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ज्येष्ठ मास 2026: स्नान-दान और भक्ति का पर्व, जानें धार्मिक महत्व और बड़ा मंगल परंपरा

नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास को अत्यंत पवित्र और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ मास की शुरुआत 2 मई से हो रही है और इसका समापन 29 जून को होगा। इस बार विशेष संयोग यह है कि ज्येष्ठ मास में अधिक मास का योग बन रहा है, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह संयोग धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का समय कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास में स्नान, दान और व्रत का विशेष महत्व होता है। इस अवधि में किए गए पुण्य कार्यों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार इस महीने में जप, तप और पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की वृद्धि होती है। विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना इस मास में अत्यंत फलदायी मानी जाती है। ज्येष्ठ मास की एक प्रमुख विशेषता बड़ा मंगल है। इस महीने के प्रत्येक मंगलवार को बड़ा मंगल के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ माह के मंगलवार को ही भगवान श्रीराम और हनुमान जी की पहली भेंट हुई थी। इसी कारण इस दिन हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त इस दिन हनुमान जी को बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं और संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं। मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के मंगलवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ हनुमान जी की पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और बिगड़े कार्य भी बनने लगते हैं। इस दौरान सत्तू, जल, अन्न और धन का दान करना भी अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। दान करने से न केवल धार्मिक फल की प्राप्ति होती है बल्कि धन-समृद्धि के योग भी मजबूत होते हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह महीना अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है क्योंकि अधिक मास के संयोग में किए गए धार्मिक कार्यों का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यही कारण है कि इस अवधि में मंदिरों में विशेष पूजा-पाठ, हवन और भक्ति कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कुल मिलाकर ज्येष्ठ मास केवल एक धार्मिक अवधि नहीं बल्कि आत्मिक शुद्धि और पुण्य अर्जन का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान की गई साधना और भक्ति जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।

द्वारका गुजरात रुक्मिणी देवी मंदिर की प्राचीन परंपरा और जल प्रसाद की अनोखी आस्था..

नई दिल्ली। द्वारका गुजरात में स्थित रुक्मिणी देवी मंदिर श्रीकृष्ण की प्रिया रुक्मिणी को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन और श्रद्धेय तीर्थ स्थल माना जाता है। यह मंदिर द्वारका शहर के मध्य भाग में स्थित है और इसे रुक्मिणी माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में है और इसका संबंध पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व की धार्मिक परंपराओं से जोड़ा जाता है। मंदिर का वातावरण भक्तों को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कराता है। यहां स्थापित रुक्मिणी देवी की भव्य प्रतिमा पारंपरिक आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित रहती है जो श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत प्रतीक है। मंदिर की वास्तुकला भी इसकी विशेष पहचान है। नागर शैली में निर्मित इस मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी और चित्रकारी श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के दिव्य प्रेम प्रसंगों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है। मंदिर का मंडप गुंबदाकार संरचना और जालीदार खिड़कियों के साथ एक विशिष्ट शैली का परिचय देता है। यह संरचना इसे अन्य धार्मिक स्थलों से अलग और विशेष बनाती है। द्वारकाधीश मंदिर से इसकी दूरी अधिक नहीं है और यह गोमती नदी के समीप स्थित होने के कारण धार्मिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यहां चढ़ाए जाने वाले जल प्रसाद से जुड़ी है। भक्त यहां देवी को जल अर्पित करते हैं और इसे ही प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। इस परंपरा को जीवन और पवित्रता से जोड़कर देखा जाता है। इसके पीछे एक प्राचीन कथा का उल्लेख मिलता है जिसमें कहा जाता है कि एक बार यात्रा के दौरान रुक्मिणी देवी ने एक ऋषि को तुरंत जल नहीं दिया था। इस घटना से संबंधित मान्यता के अनुसार इसके बाद द्वारका क्षेत्र में जल की कमी की स्थिति बनी रही। इसी कारण यहां जल दान और जल ग्रहण को अत्यंत पुण्यकारी और महत्वपूर्ण माना जाता है। रुक्मिणी देवी का संबंध श्रीकृष्ण से जुड़ी प्रेम और विवाह की गाथा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार रुक्मिणी विदर्भ राज्य के शासक की पुत्री थीं और उन्होंने बाल्यकाल से ही श्रीकृष्ण को अपने जीवन साथी के रूप में स्वीकार कर लिया था। उनके विवाह से जुड़ी घटनाएं द्वारका और उसके आसपास के क्षेत्रों में विशेष महत्व रखती हैं। कहा जाता है कि कठिन परिस्थितियों के बीच श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का साथ स्वीकार कर विवाह किया और इस प्रकार दिव्य प्रेम की एक अमर कथा स्थापित हुई। समय के साथ यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व का भी प्रतीक बन गया। यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर भक्ति संगीत और धार्मिक अनुष्ठानों से गूंज उठता है। भक्त यहां दर्शन के साथ-साथ आध्यात्मिक अनुभव की प्राप्ति के लिए आते हैं।

