पेपर लीक और फर्जी दावों पर रोक के लिए सरकार का कड़ा कदम, Telegram पर अस्थायी प्रतिबंध; Android यूजर्स के लिए डाउनलोड बंद

नई दिल्ली । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) 2026 की पुनर्परीक्षा से पहले केंद्र सरकार ने परीक्षा सुरक्षा को लेकर बड़ा और सख्त कदम उठाया है। सरकार के निर्देशों के बाद लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम को भारत में गूगल प्ले स्टोर से हटा दिया गया है। इसके चलते एंड्रॉयड उपयोगकर्ता फिलहाल आधिकारिक माध्यम से इस ऐप को डाउनलोड नहीं कर सकेंगे। हालांकि, एप्पल डिवाइस उपयोगकर्ताओं के लिए यह प्लेटफॉर्म अभी भी ऐप स्टोर पर उपलब्ध बना हुआ है। यह कार्रवाई ऐसे समय में की गई है जब 21 जून को आयोजित होने वाली NEET (UG) पुनर्परीक्षा को लेकर सुरक्षा व्यवस्थाएं अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुकी हैं। परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने और किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोकने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी बढ़ा दी है। अधिकारियों का मानना है कि कुछ ऑनलाइन चैनलों और समूहों के जरिए परीक्षा संबंधी भ्रामक सूचनाएं, फर्जी पेपर लीक के दावे और नकल से जुड़े नेटवर्क सक्रिय थे। सरकारी सूत्रों के अनुसार, कई टेलीग्राम चैनलों पर अभ्यर्थियों को प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने के नाम पर गुमराह किया जा रहा था। जांच में ऐसे कई दावों को भ्रामक पाया गया, लेकिन इनके कारण छात्रों और अभिभावकों के बीच भ्रम और चिंता का माहौल बन रहा था। इसी को देखते हुए व्यापक स्तर पर हस्तक्षेप का निर्णय लिया गया। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने परीक्षा एजेंसियों की सिफारिशों के आधार पर टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध लागू किया है। यह प्रतिबंध 22 जून तक प्रभावी रहेगा। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम केवल परीक्षा अवधि तक सीमित सुरक्षा उपाय है, जिसका उद्देश्य किसी भी प्रकार के डिजिटल दुरुपयोग को रोकना और परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना है। सरकार ने टेलीग्राम के मैसेज एडिटिंग फीचर को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। अधिकारियों के मुताबिक, इस सुविधा का उपयोग पहले ऐसे मामलों में किया गया था जहां पुराने संदेशों में बाद में नई सामग्री जोड़ दी जाती थी, जबकि संदेश का मूल समय वही दिखाई देता था। इससे फर्जी दस्तावेज, भ्रामक स्क्रीनशॉट और कथित पेपर लीक के नकली प्रमाण तैयार किए जाने की आशंका बढ़ जाती है। इसी कारण प्लेटफॉर्म को भारत में निर्धारित अवधि तक इस सुविधा को निष्क्रिय रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। परीक्षा संचालन से जुड़े अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अब तक की जांच में NEET 2026 प्रश्नपत्र लीक होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही अफवाहों और दावों ने परीक्षा की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करने की कोशिश की। इसी वजह से केवल कुछ चैनलों या समूहों को हटाने के बजाय व्यापक कार्रवाई को अधिक प्रभावी माना गया। इस पूरे अभियान में साइबर अपराध से जुड़ी केंद्रीय और राज्य स्तरीय एजेंसियां भी सक्रिय रूप से शामिल हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और फर्जी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी है। सरकार का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर कड़े कदम आवश्यक हैं। परीक्षा से जुड़े सभी हितधारकों को यह संदेश दिया गया है कि किसी भी अपुष्ट सूचना, पेपर लीक के दावे या संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि पर भरोसा न करें। अधिकारियों ने अभ्यर्थियों से केवल आधिकारिक माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं पर ही विश्वास करने की अपील की है ताकि परीक्षा प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।
बुध ग्रह की कृपा से चमक सकता है करियर और कारोबार, बुधवार के ये सरल उपाय बदल सकते हैं सफलता की दिशा

नई दिल्ली । ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, तर्कशक्ति, शिक्षा, व्यापार और संचार का प्रमुख कारक ग्रह माना गया है। मान्यता है कि व्यक्ति के जीवन में निर्णय लेने की क्षमता, संवाद कौशल, स्मरण शक्ति और व्यावसायिक सफलता पर बुध ग्रह का विशेष प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि कुंडली में बुध की स्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब बुध ग्रह शुभ और मजबूत स्थिति में होता है, तब व्यक्ति को शिक्षा, करियर, व्यापार और आर्थिक मामलों में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है। वहीं इसके कमजोर होने पर कई प्रकार की चुनौतियां सामने आ सकती हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से