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अवैध खनन मामला: जब्त होने थे वाहन, लेकिन भिंड-मुरैना-श्योपुर में जुर्माना लेकर छोड़े गए

चंबल । चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन और परिवहन के खिलाफ चल रही कार्रवाई एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। परिवहन विभाग के उच्च स्तर से मिले पत्र के बाद यह खुलासा हुआ है कि मुरैना, भिंड और श्योपुर जिलों में नियमों के उल्लंघन के बावजूद बड़ी संख्या में वाहनों को जब्त करने के बजाय केवल जुर्माना वसूलकर छोड़ दिया गया। परिवहन विभाग के सचिव मनीष सिंह द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीर माना जाएगा। पत्र में संबंधित जिलों के अधिकारियों से कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड मांगा गया है और यह पूछा गया है कि जब नियमों के तहत वाहन राजसात किए जाने चाहिए थे, तो उन्हें क्यों छोड़ा गया। जानकारी के अनुसार, श्योपुर जिले में पिछले छह दिनों में 11 वाहन बिना नंबर प्लेट के पकड़े गए, जिनमें से केवल एक जेसीबी को जब्त किया गया, जबकि बाकी 10 वाहनों को जुर्माना लेकर छोड़ दिया गया। इसी तरह मुरैना में भी 12 ट्रैक्टरों और अन्य 54 वाहनों पर जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ दिया गया, जबकि केवल दो ट्रैक्टरों को जब्त किया गया। भिंड जिले की स्थिति भी इसी तरह चिंताजनक बताई जा रही है, जहां 28 से अधिक बिना नंबर प्लेट वाले वाहन पकड़े गए। इनमें अधिकांश ट्रकों पर केवल 500 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ दिया गया। इस पूरे मामले ने प्रशासनिक कार्रवाई की गंभीरता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्र में यह भी कहा गया है कि जिन अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए केवल जुर्माना वसूला, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। परिवहन सचिव ने अपने निर्देश में यह भी स्पष्ट किया है कि अवैध खनन गतिविधियों में लगे सभी फर्जी, बिना नंबर प्लेट और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों को तुरंत जब्त किया जाए और मोटर वाहन अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत राजसात की कार्रवाई की जाए। गौरतलब है कि चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्ती दिखाई है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई की प्रभावशीलता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। अब इस ताजा खुलासे के बाद यह मामला और अधिक गंभीर हो गया है, क्योंकि यह न केवल नियमों के पालन पर बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी सीधा सवाल खड़ा करता है।

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कागजों में दो बार रिटायर किए गए चौकीदार को फिर मिली नौकरी

