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भूत बंगला बॉक्स ऑफिस पर धीमी रफ्तार, अक्षय कुमार की फिल्म दो दिन में 50 करोड़ के आंकड़े से रह गई दूर, वीकेंड पर टिकी उम्मीदें

नई दिल्ली। अक्षय कुमार की नई हॉरर कॉमेडी फिल्म भूत बंगला ने बॉक्स ऑफिस पर शुरुआती दो दिनों में मध्यम रफ्तार से प्रदर्शन किया है। फिल्म को लेकर रिलीज से पहले काफी चर्चा थी, लेकिन शुरुआती कमाई उम्मीद के मुकाबले संतुलित मानी जा रही है। दर्शकों की शुरुआती प्रतिक्रिया मिली जुली रही है, जिसका असर कलेक्शन पर साफ दिखाई दे रहा है। फिल्म ने पहले दिन करीब 21.60 करोड़ की कमाई दर्ज की, जबकि दूसरे दिन इसमें हल्की बढ़ोतरी देखने को मिली और आंकड़ा लगभग 25.65 करोड़ तक पहुंच गया। इस तरह दो दिनों में कुल कमाई लगभग 47 करोड़ के आसपास रही है। हालांकि यह शुरुआत खराब नहीं कही जा सकती, लेकिन फिल्म अभी 50 करोड़ का महत्वपूर्ण आंकड़ा पार नहीं कर सकी है। फिल्म के कारोबार पर नजर रखने वाले मानते हैं कि वीकेंड के चलते रविवार को कलेक्शन में और उछाल देखने को मिल सकता है। यदि दर्शकों की भीड़ बनी रहती है तो फिल्म कुल मिलाकर 60 करोड़ के करीब पहुंच सकती है। लेकिन इसके बाद के दिनों में गिरावट आई तो फिल्म की लंबी दौड़ प्रभावित हो सकती है। भूत बंगला को खास इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि इसमें लंबे समय बाद अक्षय कुमार और निर्देशक प्रियदर्शन की जोड़ी एक साथ नजर आई है। दोनों ने पहले भी कॉमेडी फिल्मों के जरिए दर्शकों को बड़ा मनोरंजन दिया है, जिससे इस फिल्म से भी उम्मीदें जुड़ी हुई थीं। फिल्म में तब्बू समेत अन्य कलाकारों की मौजूदगी ने भी इसे चर्चा में बनाए रखा है। हालांकि दर्शकों की राय पूरी तरह एक जैसी नहीं है। कुछ लोग फिल्म के हल्के-फुल्के मनोरंजन और कॉमेडी को पसंद कर रहे हैं, जबकि कुछ दर्शकों को कहानी और प्रस्तुति अपेक्षा के अनुसार प्रभावी नहीं लगी। यही वजह है कि फिल्म की कमाई में स्थिरता दिखाई दे रही है। अब फिल्म का पूरा भविष्य वीकेंड के प्रदर्शन और आने वाले दिनों की पकड़ पर निर्भर करेगा। अगर सकारात्मक वर्ड ऑफ माउथ मजबूत हुआ तो फिल्म लंबी रेस में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है, अन्यथा शुरुआती गति ही इसका सर्वोच्च स्तर साबित हो सकती है।

जब दोस्ती निभाने के लिए अमिताभ बच्चन उतर गए भोजपुरी सिनेमा में तीन फिल्मों से जीता दिल