Astro Tips: इस सुगंधित वस्तु से मजबूत होते हैं चंद्र शुक्र गुरु

उज्‍जैन। चंदन सुगंध तो फैलाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही चंदन एक शक्तिशाली वस्तु है जो आपकी कुंडली के तीन ग्रह को एक साथ मजबूत कर कई परेशानियों से उबार सकता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंदन जीवन में खुशियां लाने का कारक बन सकता है. इससे जुड़े उपाय धन से लेकर पारिवारिक समस्याओं का भी अंत कर सकता है. इसके साथ ही एक चंद्रमा, गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह के दोष को कुंडली से दूर कर इन्हें मजबूत कर सकता है. आइए जानते हैं चंदन के प्रभावशाली उपाय क्या हैं, साथ ही ये भी जानेंगे कि चंदन का चंद्रमा, गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह से क्या संबंध है. चंदन और गुरु बृहस्पति ग्रह- ज्योतिष शास्त्र में चंदन और गुरु बृहस्पति ग्रह का बहुत गहरा संबंध बताया गया है. गुरु ग्रह भाग्य और ज्ञान के का कारक है. कुंडली में गुरु मजबूत होने का अर्थ है कि भाग्य तेज है और भाग्य तेज होने पर हर ओर से व्यक्ति सफलता प्राप्त करता है. ऐसे व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं. गुरुवार के दिन माथे पर सफेद या पीले चंदन का तिलक नियमित रूप से लगाएं तो इसके लाभ दिखने लगेंगे. मन शांत रहेगा. चंदन और शुक्र ग्रह- ज्योतिष शास्त्र में सफेद चंदन को शुक्र ग्रह से जोड़ा जाता है. शुक्र ग्रह के मजबूत होने पर जातक को सुख-समृद्धि, प्रेम और सौदर्य प्राप्त होता है. ऐसे में शुक्रवार को नियमित रूप से सफेद चंदन का तिलक लगाएं, चंदन का सुगंध लगाएं और स्नान के पानी में चंदन मिलाएं तो शुक्र मजबूत होगा. जिससे धन और परिवार संबंधी दिक्कतें दूर होने लगेंगी. चंदन और चंद्रमा- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंदन का गहरा संबंध चंद्रमा से भी माना गया है. चंदन और चंद्रमा दोनों ही मानसिक शांति और शीतलता के कारक हैं. मन के कारक चंद्रमा के मजबूत रहने पर जातक भावनात्मक रूप से स्थिर रहता है और धन संबंधी सही निर्णय लेता है. ऐसे में चंद्रमा को मजबूत करने के लिए अगर हर दिन घर से निकलने से पहले ललाट और गले पर सफेद चंदन का तिलक लगाएं तो चंद्रमा को मजबूत किया जा सकता है. घर के सुख और समृद्धि के लिए उपाय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, घर के सुख और समृद्धि के लिए पुष्य नक्षत्र में पड़ने वाले गुरुवार के दिन चंदन के पेड़ की जड़ में सिंदूर, पीले चावल चढ़ाएं और जल अर्पित करें. धूप-दीप दिखाएं और फिर दूसरे दिन उसी चंदन के पेड़ की थोड़ी सी लकड़ी लाल कपड़े में बांधें व घर के मुख्य द्वार पर टांगें. घर में सकारात्मक ऊर्जा, खुशियां व समृद्धि आएगी. आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए उपाय लाल कपड़े में चंदन की लकड़ी बांधे और इसे मां लक्ष्मी को चढ़ाएं. अब माता लक्ष्मी और चंदन की पूजा करें व कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें. अब इस चंदन को धन वाली जगह पर रखें. आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगेगी और धन-धान्य की कभी कमी नहीं होगी. वैवाहिक जीवन में सुख लाने के लिए उपाय वैवाहिक जीवन में सुख बढ़े इसके लिए शुभ तिथि या मुहूर्त में चंदन की जड़ को गंगाजल से शुद्ध करें और इसे फिटकरी के साथ छोटी सी पोटली बनाकर कमर में बांधें. सुख और पति पत्नी के बीच का प्रेम बढ़ेगा. नजर दोष दूर करने के उपाय बच्चे के ऊपर से नजर दोष हटाने के लिए उसे चंदन की छाल का धुआं दिखाए. बुरी शक्तियां दूर होंगी और मन शांत होगा. हर दिन बच्चे को चंदन का तिलक लगाएं. वास्तु दोष दूर करने का उपाय घर का वास्तु दोष दूर करना है तो चंदन का चूरा, अश्वगंधा और गोखरू चूर्ण लें और इसमें कपूर मिला लें और इसी चूर्ण से नियमिक 40 दिन तक हवन करें. लाभ दिखेगा. इसके अलावा घर के पश्चिम या दक्षिण दिशा में एक चंदन का पेड़ लगाने से भी घर का वास्तु ठीक हो जाएगा.

