Chambalkichugli.com

छोले-कुलचे की रेहड़ी से टीम इंडिया तक: जालंधर के अर्जुन राजपूत का अंडर-19 टीम में चयन, मेहनत ने बदली तकदीर

नई दिल्ली। कहते हैं कि सपनों की कोई आर्थिक सीमा नहीं होती। यदि इरादे मजबूत हों, मेहनत सच्ची हो और परिवार का साथ मिले, तो साधारण परिस्थितियों से निकलकर भी असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। पंजाब के जालंधर निवासी अर्जुन राजपूत की कहानी इसी जज्बे और संघर्ष की मिसाल बनकर सामने आई है। छोले-कुलचे की रेहड़ी लगाने वाले एक मेहनतकश पिता के बेटे अर्जुन ने भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम में चयनित होकर अपने परिवार, शहर और प्रदेश का नाम रोशन कर दिया है। जालंधर के राम नगर इलाके में रहने वाले अर्जुन राजपूत का चयन भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम में हुआ है। अगले महीने 4 जुलाई को टीम श्रीलंका दौरे के लिए रवाना होगी, जहां अर्जुन पहली बार भारत की नीली जर्सी पहनकर मैदान में उतरेंगे। यह पल न केवल उनके लिए बल्कि उनके पूरे परिवार के लिए गर्व और खुशी का अवसर है। अर्जुन एक प्रतिभाशाली ऑलराउंडर हैं। वह बाएं हाथ के बल्लेबाज होने के साथ-साथ दाएं हाथ के ऑफ स्पिन गेंदबाज भी हैं। क्रिकेट के प्रति उनका जुनून बचपन से ही दिखाई देने लगा था। उन्होंने महज आठ-नौ वर्ष की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने अपनी क्रिकेट यात्रा की शुरुआत हरभजन सिंह क्रिकेट अकादमी से की, जहां उन्हें कोच विक्रम सिद्धू का मार्गदर्शन मिला। अंडर-19 टीम में चयन के बाद अर्जुन ने अपनी खुशी साझा करते हुए कहा कि यह उनके जीवन का बेहद खास क्षण है। उन्होंने कहा कि देश का प्रतिनिधित्व करना हर खिलाड़ी का सपना होता है और वह श्रीलंका दौरे पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे। अर्जुन ने भरोसा जताया कि टीम पूरे दमखम के साथ खेलेगी और ट्रॉफी जीतकर भारत लौटने का प्रयास करेगी। उन्होंने अपने माता-पिता के संघर्ष और त्याग को याद करते हुए कहा कि उनके पिता ने उनके सपनों को पूरा करने के लिए वर्षों तक कड़ी मेहनत की है। अर्जुन के अनुसार, उनके पिता डीएवी कॉलेज के बाहर छोले-कुलचे की रेहड़ी लगाते हैं और उन्होंने कभी भी बेटे की क्रिकेट यात्रा में आर्थिक कठिनाइयों को आड़े नहीं आने दिया। अर्जुन ने भावुक होकर कहा कि अब उनकी जिम्मेदारी है कि वह अपने पिता के सपनों को पूरा करें और उन्हें गर्व महसूस कराएं। पिता होती राम के लिए यह उपलब्धि किसी सपने के सच होने से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि अर्जुन बचपन से ही क्रिकेट के प्रति समर्पित रहा है और दिन-रात मेहनत करता रहा। जब उन्हें बेटे के भारतीय अंडर-19 टीम में चयन की खबर मिली, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वहीं अर्जुन की मां नन्ही देवी ने कहा कि यह पूरे परिवार के लिए बेहद भावुक और गर्व का पल है। अर्जुन की बहन किरण राजपूत ने भी कहा कि भाई ने वर्षों तक लगातार मेहनत की और कभी हार नहीं मानी। अब उसकी मेहनत का फल पूरे देश के सामने है। परिवार का सपना था कि अर्जुन भारतीय टीम की नीली जर्सी पहने और अब वह सपना साकार हो चुका है। अर्जुन राजपूत की यह सफलता उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि मेहनत, समर्पण और आत्मविश्वास के सामने आर्थिक कठिनाइयां भी छोटी पड़ जाती हैं।

अमेरिका-ईरान समझौते पर बना संशय, होर्मुज में ड्रोन कार्रवाई और बंदर अब्बास धमाकों से फिर बढ़ा तनाव

नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के संबंध एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। दोनों देशों के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर हाल के दिनों में उम्मीदें जगी थीं, लेकिन ताजा घटनाक्रमों ने संकेत दिया है कि किसी व्यापक सहमति तक पहुंचने का रास्ता अभी भी जटिल बना हुआ है। कूटनीतिक बयानों, समुद्री गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं ने क्षेत्र की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से हाल ही में यह संकेत दिया गया कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव को समाप्त करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता अंतिम चरण में है। दावा किया गया कि बातचीत में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और जल्द ही औपचारिक घोषणा संभव हो सकती है। हालांकि, ईरानी पक्ष ने इन दावों पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि वार्ता के कई पहलुओं पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और राष्ट्रीय हितों से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर उसकी स्थिति यथावत बनी हुई है। कूटनीतिक मतभेदों के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा गतिविधियों ने भी चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस रणनीतिक समुद्री मार्ग में ड्रोन गतिविधियों और सैन्य प्रतिक्रिया से जुड़ी घटनाएं सामने आई हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि समुद्री यातायात की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई की गई, जबकि ईरान की ओर से क्षेत्र में अपने सुरक्षा अधिकारों और निगरानी गतिविधियों को उचित ठहराया गया है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण इस जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। इसी दौरान दक्षिणी ईरान के बंदर अब्बास और आसपास के समुद्री क्षेत्र से धमाकों की खबरों ने तनाव को और बढ़ा दिया। स्थानीय मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार, तटीय इलाकों में विस्फोट जैसी आवाजें सुनाई दीं, जिसके बाद विभिन्न संभावनाओं को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया। हालांकि घटनाओं के संबंध में विस्तृत और स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार बना हुआ है। समुद्री सुरक्षा के मुद्दे ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब ईरान ने कुछ हालिया घटनाओं को लेकर अमेरिका पर आरोप लगाए। ईरानी अधिकारियों ने दावा किया कि क्षेत्र में संचालित कुछ वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया, जबकि अमेरिकी पक्ष ने इन आरोपों पर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रश्न को फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है। उधर मानवीय मुद्दे भी चर्चा में बने हुए हैं। गाजा क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं और मरीजों की निकासी से जुड़े मामलों पर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में बहस तेज हुई है। कई सांसदों ने गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए राहत और चिकित्सा सहायता की मांग उठाई है। इससे क्षेत्रीय संघर्षों के मानवीय प्रभावों पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता प्रक्रिया जारी रहने के बावजूद क्षेत्र में मौजूद सुरक्षा चुनौतियां और रणनीतिक हित किसी भी त्वरित समाधान को कठिन बना सकते हैं। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर दोनों देशों के अगले कदमों, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक वार्ताओं और सुरक्षा घटनाक्रमों की दिशा ही यह तय करेगी कि तनाव कम होगा या स्थिति और अधिक जटिल रूप लेगी।

जसपाल राणा के निधन पर राष्ट्र शोकाकुल, राष्ट्रपति मुर्मु से लेकर कई दिग्गज नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

नई दिल्ली। भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज खिलाड़ी, प्रख्यात कोच और पद्मश्री सम्मानित जसपाल राणा के निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। खेल जगत की इस बड़ी क्षति पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से लेकर केंद्र और राज्यों के अनेक वरिष्ठ नेताओं ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। नेताओं ने अपने संदेशों में जसपाल राणा के खेल जीवन, उनके योगदान और युवा खिलाड़ियों को तैयार करने में निभाई गई उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को याद किया। जानकारी के अनुसार, जर्मनी के म्युनिख में आयोजित आईएसएसएफ वर्ल्ड कप से भारतीय दल के साथ लौटते समय उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। इसके बाद उन्हें दिल्ली के साकेत स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 49 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही खेल जगत और राजनीतिक क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने शोक संदेश में कहा कि जसपाल राणा भारतीय खेलों के ऐसे प्रतीक थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया। उन्होंने कहा कि एक खिलाड़ी और मार्गदर्शक के रूप में उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा तथा उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय शूटिंग में जसपाल राणा का योगदान अमूल्य है। उन्होंने कहा कि युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनका समर्पण हमेशा याद रखा जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उनके निधन को भारतीय खेल जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने शानदार करियर के दौरान देश को विश्व मंच पर गौरवान्वित किया। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि जसपाल राणा ने अपनी प्रतिभा, अनुशासन और समर्पण के बल पर भारत को अनेक गौरवपूर्ण क्षण दिए। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी और कोच दोनों रूपों में उनका योगदान भारतीय खेल इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा कि जसपाल राणा का निधन भारतीय खेल जगत के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर भारत को सम्मान दिलाने वाली उनकी उपलब्धियां और युवा खिलाड़ियों के मार्गदर्शन में निभाई गई भूमिका सदैव स्मरणीय रहेगी। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी उन्हें भारतीय निशानेबाजी का गौरव बताते हुए श्रद्धांजलि दी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जसपाल राणा को देवभूमि उत्तराखंड का गौरव बताते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी उनके निधन को खेल जगत के लिए बड़ी क्षति करार दिया। राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी गहरा दुख व्यक्त किया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि जसपाल राणा भारतीय खेलों की सबसे बड़ी हस्तियों में से एक थे। उन्होंने न केवल देश का नाम विश्वभर में रोशन किया बल्कि नई पीढ़ी के निशानेबाजों को भी तैयार किया। कांग्रेस सांसद और बीसीसीआई उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला ने कहा कि भारतीय निशानेबाजी के स्वर्णिम अध्यायों में जसपाल राणा का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा। जसपाल राणा ने अपने करियर में अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर भारत को गौरवान्वित किया था। बाद में कोच के रूप में उन्होंने कई युवा खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके निधन से भारतीय खेल जगत ने एक ऐसे मार्गदर्शक को खो दिया है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