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने लंबे करियर में हिंदी फिल्मों के साथ-साथ कई अलग-अलग प्रयोग किए हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने भोजपुरी सिनेमा में भी अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई थी खास बात यह है कि यह फैसला उन्होंने किसी बड़े प्रोड्यूसर या स्क्रिप्ट के कारण नहीं बल्कि अपने करीबी रिश्ते और दोस्ती के चलते लिया था दरअसल भोजपुरी फिल्मों में काम करने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनके मेकअप आर्टिस्ट दीपक सावंत थे दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी और जब दीपक सावंत ने भोजपुरी फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव रखा तो अमिताभ बच्चन ने बिना ज्यादा सोचे इसे स्वीकार कर लिया यह एक ऐसा उदाहरण है जहां प्रोफेशनल दुनिया में भी रिश्तों की अहमियत साफ नजर आती है अमिताभ बच्चन ने कुल तीन भोजपुरी फिल्मों में काम किया जिनमें गंगा गंगोत्री और गंगा देवी शामिल हैं इन फिल्मों में उन्होंने अपनी एक्टिंग क्षमता का वही लेवल शो जिसके लिए वह जाने जाते हैं दर्शकों ने भी उन्हें भोजपुरी अंदाज में काफी पसंद किया फिल्म गंगा में उनके साथ मनोज तिवारी और रवि किशन जैसे लोकप्रिय सितारे नजर आए इस फिल्म ने दर्शकों के बीच अच्छी पहचान बनाई और भोजपुरी सिनेमा में बिग बी की एंट्री को खास बना दिया इसके बाद आई फिल्म गंगोत्री जिसमें हेमा मालिनी और भूमिका चावला भी अहम किरदार में थीं, यह फिल्म भी दर्शकों को पसंद आई और इसने अमिताभ बच्चन की बहुमुखी प्रतिभा को फिर साबित किया। तीसरी फिल्म गंगा देवी और भी खास रही क्योंकि इसमें उनके साथ उनकी पत्नी जया बच्चन भी नजर आईं फिल्म की कहानी सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित थी जिसमें एक महिला के संघर्ष और उसके सफर को दिखाया गया था इस फिल्म में गुलशन ग्रोवर और दिनेश लाल यादव जैसे कलाकार भी शामिल थे। इन तीन फिल्मों के जरिए अमिताभ बच्चन ने यह साबित किया कि भाषा और इंडस्ट्री कोई भी हो अगर कलाकार सच्चे मन से काम करे तो दर्शकों का प्यार मिलना तय है हालांकि दिलचस्प बात यह है कि इन फिल्मों के बाद उन्होंने भोजपुरी सिनेमा से दूरी बना ली और फिर कभी इस इंडस्ट्री में काम नहीं किया। आज जब भोजपुरी सिनेमा तेजी से आगे बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना रहा है तब अमिताभ बच्चन का यह छोटा लेकिन प्रभावशाली सफर और भी खास बन जाता है यह कहानी सिर्फ फिल्मों की नहीं बल्कि दोस्ती निभाती है और एक कलाकार की बहुमुखी प्रतिभा की मिसाल भी हैभारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने लंबे करियर में हिंदी फिल्मों के साथ-साथ कई अलग-अलग प्रयोग किए हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने भोजपुरी सिनेमा में भी अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई थी खास बात यह है कि यह फैसला उन्होंने किसी बड़े प्रोड्यूसर या स्क्रिप्ट के कारण नहीं बल्कि अपने करीबी रिश्ते और दोस्ती के चलते लिया था दरअसल भोजपुरी फिल्मों में काम करने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनके मेकअप आर्टिस्ट दीपक सावंत थे दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी और जब दीपक सावंत ने भोजपुरी फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव रखा तो अमिताभ बच्चन ने बिना ज्यादा सोचे इसे स्वीकार कर लिया यह एक ऐसा उदाहरण है जहां प्रोफेशनल दुनिया में भी रिश्तों की अहमियत साफ नजर आती है अमिताभ बच्चन ने कुल तीन भोजपुरी फिल्मों में काम किया जिनमें गंगा गंगोत्री और गंगा देवी शामिल हैं इन फिल्मों में उन्होंने अपनी एक्टिंग क्षमता का वही लेवल शो जिसके लिए वह जाने जाते हैं दर्शकों ने भी उन्हें भोजपुरी अंदाज में काफी पसंद किया फिल्म गंगा में उनके साथ मनोज तिवारी और रवि किशन जैसे लोकप्रिय सितारे नजर आए इस फिल्म ने दर्शकों के बीच अच्छी पहचान बनाई और भोजपुरी सिनेमा में बिग बी की एंट्री को खास बना दिया इसके बाद आई फिल्म गंगोत्री जिसमें हेमा मालिनी और भूमिका चावला भी अहम किरदार में थीं, यह फिल्म भी दर्शकों को पसंद आई और इसने अमिताभ बच्चन की बहुमुखी प्रतिभा को फिर साबित किया। तीसरी फिल्म गंगा देवी और भी खास रही क्योंकि इसमें उनके साथ उनकी पत्नी जया बच्चन भी नजर आईं फिल्म की कहानी सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित थी जिसमें एक महिला के संघर्ष और उसके सफर को दिखाया गया था इस फिल्म में गुलशन ग्रोवर और दिनेश लाल यादव जैसे कलाकार भी शामिल थे। इन तीन फिल्मों के जरिए अमिताभ बच्चन ने यह साबित किया कि भाषा और इंडस्ट्री कोई भी हो अगर कलाकार सच्चे मन से काम करे तो दर्शकों का प्यार मिलना तय है हालांकि दिलचस्प बात यह है कि इन फिल्मों के बाद उन्होंने भोजपुरी सिनेमा से दूरी बना ली और फिर कभी इस इंडस्ट्री में काम नहीं किया। आज जब भोजपुरी सिनेमा तेजी से आगे बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना रहा है तब अमिताभ बच्चन का यह छोटा लेकिन प्रभावशाली सफर और भी खास बन जाता है यह कहानी सिर्फ फिल्मों की नहीं बल्कि दोस्ती निभाती है और एक कलाकार की बहुमुखी प्रतिभा की मिसाल भी है

