दिल्ली में अवैध निर्माण पर नगर निगम का हथौड़ा: मालवीय नगर अग्निकांड के बाद एमसीडी की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई, 217 इमारतें ध्वस्त और 237 संपत्तियां सील

नई दिल्ली । दिल्ली नगर निगम ने राजधानी में अवैध निर्माण और भवन नियमों के गंभीर उल्लंघन के खिलाफ अपने अब तक के सबसे बड़े प्रशासनिक और दंडात्मक अभियान को तेज कर दिया है। शहर के रिहाइशी और व्यावसायिक इलाकों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर बनाई गई इमारतों पर निगम का डंडा पूरी ताकत से चला है। हाल ही में मालवीय नगर के एक होटल में हुए भीषण अग्निकांड के बाद नींद से जागे नागरिक प्रशासन ने अवैध रूप से संचालित और निर्मित संपत्तियों को लक्षित करते हुए चौबीसों घंटे की कार्रवाई शुरू कर दी है, जिसके तहत तोड़फोड़ और सीलिंग का काम युद्ध स्तर पर जारी है। प्रशासनिक अधिकारियों से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को ही निगम की प्रवर्तन टीमों ने शहर के विभिन्न कोनों में चौदह अवैध संपत्तियों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया, जबकि पच्चीस अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को मौके पर ही सील कर दिया गया। पिछले दस दिनों के भीतर राजस्व विभाग और नगर निगम की संयुक्त टीमों ने पूरी दिल्ली में सात सौ सत्तर से अधिक संदिग्ध और अनियमित प्रतिष्ठानों के खिलाफ औचक निरीक्षण कर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की है, जिससे नियम तोड़ने वाले भवन स्वामियों में हड़कंप मचा हुआ है। जून महीने की शुरुआत में हुए मालवीय नगर अग्निकांड को एक टर्निंग पॉइंट मानते हुए नगर निकाय ने पिछले दो हफ्तों के भीतर कुल दो सौ सत्रह अवैध संपत्तियों को मलबे में तब्दील कर दिया है, जबकि दो सौ सैंतीस अन्य विवादित संपत्तियों पर सरकारी ताला लटकाया जा चुका है। इस अभूतपूर्व कार्रवाई के दौरान निगम ने कानूनसम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए अवैध निर्माण के मामलों में तीन सौ तीस कारण बताओ नोटिस और संपत्तियों को कुर्क या सील करने के लिए एक सौ एकावन वैधानिक नोटिस जारी किए हैं, जिसके साथ ही इक्यानवे पक्के विध्वंस आदेश भी पारित किए जा चुके हैं। राजस्व विभाग की दैनिक निरीक्षण रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के सभी बारह जोनों में विशेष टीमें लगातार ग्राउंड सर्वे कर रही हैं। उत्तरी जिले, नई दिल्ली जिले और दक्षिण-पश्चिम जिले में जिलाधिकारियों और निगम अभियंताओं की संयुक्त टीमों ने औचक निरीक्षण किए हैं, जहां पाई गई भारी अनियमितताओं के दस्तावेज नजफगढ़ जोन को आगे की दंडात्मक कार्रवाई के लिए सौंपे गए हैं। इसी तरह दक्षिण-पूर्व और पश्चिमी जिलों में भी दर्जनों ऐसी इमारतों को चिन्हित किया गया है जो बिना स्वीकृत मानचित्र या बिना फायर एनओसी के व्यावसायिक गतिविधियां संचालित कर रही थीं। दिल्ली में नागरिक बुनियादी ढांचे की विफलता, अग्नि सुरक्षा नियमों के खुले उल्लंघन और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक ढिलाई के कारण पूर्व में हुए कई हादसों को देखते हुए उच्च स्तरीय बैठकों में यह सख्त नीति तैयार की गई है। निगम के वरिष्ठ अधिकारियों ने साफ किया है कि यह अभियान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दिल्ली में जहां भी सुरक्षा मानकों के साथ समझौता पाया जाएगा, वहां बुलडोजर की कार्रवाई और सीलिंग की प्रक्रिया को बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के अंजाम दिया जाता रहेगा।
ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल

नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ एक नई शांति संधि की कोशिशों के बीच मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा वैचारिक टकराव उभरकर सामने आया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत की सुगबुगाहटों के बीच इजरायल ने अपने रुख को बेहद आक्रामक बनाए रखा है। वाशिंगटन के लिए जहां यह युद्ध वैश्विक कूटनीति और हितों का एक हिस्सा मात्र हो सकता है, वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वहां की एक बड़ी आबादी के लिए यह देश के वजूद और अस्तित्व को बचाए रखने की एक अनिवार्य लड़ाई बन चुकी है। यरुशलम की रणनीतिक सोच और वाशिंगटन के नजरिए में बुनियादी फर्क यह है कि अमेरिका इस सैन्य संघर्ष की शुरुआत को हालिया तारीखों से जोड़कर देखता है, जबकि इजराइली अवाम के लिए यह लड़ाई अक्टूबर दो हजार तेईस के उस काले दिन से शुरू हो चुकी है जब उनकी सीमाओं के भीतर घुसकर बर्बरता को अंजाम दिया गया था। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन जब भी शांति और समझौते की बात आगे बढ़ाता है, इजरायली रक्षा बल अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पड़ोसी मुल्कों में बने आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई और तेज कर देते हैं। बेंजामिन नेतन्याहू का पूरा राजनीतिक जीवन और उनकी दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी की विचारधारा इस बात पर टिकी है कि दुश्मनों के सामने रियायतें देना आत्मघाती साबित होता है। संयुक्त राष्ट्र में देश के सबसे युवा राजदूत के रूप में काम कर चुके नेतन्याहू के पास सुरक्षा मामलों का लंबा व्यावहारिक अनुभव है, जिसके दम पर वे कई बार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दबाव को भी खारिज कर चुके हैं। इजरायल में यह माना जाता है कि जब भी किसी कमजोर सरकार ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर कदम पीछे खींचे हैं, देश को और बड़े संकटों का सामना करना पड़ा है। इजरायल की अंदरूनी राजनीति भले ही बेहद जटिल और मिली-जुली सरकारों के दौर से गुजरती रही हो, लेकिन बाहरी खतरों के समय वहां का समाज पूरी तरह एकजुट हो जाता है। वर्तमान में देश की साठ फीसदी से अधिक जनता राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर सरकार की इस सैन्य नीति के साथ मजबूती से खड़ी है कि ईरान समर्थित उग्रवादी संगठनों का पूरी तरह सफाया किया जाए। गाजा पट्टी से वर्ष दो हजार पांच में सेना हटाने के बाद जिस तरह वहां हमास का गढ़ तैयार हुआ, उसने इजरायली सुरक्षा तंत्र को यह सबक सिखाया है कि जमीन के बदले शांति की नीति हमेशा बेअसर रहती है। सैन्य मोर्चे पर इजरायल इस समय चारों तरफ से खतरनाक हथियारों से लैस गैर-राज्य अभिकर्ताओं से घिरा हुआ है। एक तरफ गाजा में सक्रिय नेटवर्क है, तो दूसरी तरफ लेबनान की सीमा पर आधुनिक मिसाइलों से लैस हिजबुल्लाह मौजूद है, जिसने उत्तरी इजरायल के नागरिकों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर रखा है। इजरायली सेना की रणनीति अब बिल्कुल साफ है कि वे किसी भी मोर्चे पर कमजोरी नहीं दिखाएंगे और उत्तरी सीमा को सुरक्षित करने के लिए लितानी नदी तक के पूरे क्षेत्र को हमेशा के लिए पूरी तरह खामोश कर देंगे ताकि भविष्य में रॉकेट हमलों का खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो सके। कूटनीतिक स्तर पर यरुशलम इस बात को भली-भांति समझता है कि महाशक्तियों की नीतियां उनके तात्कालिक राजनीतिक फायदों के हिसाब से बदलती रहती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए युद्ध को बीच में रोकना एक कूटनीतिक जीत हो सकती है, लेकिन इजरायल के लिए युद्ध को अधूरा छोड़ना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। यदि यह जंग बिना किसी ठोस नतीजे के रुकती है, तो तेहरान से हथियारों की आपूर्ति दोबारा शुरू हो जाएगी और सीमावर्ती इलाकों से विस्थापित हुए लाखों इजरायली नागरिक कभी भी अपने घरों को सुरक्षित वापस नहीं लौट पाएंगे।
होटल में प्रेमिका संग मिले रेंजर, कॉन्स्टेबल पत्नी ने रंगे हाथों पकड़ा; रीवा में सड़क तक पहुंचा विवाद

रीवा रीवा में एक हाई-प्रोफाइल पारिवारिक विवाद उस समय चर्चा का विषय बन गया, जब सतना जिले में पदस्थ एक वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) को उनकी पत्नी ने कथित रूप से एक युवती के साथ होटल के कमरे में पकड़ लिया। घटना के बाद होटल परिसर में जमकर हंगामा हुआ और देखते ही देखते मामला सड़क तक पहुंच गया। इस पूरे घटनाक्रम के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिससे मामला और अधिक सुर्खियों में आ गया है। जानकारी के अनुसार सतना जिले के बरौंधा सर्किल में पदस्थ वन परिक्षेत्र अधिकारी बृजेंद्र पाण्डेय रीवा के एक निजी होटल में रुके हुए थे। इसी दौरान उनकी पत्नी, जो स्वयं पुलिस विभाग में आरक्षक के पद पर कार्यरत हैं, को सूचना मिली कि उनके पति होटल में किसी युवती के साथ मौजूद हैं। सूचना मिलने के बाद वह सीधे होटल पहुंच गईं और संबंधित कमरे तक पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। बताया जा रहा है कि दरवाजा खुलने पर पत्नी ने पति से कमरे में किसी अन्य व्यक्ति की मौजूदगी के बारे में सवाल किया। शुरुआत में रेंजर ने किसी के होने से इनकार किया, लेकिन पत्नी जब कमरे के भीतर पहुंचीं तो वहां एक युवती मौजूद मिली। इसके बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया और होटल परिसर में दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक पत्नी ने युवती को कमरे से बाहर लाकर दोनों के संबंधों को लेकर सवाल-जवाब किए। होटल परिसर में काफी देर तक विवाद चलता रहा, जिससे वहां मौजूद लोगों की भीड़ जमा हो गई। कई लोगों ने पूरे घटनाक्रम के वीडियो अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिए, जो बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो गए। मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि विवाद बढ़ने के बाद रेंजर और उनके साथ मौजूद युवती होटल से बाहर निकले और एक डंपर में बैठकर वहां से चले गए। वहीं उनकी पत्नी काफी देर तक होटल परिसर में मौजूद रहीं और नाराजगी जताती रहीं। घटना के कारण होटल परिसर में अफरा-तफरी जैसी स्थिति बन गई थी। मामले ने कानूनी मोड़ भी ले लिया है। जानकारी के अनुसार रीवा के चोरहटा थाना में रेंजर बृजेंद्र पाण्डेय और उनकी महिला मित्र के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। हालांकि पुलिस की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि शिकायत किन धाराओं के तहत दर्ज की गई है और आरोपों का स्वरूप क्या है। पुलिस मामले की जांच कर रही है तथा वायरल वीडियो और उपलब्ध साक्ष्यों की भी पड़ताल की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक रेंजर की पत्नी सतना जिले के बरौंधा थाने में आरक्षक के रूप में पदस्थ हैं। यह भी चर्चा है कि वह बिना अवकाश स्वीकृत कराए रीवा पहुंची थीं। हालांकि इस संबंध में विभागीय स्तर पर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। फिलहाल पूरा मामला जांच के दायरे में है। पुलिस सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही है और संबंधित पक्षों के बयान भी दर्ज किए जा सकते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और होटल में हुए विवाद ने इस मामले को क्षेत्र में चर्चा का प्रमुख विषय बना दिया है।
तृणमूल कांग्रेस में ऐतिहासिक बिखराव के बीच 65वें विधायक के पाला बदलने का दावा, दिल्ली से कोलकाता तक गहराया संकट

नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस इस समय अपने सबसे गंभीर और अभूतपूर्व आंतरिक राजनीतिक संकट से जूझ रही है। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक पार्टी के भीतर मची रार अब पूरी तरह खुलकर सामने आ चुकी है। पार्टी के भीतर से शुरू हुई असंतोष की चिंगारी अब एक बड़े सियासी विस्फोट का रूप ले चुकी है, जिसने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक किले की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। विधानसभा से लेकर संसद के दोनों सदनों तक तृणमूल कांग्रेस के जनप्रतिनिधियों का टूटना लगातार जारी है। कोलकाता से आ रही ताजा रिपोर्टों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायकों की संख्या अब बढ़कर 65 के आंकड़े को छूने की तैयारी में है। इस पूरे विद्रोह की कमान संभाल रहे निष्कासित नेता रिताब्रता बनर्जी ने दावा किया है कि उनके खेमे में असंतुष्ट जनप्रतिनिधियों का आंकड़ा लगातार मजबूत हो रहा है। शुरुआत में केवल 58 विधायकों के साथ शुरू हुई यह बगावत अब धीरे-धीरे बढ़ते हुए 60 के पार जा चुकी है और हाल ही में एक और विधायक के हस्ताक्षर होने के बाद यह संख्या 65 तक पहुंच गई है। हालांकि बागी गुट ने अभी तक इस नए सदस्य के नाम का आधिकारिक खुलासा नहीं किया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच कोलकाता के सियासी गलियारों में उस समय हलचल काफी तेज हो गई जब ममता बनर्जी के बेहद करीबी और भरोसेमंद माने जाने वाले कोलकाता पोर्ट से विधायक फिरहाद हाकिम ने विधानसभा परिसर में रिताब्रता बनर्जी से सीक्रेट मीटिंग की। इस मुलाकात के तुरंत बाद ही बागी गुट की तरफ से संख्या बल बढ़ने का नया दावा सामने आया। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात को लेकर कयासों का दौर जारी है कि क्या हस्ताक्षर करने वाले नए नेता खुद पूर्व मेयर ही हैं या फिर पर्दे के पीछे कोई और बड़ा चेहरा मौजूद है। घटनाक्रम केवल विधानसभा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कड़ियों को जोड़ने पर संकट और गहरा नजर आता है। सचिवालय और विधानसभा के सूत्रों के मुताबिक, पूर्व मेयर हाकिम ने इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ भी एक महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा लिया था। इस बैठक के बाद जब वे विधानसभा के लिए रवाना हुए, तब उनके ठीक पीछे बागी गुट के एक अन्य निष्कासित नेता संदीपन साहा की गाड़ी भी देखी गई। दोनों नेताओं का एक साथ विधानसभा में प्रवेश करना और फिर तृणमूल कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं से लंबी चर्चा करना इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी के भीतर कुछ बहुत बड़ा पक रहा है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस को देश की राजधानी दिल्ली में भी एक बड़ा और करारा झटका लग चुका है, जहां रविवार को लोकसभा के भीतर एक बड़ी टूट देखने को मिली थी। पार्टी की तेजतर्रार नेता सायोनी घोष के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए करीब 20 बागी लोकसभा सांसदों ने एक सामूहिक फैसला लेते हुए एनसीपीआई में अपने विलय की घोषणा कर दी थी। सांसदों के इस बड़े धड़े के अलग होने से संसद के निचले सदन में पार्टी की ताकत काफी कम हो गई है। संसदीय संकट केवल लोकसभा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। पार्टी के चार प्रमुख राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव, कोयल मलिक, सुखेंदु शेखर रे और प्रकाश बरेक पहले ही बगावत का रास्ता अख्तियार करते हुए पार्टी आलाकमान से अपना नाता तोड़ चुके हैं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि आने वाले दिनों में यह संख्या और ज्यादा बढ़ सकती है, क्योंकि कई अन्य सांसद और विधायक भी मौजूदा नेतृत्व की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं। फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है जहां दल-बदल और गुप्त बैठकों का दौर चौबीसों घंटे चल रहा है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर मचे इस घमासान ने न केवल राज्य सरकार के स्थायित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि आने वाले दिनों में यह कानूनी और तकनीकी रूप से भी एक बड़ी लड़ाई का रूप ले सकता है। बागी गुट जिस तेजी से अपनी संख्या बढ़ा रहा है, उससे साफ है कि वे दल-बदल कानून के दायरे से बचने के लिए जरूरी कानूनी आंकड़े को जुटाने की हरसंभव कोशिश में लगे हुए हैं।
102 दिनों से लापता पूर्व TI गजेंद्र सिंह धाकड़, अब तकनीकी जांच के सहारे तलाश में जुटी पुलिस

रीवा रीवा जिले के मनगवां थाने के पूर्व प्रभारी निरीक्षक (टीआई) गजेंद्र सिंह धाकड़ के रहस्यमय ढंग से लापता होने का मामला अब और अधिक गंभीर होता जा रहा है। विभागीय निलंबन के बाद से बीते 102 दिनों में उनका कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया है। एक पुलिस अधिकारी का इतने लंबे समय तक विभाग और परिवार दोनों के संपर्क से बाहर रहना पुलिस महकमे के लिए चिंता का विषय बन गया है। अब उनकी तलाश के लिए पुलिस ने तकनीकी जांच का सहारा लिया है और मोबाइल लोकेशन से लेकर कॉल डिटेल रिकॉर्ड तक की गहन पड़ताल शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में गजेंद्र सिंह धाकड़ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित किया गया था। निलंबन आदेश मिलने के बाद उन्होंने मनगवां थाने के रोजनामचा में स्वयं को बीमार बताते हुए ‘सिक’ की एंट्री दर्ज कराई थी। इसके बाद वे थाने से रवाना हो गए, लेकिन फिर कभी विभाग के संपर्क में नहीं आए। न तो उन्होंने किसी वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क किया और न ही अपनी वर्तमान स्थिति के बारे में कोई जानकारी दी। विभागीय नियमों के तहत निलंबन के बाद उन्हें पुलिस लाइन रीवा में आमद देना अनिवार्य था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। लगातार अनुपस्थित रहने के कारण विभाग ने उन्हें कई बार नोटिस जारी किए। हालांकि इन नोटिसों का भी कोई जवाब नहीं मिला। इससे मामला और अधिक संदिग्ध एवं चिंताजनक बनता चला गया। जब विभागीय स्तर पर संपर्क के सभी प्रयास विफल हो गए तो पुलिस ने उनके ग्वालियर स्थित पैतृक निवास पर भी जानकारी जुटाने का प्रयास किया। वहां भी उनकी मौजूदगी की पुष्टि नहीं हो सकी। परिजनों ने भी उनके लंबे समय से संपर्क में न होने को लेकर चिंता व्यक्त की है। बताया जा रहा है कि परिवार अपने स्तर पर भी उनकी तलाश में जुटा हुआ है, लेकिन अब तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब पुलिस ने तकनीकी जांच को प्राथमिकता दी है। जांच एजेंसियां उनके मोबाइल नंबरों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), अंतिम सक्रिय लोकेशन, फोन गतिविधियों और संभावित संपर्कों की जांच कर रही हैं। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि निलंबन के बाद उन्होंने किन लोगों से बातचीत की और आखिरी बार उनकी लोकेशन कहां दर्ज हुई थी। जांच टीम उन लोगों से भी पूछताछ कर सकती है जो हाल के दिनों में उनके संपर्क में रहे हों। पुलिस को उम्मीद है कि डिजिटल साक्ष्यों और तकनीकी विश्लेषण के माध्यम से कोई महत्वपूर्ण सुराग मिल सकता है, जिससे उनकी वर्तमान स्थिति का पता लगाया जा सके। रीवा पुलिस अधीक्षक गुरकरन सिंह ने बताया कि निलंबित निरीक्षक गजेंद्र सिंह धाकड़ अभी भी गैरहाजिर हैं। उन्होंने पुलिस लाइन में आमद नहीं दी है और विभाग के संपर्क में भी नहीं हैं। उनकी लोकेशन ट्रेस करने और वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए सभी आवश्यक प्रयास किए जा रहे हैं। फिलहाल यह मामला पुलिस विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का 102 दिनों तक बिना किसी सूचना के लापता रहना कई सवाल खड़े कर रहा है। अब सभी की निगाहें तकनीकी जांच के नतीजों पर टिकी हैं, जिनसे इस रहस्य से पर्दा उठने की उम्मीद की जा रही है।
