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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अब आपके दिल की धड़कनों को पढ़ेंगे डॉक्टर, हार्ट अटैक के खतरों पर लगेगी लगाम।


नई दिल्ली। चिकित्सा और प्रौद्योगिकी के संगम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आधुनिक समस्याओं का समाधान नवाचार में ही छिपा है। झारखंड स्थित आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के वैज्ञानिकों ने स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक ऐसी तकनीकी छलांग लगाई है, जो भविष्य में हजारों जिंदगियां बचाने की क्षमता रखती है।

संस्थान के कंप्यूटर साइंस विभाग के विशेषज्ञों ने ‘इकोपल्स’ (EcoPulse) नामक एक आधुनिक प्रणाली विकसित की है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग कर हृदय संबंधी रोगों की पहचान को बेहद सरल और सटीक बना देगी। यह तकनीक उन लोगों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है, जो समय पर दिल की बीमारियों का पता न चल पाने के कारण जोखिम में रहते हैं। इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह जटिल जांच प्रक्रियाओं को न केवल सस्ता बनाती है, बल्कि इसकी सटीकता किसी विशेषज्ञ डॉक्टर के विश्लेषण के बराबर है।

‘इकोपल्स’ की कार्यप्रणाली इसे दुनिया की मौजूदा तकनीकों से अलग खड़ा करती है। आमतौर पर हृदय की जांच के लिए किए जाने वाले परीक्षणों की रिपोर्ट को समझना आम आदमी तो क्या, कई बार चिकित्सा कर्मियों के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है।

लेकिन यह नई तकनीक ‘सेल्फ-सुपरवाइज्ड लर्निंग’ मॉडल पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि यह मशीन बिना किसी पुराने रिकॉर्ड के भी हृदय की धड़कनों और रक्त पंप करने की क्षमता में आने वाले सूक्ष्म बदलावों को तुरंत भांप लेती है। इतना ही नहीं, वर्चुअल रियलिटी यानी आभासी वास्तविकता का उपयोग करके डॉक्टर मरीज के दिल की कार्यप्रणाली को 3D प्रारूप में देख सकते हैं। इससे दिल के किसी भी हिस्से में होने वाली रुकावट या कमजोरी को गहराई से समझना और उसका तत्काल उपचार शुरू करना संभव हो जाएगा।

इस तकनीक का सबसे क्रांतिकारी प्रभाव भारत के ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे पर पड़ने वाला है। हमारे देश के दूरदराज के क्षेत्रों में अक्सर अनुभवी कार्डियोलॉजिस्ट की कमी होती है, जिससे हृदय रोग के शुरुआती लक्षणों की पहचान नहीं हो पाती। ‘इकोपल्स’ इस अंतर को पाटने का काम करेगा। इसकी सरलता का लाभ उठाकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी भी किसी विशेषज्ञ की तरह सटीक हृदय जांच कर सकेंगे।

यह तकनीक जटिल डेटा को इतने सरल विजुअल्स में बदल देती है कि कोई भी पैरामेडिकल स्टाफ समय रहते जीवनरक्षक निर्णय लेने में सक्षम हो जाएगा। यह नवाचार ग्रामीण भारत के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, जहाँ अब विशेषज्ञ सेवाओं के अभाव में इलाज में देरी नहीं होगी।

प्रोफेसर ए.सी.एस. राव के नेतृत्व में तैयार किए गए इस प्रोजेक्ट की गंभीरता को समझते हुए राष्ट्रीय स्तर पर भी इसे भारी समर्थन मिला है। अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन ने इस स्वदेशी तकनीक के विकास के लिए 47 लाख रुपये की महत्वपूर्ण आर्थिक सहायता प्रदान की है।

इस प्रोजेक्ट का मुख्य लक्ष्य चिकित्सा क्षेत्र को ‘स्मार्ट’ और ‘पारदर्शी’ बनाना है, ताकि तकनीक और मरीज के बीच कोई पर्दा न रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आविष्कार न केवल भारत में हृदय रोगों से होने वाली मृत्यु दर को कम करने में सहायक होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चिकित्सा इमेजिंग के क्षेत्र में एक नया मानक स्थापित करेगा। यह तकनीक इस बात का प्रमाण है कि भारतीय वैज्ञानिक अपनी प्रतिभा से वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान निकालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

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