जब बेटे को कहा गया मेरा बाप औरत है तब टूट गए अली असगर छोड़ना पड़ा कॉमेडी का सबसे बड़ा रोल

नई दिल्ली । टीवी की दुनिया में अपनी कॉमिक टाइमिंग और अलग अंदाज़ से पहचान बनाने वाले अली असगर ने हाल ही में उस फैसले के पीछे की सच्चाई बताने की है जिसने उनके करियर की दिशा बदल दी थी एक समय था जब कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में उनकी दादी का किरदार घर घर में लोकप्रिय था दर्शक उनके हर डायलॉग पर ठहाके लगाते थे लेकिन अचानक उनके शो से गायब होना कई सवाल छोड़ गया था अब इस राज से पर्दा उठाते हुए अली असगर ने बताया कि यह फैसला जितना प्रोफेशनल था उससे कहीं ज़्यादा पर्सनल भी था उन्होंने एक बातचीत के दौरान कहा कि उनके इस किरदार का असर उनके परिवार खासकर बच्चों पर पड़ने लगा था जो उनके लिए बेहद मेहनतीदेह था अली ने खुलासा किया कि उनके बच्चों को स्कूल में इस वजह से चिढ़ाया जाता था उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे फिल्मों में डायलॉग होता है मेरा बाप चोर है उसी तरह उनके बेटे को लेकर बच्चे कहते थे मेरा बाप औरत है यह सुनना उनके लिए एक पिता के रूप में बेहद कठिन था और दब से उनके मन में बदलाव की शुरुआत हुई उन्होंने यह भी बताया कि समस्या सिर्फ दब तक सीमित नहीं थी बल्कि उन्हें लगातार एक ही तरह के किरदार ऑफर किए जा रहे थे कॉमेडी शो में उन्हें बार बार महिला किरदार निभाने को कहा जाता था जिससे उनकी क्रिएटिव सैटिस्फैक्शन भी प्रभावित हो रही थी अली ने कहा कि कलाकार होने के रिश्तेदार वह अलग-अलग तरह के रोल करना चाहते थे लेकिन उन्हें बार-बार उसी इमेज में ढाल दिया जाता था उन्होंने अपने एक्सपीरियंस को शेयर करते हुए कहा कि हर वीकेंड जब वह कॉमेडी शो करते थे तो उन्हें दो अलग-अलग एक्ट में भी महिला किरदार ही निभाने को कहा इससे उन्हें फील होने लगा कि उनकी पहचान लिमिटेड हो रही है और इंडस्ट्री उन्हें एक ही नजर से देख रही है उन्होंने यह भी कहा कि कलाकार को वैरायटी चाहिए और वह सिर्फ एक ही तरह का काम करते रहना नहीं चाहते थे गौरतलब है कि अली असगर ने साल 2017 में शो छोड़ा था उस समय यह कहा गया था कि उन्होंने क्रिएटिव बदलावों के कारण यह फैसला लिया है लेकिन अब सामने आई सच्चाई इस फैसले को एक नई नजर देती है अली असगर का करियर सिर्फ कॉमेडी तक लिमिटेड नहीं रहा है उन्होंने कई पॉपुलर टीवी शो जैसे कहानी घर घर की और दूसरे प्रोजेक्ट्स में भी काम किया है इसके अलावा फिल्मों में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई है और कई चर्चित फिल्मों में नजर आ चुके हैं उनकी बची हुई फिल्म और टीवी प्रोजेक्ट्स भी इस बात का सबूत हैं कि उन्होंने खुद को एक ही छवि तक सीमित नहीं रखा बल्कि नए प्रयोग करने की कोशिश की है यह कहानी सिर्फ एक कलाकार के फैसले की नहीं है बल्कि उस जिम्मेदारी की भी है जो एक पिता अपने परिवार के प्रति महसूस करता है अली असगर का यह कदम दिखाता है कि कभी कभी सफलता से ज्यादा जरूरी अपने करीबियों की भावनाएं होती हैं और यही असली जीत होती है

महावतार परशुराम का पहला पोस्टर रिलीज होते ही मचा हंगामा, दमदार लुक और टैगलाइन ने फैंस को किया रोमांचित