बुध ग्रह व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता और व्यवहार को प्रभावित करता है। लेखन, पत्रकारिता, बैंकिंग, अकाउंटिंग, मार्केटिंग, मीडिया और व्यापार जैसे क्षेत्रों में कार्यरत लोगों के लिए इसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। बुध की अनुकूल स्थिति व्यक्ति को तार्किक सोच, प्रभावी अभिव्यक्ति और बेहतर निर्णय क्षमता प्रदान करने वाली मानी जाती है। इसके विपरीत अशुभ बुध कई बार भ्रम, एकाग्रता की कमी, पढ़ाई में बाधा, संवाद संबंधी समस्याएं और व्यापारिक नुकसान जैसी स्थितियों का कारण बन सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बुधवार का दिन बुध देव को समर्पित माना जाता है। इस दिन कुछ विशेष उपायों को अपनाकर बुध ग्रह की सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। माना जाता है कि हरे रंग का बुध ग्रह से विशेष संबंध है, इसलिए बुधवार को हरे रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। यह उपाय मानसिक संतुलन और सकारात्मकता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। बुध ग्रह की कृपा प्राप्त करने के लिए मंत्र जाप का भी विशेष महत्व बताया गया है। बुधवार की सुबह स्नान के बाद श्रद्धापूर्वक “ॐ बुधाय नमः” अथवा “ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः” मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि नियमित मंत्र जाप से मानसिक एकाग्रता, स्मरण शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। सूर्योदय के बाद शांत वातावरण में किए गए जाप को विशेष फलदायी माना जाता है। दान को भी बुध ग्रह को प्रसन्न करने का प्रभावी माध्यम माना गया है। बुधवार के दिन हरी मूंग, हरी सब्जियां, हरे वस्त्र, फल अथवा कांस्य के बर्तनों का दान जरूरतमंद लोगों को करने की परंपरा बताई गई है। इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री प्रदान करना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी शुभ कार्यों में शामिल माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भगवान गणेश और बुध ग्रह का विशेष संबंध बताया गया है। इसलिए बुधवार को भगवान गणेश की पूजा, दुर्वा अर्पित करना तथा गणेश मंत्रों का जाप करना भी लाभकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गणपति की आराधना से बुद्धि, विवेक और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। बुध ग्रह के रत्न के रूप में पन्ना का विशेष महत्व बताया गया है। इसे धारण करने से बुद्धि, संवाद कौशल और निर्णय क्षमता में सुधार होने की मान्यता है। हालांकि किसी भी रत्न को धारण करने से पहले योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श लेना आवश्यक माना जाता है ताकि व्यक्ति की कुंडली के अनुसार उचित निर्णय लिया जा सके। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार बुध ग्रह को मजबूत बनाने के लिए मधुर वाणी का प्रयोग, माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान, सेवा कार्यों में भागीदारी तथा सकारात्मक सोच बनाए रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे उपाय व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास के साथ-साथ करियर और आर्थिक उन्नति के मार्ग को भी मजबूत करने में सहायक माने जाते हैं।
विदेश यात्रा से पहले सावधान! बैग में रखा एक गैजेट भी बना सकता है कानूनी मुसीबत, कई देशों में सख्त प्रतिबंध

नई दिल्ली । डिजिटल युग में गैजेट्स लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। संचार, सुरक्षा, नेविगेशन और मनोरंजन से जुड़े उपकरण अब यात्रा के दौरान भी आमतौर पर साथ रखे जाते हैं। हालांकि दुनिया के अलग-अलग देशों में तकनीकी उपकरणों को लेकर नियम समान नहीं हैं। कई ऐसे गैजेट हैं जो एक देश में पूरी तरह वैध और सामान्य माने जाते हैं, जबकि दूसरे देश में उनके उपयोग, स्वामित्व या आयात पर सख्त प्रतिबंध लागू हैं। ऐसे में विदेश यात्रा करने वाले लोगों के लिए स्थानीय कानूनों की जानकारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी उपकरणों से जुड़े नियम मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा, संचार नियंत्रण, गोपनीयता संरक्षण और हवाई क्षेत्र की सुरक्षा जैसे कारणों से बनाए जाते हैं। कई बार यात्रियों को यह जानकारी नहीं होती कि उनके बैग में रखा कोई सामान्य गैजेट भी किसी देश के कानून का उल्लंघन कर सकता है। ऐसी स्थिति में जुर्माना, डिवाइस जब्ती और कुछ मामलों में गिरफ्तारी तक की नौबत आ सकती है। सैटेलाइट फोन इसका सबसे प्रमुख उदाहरण माना जाता है। यह उपकरण दूरदराज और नेटवर्कविहीन क्षेत्रों में भी संचार सुविधा उपलब्ध कराता है। पर्वतारोहियों, समुद्री यात्रियों और साहसिक यात्राओं पर जाने वाले लोगों के बीच इसकी मांग रहती है। हालांकि कुछ देशों में सैटेलाइट संचार पर विशेष नियंत्रण होने के कारण इसके उपयोग पर प्रतिबंध या सख्त नियमन लागू है। ऐसे