नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान उस समय असामान्य स्थिति पैदा हो गई, जब एक वकील ने अदालत की कार्यवाही के बीच अभद्र व्यवहार करते हुए न्यायिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। मामले की सुनवाई जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ कर रही थी। इसी दौरान वकील ने न्यायालय के प्रति अनुचित आचरण किया, जिससे कुछ समय के लिए कोर्टरूम का वातावरण तनावपूर्ण हो गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप करना पड़ा और संबंधित वकील को अदालत कक्ष से बाहर ले जाया गया।
घटना उस समय हुई जब संबंधित याचिका पर सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान वकील ने अदालत के समक्ष असामान्य तरीके से अपनी बात रखनी शुरू की। न्यायाधीशों के साथ संवाद के दौरान उसने ऐसी भाषा और व्यवहार अपनाया जिसे अदालत की गरिमा के विपरीत माना गया। इसके बाद उसने अपने पास मौजूद केस से जुड़े दस्तावेज हवा में उछाल दिए, जिससे कुछ देर के लिए कोर्टरूम में अफरा-तफरी जैसी स्थिति बन गई। अदालत में मौजूद अधिवक्ता और अन्य लोग इस घटनाक्रम से हैरान रह गए।
सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल कार्रवाई करते हुए संबंधित व्यक्ति को न्यायालय कक्ष से बाहर निकाल दिया। घटना के बाद पीठ ने संयमित रुख अपनाते हुए कहा कि संबंधित व्यक्ति मानसिक और भावनात्मक तनाव की स्थिति में प्रतीत होता है तथा उसके प्रति सहानुभूति रखी जानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह तत्काल उसके खिलाफ अलग से कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करना चाहती। हालांकि संबंधित याचिका पर विचार करने के बाद पीठ ने कहा कि विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त कानूनी आधार नहीं पाया गया।
इस घटना ने एक बार फिर न्यायालयों में पेशेवर आचरण और अधिवक्ताओं की जिम्मेदारियों को लेकर चर्चा तेज कर दी है। कानूनी व्यवस्था में अधिवक्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अदालत की गरिमा, अनुशासन और पेशेवर मानकों का पूरी तरह पालन करें। यदि कोई अधिवक्ता इन मानकों का उल्लंघन करता है तो उसके विरुद्ध अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। ऐसी स्थिति में संबंधित बार काउंसिल प्रारंभिक जांच कर मामले को अनुशासनात्मक समिति के समक्ष भेज सकती है।
यदि जांच में पेशेवर कदाचार सिद्ध होता है तो संबंधित अधिवक्ता को चेतावनी, निश्चित अवधि तक वकालत पर रोक या गंभीर मामलों में बार काउंसिल की सूची से नाम हटाने जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि किसी भी कार्रवाई का निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही लिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अदालत की कार्यवाही के दौरान इस प्रकार की घटनाएं अत्यंत दुर्लभ मानी जाती हैं। अतीत में भी कुछ मामलों में अदालत की अवमानना या अनुचित व्यवहार के आरोप सामने आए हैं, जिनमें न्यायपालिका ने कानून के अनुरूप कार्रवाई की है। ताजा घटना ने न्यायालयों में अनुशासन, पेशेवर नैतिकता और न्यायिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने की आवश्यकता को एक बार फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है।