नई दिल्ली। भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित भव्य फिल्म महावतार परशुराम का पहला पोस्टर जारी कर दिया गया है, जिसके सामने आते ही दर्शकों के बीच उत्साह तेजी से बढ़ गया है। यह फिल्म महावतार सिनेमैटिक यूनिवर्स की दूसरी कड़ी है और इसे बड़े स्तर पर प्रस्तुत करने की तैयारी की जा रही है। पोस्टर में दिखाई गई भव्यता और गहराई यह संकेत देती है कि फिल्म को दृश्यात्मक रूप से बेहद प्रभावशाली बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। फिल्म का निर्देशन अश्विन कुमार कर रहे हैं, जिन्हें उनकी रचनात्मक दृष्टि के लिए जाना जाता है। पोस्टर के साथ जारी की गई टैगलाइन जहां धैर्य समाप्त होता है वहां परशुराम का फरसा शुरू होता है फिल्म के कथानक की तीव्रता और भावनात्मक गहराई को दर्शाती है। यह कहानी भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम के जीवन और उनके संघर्षों पर आधारित है। फिल्म में उस समय की परिस्थितियों को दिखाया जाएगा जब समाज में अन्याय और अत्याचार बढ़ गए थे और धर्म का संतुलन बिगड़ चुका था। ऐसे समय में परशुराम का अवतार हुआ, जिन्होंने अधर्म के खिलाफ संघर्ष करते हुए न्याय और संतुलन की स्थापना की। इस कथा को आधुनिक तकनीक और भव्य प्रस्तुति के साथ बड़े पर्दे पर जीवंत करने की योजना बनाई गई है। निर्माताओं का उद्देश्य केवल एक मनोरंजक फिल्म बनाना नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं को नई पीढ़ी तक प्रभावशाली तरीके से पहुंचाना भी है। इस परियोजना को एक ऐसे अनुभव के रूप में तैयार किया जा रहा है जो दर्शकों को भावनात्मक और दृश्य दोनों स्तरों पर जोड़ सके। इस सिनेमैटिक यूनिवर्स की पहली फिल्म को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी और उसे एक अलग तरह के अनुभव के रूप में देखा गया था। उसी सफलता को आगे बढ़ाते हुए अब इस नई कड़ी को और अधिक भव्य और प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पोस्टर के सामने आने के बाद से ही फिल्म को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं और इसे भारतीय सिनेमा के एक बड़े और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के रूप में देखा जा रहा है। दर्शकों को उम्मीद है कि यह फिल्म पौराणिक कथाओं को नए अंदाज में प्रस्तुत करते हुए एक यादगार सिनेमाई अनुभव देगी।

टैक्सी बेचकर फिल्म बनाने वाले सरदार सिंह सूरी की कहानी, सफलता के बाद भी मिला सिर्फ धोखा

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा जगत में कई प्रेरणादायक कहानियां सामने आती रही हैं, लेकिन कुछ जीवन यात्राएं ऐसी होती हैं जिनमें संघर्ष और सफलता के साथ गहरा दर्द भी जुड़ा होता है। ऐसी ही एक कहानी है सरदार सिंह सूरी की, जिन्होंने साधारण जीवन से उठकर अपने सपनों को साकार किया और सिनेमा की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका सफर मेहनत, जज्बे और त्याग से भरा हुआ था, लेकिन अंत में उन्हें एक ऐसे विश्वासघात का सामना करना पड़ा जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। सरदार सिंह सूरी मूल रूप से रावलपिंडी के निवासी थे। देश के विभाजन के बाद उन्होंने नए सिरे से जीवन की शुरुआत की और मुंबई पहुंचकर टैक्सी चलाने का काम शुरू किया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे धीरे अपने परिश्रम से एक टैक्सी को तीन टैक्सियों में बदल दिया। हालांकि उनके मन में सिनेमा के प्रति गहरी रुचि थी और वे कुछ बड़ा करने का सपना देखते थे। अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने एक बड़ा और जोखिम भरा फैसला लिया। उन्होंने अपनी तीनों टैक्सियां बेच दीं और उस धन से पंजाबी फिल्म ए धरती पंजाब दी का निर्माण किया। यह फिल्म उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। इस फिल्म में प्रेम चोपड़ा को बतौर हीरो पहला बड़ा अवसर मिला, जिसने उनके अभिनय करियर की मजबूत नींव रखी। फिल्म रिलीज होने के बाद जबरदस्त सफल रही और इसे कुल नौ पुरस्कार भी प्राप्त हुए। यह सफलता किसी भी निर्माता के लिए गर्व का क्षण होती, लेकिन सरदार सिंह सूरी के लिए यह खुशी अधूरी रह गई। फिल्म की कमाई में उनके एक सहयोगी द्वारा धोखाधड़ी किए जाने के कारण उन्हें उनका उचित हिस्सा नहीं मिल पाया। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि वे अपनी ही फिल्म के सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए टिकट तक नहीं खरीद सके। यह घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा झटका साबित हुई। एक ओर जहां उन्होंने अपने सपनों के लिए सब कुछ दांव पर लगाया, वहीं दूसरी ओर विश्वासघात ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। इस दर्दनाक अनुभव के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण से दूरी बना ली और सिनेमा की दुनिया से लगभग अलग हो गए। वर्षों बाद प्रेम चोपड़ा ने एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम में उन्हें याद करते हुए कहा कि सरदार सूरी केवल एक निर्माता नहीं बल्कि एक नेक और सच्चे इंसान थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके करियर की शुरुआत में मिला अवसर सरदार सूरी की ही देन था। उस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्मों में काम करने का जुनून अलग ही था। सरदार सिंह सूरी का जीवन केवल सिनेमा तक सीमित नहीं था। उन्होंने सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई और मुंबई के चार बंगला गुरुद्वारा साहिब के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सपनों को पूरा करने के लिए साहस जरूरी है, लेकिन विश्वास और पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