देशों में बिना अनुमति सैटेलाइट फोन रखना कानूनी समस्या का कारण बन सकता है। इसी प्रकार ड्रोन तकनीक ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से लोकप्रियता हासिल की है। पर्यटन, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और निजी उपयोग के लिए ड्रोन का इस्तेमाल व्यापक रूप से बढ़ा है। लेकिन कई देशों में ड्रोन को सुरक्षा और हवाई क्षेत्र प्रबंधन से जुड़ा संवेदनशील उपकरण माना जाता है। कुछ देशों में विदेशी यात्रियों को ड्रोन साथ ले जाने की अनुमति नहीं होती, जबकि कहीं पूर्व अनुमति या विशेष पंजीकरण अनिवार्य होता है। नियमों की अनदेखी करने पर ड्रोन जब्त किए जा सकते हैं और कानूनी कार्रवाई भी संभव है। वाहनों में लगाए जाने वाले डैशकैम भी कई देशों में विवाद का विषय बने हुए हैं। सड़क सुरक्षा और दुर्घटना रिकॉर्डिंग के लिए उपयोगी माने जाने वाले ये कैमरे कुछ देशों में निजता के अधिकार से जुड़ी चिंताओं के कारण प्रतिबंधित या नियंत्रित हैं। वहां सार्वजनिक स्थानों पर लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग को व्यक्तिगत गोपनीयता का उल्लंघन माना जाता है। परिणामस्वरूप ऐसे उपकरणों के उपयोग पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। वॉकी-टॉकी जैसे रेडियो संचार उपकरण भी हर देश में स्वतंत्र रूप से उपयोग नहीं किए जा सकते। कई देशों में रेडियो फ्रीक्वेंसी के उपयोग को लेकर सख्त नियम लागू हैं। निर्धारित अनुमति या लाइसेंस के बिना ऐसे उपकरणों का संचालन अवैध माना जा सकता है। गलत फ्रीक्वेंसी पर प्रसारण होने की स्थिति में डिवाइस जब्त करने और जुर्माना लगाने का प्रावधान भी मौजूद है। इंटरनेट गोपनीयता के लिए उपयोग किए जाने वाले वीपीएन को लेकर भी विभिन्न देशों का दृष्टिकोण अलग-अलग है। जहां कई देशों में इसे डिजिटल सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है, वहीं कुछ देशों में इसके उपयोग पर नियंत्रण या प्रतिबंध लागू हैं। ऐसे देशों का तर्क है कि वीपीएन निगरानी व्यवस्था और साइबर नियमों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए वहां इसके उपयोग के लिए विशेष शर्तें निर्धारित की गई हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय यात्रा से पहले गंतव्य देश के तकनीकी और संचार संबंधी नियमों की आधिकारिक जानकारी अवश्य प्राप्त करनी चाहिए। थोड़ी सी सतर्कता यात्रियों को अनावश्यक कानूनी परेशानियों से बचा सकती है और उनकी यात्रा को सुरक्षित एवं सुगम बना सकती है।
जुबली गर्ल आशा पारेख के त्याग की अनकही दास्तान: शादीशुदा फिल्ममेकर से बेइंतहा मोहब्बत के बाद भी ताउम्र क्यों कुंवारी रहीं दिग्गज अभिनेत्री

नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में साठ और सत्तर के दशक में सिल्वर स्क्रीन राज करने वाली सदाबहार अभिनेत्री आशा पारेख की पेशेवर जिंदगी जितनी चकाचौंध और सफलताओं से भरी रही, उनकी निजी जिंदगी में उतनी ही खामोशी और त्याग की एक अनूठी कहानी छिपी रही। अपनी बेमिसाल खूबसूरती और बेहतरीन अभिनय के दम पर करोड़ों प्रशंसकों को अपना दीवाना बनाने वाली इस महान अदाकारा ने अपनी असल जिंदगी में प्यार की एक ऐसी गरिमापूर्ण मिसाल पेश की, जिसकी चर्चा आज भी बॉलीवुड के गलियारों में बेहद सम्मान के साथ की जाती है। उन्होंने एक शादीशुदा मर्द से सच्ची मोहब्बत तो की, लेकिन समाज में ‘घर तोड़ने वाली’ कहलाने का कलंक झेलने की बजाय ताउम्र कुंवारी रहने का रास्ता चुना। इस निश्छल और मूक प्रेम कहानी की शुरुआत वर्ष उन्नीस सौ उनसठ में हुई थी, जब मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक नासिर हुसैन ने युवा आशा पारेख की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें अपनी फिल्म ‘दिल देके देखो’ में मुख्य अभिनेत्री के तौर पर एक बड़ा ब्रेक दिया था। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसके बाद इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई शानदार और जुबली फिल्में सिनेमा जगत को दीं। सेट पर एक साथ लगातार काम करने के दौरान आशा पारेख कब अपने निर्देशक को दिल दे बैठीं, उन्हें खुद भी इसका अहसास नहीं हुआ और दूसरी तरफ नासिर हुसैन के दिल में भी उनके लिए वही सम्मानजनक भावनाएं थीं। नासिर हुसैन के लिए अपने दिल में बेइंतहा मोहब्बत और कशिश होने के बावजूद आशा पारेख ने कभी भी अपने हक के लिए उनके सामने कोई जिद या शर्त नहीं रखी। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह थी कि नासिर हुसैन पहले से ही शादीशुदा थे और बाल-बच्चों के साथ एक खुशहाल जीवन बिता रहे थे। अभिनेत्री के भीतर के नैतिक मूल्यों ने उन्हें कभी इस बात की इजाजत नहीं दी कि उनके व्यक्तिगत सुख या प्यार की खातिर किसी दूसरी औरत का सुहाग और एक हंसता-खेलता परिवार हमेशा के लिए बिखर जाए। उन्होंने अपने दिल की आवाज को दबाकर दूसरे के आशियाने की हिफाजत करना ज्यादा जरूरी समझा। दशकों तक इस खामोश दर्द और मोहब्बत को अपने सीने में दफन रखने के बाद, आशा पारेख ने वर्ष दो हजार सत्रह में प्रकाशित हुई अपनी आत्मकथा ‘द हिट गर्ल’ में इस राज से पर्दा उठाया था। उन्होंने बेहद भावुक शब्दों में स्वीकार किया था कि नासिर हुसैन ही उनकी जिंदगी के एकमात्र ऐसे पुरुष थे जिनसे उन्होंने बेहद शिद्दत से प्यार किया था। लेकिन किसी का घर उजाड़कर अपनी खुशियों का महल खड़ा करना उनके संस्कारों के खिलाफ था, यही वजह थी कि उन्होंने नासिर हुसैन पर शादी का दबाव बनाने की बजाय खुद अकेले जिंदगी काटने का एक बेहद कठिन और साहसिक निर्णय लिया। अपनी पूरी जिंदगी तन्हाई और अकेलेपन में गुजारने के बाद भी इस उम्र में पद्मश्री और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अभिनेत्री के मन में अपने अतीत के फैसलों को लेकर कोई मलाल, कड़वाहट या शिकायत नहीं है। उनका हमेशा से यह दृढ़ विश्वास रहा है कि किसी दूसरे को दुख देकर हासिल की गई खुशी कभी भी स्थायी और सच्ची नहीं हो सकती। आज बयासी वर्ष से अधिक की उम्र पार कर चुकीं आशा पारेख अपने इस फैसले पर अडिग रहते हुए पूरे आत्मसम्मान, सुकून और गरिमा के साथ अपनी एकाकी जिंदगी का आनंद ले रही हैं, जो आज के दौर के रिश्तों के लिए एक बहुत बड़ी नजीर है।
सिनेमाई इतिहास का वो विवादित वाकया: जब फिल्म 'प्रेम धर्म' के इंटीमेट सीन के दौरान बेकाबू हुए विनोद खन्ना, गुस्से में डिंपल कपाड़िया ने उठाया था बड़ा कदम

नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे किस्से दर्ज हैं जो फिल्मों की सफलता से इतर सेट पर घटित विवादित वाकयों के लिए हमेशा चर्चा में रहे। अस्सी के दशक में भी एक ऐसा ही वाकया सामने आया था, जिसने तत्कालीन फिल्म जगत में भारी सनसनी मचा दी थी। यह पूरा मामला हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर के सुपरस्टार विनोद खन्ना और दिग्गज अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया से जुड़ा हुआ है। वर्ष उन्नीस सौ अस्सी में आई फिल्म ‘प्रेम धर्म’ की शूटिंग के दौरान एक बेहद संवेदनशील और अंतरंग दृश्य को फिल्माते समय ऐसा घटनाक्रम हुआ कि सेट पर मौजूद हर व्यक्ति हैरान रह गया। इस बहुचर्चित फिल्म का निर्देशन मशहूर फिल्मकार महेश भट्ट कर रहे थे, जो अपनी फिल्मों में दृश्यों को बेहद यथार्थवादी और भावुक बनाने के लिए जाने जाते हैं। फिल्म के एक खास सीक्वेंस के लिए विनोद खन्ना और डिंपल कपाड़िया के बीच एक बेहद इंटीमेट और इमोशनल सीन शूट किया जाना तय हुआ था। इस दृश्य को अधिक वास्तविक रूप देने और कलाकारों की झिझक दूर करने के उद्देश्य से निर्देशक महेश भट्ट ने सेट की सभी लाइटों को काफी धीमा करवा दिया था और मुख्य कैमरा टीम को छोड़कर बाकी पूरी यूनिट को भी उस स्थान से थोड़ा दूर रहने के निर्देश दिए गए थे। जैसे ही कैमरे ने रोल करना शुरू किया, विनोद खन्ना ने स्क्रिप्ट की मांग के अनुसार अपनी सह-कलाकार डिंपल कपाड़िया को चूमना शुरू कर दिया। दृश्य के पूरा होते ही निर्देशक महेश भट्ट ने लाउडस्पीकर पर ‘कट’ की घोषणा की, लेकिन विनोद खन्ना दृश्य की भावुकता और तीव्रता में इस कदर खो चुके थे कि उन्होंने निर्देशक की आवाज नहीं सुनी। ‘कट’ बोले जाने के बाद भी वे लगातार डिंपल कपाड़िया को किस करते रहे, जिससे सेट पर असहज स्थिति पैदा हो गई। डिंपल कपाड़िया को शुरुआत में समझ ही नहीं आया कि उनके सह-कलाकार आखिर क्या कर रहे हैं। माहौल को अचानक गंभीर और अजीब होते देख निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी जगह से उठकर बेहद जोर-जोर से ‘कट’ बोलना शुरू किया, जिसके बाद कहीं जाकर विनोद खन्ना होश में आए और पीछे हटे। इस अप्रत्याशित और अचानक हुई घटना से युवा अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया पूरी तरह स्तब्ध और गहरे सदमे में आ गईं। उन्हें विनोद खन्ना के इस अनपेक्षित व्यवहार पर भारी गुस्सा भी आया और वे तुरंत सेट से भागकर सीधे अपने मेकअप रूम की तरफ चली गईं। अपने स्वाभिमान और गरिमा को ठेस पहुंचने से आहत अभिनेत्री ने मेकअप रूम के भीतर पहुंचकर खुद को अंदर से पूरी तरह बंद कर लिया और बाहर आने से साफ मना कर दिया। सेट पर पैदा हुए इस गंभीर तनाव को देखते हुए निर्देशक महेश भट्ट ने तुरंत स्थिति को संभाला और वे स्वयं डिंपल कपाड़िया के कमरे के बाहर पहुंचे। उन्होंने अभिनेत्री से इस पूरी घटना के लिए औपचारिक रूप से माफी मांगी और उन्हें आश्वस्त किया कि यह केवल एक भूल थी। दूसरी तरफ, सुपरस्टार विनोद खन्ना भी अपनी इस अनियंत्रित हरकत के बाद बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। बॉलीवुड के गलियारों में आज भी इस किस्से को संवेदनशीलता के साथ याद किया जाता है, जो यह दर्शाता है कि चकाचौंध भरी फिल्मों के निर्माण के दौरान कई बार कलाकारों के लिए स्थितियां कितनी असहज और चुनौतीपूर्ण हो जाती हैं। हालांकि, बाद में मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे सुलझा लिया गया था, लेकिन सेंसर बोर्ड की कैंची और सेट पर मचे इस बवाल के कारण यह फिल्म और इससे जुड़ा यह विवाद हमेशा-कहमेशा के लिए फिल्मी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
