GWALIOR HIGH COURT: ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने जमीन खरीदने वालों के लिए एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि सिर्फ जमीन की रजिस्ट्री कराने, नामांतरण करानेया प्रॉपर्टी टैक्स भरने से कोई व्यक्ति उस जमीन का कानूनी मालिक नहीं बन जाता।
यह मामला अशोकनगर के लंबरदार मोहल्ला स्थित धनुषधारी बांके देव मंदिर की करीब 98 बीघा जमीन से जुड़ा है, जिसकी कीमत लगभग 50 करोड़ रुपए बताई जा रही है। इस जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था।
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जमीन बेचने वाले का अधिकार नहीं
सुनवाई के दौरान कुछ पक्षों ने दावा किया कि उन्होंने जमीन की रजिस्ट्री कराई है, उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है और वे नियमित रूप से टैक्स भी जमा कर रहे हैं। इसलिए जमीन पर उनका अधिकार माना जाना चाहिए।
लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि सबसे जरूरी बात यह है कि जमीन बेचने वाले के पास उसे बेचने का वैध अधिकार था या नहीं। अगर मूल मालिक ही जमीन बेचने का अधिकार नहीं रखता था, तो उसके जरिए हुई पूरी खरीद-फरोख्त कानूनी रूप से मान्य नहीं मानी जाएगी।
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नामांतरण और टैक्स भुगतान केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नामांतरण और टैक्स भुगतान जैसे दस्तावेज केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड होते हैं। इन्हें जमीन के मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। किसी भी संपत्ति पर स्वामित्व का फैसला वैध अधिकार और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर ही होगा।
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है जो केवल रजिस्ट्री और सरकारी रिकॉर्ड के भरोसे जमीन खरीद लेते हैं। यह फैसला बताता है कि जमीन खरीदने से पहले उसके वास्तविक स्वामित्व और कानूनी स्थिति की पूरी जांच करना कितना जरूरी है।