महिला आरक्षण बिल पर असफलता से बढ़ा सियासी तनाव, रूपाली गांगुली का तीखा बयान..

नई दिल्ली। संसद में महिला आरक्षण संशोधन बिल को आवश्यक दो तिहाई बहुमत न मिलने के बाद राजनीतिक माहौल तेजी से गरमा गया है। बिल के समर्थन में पर्याप्त संख्या में वोट न जुट पाने के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। प्रस्ताव के लिए जहां 352 वोटों की आवश्यकता थी, वहीं 298 वोट ही पक्ष में पड़ सके। इस परिणाम के बाद राजनीतिक दलों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है और महिला प्रतिनिधित्व से जुड़ा यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। इस घटनाक्रम पर टीवी अभिनेत्री और राजनीतिक रूप से सक्रिय रूपाली गांगुली ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने इस फैसले को लेकर गहरा आक्रोश जताते हुए कहा कि जिस देश में महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता है, वहां वास्तविक जीवन में उनके अधिकारों को लेकर अभी भी संघर्ष जारी है। उन्होंने इसे केवल राजनीतिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक असमानता का संकेत बताया। अपने संदेश में रूपाली गांगुली ने कहा कि महिला आरक्षण का उद्देश्य संसद और अन्य संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना था ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में समानता सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय से इस विषय पर चर्चा होती रही है लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आए हैं। उनके अनुसार यह स्थिति महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करने वाली सोच को दर्शाती है। उन्होंने आगे कहा कि महिलाओं को आगे बढ़ाने की बात तो अक्सर की जाती है लेकिन जब वास्तविक अवसर देने की बात आती है तो बाधाएं सामने आ जाती हैं। उनके अनुसार यह केवल एक कानून का मामला नहीं बल्कि सोच और व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि महिलाओं की भागीदारी किसी एक वर्ग या समूह का विषय नहीं बल्कि पूरे समाज के विकास से जुड़ा हुआ प्रश्न है। रूपाली गांगुली ने अपने संदेश में अपने लोकप्रिय धारावाहिक का संदर्भ देते हुए कहा कि समाज में महिलाओं को अक्सर सीमित भूमिकाओं में देखने की प्रवृत्ति रही है। उन्होंने कहा कि वास्तविक जीवन में भी कई बार महिलाओं को यही संदेश दिया जाता है कि उनकी भूमिका सीमित है, जो बदलने की आवश्यकता है। इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। कई लोग इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा अवसर मानते हैं, जबकि कुछ इसे संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं। हालांकि यह स्पष्ट है कि महिला आरक्षण जैसे विषय पर देश में व्यापक सहमति अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।

रीयल लाइफ से प्रेरित किरदारों की बढ़ती मांग: अब दर्शकों को नायक की अच्छाई से ज्यादा विलेन की वजह आ रही पसंद