भाई का आरोप- काम की कमी और मानसिक अपमान झेल रही थीं अभिनेत्री, सुशांत सिंह राजपूत से जुड़ा आखिरी पोस्ट

नई दिल्ली । टेलीविजन मनोरंजन उद्योग से आई एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली खबर ने पूरी इंडस्ट्री सहित प्रशंसकों को गहरे सदमे में डाल दिया है। कई लोकप्रिय धारावाहिकों में अपनी अदाकारी का जलवा बिखेर चुकीं बाईस वर्षीय उभरती हुई अभिनेत्री संचिता उगले के अचानक निधन से एक बार फिर चकाचौंध भरी इस दुनिया के पीछे छिपे मानसिक तनाव और दबाव की कड़वी सच्चाई सामने आ गई है। शुरुआती पुलिस जांच में इस घटना को कथित तौर पर आत्महत्या का मामला माना जा रहा है, जिसकी बारीकी से तफ्तीश की जा रही है। अभिनेत्री के असमय चले जाने के बाद उनके परिजनों और करीबी सहयोगियों की तरफ से आ रहे बयानों ने इस मामले में दुख और आक्रोश को और बढ़ा दिया है। संचिता की सह-कलाकार और बेहद करीबी दोस्त मेघा शर्मा ने मीडिया से बातचीत में खुलासा किया कि अभिनेत्री पिछले कुछ महीनों से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं और मानसिक अवसाद के दौर से गुजर रही थीं। जनवरी महीने से ही उनका नियमित इलाज चल रहा था और वे अपनी कुछ निजी उलझनों को लेकर लगातार मानसिक रूप से परेशान चल रही थीं। करीबी सूत्रों के मुताबिक, संचिता अक्सर जिंदगी से हार मानने और हताशा से भरी बातें किया करती थीं, जिसके बाद उनके दोस्तों और परिजनों ने हमेशा उन्हें ढांढस बंधाया और सकारात्मक रहने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, बीते कुछ दिनों से उनका फोन लगातार बंद आ रहा था, जिसने उनके करीबियों की चिंता बढ़ा दी थी। अपनी मौत से करीब दस दिन पहले वे एक ऑडिशन के सिलसिले में अपनी दोस्त के साथ गई थीं, जहां वे अपने भविष्य और अभिनय करियर को लेकर काफी आश्वस्त और सकारात्मक नजर आ रही थीं। दूसरी तरफ, इस संवेदनशील मामले में पुलिसिया कार्रवाई के बीच संचिता के भाई अविनाश उगले ने मनोरंजन जगत की कार्यशैली पर बेहद गंभीर और तीखे आरोप लगाए हैं। उनके भाई का कहना है कि ग्लैमर की इस दुनिया में लगातार मिलने वाला मानसिक दबाव, काम की अत्यधिक कमी और कार्यस्थल पर वरिष्ठों द्वारा कथित तौर पर किया जाने वाला अपमान उनकी बहन की मानसिक स्थिति बिगड़ने की मुख्य वजह बना। वह लंबे समय से इस बेइज्जती और उपेक्षा को चुपचाप सहन कर रही थीं, जिससे उनका आत्मविश्वास पूरी तरह टूट चुका था। मृतक अभिनेत्री के भाई ने इस पूरे घटनाक्रम का संबंध दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की त्रासदी से भी जोड़ा है। उन्होंने बताया कि संचिता का आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट भी सुशांत सिंह राजपूत को ही समर्पित था, जिससे यह साफ झलकता है कि वे किस कदर अंदरूनी तौर पर अकेलेपन और मानसिक तनाव से जूझ रही थीं। गौरतलब है कि चौदह जून की शाम को संचिता अपने आवास पर अचेत अवस्था में पाई गई थीं, जिसके बाद अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था। टेलीविजन शोज के अलावा हाल ही में एक बड़ी फिल्म का हिस्सा रहीं संचिता उगले के इस कदम ने फिल्म सिटी के भीतर कलाकारों की मानसिक सुरक्षा पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। पुलिस प्रशासन ने इस मामले में अप्राकृतिक मृत्यु का मुकदमा दर्ज कर शव को अंत्यपरीक्षण के लिए भेज दिया है। जांच अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम की विस्तृत रिपोर्ट आने और अभिनेत्री के कॉल डिटेल्स व सोशल मीडिया अकाउंट्स की गहन पड़ताल के बाद ही मौत के वास्तविक कारणों का पूरी तरह खुलासा हो सकेगा।
बुढ़वा मंगल पर बजरंगबली को बेहद प्रिय हैं ये पांच विशेष चीजें, शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों से राहत मिलने की है मान्यता

नई दिल्ली । उत्तर भारत की सनातन धार्मिक परंपराओं में ज्येष्ठ महीने के मंगलवार का एक बेहद विशिष्ट और पावन महत्व माना गया है, जिन्हें आम बोलचाल में बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल के नाम से पुकारा जाता है। ज्येष्ठ महीना अब अपने समापन की ओर अग्रसर है और आज यानी १६ जून २०२६ को इस पावन महीने का सातवां बड़ा मंगल पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस साल ज्येष्ठ मास के दौरान अधिकमास का विशेष संयोग बनने के कारण कुल आठ बड़े मंगल पड़ रहे हैं, जिसके चलते आज के सातवें बड़े मंगल का महत्व ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कहीं अधिक बढ़ गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन पर व्रत रखने और पूरी निष्ठा से संकटमोचन की उपासना करने से बजरंगबली अपने भक्तों पर अटूट कृपा बरसाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों के अनुसार, बड़े मंगल के दिन की गई पूजा न केवल जीवन के संकटों को टालती है, बल्कि इससे कुंडली में मंगल ग्रह की स्थिति भी बेहद