकारियों की स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार यह घटना 22 अप्रैल की है, जब प्रिया काग अपने कार्यालय पहुंचीं। आरोप है कि कन्या विवाह योजना के तहत पहले से विवाहित आवेदकों के आवेदन निरस्त किए जाने को लेकर इंदरसिंह चौहान नाराज हो गए। इसी बात को लेकर उन्होंने कार्यालय में हंगामा किया और सीईओ के साथ अभद्रता की।

सीईओ प्रिया काग का कहना है कि इंदरसिंह चौहान ने उन्हें न सिर्फ धमकाया बल्कि मारने के लिए दौड़े भी। उन्होंने कथित रूप से कहा कि तेरे दांत तोड़ दूंगा तुझे जिंदा गाड़ दूंगा और यहां सब कुछ उनकी मर्जी से चलेगा। इस दौरान उन्होंने उनका रास्ता भी रोका जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। मौके पर मौजूद लेखाधिकारी सावन भिंडे ने बीच बचाव कर स्थिति को संभाला।

घटना के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इंदरसिंह चौहान के खिलाफ विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया है। मध्य प्रदेश पुलिस ने बीएनएस की धाराओं के तहत कार्रवाई करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जहां से उन्हें जमानत मिल गई। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक व्यवस्था और कानून व्यवस्था को लेकर बहस छेड़ दी है।

बताया जा रहा है कि इंदरसिंह चौहान पहले भी विवादों में रह चुके हैं। खाद वितरण को लेकर एक सेल्समैन से मारपीट और कार्यालय में लगे सीसीटीवी कैमरे हटवाने जैसे आरोप पहले भी सामने आ चुके हैं। ऐसे में यह नया मामला उनके पुराने विवादों को फिर से चर्चा में ले आया है।

वहीं इस पूरे विवाद पर मंत्री नागर सिंह चौहान ने खुद को अलग बताते हुए कहा कि उनका अपने भाई से लंबे समय से कोई संबंध नहीं है और वह अपने निजी मामलों के लिए खुद जिम्मेदार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कानून अपना काम करेगा और जो भी उचित कार्रवाई होगी वह की जाएगी।

यह मामला न सिर्फ राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है बल्कि इससे कार्यस्थल पर महिला अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों को भी कई बार दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ता है, जो व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

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