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के आधुनिक दौर में एक दिलचस्प और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। अब दर्शक केवल सफेद और काले यानी पूरी तरह अच्छे या पूरी तरह बुरे किरदारों तक सीमित नहीं रहना चाहते। अस्सी और नब्बे के दशक के उस सीधे-सादे फॉर्मूले का अंत हो चुका है, जहां नायक हमेशा आदर्शवादी होता था और खलनायक केवल नफरत का पात्र। आज के समय में पर्दे पर ग्रे शेड यानी भूरे रंग के किरदारों का दबदबा बढ़ गया है। दर्शक अब खलनायक को केवल एक अपराधी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच और अनुभव वाले इंसान के रूप में देख रहे हैं जिसकी अपनी एक जटिल जीवन यात्रा है। इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह किरदारों की मनोवैज्ञानिक गहराई है। आज के निर्माता और लेखक विलेन को केवल बुरा दिखाने के बजाय उसके अतीत, मजबूरी और उन सामाजिक परिस्थितियों को भी उजागर कर रहे हैं जिन्होंने उसे उस रास्ते पर धकेला। जब दर्शक देखते हैं कि किसी किरदार की बुराई के पीछे बचपन का कोई आघात, गरीबी, धोखा या समाज का अन्याय है, तो वे उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। इस कारण अब विलेन केवल नफरत का प्रतीक नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसा पात्र बन गया है जिसके प्रति दर्शक सहानुभूति या कम से कम समझ पैदा कर लेते हैं। यही कारण है कि ‘एंटी-हीरो’ का चलन आज अपने चरम पर है। एक और बड़ा कारण विलेन का स्मार्ट और प्रभावशाली होना है। पुराने सिनेमा में विलेन अक्सर दिमागी रूप से कमजोर या केवल गुस्से वाला दिखाया जाता था, लेकिन आज का विलेन नायक से भी अधिक बुद्धिमान, रणनीतिकार और आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है। वह दिमाग से खेलता है और कई बार नायक को भी मात दे देता है। इसके साथ ही, आज के दौर के बड़े कलाकार भी नकारात्मक भूमिकाएं निभाने में रुचि दिखा रहे हैं। उनके दमदार अभिनय, अद्वितीय लुक्स और बेहतरीन संवाद अदायगी ने विलेन को नायक के बराबर या उससे भी बड़ा आकर्षण बना दिया है। दर्शक अब नायक की सादगी से ज्यादा विलेन की स्टाइल और स्क्रीन प्रेजेंस के दीवाने हो रहे हैं। आज का दर्शक पहले से कहीं अधिक समझदार और तार्किक हो चुका है। उसे काल्पनिक दुनिया के बजाय वास्तविक जीवन की झलकियां पसंद आती हैं, जहां कोई भी इंसान पूरी तरह दूध का धुला नहीं होता। फिल्मों में जब विलेन भ्रष्टाचार, अन्याय और सत्ता के दुरुपयोग जैसे वास्तविक मुद्दे उठाता है, तो वह समाज का आईना बन जाता है। अब नायक और खलनायक के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो गई है; कई बार नायक भी अपने उद्देश्यों के लिए गलत रास्ते अपनाता है। यही वजह है कि आज का सिनेमा अधिक वास्तविक और प्रभावशाली हो गया है, जहां विलेन अब कहानी का सबसे मजबूत हिस्सा बनकर उभर रहा है।

चीख-पुकार और भारी मेकअप के दौर से निकलकर अब मनोवैज्ञानिक गहराई और देसी लोककथाओं तक पहुंचा डर

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में हॉरर फिल्मों का सफर बेहद दिलचस्प रहा है। अस्सी और नब्बे के दशक में हॉरर का मतलब केवल पुरानी हवेलियां, अंधेरी रातें, चेहरे पर भारी मेकअप और डरावनी आवाजों तक सीमित था। उस दौर में कहानियों का ढांचा बहुत सरल हुआ करता था और दर्शकों का मुख्य उद्देश्य केवल डर का अनुभव करना था। हालांकि, समय के साथ दर्शकों की सोच और सिनेमाई तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। अब हॉरर केवल डराने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि इसे एक गंभीर सिनेमा की तरह देखा जाने लगा है, जहां कहानी के पीछे तर्क, भावनाएं और किरदारों की मनोवैज्ञानिक यात्रा भी महत्वपूर्ण हो गई है। आज के दौर में हॉरर फिल्मों में सिर्फ डरावने दृश्य दिखाना काफी नहीं रह गया है। आधुनिक निर्माता अब ऐसे कथानक तैयार कर रहे हैं जिनमें सस्पेंस, मिस्ट्री और इमोशन का सटीक संतुलन हो। दर्शक अब भूत-प्रेत से ज्यादा कहानी के मोड़ और किरदारों के मानसिक संघर्ष में दिलचस्पी लेते हैं। फिल्मों में अब मनोवैज्ञानिक कोण यानी साइकोलॉजिकल एंगल जोड़ा जा रहा है, जिससे डर और भी वास्तविक और गहरा लगने लगा है। यह बदलाव दर्शाता है कि दर्शक अब पहले से अधिक समझदार हो चुके हैं और वे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक विचारोत्तेजक अनुभव की तलाश में रहते हैं। इस बदलाव ने हॉरर को ड्रामा और थ्रिलर के साथ मिश्रित कर एक नया आयाम दिया है। सिनेमा के इस विकास में उन्नत तकनीक और वीएफएक्स की भूमिका अतुलनीय रही है। पहले के समय में सीमित संसाधनों के कारण डरावने दृश्य उतने प्रभावशाली नहीं लगते थे, लेकिन आज अत्याधुनिक ग्राफिक्स और साउंड डिजाइन ने डर को एक नया एहसास दिया है। अब दर्शक स्क्रीन पर केवल डर देखते नहीं, बल्कि उसे महसूस करते हैं। अचानक छाई खामोशी और बेहतरीन विजुअल्स दर्शकों को कहानी के भीतर तक खींच ले जाते हैं। इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने भी इस जॉनर को नई आजादी दी है। यहां निर्माताओं को बिना किसी दबाव के डार्क और गहरी कहानियों को विस्तार से दिखाने का मौका मिल रहा है, जिससे इस विषय की पहुंच व्यापक स्तर पर बढ़ी है। वर्तमान में भारतीय हॉरर सिनेमा में एक और बड़ा बदलाव देसी कहानियों और लोककथाओं के इस्तेमाल के रूप में देखा जा रहा है। अब निर्माता विदेशी कहानियों की नकल करने के बजाय अपने ही देश की मिट्टी से जुड़ी लोककथाओं, गांवों और परंपराओं को पर्दे पर उतार रहे हैं। ये कहानियां दर्शकों को अपने आसपास की याद दिलाती हैं, जिससे डर और भी सजीव हो उठता है। फिल्म निर्माताओं के लिए भी यह जॉनर एक सुरक्षित विकल्प साबित हो रहा है, क्योंकि एक मजबूत कहानी होने पर बिना किसी बड़े सुपरस्टार के भी फिल्म सफल हो सकती है। आज हॉरर सिनेमा निरंतर नए प्रयोगों के साथ विकसित हो रहा है और दर्शकों को एक अलग तरह का रोमांच प्रदान कर रहा है।