जब ‘बिस्मार्क’ ने डुबो दिया ब्रिटेन का गौरव, द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन युद्धपोत की ताकत ने बदल दिए थे समीकरण

नई दिल्ली । द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में कुछ युद्धपोत ऐसे रहे हैं जिनका नाम आज भी सैन्य रणनीति, समुद्री शक्ति और युद्धक क्षमता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। जर्मनी का युद्धपोत बिस्मार्क उनमें सबसे प्रमुख माना जाता है। वर्ष 1941 में अटलांटिक महासागर में उसकी मौजूदगी मात्र ने ब्रिटिश नौसेना के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी। यही कारण था कि उसे नष्ट करने के लिए ब्रिटेन को अपने इतिहास के सबसे बड़े नौसैनिक अभियानों में से एक चलाना पड़ा। मई 1941 में डेनमार्क स्ट्रेट के समुद्री क्षेत्र में हुई लड़ाई ने बिस्मार्क को विश्वभर में चर्चा का विषय बना दिया। इस युद्ध के दौरान उसने ब्रिटिश नौसेना के गौरव माने जाने वाले HMS Hood को कुछ ही मिनटों में समुद्र की गहराइयों में पहुंचा दिया। उस समय हूड ब्रिटेन का सबसे प्रतिष्ठित युद्धपोत था और उसकी तबाही ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर दिया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिस्मार्क केवल एक बड़ा जहाज नहीं, बल्कि अत्यंत खतरनाक युद्ध मशीन था। बिस्मार्क की सबसे बड़ी विशेषता उसका विशाल आकार था। लगभग 41,700 टन के मानक विस्थापन वाला यह युद्धपोत अपने दौर के सबसे बड़े और प्रभावशाली जहाजों में शामिल था। उस समय दुनिया के अधिकांश युद्धपोत उससे छोटे थे। केवल बाद में विकसित हुए कुछ अमेरिकी और जापानी युद्धपोत ही आकार में उससे आगे निकल सके। रफ्तार के मामले में भी बिस्मार्क अपने समकालीन युद्धपोतों से बेहतर माना जाता था। लगभग 56 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम गति उसे तेज कार्रवाई और रणनीतिक गतिशीलता प्रदान करती थी। विशाल आकार के बावजूद उसकी गति और संचालन क्षमता ने उसे युद्ध के मैदान में विशेष बढ़त दी। इस युद्धपोत की एक और बड़ी ताकत उसकी सुरक्षा प्रणाली थी। जहाज के ढांचे को कई जलरोधी खंडों में विभाजित किया गया था, जिससे गंभीर क्षति के बावजूद उसके डूबने की संभावना कम हो जाती थी। यही वजह थी कि बाद में ब्रिटिश नौसेना को उसे निष्क्रिय करने के लिए लगातार गोलाबारी, हवाई हमलों और टॉरपीडो का सहारा लेना पड़ा। बिस्मार्क की मजबूती ने उसे उस समय के सबसे सुरक्षित युद्धपोतों में स्थान दिलाया। हथियारों की दृष्टि से भी बिस्मार्क बेहद शक्तिशाली था। उसकी आठ 15 इंच की मुख्य तोपें एक साथ भारी मात्रा में विस्फोटक और स्टील के गोले दागने में सक्षम थीं। हालांकि जापान के यामाटो जैसे कुछ युद्धपोत उससे अधिक भारी गोलाबारी कर सकते थे, फिर भी बिस्मार्क की फायर कंट्रोल प्रणाली और लक्ष्य भेदन क्षमता उसे बेहद प्रभावशाली बनाती थी। डेनमार्क स्ट्रेट की लड़ाई में उसने ब्रिटिश युद्धपोत Prince of Wales को भी गंभीर क्षति पहुंचाई। सटीक गोलाबारी के कारण जहाज के कई हिस्सों को नुकसान हुआ और ब्रिटिश नौसेना को पीछे हटना पड़ा। हालांकि बाद में Prince of Wales ने मरम्मत के बाद फिर से अभियान में हिस्सा लिया, लेकिन उस संघर्ष ने बिस्मार्क की युद्ध क्षमता का प्रदर्शन पूरी दुनिया के सामने कर दिया। HMS Hood के विनाश के बाद ब्रिटेन ने बिस्मार्क को हर कीमत पर नष्ट करने का निर्णय लिया। दर्जनों युद्धपोतों, क्रूजरों और विमानों को उसके पीछा करने के लिए लगाया गया। कई दिनों तक चले इस विशाल अभियान के बाद अंततः बिस्मार्क को घेरकर डुबो दिया गया, लेकिन तब तक वह नौसैनिक इतिहास में अपनी अमिट पहचान बना चुका था। आज भी बिस्मार्क को केवल एक युद्धपोत नहीं, बल्कि समुद्री युद्धक शक्ति, तकनीकी उत्कृष्टता और द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे चर्चित नौसैनिक घटनाओं के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।