ग्वालियर । ग्वालियर खंडपीठ में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने वन विभाग के एक विवादित और प्रशासनिक मनमानेपन से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने एक दैनिक वेतनभोगी चौकीदार को राहत देते हुए उसके पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है और विभाग द्वारा जारी दो अलग-अलग रिटायरमेंट आदेशों को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। यह मामला दतिया वन परिक्षेत्र में कार्यरत साहब सिंह ठाकुर से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 1986 में चौकीदार के पद पर नियुक्त किया गया था। लगभग 31 वर्षों तक सेवा देने के बाद उन्हें वर्ष 2017 में नियमित कर दिया गया था। इसी दौरान उनकी वास्तविक उम्र को लेकर विवाद खड़ा हुआ। विभाग ने जब उनकी आयु निर्धारण के लिए जिला मेडिकल बोर्ड को अधिकृत किया, तो 7 अप्रैल 2017 को विशेषज्ञ डॉक्टरों के पैनल ने वैज्ञानिक जांच के आधार पर उनकी उम्र 50 वर्ष निर्धारित की। इस रिपोर्ट के अनुसार उनकी सेवानिवृत्ति वर्ष 2029 में होनी चाहिए थी। हालांकि, इसके बावजूद वन विभाग ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए अपनी ओर से उनकी उम्र 60 वर्ष मान ली और उन्हें उसी वर्ष 2017 में ही रिटायर करने का आदेश जारी कर दिया। कर्मचारी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां अदालत ने प्रारंभिक रूप से उस पर रोक लगा दी। लेकिन इसके बाद विभाग ने एक और विवादित कदम उठाते हुए 17 अप्रैल 2018 को दूसरा आदेश जारी कर दिया, जिसमें उनकी उम्र 62 वर्ष मानकर फिर से सेवा समाप्त करने का प्रयास किया गया। इस तरह कागजों पर एक ही कर्मचारी को दो बार रिटायर दिखा दिया गया। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने वन विभाग के रवैये पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब विभाग ने स्वयं मेडिकल बोर्ड से आयु निर्धारण कराया था, तो उसकी वैज्ञानिक रिपोर्ट को प्रशासनिक अधिकारी मनमाने तरीके से खारिज नहीं कर सकते। अदालत ने यह भी कहा कि विभाग किसी भी प्रकार का वैकल्पिक जन्म प्रमाण पत्र या विरोधी मेडिकल रिपोर्ट पेश करने में विफल रहा, जिससे मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर संदेह किया जा सके। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट निर्देश दिया कि साहब सिंह ठाकुर को उनकी वास्तविक सेवा अवधि यानी अप्रैल 2029 तक सम्मानपूर्वक नौकरी पर रखा जाए। साथ ही उन्हें बकाया वेतन, एरियर और सभी सेवा लाभ भी तत्काल प्रभाव से दिए जाएं। इस फैसले को प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, जिसने सरकारी विभागों की मनमानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शादी समारोह में हत्या केस: ग्वालियर में आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा

ग्वालियर । ग्वालियर जिले के सिंधिया नगर स्थित “गड्ढे वाला मोहल्ला” में वर्ष 2024 में हुए चर्चित सोनू आदिवासी हत्याकांड में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अठारहवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पारस कुमार जैन की अदालत ने मामले में पिता-पुत्र समेत तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही प्रत्येक आरोपी पर पांच-पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। यह मामला 25-26 अप्रैल 2024 की दरमियानी रात का है, जब सोनू आदिवासी अपने रिश्तेदार की बेटी की शादी समारोह में शामिल होने के लिए सिंधिया नगर पहुंचा था। शादी का माहौल चल रहा था, लेकिन इसी दौरान पुरानी रंजिश ने एक दर्दनाक वारदात का रूप ले लिया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सोनू शादी समारोह के दौरान टेंट के पीछे स्थित किराना दुकान के पास गया था, तभी पहले से घात लगाए बैठे आरोपियों ने उसे घेर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आरोपी उसे धमकाते हुए कह रहे थे कि “तू दूसरों के मामलों में ज्यादा नेता बनता है, आज तुझे सबक सिखाते हैं।” जांच में यह सामने आया कि घटना से लगभग 15-20 दिन पहले आरोपियों का किसी अन्य व्यक्ति से विवाद हुआ था, जिसमें सोनू ने बीच-बचाव कर मामला शांत कराया था। इसी बात को लेकर आरोपी उससे रंजिश रखने लगे थे और बाद में इस हत्या की योजना बनाई गई। घटना के दौरान अनिल आदिवासी और उसके पिता वीरू आदिवासी ने सोनू के हाथ पकड़ लिए, ताकि वह किसी तरह बचाव न कर सके। इसी बीच मुख्य आरोपी सुनील आदिवासी ने लोहे का धारदार चाकू निकालकर सोनू के सीने और पसलियों पर कई वार कर दिए। हमले के बाद सोनू गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा और शादी समारोह स्थल पर अफरा-तफरी मच गई। घटना के बाद आरोपी मौके से फरार हो गए। परिजन घायल सोनू को तत्काल अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन गंभीर आंतरिक चोटों के कारण डॉक्टरों ने उसे बचा नहीं सके और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस जघन्य हत्या के मामले में अदालत में पेश गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को दोषी पाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह हमला पूर्व नियोजित था और बदले की भावना से किया गया था। फैसले के बाद पीड़ित पक्ष ने राहत की सांस ली है, जबकि पुलिस और प्रशासन ने भी अदालत के निर्णय को न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।