सफलता के शिखर पर पहुंचकर कैसे बिखर गया सात साल पुराना प्रेम, फिल्म के सेट पर हुए झगड़े ने बिगाड़ी केमिस्ट्री

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का फिल्मी सफर जितना शानदार रहा, उनकी निजी जिंदगी और उससे जुड़े किस्से भी उतने ही चर्चा में रहे। राजेश खन्ना और अंजू महेंद्रू के सात साल लंबे प्रेम संबंधों की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जिसमें प्यार और ग्लैमर के साथ-साथ कड़वाहट और विवादों का भी तड़का लगा। एक दौर वह भी आया जब इस चर्चित जोड़ी के बीच का तनाव फिल्म के सेट तक पहुंच गया, जिसके परिणामस्वरूप पर्दे पर उनकी केमिस्ट्री पूरी तरह फेल साबित हुई और दर्शकों ने इस रीयल लाइफ कपल को पर्दे पर सिरे से नकार दिया। राजेश खन्ना और अंजू महेंद्रू का रिश्ता थिएटर के दिनों से शुरू हुआ था और दोनों के बीच एक गहरा जुड़ाव था। साल 1969 में जब फिल्म बंधन की घोषणा हुई, तो पहली बार इस जोड़ी को बड़े पर्दे पर एक साथ देखने के लिए प्रशंसकों में जबरदस्त उत्साह था। फिल्म के निर्माण के दौरान दोनों के निजी संबंधों के कारण काफी चर्चाएं हुईं, लेकिन सेट पर जो हुआ वह पेशेवर रूप से काफी चिंताजनक था। बताया जाता है कि शूटिंग के दौरान दोनों के बीच किसी बात को लेकर भयंकर झगड़ा हो गया, जिसका सीधा असर उनके काम पर पड़ा। राजेश खन्ना ने खुद बाद में एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि सेट पर उन दोनों का व्यवहार एक-दूसरे के प्रति बेहद खराब था। जब राजेश अपनी लाइनें बोलते थे तो अंजू मुंह फेर लेती थीं और जब अंजू के संवाद की बारी आती थी तो राजेश भी वैसा ही असहयोग करते थे। तनाव और खींचतान के बीच पूरी हुई इस फिल्म ने एक कड़वा सच उजागर कर दिया। हालांकि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही, लेकिन दर्शकों को राजेश और अंजू की जोड़ी में वह कशिश नजर नहीं आई जिसकी उम्मीद की जा रही थी। दिलचस्प बात यह रही कि प्रशंसकों ने मुख्य नायिका के बजाय फिल्म की सह-कलाकार मुमताज और राजेश खन्ना के दृश्यों पर अधिक प्यार बरसाया, जिससे यह साफ हो गया कि असल जिंदगी की यह जोड़ी पर्दे पर जादू चलाने में नाकाम रही है। इसी के बाद से राजेश खन्ना के करियर का ग्राफ तेजी से बढ़ा और अन्य सफल फिल्मों के बाद वे देश के पहले सुपरस्टार बन गए, जिसने उनके निजी रिश्तों के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया। सुपरस्टार बनने के बाद राजेश खन्ना के व्यस्त शेड्यूल और उनके स्वभाव में आए बदलावों ने इस रिश्ते में दरार को और गहरा कर दिया। एक ओर जहां सार्वजनिक चर्चाओं में अंजू महेंद्रू की पहचान केवल सुपरस्टार की प्रेमिका के रूप में सिमटने लगी, वहीं दूसरी ओर वैचारिक मतभेदों ने भी जन्म ले लिया। अंजू के अनुसार, राजेश खन्ना के जीवन में सफलता के साथ बढ़ते प्रभाव ने उनके बीच की सहजता को खत्म कर दिया था। अंजू ने यह भी साझा किया था कि राजेश को उनका मॉडलिंग करना पसंद नहीं था और उनके कहने पर उन्होंने कई पेशेवर समझौते भी किए, लेकिन फिर भी यह रिश्ता टूटने से नहीं बच सका। अंततः सात साल का यह सफर उस वक्त एक नाटकीय मोड़ पर खत्म हुआ जब राजेश खन्ना ने विवाह का फैसला लिया और फिल्म जगत के इस सबसे चर्चित प्रेम अध्याय का दुखद अंत हो गया।