चीन की मदद से पाकिस्तान को मिली नई ताकत, लेकिन परमाणु और पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता में भारत अभी भी कई कदम आगे

नई दिल्ली । चीन में निर्मित पहली हंगोर-क्लास पनडुब्बी के पाकिस्तान पहुंचने के साथ ही दक्षिण एशिया में समुद्री शक्ति संतुलन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। कराची नौसैनिक अड्डे पर आयोजित समारोह में पाकिस्तान ने इस उपलब्धि को अपने नौसेना आधुनिकीकरण कार्यक्रम का महत्वपूर्ण चरण बताया। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई पनडुब्बी के शामिल होने के बावजूद समुद्री शक्ति के व्यापक परिदृश्य में भारत की बढ़त स्पष्ट रूप से कायम है। पाकिस्तान लंबे समय से अपनी नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत करने के लिए चीन के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता रहा है। हंगोर-क्लास पनडुब्बी इसी सहयोग का हिस्सा है। यह डीजल-इलेक्ट्रिक प्रणाली पर आधारित आधुनिक अटैक सबमरीन है, जिसमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक का उपयोग किया गया है। इस तकनीक की मदद से पनडुब्बी लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकती है और उसकी पहचान करना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है। पाकिस्तान को कुल आठ हंगोर-क्लास पनडुब्बियां मिलने की योजना है। इनमें से कुछ का निर्माण चीन में किया जा रहा है, जबकि शेष का निर्माण तकनीकी हस्तांतरण के तहत कराची में होगा। इससे पाकिस्तान अपनी घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता को भी मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत और पाकिस्तान की पनडुब्बी क्षमताओं में अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। भारतीय नौसेना के पास परमाणु शक्ति से संचालित अरिहंत श्रेणी की बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं, जिन्हें देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। ये पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र की गहराइयों में रहकर रणनीतिक अभियानों को अंजाम देने में सक्षम हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अरिहंत श्रेणी की भूमिका केवल युद्ध संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की परमाणु त्रिस्तरीय प्रतिरोधक क्षमता का अभिन्न हिस्सा है। इस श्रेणी की तुलना पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों से करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि दोनों की रणनीतिक भूमिका अलग-अलग होती है। दूसरी ओर भारत की कलावरी श्रेणी की पनडुब्बियां भी आधुनिक तकनीक और उन्नत युद्धक प्रणालियों से लैस हैं। फ्रांसीसी डिजाइन पर आधारित इन पनडुब्बियों को कम ध्वनि उत्सर्जन, आधुनिक सेंसर और सटीक हथियार प्रणालियों के लिए जाना जाता है। समुद्री निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और सामरिक अभियानों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हंगोर-क्लास पाकिस्तान की पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता को अवश्य मजबूत करेगी, लेकिन भारतीय नौसेना के परिचालन अनुभव, तकनीकी विविधता और संसाधनों के मुकाबले यह बढ़त सीमित है। भारतीय नौसेना के पास विमानवाहक पोत, उन्नत युद्धपोत, लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियां और बहुस्तरीय समुद्री सुरक्षा ढांचा मौजूद है, जो उसे क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत स्थिति प्रदान करता है। भारत वर्तमान में प्रोजेक्ट-75I तथा स्वदेशी परमाणु अटैक पनडुब्बी कार्यक्रमों पर भी कार्य कर रहा है। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भारतीय नौसेना की पानी के भीतर संचालन क्षमता और अधिक सशक्त होने की उम्मीद है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति और प्रभाव भी मजबूत होगा। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की नई पनडुब्बी उसकी नौसैनिक क्षमता में सकारात्मक वृद्धि का संकेत है, लेकिन इसे भारत की समुद्री बढ़त को चुनौती देने वाला निर्णायक बदलाव नहीं माना जा सकता। वर्तमान परिस्थितियों में समुद्री शक्ति, तकनीकी क्षमता, रणनीतिक संसाधनों और दीर्घकालिक सैन्य तैयारी के पैमानों पर भारत अब भी स्पष्ट रूप से मजबूत स्थिति में दिखाई देता है।