पानी, नमी और फटने से सुरक्षित होंगे नए बैंक नोट, प्लास्टिक करेंसी को लेकर भारत में नई पहल तेज

नई दिल्ली । भारत की मौद्रिक प्रणाली में एक बड़े बदलाव की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है, जहां भारतीय रिजर्व बैंक देश में प्लास्टिक आधारित बैंक नोटों को शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यह कदम करीब 14 साल पुराने प्रस्ताव को फिर से सक्रिय करने के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर हाल के उच्च स्तरीय बैठकों में गंभीर विचार-विमर्श हुआ है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में इस संभावित बदलाव को लेकर लोगों और वित्तीय विशेषज्ञों के बीच उत्सुकता बढ़ गई है। यदि यह योजना लागू होती है तो भारतीय करेंसी के स्वरूप और उपयोग प्रणाली में एक ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिल सकता है। सूत्रों के अनुसार, आरबीआई की हालिया बैठकों में प्लास्टिक नोटों को लेकर पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की संभावना पर चर्चा की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य मौजूदा कागजी नोटों की छपाई और रखरखाव पर होने वाले भारी खर्च को कम करना बताया जा रहा है। वर्तमान में हर साल बड़ी संख्या में नोट खराब होकर चलन से बाहर हो जाते हैं, जिन्हें फिर से छापने में हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है। इस आर्थिक बोझ को कम करने के लिए पॉलीमर आधारित नोटों को एक व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है, जो लंबे समय तक टिकाऊ हो सकते हैं। प्लास्टिक नोटों की सबसे बड़ी खासियत उनकी मजबूती और टिकाऊपन मानी जा रही है। ये नोट पानी, नमी और सामान्य गंदगी से प्रभावित नहीं होते, जिससे इनकी उम्र कागज के नोटों की तुलना में काफी अधिक हो सकती है। इसके अलावा ये नोट फटने से भी अधिक सुरक्षित होते हैं और इन्हें लंबे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से इनमें आधुनिक सुरक्षा फीचर्स शामिल किए जाने की संभावना है, जिससे जालसाजी पर भी प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी। भारत में इससे पहले वर्ष 2012 में कुछ चुनिंदा शहरों में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का सीमित परीक्षण किया गया था, लेकिन उस समय तकनीकी और परिचालन चुनौतियों के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका था। अब बदलती तकनीक और वैश्विक अनुभवों के आधार पर इस दिशा में फिर से संभावनाएं मजबूत होती दिख रही हैं। दुनिया के कई देश पहले ही प्लास्टिक मुद्रा अपना चुके हैं और इसे अधिक सुरक्षित एवं टिकाऊ विकल्प मानते हैं। यदि यह योजना लागू होती है तो यह भारतीय वित्तीय व्यवस्था में एक आधुनिक और तकनीक-आधारित बदलाव का संकेत होगा, जिससे न केवल लागत में कमी आएगी बल्कि मुद्रा प्रबंधन की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है। आने वाले समय में इस पर आरबीआई की आधिकारिक घोषणा और आगे की रूपरेखा पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