इस हॉलीवुड फिल्म से लिया गया था ‘बाजीगर’ का वो खौफनाक सीन, देख सिहर उठेंगे आप

नई दिल्ली। रोमांस के किंग कहे जाने वाले Shah Rukh Khan ने अपने करियर में कई यादगार किरदार निभाए हैं, लेकिन फिल्म Baazigar में उनका निगेटिव रोल आज भी फैंस के रोंगटे खड़े कर देता है। यह फिल्म न सिर्फ सुपरहिट रही, बल्कि इसने शाहरुख की इमेज को भी पूरी तरह बदल दिया। छत से धक्का देने वाला सीन था कॉपी?फिल्म का सबसे चर्चित और शॉकिंग सीन जब शाहरुख का किरदार Shilpa Shetty के किरदार को छत से नीचे धक्का दे देता है असल में हॉलीवुड फिल्म A Kiss Before Dying से इंस्पायर्ड बताया जाता है। यह हॉलीवुड फिल्म 1991 में रिलीज हुई थी, जबकि बाजीगर 1993 में आई। दोनों फिल्मों के इस सीन में काफी समानता देखी गई है, जिसने इसे और भी चर्चित बना दिया। क्या थी ‘बाजीगर’ की कहानीबाजीगर की कहानी बदले की आग में जल रहे एक शख्स के इर्द-गिर्द घूमती है। वह अपनी दुश्मनी निकालने के लिए एक ही परिवार की दो बहनों को अपने प्यार के जाल में फंसाता है। इस दौरान उसकी असली मंशा सामने आती है, जो फिल्म को थ्रिल और सस्पेंस से भर देती है। शाहरुख नहीं थे पहली पसंददिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म के लिए शाहरुख खान पहली पसंद नहीं थे। मेकर्स ने पहले Anil Kapoor को अप्रोच किया था, लेकिन उन्होंने इस रिस्की किरदार को करने से मना कर दिया। इसके बाद Salman Khan से भी बात हुई, लेकिन वह अन्य प्रोजेक्ट्स में व्यस्त थे। अंत में जब शाहरुख को कहानी सुनाई गई, तो उन्होंने तुरंत हां कर दी। स्टोरी सुनते ही मान गए थे शाहरुखडायरेक्टर के मुताबिक, जब शाहरुख को कहानी सुनाई गई तो वह इतने प्रभावित हुए कि तुरंत उठकर गले लगा लिया और फिल्म करने के लिए हामी भर दी। यही फैसला उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। आज भी यादगार है ये फिल्मबाजीगर आज भी बॉलीवुड की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है। इसके डायलॉग्स, गाने और खासकर शाहरुख का निगेटिव किरदार दर्शकों के दिलों में आज भी जिंदा है। वर्क फ्रंट पर शाहरुख खान Shah Rukh Khan आखिरी बार Dunki में नजर आए थे। इससे पहले 2023 में उनकी Jawan और Pathaan जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में रिलीज हुई थीं। अब वह जल्द ही फिल्म King में नजर आने वाले हैं, जिसमें उनके साथ Suhana Khan, Deepika Padukone और Abhishek Bachchan अहम भूमिकाओं में होंगे। इस फिल्म को Siddharth Anand डायरेक्ट कर रहे हैं। ‘बाजीगर’ का यह सीन भले ही हॉलीवुड से प्रेरित हो, लेकिन शाहरुख खान की दमदार एक्टिंग ने इसे भारतीय सिनेमा में आइकॉनिक बना दिया। यही वजह है कि यह फिल्म आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है।