मजबूत और शुभ होती है। इसके अतिरिक्त, जो जातक वर्तमान समय में शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के बुरे दौर और कष्टों से गुजर रहे हैं, उनके लिए भी आज के दिन हनुमान जी की आराधना करना अचूक और राहत देने वाला माना गया है। इस पावन अवसर पर पूजा और आरती के लिए शास्त्रों में कुछ विशेष और कल्याणकारी मुहूर्त निर्धारित किए गए हैं, जिनमें सुबह ०५:४५ बजे से ०७:२५ बजे तक अमृत काल का श्रेष्ठ समय रहा, जबकि दोपहर ११:५० बजे से १२:४५ बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा और शाम को संध्या आरती के लिए ०६:३० बजे से ०७:४५ बजे तक का समय सर्वश्रेष्ठ माना गया है। उत्तर भारत, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और उसके आस-पास के तमाम क्षेत्रों में बड़े मंगल के अवसर पर एक बहुत ही भव्य सांस्कृतिक व धार्मिक नजारा देखने को मिलता है। इस दिन जगह-जगह विशाल भंडारों का आयोजन करने, भीषण गर्मी के इस मौसम में राहगीरों को ठंडा शरबत व पानी पिलाने तथा सामूहिक रूप से सुंदरकांड का पाठ करने की एक लंबी और गौरवशाली परंपरा रही है। सुबह से ही तमाम प्रमुख हनुमान मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है, जहां विशेष पूजा-अर्चना, भव्य श्रृंगार और कीर्तन के कार्यक्रम अनवरत रूप से चल रहे हैं। धर्म-शास्त्रों के अनुसार, आज के दिन बजरंगबली को उनकी कुछ बेहद प्रिय चीजें अर्पित करने से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं स्वतः ही दूर हो जाती हैं। शास्त्रों में वर्णित इन पांच प्रमुख चीजों में सबसे पहला स्थान लाल फूलों का है, जिसके तहत हनुमान जी को गुड़हल या गुलाब के लाल पुष्प अर्पित करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। दूसरी प्रमुख सामग्री चोला है, जिसमें चमेली के तेल में केसरिया सिंदूर मिलाकर प्रभु के चरणों से शुरुआत करते हुए चोला चढ़ाया जाता है और अंत में वही सिंदूर माथे पर लगाया जाता है। इसके अलावा, बजरंगबली को बनारसी पान पर कत्था, गुलकंद, सौंफ और इलायची रखकर मीठे पान का बीड़ा अर्पित करने से जीवन की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, ध्यान रहे कि इस पान में चूना या सुपारी बिल्कुल न हो। चौथी और पांचवीं चीज के रूप में हनुमान जी को बूंदी या बेसन के लड्डू तथा आटे, शुद्ध घी और गुड़ से बने पारंपरिक चूरमे या मीठी रोटी का भोग लगाने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की ब्लॉकबस्टर जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर रचा था इतिहास, इन ९ फिल्मों में साथ आकर दर्शकों को बनाया दीवाना

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सबसे प्रतिष्ठित और स्क्रीन पर तहलका मचाने वाली जोड़ियों का जिक्र होता है, तो अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। सत्तर और अस्सी के दशक में इन दोनों दिग्गज कलाकारों ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा चमत्कारी तालमेल दिखाया कि डिस्ट्रीब्यूटर्स और दर्शकों के बीच यह माना जाने लगा था कि जिस फिल्म में ये दोनों साथ हैं, उसका सुपरहिट होना तय है। इस ब्लॉकबस्टर जोड़ी की लोकप्रियता का आलम यह था कि इनकी एक कल्ट क्लासिक फिल्म रिलीज के बाद लगातार पांच सालों तक सिनेमाघरों से नहीं उतरी थी, जो अपने आप में एक अटूट कीर्तिमान है। इन दोनों महानायकों ने मुख्य भूमिकाओं से लेकर खास कैमियो रोल्स तक, कुल ९ फिल्मों में एक साथ स्क्रीन शेयर कर सिल्वर स्क्रीन पर अपनी दोस्ती और अभिनय का लोहा मनवाया। इस बेमिसाल जोड़ी के करियर और हिंदी सिनेमा के इतिहास में साल १९७५ में आई फिल्म ‘शोले’ एक मील का पत्थर साबित हुई। निर्देशक रमेश सिप्पी की इस एक्शन-ड्रामा फिल्म में जय और वीरू के किरदारों में अमिताभ और धर्मेंद्र ने जिगरी दोस्ती की ऐसी अनूठी मिसाल पेश की, जो आज आधी सदी बीत जाने के बाद भी मुहावरा बनी हुई है। यह फिल्म न केवल उस दौर की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी, बल्कि मुंबई के मिनर्वा थिएटर में लगातार पांच सालों तक चलकर इसने इतिहास रच दिया। इसी साल इस सुपरहिट जोड़ी की एक और क्लासिक फिल्म ‘चुपके चुपके’ रिलीज हुई थी। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी यह बेहतरीन कॉमेडी फिल्म बंगाली सिनेमा की रीमेक थी। फिल्म में दोनों की कॉमिक टाइमिंग कमाल की थी और एसडी बर्मन के संगीत से सजे इसके गाने आज भी चाव से सुने जाते हैं। एक्शन और कॉमेडी के बाद इस जोड़ी ने साल १९८० में आई फिल्म ‘राम बलराम’ के जरिए थ्रिलर जॉनर में अपनी धाक जमाई। विजय आनंद द्वारा निर्देशित इस एक्शन थ्रिलर फिल्म में दोनों ने ऐसे दो भाइयों का किरदार निभाया था, जिनका पालन-पोषण धोखे से उनके माता-पिता के हत्यारे चाचा ने किया था। इसके अलावा यह जोड़ी ऋषिकेश मुखर्जी की ही एक और कल्ट फिल्म ‘गुड्डी’ में भी एक साथ नजर आई थी। हालांकि इस फिल्म में मुख्य भूमिका अभिनेत्री जया बच्चन की थी, लेकिन धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन ने फिल्म इंडस्ट्री की असलियत दिखाते हुए इसमें बेहद प्रभावी कैमियो रोल किए थे, जिसने फिल्म की कहानी को एक नया आयाम दिया था। सिल्वर स्क्रीन पर नए प्रयोग करने के मामले में भी यह जोड़ी पीछे नहीं रही। साल १९७७ में रिलीज हुई फिल्म ‘चरणदास’ एकमात्र ऐसी अनूठी फिल्म है, जिसमें अमिताभ और धर्मेंद्र दोनों ने कव्वाली गायकों के रूप में एक विशेष और बेहद दिलचस्प भूमिका निभाई थी। आशा भोसले और मुकेश की आवाज में सजे इस फिल्म के कव्वाली गीत आज भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। इसके बाद निर्देशक दुलल गुहा की फिल्म ‘दोस्त’ में भी अमिताभ बच्चन ने ‘आनंद’ नाम के किरदार में एक बेहद प्रभावशाली कैमियो किया था, जहां मुख्य भूमिका में धर्मेंद्र मौजूद थे। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत से सजी इस फिल्म में दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों ने खूब सराहा था। इन दोनों सितारों की जुगलबंदी का सिलसिला आगे भी जारी रहा, जिसमें एक हॉरर-थ्रिलर फिल्म ‘जादूगर’ शामिल है। इस रहस्यमयी कहानी में धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन ने क्रमशः वीरेंद्र और फ्रैंक जेम्स की भूमिकाएं निभाकर दर्शकों को चौंका दिया था, जिसकी पृष्ठभूमि एक सुनसान हवेली से जुड़ी थी। इसके बाद फिल्म ‘दिल्लगी’ में भी दोनों का जादू देखने को मिला, जहां अमिताभ बच्चन का रोल भले ही छोटा था, लेकिन एक गंभीर और सीधे-सादे प्रोफेसर की भूमिका निभा रहे धर्मेंद्र के साथ उनकी ऑनस्क्रीन मौजूदगी ने फिल्म की रौनक बढ़ा दी थी। इसके अतिरिक्त इस लिस्ट में एक अन्य फिल्म ‘हम कौन हैं’ का नाम भी प्रमुखता से शामिल है, जिसमें इस महान जोड़ी ने अपने अभिनय से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।
न मनमुटाव, न तलाक, फिर भी ३७ सालों से अलग शहरों में रह रहे हैं अलका याग्निक और नीरज कपूर, खुद सिंगर ने खोला इस अनोखे रिश्ते का राज

नई दिल्ली । भारतीय संगीत जगत पर दशकों तक राज करने वाली दिग्गज गायिका अलका याग्निक की सुरीली आवाज से तो हर कोई वाकिफ है, लेकिन उनकी निजी जिंदगी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। अलका याग्निक ने साल १९८९ में बिजनेसमैन नीरज कपूर से शादी की थी, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि शादी के करीब ३७ साल बीत जाने के बाद भी यह कपल एक-दूसरे से अलग रहता है। अमूमन फिल्म इंडस्ट्री में अलग रहने का मतलब मनमुटाव या तलाक माना जाता है, मगर इस जोड़े के बीच ऐसा कुछ भी नहीं है। दोनों के बीच आज भी अटूट प्यार और आपसी समझ कायम है। दरअसल, अलका याग्निक के पति नीरज कपूर मूल रूप से मेघालय की राजधानी शिलांग के रहने वाले हैं और वहीं रहकर अपना पूरा बिजनेस संभालते हैं, जबकि अलका अपने काम के सिलसिले में मुंबई में रहती हैं। इस अनोखे रिश्ते की शुरुआत एक पारिवारिक जुड़ाव से हुई थी। नीरज कपूर की आंटी और अलका याग्निक की मां बचपन में क्लासमेट हुआ करती थीं। इसी पारिवारिक कनेक्शन के चलते नीरज जब मुंबई आए, तो उनकी पहली मुलाकात अलका से हुई। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला बढ़ा और यह दोस्ती गहरी मोहब्बत में बदल गई। उस दौर में दोनों के बीच रात-रात भर फोन पर बातें हुआ करती थीं और जब घर पर फोन का भारी-भरकम बिल आया, तब जाकर अलका की मां को इस अफेयर की भनक लगी। अलका उस समय तक यह पूरी तरह तय कर चुकी थीं कि वह जीवनसाथी के रूप में सिर्फ नीरज को ही चुनेंगी। हालांकि, जब दोनों ने अपने परिवारों के सामने शादी की इच्छा जताई, तो अलका के माता-पिता इस रिश्ते के सख्त खिलाफ खड़े हो गए। घरवालों के विरोध की सबसे बड़ी वजह दोनों के करियर और अलग-अलग शहर थे। नीरज शिलांग में पूरी तरह सेटल थे और अलका उस दौर में अपने सिंगिंग करियर के पीक पर थीं, जिसके कारण उनका मुंबई में रहना बेहद जरूरी था। माता-पिता का मानना था कि एक पार्टनर मुंबई में और दूसरा शिलांग में रहेगा, तो इतनी दूरी के बीच शादी का चलना नामुमकिन हो जाएगा। हालांकि, अलका और नीरज के दृढ़ निश्चय के आगे आखिरकार दोनों परिवारों को झुकना पड़ा और साल १९८९ में दोनों पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह के बंधन में बंध गए। शादी के शुरुआती दिनों में दोनों ने एक बीच का रास्ता निकाला था, जिसके तहत तय हुआ था कि अलका एक महीने के लिए शिलांग जाएंगी और नीरज अगले महीने मुंबई आएंगे। शादी के तुरंत बाद अलका याग्निक का करियर इतनी तेजी से चमका कि उनके लिए एक दिन के लिए भी मुंबई छोड़ना पूरी तरह नामुमकिन हो गया। साल १९९० में उनकी बेटी सायशा का जन्म हुआ और उसके ठीक बाद जनवरी १९९१ में उनका गाना ‘एक दो तीन’ ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। इस सफलता ने अलका को बॉलीवुड की सबसे व्यस्त गायिका बना दिया। अलका बताती हैं कि उनके पति अक्सर मजाक में उन्हें चिढ़ाते हैं कि वह अलका के करियर के लिए तो बहुत लकी साबित हुए, लेकिन अपने खुद के वैवाहिक जीवन के लिए अनलकी रहे। खुद अलका भी मानती हैं कि पूरी जिंदगी अलग-अलग शहरों में रहने की वजह से जब भी वे लंबे समय बाद मिलते हैं, तो एक-दूसरे के तौर-तरीकों को दोबारा समझने में दो-चार दिन का समय लग जाता है, लेकिन इस दूरी ने उनके रिश्ते के विश्वास को कभी कमजोर नहीं होने दिया।