ग्वालियर में दर्दनाक सुसाइड: भाई को वीडियो कॉल कर युवक ने खुद को मारी गोली

ग्वालियर । ग्वालियर शहर के डफरीन सराय इलाके में शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात उस समय सनसनी फैल गई जब नगर निगम में क्रेन ऑपरेटर के पद पर कार्यरत युवक ने अपनी लाइसेंसी राइफल से खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। यह घटना करीब रात 1 बजे की बताई जा रही है। मृतक की पहचान गौरव भदौरिया के रूप में हुई है, जिसने आत्महत्या से पहले अपने बड़े भाई को वीडियो कॉल किया और उसी कॉल के दौरान 315 बोर की राइफल मुंह पर रखकर ट्रिगर दबा दिया। घटना के बाद परिवार और आसपास के इलाके में हड़कंप मच गया। जानकारी के अनुसार, गौरव भदौरिया ने आत्महत्या से पहले सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट भी किया था, जिसमें उसने अपने ही परिवार के कई सदस्यों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने अपने पिता रणवीर सिंह भदौरिया, मां सत्यवती भदौरिया, बहन नीतू सिकरवार और मामी सीमा परमार पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया है। पोस्ट में गौरव ने लिखा कि उसे लगातार पैसे और जमीन में हिस्सा देने का दबाव बनाया जा रहा था। उसने यह भी दावा किया कि उससे 5 लाख रुपए की मांग की गई थी और मांग पूरी न करने पर उसे जहर देकर मारने की धमकी दी गई थी। इसी तनाव और दबाव के चलते वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुआ। गौरव ने यह भी लिखा कि वह अपनी बहन को पहले ही 2.40 लाख रुपए दे चुका था, इसके बावजूद उससे और पैसे मांगे जा रहे थे और मकान में हिस्सेदारी देने का दबाव बनाया जा रहा था। उसने आरोप लगाया कि इन सभी बातों के कारण वह मानसिक रूप से बेहद परेशान था। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी। प्रारंभिक जांच में पुलिस सभी आरोपों और पारिवारिक विवाद के पहलुओं को ध्यान में रखकर मामले की जांच कर रही है। परिवार और रिश्तेदारों के बीच इस घटना के बाद माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है। पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो कॉल की भी जांच की जा रही है, ताकि घटना की वास्तविक परिस्थितियों को स्पष्ट किया जा सके। फिलहाल पुलिस यह भी जांच कर रही है कि मामला केवल पारिवारिक विवाद और मानसिक तनाव का है या इसके पीछे कोई और गहरी वजह भी शामिल है।

चितौली गांव शोक में डूबा: भजन-कीर्तन के बीच किसान की सर्पदंश से मौत

ग्वालियर । ग्वालियर जिले के बेलगढ़ा थाना क्षेत्र अंतर्गत चितौली गांव में एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां भागवत कथा में भजन-कीर्तन कर रहे एक किसान की सांप के काटने से मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। मृतक की पहचान 50 वर्षीय मदनलाल रावत के रूप में हुई है, जो पिछले एक सप्ताह से लकेश्वरी माता मंदिर में आयोजित भागवत कथा में नियमित रूप से शामिल हो रहे थे। धार्मिक प्रवृत्ति के कारण वे न केवल कथा सुनते थे, बल्कि भजन-कीर्तन में भी सक्रिय भागीदारी निभाते थे। जानकारी के अनुसार, शुक्रवार शाम करीब 7:30 बजे कथा के दौरान जब मदनलाल रावत भजन गा रहे थे, तभी अचानक एक जहरीले सांप ने उन्हें काट लिया। शुरुआत में वहां मौजूद लोगों को इस घटना का अंदाजा नहीं हुआ और कार्यक्रम सामान्य रूप से चलता रहा। कुछ ही देर बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। परिजनों और श्रद्धालुओं ने तुरंत उन्हें नजदीकी अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू किया। हालांकि सांप के जहर का असर तेजी से फैल चुका था और तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका। देर रात करीब 1 बजे उपचार के दौरान मदनलाल रावत ने दम तोड़ दिया। इस घटना की जानकारी मिलते ही बेलगढ़ा थाना पुलिस मौके पर पहुंची और आवश्यक कार्रवाई शुरू की। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम कराया और बाद में परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया। इस हादसे ने पूरे चितौली गांव को गहरे सदमे में डाल दिया है। परिजनों का कहना है कि मदनलाल बेहद धार्मिक स्वभाव के व्यक्ति थे और किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि एक धार्मिक आयोजन के दौरान इस तरह की दर्दनाक घटना घट जाएगी। गांव में शोक का माहौल है और लोग इस अप्रत्याशित घटना को लेकर स्तब्ध हैं। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में सांपों से सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