फीफा वर्ल्ड कप 2026: दक्षिण कोरिया की शानदार शुरुआत, चेकिया को 2-1 से हराकर दर्ज की दमदार जीत

नई दिल्ली। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में दक्षिण कोरिया ने अपने अभियान की शानदार शुरुआत करते हुए चेकिया को 2-1 से हराकर जीत दर्ज की। रोमांच से भरपूर इस मुकाबले में दक्षिण कोरिया ने दूसरे हाफ में एक गोल से पिछड़ने के बावजूद जबरदस्त वापसी की और अंततः मुकाबला अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ कोरियाई टीम ने टूर्नामेंट में अपने इरादे साफ कर दिए हैं। मैच की शुरुआत से ही दोनों टीमों ने आक्रामक रुख अपनाया। शुरुआती मिनटों में दक्षिण कोरिया ने गेंद पर बेहतर नियंत्रण रखते हुए चेकिया के डिफेंस पर लगातार दबाव बनाया। मैच के नौवें मिनट में कोरिया को फ्री किक के रूप में शानदार मौका मिला, लेकिन चेकिया के मजबूत रक्षापंक्ति ने उसे नाकाम कर दिया। इसके बाद 11वें मिनट में मिले कॉर्नर का भी दक्षिण कोरिया फायदा नहीं उठा सका। पहले हाफ में कोरिया ने कई हमले किए, लेकिन चेकिया का डिफेंस मजबूती से खड़ा रहा। दूसरी ओर चेकिया ने भी कुछ अच्छे मूव बनाए, हालांकि वह भी गोल करने में सफल नहीं हो सकी। दोनों टीमों के बीच कड़ा संघर्ष देखने को मिला और पहले 45 मिनट तक स्कोर 0-0 पर बराबरी पर रहा। दूसरे हाफ में चेकिया ने अधिक आक्रामक अंदाज में खेलना शुरू किया। इसका फायदा उसे 59वें मिनट में मिला जब लाडिसलाव क्रेजकी ने शानदार हेडर के जरिए गेंद को जाल में पहुंचाकर अपनी टीम को 1-0 की बढ़त दिला दी। इस गोल के बाद ऐसा लग रहा था कि मुकाबले का रुख चेकिया की ओर झुक सकता है, लेकिन दक्षिण कोरिया ने हार नहीं मानी। एक गोल से पीछे होने के बाद कोरियाई खिलाड़ियों ने अपनी गति और आक्रमण को और तेज किया। लगातार प्रयासों का परिणाम 67वें मिनट में मिला, जब हांग इन बियोम ने शानदार गोल दागकर स्कोर 1-1 से बराबर कर दिया। इस गोल ने दक्षिण कोरिया में नया जोश भर दिया और टीम ने जीत के लिए दबाव बनाए रखा। बराबरी का गोल मिलने के बाद दक्षिण कोरिया ने आक्रमण जारी रखा। मैच के 80वें मिनट में ओह हियोन ग्यू ने बेहतरीन फिनिशिंग का प्रदर्शन करते हुए टीम को 2-1 की बढ़त दिला दी। यह गोल मैच का निर्णायक क्षण साबित हुआ। इसके बाद चेकिया ने वापसी की भरपूर कोशिश की और कई हमले किए, लेकिन दक्षिण कोरिया के डिफेंस ने कोई गलती नहीं की। अंतिम मिनटों में मुकाबला बेहद रोमांचक रहा, लेकिन दक्षिण कोरिया ने संयम बनाए रखा और चेकिया को बराबरी का मौका नहीं दिया। निर्धारित समय समाप्त होने पर स्कोर 2-1 रहा और दक्षिण कोरिया ने फीफा वर्ल्ड कप 2026 में जीत के साथ अपने सफर की शुरुआत की। यह जीत टीम के आत्मविश्वास को बढ़ाने वाली साबित हो सकती है, जबकि चेकिया को अगले मुकाबलों में वापसी के लिए अधिक मजबूत प्रदर्शन करना होगा।