MP cabinet desicion: ट्रांसफर पॉलिसी पर मोहन कैबिनेट का बड़ा फैसला, आज रात 12 बजे तक जारी हो सकेंगे तबादला आदेश

MP cabinet desicion: भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ट्रांसफर पॉलिसी को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है। जिसके तहत सरकार ने तबादलों की समय-सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया है। कुछ विभागों को अंतिम मंजूरी के लिए आज रात 12 बजे तक का समय दिया गया है। ऐसे विभागों को निर्धारित समय सीमा के भीतर तबादला आदेश जारी करने होंगे। दरअसल प्रदेश में 1 जून से 15 जून तक तबादलों पर लगी रोक हटाई गई थी। इससे पहले 20 मई को मोहन कैबिनेट ने नई तबादला नीति को मंजूरी दी थी, जिसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने 22 मई को आदेश जारी कर सभी विभागों को 15 जून तक तबादले करने के निर्देश दिए थे। शराब पार्टी बनी मौत की वजह: दोस्त ने बोतल और पानी की मोटर से किया हमला, युवक की मौत कैबिनेट बैठक में हुए ये बड़े फैसले बैठक में सिर्फ तबादलों पर ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण विकास और जनहित से जुड़े प्रस्तावों पर भी मुहर लगाई गई। कैबिनेट ने इंदौर मेट्रो रेल परियोजना की संशोधित लागत को मंजूरी दे दी। साथ ही वन्यजीव पर्यटन विकास से जुड़ी तीन योजनाओं को जारी रखने का फैसला किया गया। इंदौर में दूषित पानी से हड़कंप: सीवरेज मिला पानी पीने से 10 लोग बीमार, निगम की जांच शुरू प्रदेश के गांवों में पुनर्वास के लिए मुआवजा स्वीकृति से जुड़े मामलों पर भी चर्चा हुई। इसके अलावा श्रम विभाग की विभिन्न योजनाओं को आगे जारी रखने और स्थानीय निधि ऑडिट से संबंधित प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई। स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर जोर कैबिनेट ने स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कई अहम प्रस्तावों पर भी चर्चा की। रीवा, देवास और गुना के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को आउटसोर्स व्यवस्था के तहत संचालित करने के लिए पायलट प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई है। Ashoknagar Congress Protest: पुतला जलने को लेकर कांग्रेस कारकर्ता और पुलिस के बिच छीना-झपटी, मीनाक्षी नटराजन मामले को लकेर हुआ प्रदर्शन इसके साथ ही प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करने के लिए सरकार अस्पताल संचालित करने में सक्षम ट्रस्टों को जमीन उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है। कर्मचारियों और सामाजिक न्याय विभाग से जुड़े प्रस्ताव बैठक में सामाजिक न्याय विभाग की संस्थाओं में मानदेय पर कार्यरत कर्मचारियों को संविदा कर्मचारी बनाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई। वहीं हाईकोर्ट के आदेश के तहत लोक निर्माण विभाग के एक मामले में पेंशन स्वीकृति को भी मंजूरी दी गई।
सार्वजनिक रास्ता बंद होने पर भड़के ग्रामीण, 200 लोग पहुंचे कलेक्ट्रेट; मार्ग बहाल करने की लगाई गुहार

रीवा रीवा जिले के ग्राम शाहपुर में सार्वजनिक मार्ग बंद किए जाने का मामला मंगलवार को जनसुनवाई में प्रमुखता से उठाया गया। गांव के करीब 200 ग्रामीण एकजुट होकर कलेक्ट्रेट पहुंचे और कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपते हुए रास्ते को तत्काल बहाल कराने की मांग की। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से उपयोग में आ रहे सार्वजनिक मार्ग को मिट्टी डालकर बंद कर दिया गया है, जिससे पूरे गांव के लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों के अनुसार ग्राम शाहपुर में अपर पूर्वी नहर सिंचाई विभाग की डगरी टोला सब माइनर क्रमांक-2 के समीप एक मार्ग लंबे समय से आवागमन के लिए उपयोग में था। इस रास्ते का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि ग्राम पंचायत ने यहां पहले पीसीसी सड़क का निर्माण भी कराया था। लेकिन 14 जून को कथित रूप से दो ट्रक मिट्टी डलवाकर इस मार्ग को बंद कर दिया गया, जिससे गांव के लोगों का आवागमन बाधित हो गया। रास्ता बंद होने के बाद ग्रामीणों को अपने दैनिक कार्यों के लिए लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ रहा है। इसका सबसे अधिक असर किसानों, विद्यार्थियों, मजदूरों और नौकरीपेशा लोगों पर पड़ रहा है। खेतों तक पहुंचने में अतिरिक्त समय लग रहा है, जबकि स्कूली बच्चों को भी स्कूल आने-जाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस रास्ते से वे वर्षों से आसानी से आवागमन करते थे, उसके बंद