20 जून से पहले मोदी कैबिनेट में बड़ा फेरबदल संभव, संगठन और सरकार में व्यापक बदलाव की तैयारी तेज

नई दिल्ली । केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में पहले बड़े मंत्रिमंडल विस्तार की तैयारियों ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि 20 जून से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल किया जा सकता है। यह बदलाव सरकार के नए कार्यकाल की रणनीतिक दिशा तय करने वाला माना जा रहा है, जिसमें संगठन और प्रशासन दोनों स्तरों पर व्यापक पुनर्गठन की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, इस संभावित विस्तार से पहले 10 जून को भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। यह बैठक आगामी नीतिगत दिशा और संगठनात्मक समन्वय को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित की जा रही है। माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद ही मंत्रिमंडल विस्तार को अंतिम रूप दिया जाएगा और नई टीम की घोषणा की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इस बीच राजनीतिक हलकों में दो केंद्रीय मंत्रियों के संभावित इस्तीफे को लेकर चर्चाएं तेज हैं। बताया जा रहा है कि हाल ही में संगठनात्मक जिम्मेदारियों में बदलाव के बाद दो वरिष्ठ नेताओं को ‘एक व्यक्ति एक पद’ के सिद्धांत के तहत केंद्र सरकार में अपने पद छोड़ने पड़ सकते हैं। इससे खाली होने वाले स्थानों पर नए चेहरों को शामिल किए जाने की संभावना है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि इससे संगठन और सरकार दोनों में बेहतर तालमेल स्थापित किया जा सकेगा। पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, यह बदलाव केवल पदों की अदला-बदली तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इसका उद्देश्य आगामी चुनावी रणनीति को मजबूत करना भी है। सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर ऐसे नेताओं को जिम्मेदारी देने पर विचार किया जा रहा है, जो जमीनी स्तर पर प्रभावी भूमिका निभा सकें और विभिन्न राज्यों में राजनीतिक समीकरणों को संतुलित कर सकें। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस संभावित फेरबदल को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात और मणिपुर जैसे राज्यों में आने वाले चुनावों के मद्देनजर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा हाल ही में संपन्न चुनावों के बाद कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं की दिल्ली में सक्रियता भी इस बात का संकेत मानी जा रही है कि संगठनात्मक स्तर पर बड़े बदलावों की रूपरेखा तैयार हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संभावित मंत्रिमंडल विस्तार केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति भी जुड़ी हुई है। सरकार की कोशिश है कि नई टीम के माध्यम से नीतियों के क्रियान्वयन में तेजी लाई जाए और विभिन्न राज्यों में पार्टी की स्थिति को और मजबूत किया जाए। फिलहाल आधिकारिक रूप से किसी भी बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर लगातार जारी है। आने वाले दिनों में इस पर स्पष्ट तस्वीर सामने आने की संभावना है, जिससे केंद्र की राजनीति में एक बार फिर महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है।