चार वर्षों तक कोमा से जूझने के बाद थाईलैंड की राजकुमारी का निधन, शाही परिवार और देश में शोक की लहर

नई दिल्ली । थाईलैंड के शाही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। देश के राजा महा वजीरालोंगकोर्न की सबसे बड़ी बेटी और उत्तराधिकार की प्रमुख दावेदारों में शामिल राजकुमारी बज्रकिटियाभा नरेंद्र देब्यावती का 47 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पिछले लगभग चार वर्षों से वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण कोमा में थीं और लगातार चिकित्सकीय निगरानी में उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन की खबर सामने आते ही पूरे थाईलैंड में शोक का माहौल बन गया। राजपरिवार की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राजकुमारी की तबीयत पिछले कुछ समय से लगातार नाजुक बनी हुई थी। कई जटिल स्वास्थ्य समस्याओं के चलते उनके शरीर की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम लंबे समय से उनका उपचार कर रही थी, लेकिन स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया। अंततः उन्होंने जीवन की अंतिम लड़ाई हार दी। राजकुमारी की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दिसंबर 2022 में उस समय शुरू हुई थीं, जब वह एक आधिकारिक कार्यक्रम के सिलसिले में देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के दौरे पर थीं। इसी दौरान उन्हें अचानक हृदय संबंधी गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा और वे बेहोश हो गईं। तत्काल उन्हें विशेष चिकित्सा सुविधा के लिए राजधानी लाया गया, जहां उनका इलाज शुरू हुआ। हालांकि उस घटना के बाद वह कभी पूरी तरह होश में नहीं लौट सकीं और लगातार कोमा की स्थिति में रहीं। राजकुमारी बज्रकिटियाभा को थाई शाही परिवार की सबसे प्रभावशाली और सक्रिय हस्तियों में गिना जाता था। उन्होंने केवल शाही जिम्मेदारियों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि कानून, कूटनीति और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी सार्वजनिक छवि एक शिक्षित, संवेदनशील और जिम्मेदार राजपरिवार सदस्य के रूप में स्थापित थी। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने अमेरिका में कानून की पढ़ाई की और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल कीं। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कानूनी क्षेत्र में काम किया और न्याय व्यवस्था से जुड़े विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। बाद में उन्हें विदेशों में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई, जहां उन्होंने राजनयिक के रूप में कार्य किया। राजकुमारी सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाती थीं। विशेष रूप से महिला अधिकारों और जेल सुधारों से जुड़े मुद्दों पर उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। उन्होंने महिला कैदियों और गर्भवती बंदियों के कल्याण के लिए कई पहल का समर्थन किया। इसी कारण उन्हें मानवाधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़े मंचों पर भी सम्मान प्राप्त हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान मजबूत रही। कानून के शासन, न्यायिक सुधार और सामाजिक विकास के क्षेत्रों में उनकी सक्रियता को वैश्विक संस्थाओं ने भी सराहा था। बाद के वर्षों में उन्होंने सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन किया तथा राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। राजकुमारी के निधन को थाईलैंड के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। राजनीतिक, सामाजिक और शाही हलकों में उनके योगदान को याद किया जा रहा है। देशभर में लोग उन्हें एक ऐसी शख्सियत के रूप में याद कर रहे हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में सेवा, जिम्मेदारी और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके निधन के साथ थाई शाही परिवार ने अपनी एक महत्वपूर्ण सदस्य को खो दिया है। आने वाले दिनों में देशभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है, जहां लोग उनके जीवन और योगदान को याद करेंगे।

INDORE BRICKS SUMMIT: इंदौर में BRICS कृषि सम्मेलन का आगाज, CM बोले- BRICS देशों के अनुभवों से मजबूत होगा कृषि क्षेत्र