होने से उनकी दिनचर्या प्रभावित हो गई है। जनसुनवाई में पहुंचे ग्रामीण कमलेश कुमार प्रजापति ने बताया कि समस्या के समाधान के लिए कई बार स्थानीय स्तर पर अधिकारियों और संबंधित पक्षों से संपर्क किया गया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से जिला प्रशासन का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया। उन्होंने प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। ग्रामीण राजेश प्रजापति ने कहा कि यह मार्ग सार्वजनिक उपयोग का रास्ता रहा है और गांव के अनेक परिवार इसी पर निर्भर हैं। ऐसे में इसे बंद कर देना लोगों के अधिकारों का हनन है। उन्होंने प्रशासन से मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करने और मार्ग को पुनः चालू कराने की मांग की। संतोष प्रजापति ने बताया कि रास्ता बंद होने के कारण लोगों को कई किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। इससे समय और धन दोनों की बर्बादी हो रही है। उनका कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो ग्रामीणों की परेशानी और बढ़ सकती है। ग्रामीणों ने कलेक्टर से मांग की है कि नहर विभाग की भूमि से अतिक्रमण हटाया जाए तथा मिट्टी डालकर बंद किए गए सार्वजनिक मार्ग को तत्काल बहाल किया जाए। जनसुनवाई में बड़ी संख्या में ग्रामीणों की उपस्थिति ने इस मुद्दे की गंभीरता को स्पष्ट कर दिया है। अब ग्रामीणों की निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं और वे जल्द राहत मिलने की उम्मीद कर रहे हैं।
मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा के चित्रण पर छिड़ा विवाद, चौतरफा आलोचना के बाद अब मूल तस्वीर ही छापेगा NCERT

नई दिल्ली । राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नौवीं कक्षा की नई पाठ्यपुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की ऐतिहासिक कलाकृति ‘डांसिंग गर्ल’ (नृत्य करती युवती) के चित्रण को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, परिषद द्वारा कला शिक्षा की नई पुस्तक ‘मधुरिमा’ के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में मोहनजोदड़ो से प्राप्त इस सुप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा के वास्तविक रूप में बदलाव करते हुए उसके बिना कपड़ों वाले धड़ को छायांकन (शेडिंग) के जरिए ढका हुआ दिखाया गया था। ऐतिहासिक धरोहर के इस बदले हुए रूप की शिक्षाविदों, पुरातत्वविदों और इतिहासकारों ने तीखी आलोचना की थी। चौतरफा दबाव और विरोध के बीच अब एनसीईआरटी ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए पाठ्यपुस्तक में इस मूर्ति की मूल और वास्तविक तस्वीर को ही प्रकाशित करने का अंतिम फैसला लिया है। इस पूरे मामले पर एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी ने एक साक्षात्कार के दौरान आधिकारिक पुष्टि की है। जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या परिषद कक्षा नौ की कला विषय की पुस्तक में संशोधित और विवादित तस्वीर को हटाकर मूल कांस्य प्रतिमा का चित्र शामिल करेगी, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘हां’ में जवाब दिया। उल्लेखनीय है कि इस नई पुस्तक में प्रतिमा के ऊपरी हिस्से के मूल स्वरूप को इस तरह बदला गया था कि शरीर के वे हिस्से साफ दिखाई नहीं दे रहे थे जो वास्तविक पुरातात्विक खोज में नजर आते हैं। इसके विपरीत, परिषद द्वारा ही तैयार की गई कक्षा छठी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में इसी ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर को उसके मूल और वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप के बेहद करीब दिखाया गया है, जिसने इस विसंगति को और उजागर कर दिया। कक्षा छठी की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक समिति के पूर्व प्रमुख रहे माइकल डैनिनो ने इस बदलाव पर अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने खुलासा किया कि इससे पहले उन्हें यह तर्क दिया गया था कि इस प्राचीन प्रतिमा का नग्न स्वरूप छोटे बच्चों की ‘उम्र के अनुसार उपयुक्त नहीं’ है। डैनिनो के अनुसार, उनकी पूरी टीम इस तर्क से असहमत थी और जब उन्होंने कक्षा छठी के शिक्षकों से इस संबंध में बात की, तो उन सभी का कहना था कि क्लासरूम में इस ऐतिहासिक कलाकृति को लेकर कभी कोई समस्या या असहजता नहीं रही। डैनिनो ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि कलाकृति की नग्नता को अनुपयुक्त मानना वास्तव में विक्टोरियन युग की पुरानी और संकीर्ण औपनिवेशिक सोच का हिस्सा है, जबकि वर्तमान में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को इन्हीं औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं। जानकारों का मानना है कि यदि भारतीय कला पर आधारित किसी गंभीर अध्याय में भी किसी ऐतिहासिक कलाकृति को उसके वास्तविक रूप और सही शारीरिक अनुपात में नहीं दिखाया जा सकता, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या है। इतिहासकारों ने इस बदलाव की तुलना मध्य युग की उस घटना से की है जब चर्च ने अपनी संकीर्ण सोच के कारण ‘डेविड’ की विश्वप्रसिद्ध सुंदर प्रतिमा पर अंजीर का पत्ता जोड़कर उसे गलत रूप में प्रस्तुत किया था। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक साक्ष्य या कलाकृति की तस्वीरों में इस तरह का मनमाना बदलाव करना एक तरह से ‘नकली कलाकृति’ बनाने जैसा है, जो यह साबित करता है कि जिम्मेदार संस्थाओं में इतिहास और पुरातत्व को प्रस्तुत करने की समझ बेहद कम है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, यह ‘डांसिंग गर्ल’ मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग २६०० ईसा पूर्व की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कांस्य प्रतिमा है। सिंधु घाटी सभ्यता की इस अद्भुत कलाकृति को ‘लॉस्ट-वैक्स तकनीक’ (मोम पिघलाकर धातु ढालने की विधि) से बनाया गया था, जो तकनीक आज भी भारत के पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से प्रचलित है। पुरातत्वविदों के अनुसार, कमर पर हाथ रखकर खड़े होने की यह विशिष्ट मुद्रा राजस्थान के हड़प्पा कालीन स्थल ‘भिरड़ाना’ से मिले मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों पर भी अंकित मिली है, जो यह दर्शाती है कि इस मुद्रा का प्राचीन काल में कोई गहरा सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व था।
सोसाइटी विवाद में पुलिस पर पक्षपात के आरोप: महिला बोली- FIR से आरक्षक का नाम हटाया, न्याय के लिए भटक रहा परिवार

इंदौर ; इंदौर के कनाड़िया क्षेत्र स्थित गुलमार्ग परिसर हाउसिंग सोसाइटी में चल रहा विवाद अब केवल सोसाइटी प्रबंधन और वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सोसाइटी की रहवासी सुलोचना शर्मा ने आरोप लगाया है कि उनके बेटे के साथ हुई मारपीट के मामले में एक पुलिस आरक्षक को बचाने के लिए एफआईआर में उसका नाम शामिल नहीं किया गया। पीड़ित परिवार का कहना है कि न्याय पाने के लिए वे थाने से लेकर पुलिस कमिश्नर कार्यालय तक गुहार लगा चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। महिला के अनुसार पूरा विवाद सोसाइटी के हैंडओवर, मेंटेनेंस फंड और कथित वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर चल रहा है। उनका आरोप है कि सोसाइटी के फंड से करीब 15 लाख रुपए का गबन किया गया है और कुछ पदाधिकारी चार्ज हस्तांतरण से इसलिए बच रहे हैं ताकि कथित अनियमितताएं उजागर न हों। इसके अलावा नगर निगम की जमीन पर कथित अतिक्रमण और वहां धार्मिक संरचना स्थापित करने को लेकर भी विवाद बना हुआ है। पीड़िता का कहना है कि 8 जून की रात सोसाइटी परिसर में विवाद के दौरान उनके बेटे कार्तिक शर्मा ने केवल गाली-गलौज का विरोध किया था। इसके बाद कुछ लोगों ने उस पर लाठियों, लात-घूंसों से हमला कर दिया। परिवार का आरोप है कि हमले में कार्तिक गंभीर रूप से घायल हुआ और उसके गले से सोने की चेन भी गायब हो गई। घटना के बाद परिवार शिकायत लेकर कनाड़िया थाने पहुंचा, लेकिन रातभर इंतजार कराने के बाद रिपोर्ट दर्ज की गई। सबसे गंभीर आरोप यह है कि घटना में शामिल बताए जा रहे कनाड़िया थाने के आरक्षक नारायण जाट का नाम एफआईआर से हटा दिया गया। महिला का कहना है कि उन्होंने पुलिस को कई नाम बताए थे, लेकिन रिपोर्ट में केवल कुछ लोगों के नाम शामिल किए गए। पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस विभाग से जुड़े होने के कारण आरक्षक को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। सुलोचना शर्मा ने थाना प्रभारी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब वे कार्रवाई की मांग लेकर थाने पहुंचीं तो उन्हें केवल जांच का आश्वासन दिया गया। दूसरी ओर कनाड़िया थाना प्रभारी सहर्ष यादव का कहना है कि मामले में दर्ज शिकायत के आधार पर जांच की जा रही है और जिस आरक्षक पर आरोप लगाए गए हैं, उसकी भूमिका की भी जांच जारी है। पुलिस का दावा है कि महिला द्वारा बताए गए सभी तथ्यों की जांच की जा रही है और जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। उधर, आरक्षक नारायण जाट ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि वह घटना के समय मौके पर मौजूद थे, लेकिन किसी प्रकार की मारपीट में शामिल नहीं थे। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी पहले सोसाइटी में सचिव पद पर थीं, जिसके कारण उनका नाम विवाद में घसीटा जा रहा है। इस पूरे मामले ने सोसाइटी के रहवासियों के बीच तनाव और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। पीड़ित परिवार ने पुलिस कमिश्नर और नगर निगम आयुक्त से हस्तक्षेप कर निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। अब सभी की नजर जांच रिपोर्ट और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।