लापता बच्ची की मौत का रहस्य: नदी किनारे मिला शव, हत्या की आशंका तेज

ग्वालियर । ग्वालियर के सिरोल थाना क्षेत्र से लापता हुई 12 वर्षीय 5वीं कक्षा की छात्रा का शव मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई है। पांच दिन से लापता बच्ची का शव शुक्रवार रात भिंड जिले के मौ क्षेत्र में सिंध नदी किनारे क्षत-विक्षत हालत में बरामद किया गया। आशंका जताई जा रही है कि शव का कुछ हिस्सा जलीय जीवों, संभवतः मगरमच्छों द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया है। मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब बच्ची के सौतेले पिता ने दावा किया कि 24 मई को बच्ची ने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उसके अनुसार, बदनामी और पुलिस कार्रवाई के डर से उसने शव को भिंड ले जाकर नदी किनारे दफना दिया। हालांकि पुलिस इस बयान को संदिग्ध मान रही है और हत्या की संभावना से भी इनकार नहीं कर रही है। बच्ची के लापता होने की रिपोर्ट 25 मई को सिरोल थाने में दर्ज कराई गई थी। रिपोर्ट सौतेले पिता द्वारा ही दर्ज कराई गई थी, लेकिन शुरुआती जांच में ही पुलिस को उसके बयानों और व्यवहार पर संदेह होने लगा था। पुलिस ने उसे निगरानी में रखा और मामले की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश जारी रखी। शुक्रवार रात भिंड के मौ इलाके में सिंध नदी किनारे से जब बच्ची का शव बरामद हुआ, तो पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया। शव की स्थिति बेहद खराब थी, जिसके चलते पुलिस ने तुरंत उसे पोस्टमॉर्टम और फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया। संभावना जताई जा रही है कि मेडिकल बोर्ड द्वारा पोस्टमॉर्टम कराया जाएगा, ताकि मौत के सही कारणों का पता लगाया जा सके। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, फिलहाल सभी पहलुओं से जांच की जा रही है। एक ओर सौतेला पिता इसे आत्महत्या के बाद शव छिपाने की बात बता रहा है, वहीं दूसरी ओर पुलिस इसे संदिग्ध हत्या मानकर जांच आगे बढ़ा रही है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। मृत बच्ची पिछले करीब आठ वर्षों से अपने सौतेले पिता और मां के साथ रह रही थी। परिवार में उसकी दो छोटी बहनें भी हैं, जिनकी उम्र 6 और 8 वर्ष बताई जा रही है। सौतेला पिता पेशे से टैक्सी चालक है और ट्रैवल्स एजेंसी के लिए ईको वैन चलाता है। पुलिस ने बच्ची के माता-पिता दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। वहीं, नदी किनारे और आसपास के क्षेत्रों में सर्च अभियान भी चलाया गया है, ताकि किसी भी प्रकार के सबूत जुटाए जा सकें। यह मामला अब पूरी तरह से संदिग्ध बन चुका है और पुलिस हर एंगल से जांच कर रही है कि यह वास्तव में आत्महत्या थी या फिर इसके पीछे कोई गंभीर अपराध छिपा हुआ है।

MP HIGH COURT ACTION: कागजों में दो बार किया रिटायर, कोर्ट पहुंचा चौकीदार तो खुली विभाग की पोल