INDORE BRICK SUMMIT

INDORE BRICKS SUMMIT: इंदौर। मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में 11 से 13 जून तक आयोजित होने वाले BRICS कृषि सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हो गया है। जहां आज कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अन्य देश के कृषि मंत्रियों के साथ संवाद करेंगे। सम्मेलन में BRICS देशों समेत 21 देशों के कृषि मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य सरकार की ओर से आयोजित विशेष डिनर कार्यक्रम में शामिल होकर विदेशी प्रतिनिधियों, राजदूतों और कृषि मंत्रियों का स्वागत किया। राज्यसभा चुनाव विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश, मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज, संवैधानिक सीमाओं का दिया हवाला कृषि सेक्टर को बढ़ावा इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि ‘एग्रीकल्चर ईयर’ के दौरान आयोजित यह सम्मेलन कृषि क्षेत्र में वैश्विक सहयोग, नवाचार और साझेदारी को नई दिशा देगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया के देशों के साथ सहयोग और साझा विकास की भावना के साथ आगे बढ़ रहा है। सीएम ने मध्यप्रदेश की धरती पर आए सभी विदेशी मेहमानों का स्वागत करते हुए कहा कि इंदौर में आयोजित यह सम्मेलन खाद्य सुरक्षा, कृषि नवाचार, जलवायु अनुकूल खेती, कृषि व्यापार और छोटे किसानों को सशक्त बनाने में मदद करेगा।   ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों एवं प्रतिनिधियों के सम्मान में राज्य शासन की ओर से आयोजित रात्रि भोज में सहभागिता की। ‘कृषि वर्ष’ के अवसर पर आयोजित यह सम्मेलन कृषि क्षेत्र में साझेदारी और नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। मैं सभी… pic.twitter.com/WmAbsvSRLb — Chief Minister, MP (@CMMadhyaPradesh) June 11, 2026 कृषि क्षेत्र से जुड़े अहम मुद्दों पर विचार तीन दिवसीय सम्मेलन में ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, ईरान, दक्षिण अफ्रीका, यूएई सहित कई देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। 12 जून को कृषि मंत्रियों के बीच विशेष संवाद आयोजित होगा, जबकि 13 जून को BRICS देशों की मंत्रिस्तरीय बैठक होगी, जिसमें कृषि क्षेत्र से जुड़े अहम मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में मेक्सिको की शानदार शुरुआत, साउथ अफ्रीका को 2-0 से रौंदा मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सम्मेलन केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे मध्यप्रदेश को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करने का अवसर भी मिलेगा। सम्मेलन के दौरान विदेशी प्रतिनिधि इंदौर और मध्यप्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी रूबरू होंगे। इसके तहत वे राजवाड़ा, छप्पन दुकान, सराफा और मांडू जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों का भ्रमण करेंगे। जिससे उन्हें मध्यप्रदेश की समृद्ध परंपरा और संस्कृति को करीब से जानने का अवसर मिलेगा।

जसपाल राणा का निधन: भारतीय शूटिंग के ‘गोल्डन बॉय’ को नम आंखों से विदाई, खिलाड़ी से कोच तक रहा स्वर्णिम सफर

नई दिल्ली। भारतीय निशानेबाजी जगत ने शुक्रवार को अपने सबसे चमकदार सितारों में से एक को खो दिया। पूर्व एशियाई खेल स्वर्ण पदक विजेता, अंतरराष्ट्रीय स्तर के शूटर और प्रतिष्ठित कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से न केवल भारतीय शूटिंग समुदाय बल्कि पूरे खेल जगत में शोक की लहर है। दशकों तक अपनी उपलब्धियों और समर्पण से भारतीय खेलों को गौरवान्वित करने वाले जसपाल राणा को भारतीय शूटिंग का ‘गोल्डन बॉय’ कहा जाता था। 28 जून 1976 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मे जसपाल राणा का खेल जीवन बेहद प्रेरणादायक रहा। सेना पृष्ठभूमि वाले परिवार में जन्मे राणा को बचपन से ही अनुशासन और खेल भावना का माहौल मिला। उनके पिता नारायण राणा ने ही उन्हें शूटिंग की शुरुआती बारीकियां सिखाईं और वही उनके पहले कोच बने। कम उम्र में ही उनकी प्रतिभा सामने आने लगी थी। मात्र 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी। वर्ष 1988 की राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर उन्होंने अपने उज्ज्वल भविष्य की झलक दिखा दी थी। इसके बाद 1994 में इटली में आयोजित जूनियर विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन कर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया। यही वह दौर था जब दुनिया ने भारतीय शूटिंग के इस उभरते सितारे को गंभीरता से लेना शुरू किया। जसपाल राणा ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि वह ओलंपिक पदक नहीं जीत सके, लेकिन अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्होंने अभूतपूर्व सफलता हासिल की। कॉमनवेल्थ खेलों में उनका प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। चार कॉमनवेल्थ खेलों में हिस्सा लेते हुए उन्होंने कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण पदक शामिल थे। वर्ष 2002 के मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ खेलों में उन्होंने अकेले छह पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। एशियाई खेलों में भी उनका दबदबा देखने को मिला। 2006 के दोहा एशियाई खेलों में उन्होंने तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया। इसी दौरान 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में 590 अंक हासिल कर उन्होंने विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की थी, जो उनकी तकनीकी दक्षता और मानसिक मजबूती का प्रमाण था। खिलाड़ी के रूप में शानदार करियर के बाद जसपाल राणा ने कोचिंग की जिम्मेदारी संभाली और भारतीय निशानेबाजी को नई दिशा दी। उन्होंने कई युवा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार किया। उनकी कोचिंग में भारतीय निशानेबाजों ने विश्व स्तर पर सफलता हासिल की। विशेष रूप से मनु भाकर की उपलब्धियों में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उनकी देखरेख में मनु ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर भारतीय शूटिंग को नई पहचान दिलाई। खेल के प्रति उनके समर्पण और उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। ये सम्मान उनके बहुआयामी योगदान की गवाही देते हैं। जसपाल राणा ने ऐसे समय में भारतीय शूटिंग को लोकप्रिय बनाया, जब यह खेल सीमित दायरे में सिमटा हुआ था। उन्होंने न केवल पदक जीते बल्कि एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित भी किया। उनके निधन के साथ भारतीय शूटिंग के एक गौरवशाली अध्याय का अंत जरूर हुआ है, लेकिन उनकी उपलब्धियां और योगदान हमेशा आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहेंगे।