अपमान किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं', सोशल मीडिया पर छवि धूमिल करने के खिलाफ थाने पहुंचे पूर्व कप्तान सौरव गांगुली

नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पूर्व अध्यक्ष सौरव गांगुली ने अपनी सामाजिक व पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाए जाने के खिलाफ सख्त कानूनी रुख अख्तियार कर लिया है। सोशल मीडिया पर लगातार उनके खिलाफ की जा रही अपमानजनक और भ्रामक टिप्पणियों से आहत होकर पूर्व दिग्गज क्रिकेटर ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया है। सौरव गांगुली ने कोलकाता के ठाकुरपुकुर थाने में इस संबंध में एक औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज कराई है। अपनी शिकायत में उन्होंने स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया है कि कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा इंटरनेट मीडिया पर उनके खिलाफ बेहद आपत्तिजनक, भ्रामक और मानहानिकारक कंटेंट फैलाकर आम जनता के बीच उनकी साफ-सुथरी साख को धूमिल करने की गहरी साजिश रची जा रही है। पूर्व कप्तान द्वारा पुलिस को सौंपी गई शिकायत में मुख्य रूप से ‘सौरव गांगुली फैंस’ (Sourav Ganguly Fans) नाम के एक बेहद लोकप्रिय फेसबुक पेज का विशेष उल्लेख किया गया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस फेसबुक पेज पर वर्तमान में ३६ लाख से भी अधिक फॉलोअर्स जुड़े हुए हैं और इस मंच के संचालक इसे सौरव गांगुली का आधिकारिक फैन पेज होने का दावा करते हैं। शिकायत पत्र के मुताबिक, इसी बड़े मंच का दुरुपयोग करते हुए पिछले कुछ समय से लगातार ऐसे पोस्ट पब्लिश किए जा रहे हैं, जो आम लोगों के बीच गांगुली की छवि को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं। गांगुली ने अपनी शिकायत के साथ इस फेसबुक पेज के लिंक्स, कुछ स्क्रीनशॉट्स और इससे जुड़ी एक खेल वेबसाइट की अहम जानकारियां भी साक्ष्य के तौर पर पुलिस प्रशासन से साझा की हैं। सार्वजनिक जीवन में आलोचना और व्यक्तिगत मानहानि के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए सौरव गांगुली ने अपने आवेदन में बेहद गंभीर बातें कही हैं। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि एक पब्लिक फिगर होने के नाते वह इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि लोगों की अलग-अलग राय होना और आलोचनाएं मिलना सार्वजनिक जीवन का ही एक स्वाभाविक हिस्सा होता है। लेकिन, किसी की प्रतिष्ठा को जानबूझकर ठेस पहुंचाने के इरादे से झूठी, अपमानजनक और दुर्भावनापूर्ण बातें फैलाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। गांगुली ने जोर देकर कहा है कि अपनी साख की रक्षा के लिए और इस तरह की भ्रामक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए आरोपियों के खिलाफ तत्काल और कड़ी कानूनी कार्रवाई किया जाना बेहद अनिवार्य हो गया है। इस हाई-प्रोफाइल मामले पर कोलकाता पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष की तरफ से शिकायत मिलने की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। पुलिस प्रशासन के मुताबिक, गांगुली की लिखित अर्जी के आधार पर संबंधित फेसबुक पेज के एडमिन और उससे जुड़े संदिग्धों के खिलाफ मामला दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और साइबर सेल की मदद से पूरे मामले की गहनता से तकनीकी जांच की जा रही है। इस कानूनी विवाद के बीच, हाल ही में राजनीतिक गलियारों में उड़े एक बड़े बवंडर पर भी सौरव गांगुली ने अपनी चुप्पी तोड़ी है, जिसमें दावा किया जा रहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गांगुली के जरिए सांसद यूसुफ पठान को इस्तीफा देने का संदेश भिजवाया था। इस पूरे सियासी विवाद को पूरी तरह से सिरे से खारिज करते हुए सौरव गांगुली और सांसद यूसुफ पठान दोनों ने ही इसे पूरी तरह से काल्पनिक, फर्जी और मनगढ़ंत करार दिया है। पूर्व कप्तान ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री की तरफ से उन्हें ऐसा कोई भी संदेश देने के लिए कभी नहीं कहा गया और न ही उनकी इस विषय पर यूसुफ पठान से कोई बातचीत हुई है। फिलहाल, पुलिस इस पूरे घटनाक्रम और सोशल मीडिया पेज के जरिए फैलाई जा रही नकारात्मकता के पीछे छिपे वास्तविक चेहरों की पहचान करने में जुट गई है, ताकि इस प्रतिष्ठित खिलाड़ी की मानहानि करने वालों को कानून के कटघरे में खड़ा किया जा सके।