परदे पर शराबी का अमर अभिनय करने वाले केष्टो मुखर्जी की अनसुनी दास्तान, मंदिर जाते वक्त सड़क हादसे में थम गई थीं सांसें

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के सुनहरे इतिहास में कई ऐसे कलाकारों ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है, जिनकी रील और रीयल लाइफ में जमीन-आसमान का अंतर था। एक ऐसे ही बेमिसाल अभिनेता थे केष्टो मुखर्जी, जिन्होंने परदे पर हमेशा एक पक्के शराबी का किरदार निभाकर दर्शकों को लोटपोट किया, लेकिन असल जिंदगी में उन्होंने कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाया। अपनी खास कॉमिक टाइमिंग, अनूठी शारीरिक भाषा और लड़खड़ाती जुबान से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले केष्टो मुखर्जी ने अपने करियर में ९० से भी अधिक फिल्मों में काम किया, मगर उनका यह मुकाम कड़े संघर्षों और बेहद अजीबो-गरीब दौर से गुजरकर हासिल हुआ था। कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे केष्टो को बचपन से ही अभिनय का गहरा शौक था, जिसके चलते उन्होंने शुरुआती दिनों में नुक्कड़ नाटकों और रंगमंच का रुख किया था। कोलकाता के रंगमंच पर सक्रियता के दौरान मशहूर फिल्मकार ऋत्विक घटक की पारखी नजर उन पर पड़ी। घटक ने केष्टो की असाधारण प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें अपनी बांग्ला फिल्म ‘नागरिक’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका दे दी। किस्मत का खेल देखिए कि यह फिल्म साल १९५२ में बनकर पूरी हो चुकी थी, लेकिन किन्हीं कारणों से इसे सिनेमाघरों तक पहुंचने में पूरे २५ साल लग गए। जब यह फिल्म १९७७ में रिलीज हुई, तब तक ऋत्विक घटक इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। अपने गुरु और मार्गदर्शक के निधन के गहरे सदमे के कारण केष्टो मुखर्जी ने इस फिल्म को अपने जीवन में कभी नहीं देखा। कोलकाता में कई बंगाली फिल्मों का हिस्सा रहने के बावजूद केष्टो को भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा था, जिससे न तो उनके भीतर की अभिनय की भूख मिट रही थी और न ही परिवार का गुजारा हो पा रहा था। आर्थिक तंगहाली से जूझते हुए केष्टो मुखर्जी ने एक दिन आंखों में बड़े सपने लिए मायानगरी बॉम्बे का रुख किया। बॉम्बे आकर उन्होंने नए सिरे से काम की तलाश शुरू की और किसी तरह दिग्गज निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से संपर्क साधे रखा। ऋषिकेश मुखर्जी ने उनकी अभिनय क्षमता का सम्मान करते हुए अपनी फिल्म ‘मुसाफिर’ में उन्हें एक स्ट्रीट डांसर का बेहद छोटा सा रोल दिया। इस छोटे से ब्रेक के बाद भी बॉम्बे जैसे बड़े शहर में खुद को स्थापित करने के लिए उनका संघर्ष थमा नहीं था। इसी जद्दोजहद के बीच एक दिन वह महान फिल्मकार बिमल रॉय से मिलने उनकी फिल्म के सेट पर पहुंच गए। बिमल रॉय उस समय शूटिंग के बेहद व्यस्त शेड्यूल में व्यस्त थे, इसलिए केष्टो वहीं एक कोने में बैठकर घंटों तक उनके फ्री होने का इंतजार करने लगे। काफी देर बाद जब बिमल रॉय फुर्सत में आए और केष्टो उनके सामने पहुंचे, तो उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि फिलहाल उनके पास कोई काम नहीं है और वह बाद में आएं। इस साफ इनकार के बाद भी केष्टो वहां से हिले नहीं, जिससे चिढ़कर बिमल रॉय ने उनसे पूछ लिया कि क्या तुम भौंक सकते हो, क्योंकि उन्हें अपनी फिल्म के एक दृश्य के लिए कुत्ते की आवाज की जरूरत थी। आम तौर पर ऐसा तीखा सवाल सुनकर कोई भी स्वाभिमानी कलाकार वहां से चला जाता, लेकिन केष्टो ने धैर्य रखा और तुरंत पूरी शिद्दत के साथ सेट पर ही कुत्ते की आवाज निकालने लगे। उनकी इस अप्रत्याशित हरकत और अभिनय के प्रति गजब का समर्पण देखकर बिमल रॉय पूरी तरह हैरान रह गए और उन्होंने तुरंत केष्टो को अपनी फिल्म के लिए साइन कर लिया। इस ऐतिहासिक घटना के बाद केष्टो मुखर्जी की बॉलीवुड में राह आसान हो गई और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह हिंदी सिनेमा के सबसे पसंदीदा और भरोसेमंद हास्य कलाकारों में शुमार हो गए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महज ५६ वर्ष की उम्र में एक दर्दनाक सड़क हादसे ने उनके इस सुनहरे सफर पर हमेशा के लिए विराम लगा दिया। वह मुंबई के समीप स्थित एक प्रसिद्ध गणपति मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे थे, तभी पीछे से आ रहे एक तेज रफ्तार ट्रक ने उनकी कार को जोरदार टक्कर मार दी। इस भीषण दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान अगले ही दिन दिल का दौरा पड़ने के कारण इस महान कलाकार का असमय निधन हो गया।