जसपाल राणा के निधन पर देश शोकाकुल, पीएम मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जताया गहरा दुख

नई दिल्ली। भारतीय शूटिंग जगत के दिग्गज खिलाड़ी और कोच जसपाल राणा के निधन से पूरे देश में शोक की लहर है। 49 वर्ष की आयु में उनके निधन की खबर सामने आने के बाद खेल जगत, राजनीतिक नेतृत्व और उनके प्रशंसकों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ (एनआरएआई) के पदाधिकारियों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए भारतीय खेलों में उनके योगदान को याद किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर शोक संदेश जारी करते हुए कहा कि जसपाल राणा का निधन भारतीय खेल जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। प्रधानमंत्री ने लिखा कि राणा ने शूटिंग में अपनी असाधारण उपलब्धियों से देश का गौरव बढ़ाया और एक मार्गदर्शक के रूप में भी नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि जसपाल राणा का समर्पण, अनुशासन और खेलों के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें हमेशा सम्मान दिलाती रहेगी। प्रधानमंत्री ने शोक संतप्त परिवार, मित्रों और खेल समुदाय के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी जसपाल राणा के निधन पर गहरा दुख जताया। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने वाले इस महान खिलाड़ी का अचानक निधन बेहद दुखद है। राजनाथ सिंह ने कहा कि जसपाल राणा न केवल एक उत्कृष्ट शूटर और कोच थे, बल्कि बेहद सरल, सहज और नेकदिल इंसान भी थे। उन्होंने भारत में शूटिंग को लोकप्रिय बनाने और युवा खिलाड़ियों को इस खेल की ओर आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रक्षा मंत्री ने अपने संदेश में यह भी कहा कि जसपाल राणा ने विश्व शूटिंग चैंपियनशिप और एशियाई खेलों जैसे बड़े मंचों पर भारत को स्वर्ण पदक दिलाकर देश का मान बढ़ाया। उनके अनुसार, राणा का जाना भारतीय खेल जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ (एनआरएआई) के अध्यक्ष कलिकेश नारायण सिंह देव ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जसपाल राणा केवल एक चैंपियन खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट मेंटोर भी थे। उन्होंने कहा कि भारतीय शूटिंग समुदाय को उनकी कमी हमेशा महसूस होगी और उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। जसपाल राणा भारतीय शूटिंग के सबसे सफल खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर के दौरान एशियाई खेलों, कॉमनवेल्थ गेम्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए कई पदक जीते। खिलाड़ी के रूप में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने कोचिंग में भी उल्लेखनीय योगदान दिया और कई युवा निशानेबाजों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई। दो बार की ओलंपिक पदक विजेता भारतीय शूटर मनु भाकर सहित कई शीर्ष खिलाड़ियों के करियर को संवारने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्तमान में वह भारतीय पिस्टल निशानेबाजों के हाई-परफॉर्मेंस कोच के रूप में कार्यरत थे और भारतीय शूटिंग टीम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में जुटे हुए थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल ही में जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित आईएसएसएफ वर्ल्ड कप से लौटते समय उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन से भारतीय खेल जगत ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसने अपने प्रदर्शन, नेतृत्व और मार्गदर्शन से भारतीय शूटिंग को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।