राष्ट्रपति शीनबॉम ने अपनी नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी सरकार इस आदेश के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का अध्ययन कर रही है। खासतौर पर इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि इसका असर अमेरिका में काम कर रहे लाखों मैक्सिकन नागरिकों द्वारा अपने परिवारों को भेजे जाने वाले पैसों यानी रेमिटेंस पर कितना पड़ेगा। मैक्सिको की अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत मानी जाती है और हर साल अरबों डॉलर देश में आते हैं।
मैक्सिको सरकार के अनुसार, वित्त मंत्रालय और अमेरिका में नए मैक्सिकन राजदूत Roberto Lajous इस मामले का संयुक्त रूप से अध्ययन कर रहे हैं। शुरुआती समीक्षा में फिलहाल किसी बड़े खतरे के संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। अधिकारियों का मानना है कि अगर बैंकिंग सेवाओं और पैसों के लेन-देन पर ज्यादा निगरानी बढ़ी, तो इसका असर प्रवासी समुदाय पर पड़ सकता है।
अमेरिका के इस नए आदेश में बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ग्राहकों की नागरिकता और इमिग्रेशन स्थिति से जुड़े संदिग्ध संकेतों की निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत सीमा-पार धन भेजने, बैंक खाते खोलने और वित्तीय सेवाओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पहचान पत्रों की जांच और सख्त की जाएगी। माना जा रहा है कि इससे बड़ी संख्या में प्रवासियों की वित्तीय गतिविधियां जांच के दायरे में आ सकती हैं।
व्हाइट हाउस के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने 19 मई को इस आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। प्रशासन का तर्क है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों को बैंकिंग सुविधाएं और ऋण देना वित्तीय व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ट्रंप ने कहा कि कई प्रवासियों के पास स्थायी रोजगार नहीं होता और उन पर निर्वासन का खतरा बना रहता है। ऐसे में उन्हें ऋण देना बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।
इसी बीच अमेरिकी कांग्रेस में विदेश भेजे जाने वाले पैसों यानी रेमिटेंस पर 5 प्रतिशत टैक्स लगाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा तेज हो गई है। फिलहाल केवल नकद लेन-देन पर 1 प्रतिशत टैक्स लागू है। मैक्सिको सरकार ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि यह प्रवासियों पर “दोहरी टैक्स वसूली” जैसा होगा, क्योंकि वे पहले ही अमेरिका में टैक्स का भुगतान करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ने प्रवासियों के वित्तीय लेन-देन पर और सख्ती की, तो इसका असर सिर्फ मैक्सिको ही नहीं बल्कि कई लैटिन अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा अमेरिका और मैक्सिको के बीच बड़ा राजनीतिक और आर्थिक विषय बन सकता है।