GWALIOR HIGH COURT

HIGHLIGHTS: दो बार रिटायर किया, हाईकोर्ट ने लौटाई नौकरी कागजों में बूढ़ा बना दिया, कोर्ट ने दिया इंसाफ वन विभाग की मनमानी पर हाईकोर्ट सख्त मेडिकल रिपोर्ट ठुकराना पड़ा भारी चौकीदार को 2029 तक नौकरी का अधिकार   MP HIGH COURT ACTION: मध्यप्रदेश। ग्वालियर हाई कोर्ट ने वन विभाग के एक फैसले को गलत बताते हुए कार्रवाई उसपर की है। बता दें कि दतिया वन विभाग के चौकीदार साहब सिंह ठाकुर को विभाग ने बूढ़ा बता कर कागजों में दो बार रिटायर कर दिया। पहले 2017 में और फिर 2018 में उन्हें सेवानिवृत्त करने के आदेश जारी किए गए। जिसके बाद मामला ग्वालियर हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया। लाखों में अलग पहचान चाहिए तो अपनाएं चाणक्य की ये सीख, शब्दों से लेकर आत्मविश्वास तक सब पर दिया जोर मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट नहीं मानी सूचना कि मने तो साहब सिंह की उम्र का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं था। ऐसे में वर्ष 2017 में जिला मेडिकल बोर्ड से उनका आयु परीक्षण कराया गया। मेडिकल बोर्ड ने उनकी उम्र 50 वर्ष निर्धारित की, जिसके अनुसार उनकी सेवानिवृत्ति वर्ष 2029 में होनी चाहिए थी। लेकिन इसके बावजूद भी विभाग ने उनकी उम्र ज्यादा मानकर रिटायरमेंट का आदेश जारी कर दिया। आईपीएल 2026: रिकॉर्ड रन बरसात के बीच रबाडा का जलवा, गेंदबाजों में नंबर-1 बने हाईकोर्ट ने लगाई फटकार पूरे मामले को लेकर हाईकोर्ट ने कहा कि जब विभाग ने खुद मेडिकल बोर्ड से जांच कराई थी तो उसकी रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने विभाग के दोनों आदेश रद्द करते हुए साहब सिंह को अप्रैल 2029 तक नौकरी पर बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। ‘FWICE कोई अदालत नहीं’, रणवीर सिंह विवाद पर भड़के राम गोपाल वर्मा, इंडस्ट्री पॉलिटिक्स पर साधा निशाना साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि कर्मचारी को सभी लंबित वेतन, एरियर और अन्य सेवा लाभ दिए जाएं। इस फैसले को विभागीय मनमानी पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी माना जा रहा है।

कान्हा टाइगर रिजर्व मामला: बाघों की मौतों पर हाईकोर्ट ने मांगा विस्तृत जवाब

जबलपुर । मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिजर्व (Kanha Tiger Reserve) में बाघों की लगातार हो रही मौतों का मामला अब न्यायालय की चौखट तक पहुंच गया है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA), राज्य सरकार और वन विभाग सहित छह पक्षों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब मांगा है। यह जनहित याचिका मुंबई के चेम्बूर निवासी वन्यजीव प्रेमी और अधिवक्ता सुबित चक्रवर्ती द्वारा दायर की गई है। मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच में जस्टिस विवेक जैन और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी द्वारा की गई। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में ही मामले को गंभीर प्रकृति का मानते हुए सभी संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने अदालत को बताया कि 2 अप्रैल 2026 से अब तक कान्हा टाइगर रिजर्व में 10 बाघों की मौत कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) संक्रमण के कारण हुई है। इसके बावजूद संक्रमण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। याचिका में यह भी मांग की गई है कि NTCA की गाइडलाइंस के अनुसार एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए, जो इन मौतों की निष्पक्ष जांच करे। समिति को यह भी देखना होगा कि संक्रमण का वास्तविक कारण क्या है, रोग नियंत्रण के लिए क्या उपाय किए गए और क्या प्रशासनिक स्तर पर कोई लापरवाही हुई है या नहीं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि वन विभाग ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए। साथ ही, पार्क के बफर जोन और आसपास के गांवों में आवारा कुत्तों के टीकाकरण की स्थिति पर भी कोई स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमण का प्रमुख स्रोत यही हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कैनाइन डिस्टेंपर वायरस अत्यंत संक्रामक और घातक बीमारी है, जो बाघों और अन्य वन्यजीवों के श्वसन, तंत्रिका और पाचन तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। यदि इस संक्रमण को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका असर पूरे टाइगर लैंडस्केप पर पड़ सकता है। याचिका में कुछ प्रमुख बाघों की मौतों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें बाघिन टी-122 (सुनैना), बाघिन टी-141 (अमाही) और उसके चार शावक तथा बाघ टी-220 (महावीर) शामिल हैं। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब सभी की निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो जून के अंतिम सप्ताह में होगी। अदालत के रुख के बाद यह मामला वन्यजीव संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।