केतु का नक्षत्र परिवर्तन आज, इन राशियों को होगा धन लाभ, चमकेगी किस्‍मत

नई दिल्ली। अप्रैल के अंतिम दिनों में ग्रहों की चाल एक बार फिर बड़ा परिवर्तन लेकर आई है। आज 20 अप्रैल 2026 को केतु नक्षत्र परिवर्तन कर रहे हैं, जिसे ज्योतिष में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस बदलाव का असर कई राशियों पर देखने को मिलेगा, कहीं अचानक धन लाभ के योग बनेंगे तो कहीं करियर में नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगे। केतु का नक्षत्र परिवर्तन कब और कैसे?ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, आज केतु अपने ही नक्षत्र मघा में प्रवेश कर रहे हैं। यह गोचर लंबे समय तक प्रभाव डालने वाला माना जाता है। केतु को रहस्यमय और आध्यात्मिक ग्रह माना जाता है, जो अचानक बदलाव और कर्मफल से जुड़ा होता है। मघा नक्षत्र में प्रवेश क्यों है अहम?केतु का मघा नक्षत्र में जाना एक विशेष ज्योतिषीय घटना मानी जाती है। यह नक्षत्र राजसी गुण, पितृ संबंध और अधिकार का प्रतीक है। इस दौरान कई लोगों को पूर्वजों का आशीर्वाद मिल सकता है और भाग्य का साथ भी मिल सकता है। यह समय अचानक लाभ, नई दिशा और जीवन में सकारात्मक बदलाव के संकेत देता है। इन राशियों के लिए खुलेगा भाग्य का दरवाजाइस नक्षत्र परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव कुछ खास राशियों पर देखने को मिल सकता है:-मेष राशि: रुके हुए कार्य पूरे होंगे, अटका हुआ धन वापस मिल सकता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होगी।कर्क राशि: मानसिक तनाव कम होगा, धन लाभ के योग बनेंगे और पारिवारिक सुख में बढ़ोतरी होगी।सिंह राशि: करियर में उन्नति के अवसर मिलेंगे, प्रमोशन या नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।धनु राशि: आय के स्रोत बढ़ेंगे और आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। जीवन में दिखेंगे ये बड़े बदलावइस अवधि में कई लोगों को अचानक नए अवसर मिल सकते हैं। लंबे समय से रुके काम तेजी पकड़ेंगे और पुरानी समस्याओं का समाधान मिलने की संभावना है। साथ ही, आध्यात्मिकता की ओर झुकाव बढ़ेगा और व्यक्ति जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने लगेगा।

गुरु-शुक्र युति 2026: गजलक्ष्मी राजयोग से इन राशियों का बदलेगा भाग्‍य, बरसेगा धन और सुख-समृद्धि

नई दिल्ली। मई 2026 का महीना ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद खास माना जा रहा है। इस दौरान ग्रहों की स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। 14 मई 2026 को शुक्र ग्रह मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, जहां पहले से ही गुरु विराजमान होंगे। दोनों ग्रहों की इस युति से गजलक्ष्मी राजयोग का निर्माण होगा। यह योग 2 जून 2026 तक प्रभावी रहेगा और कुछ राशियों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। गजलक्ष्मी राजयोग कैसे बनेगा?ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब गुरु और शुक्र एक ही राशि में मिलते हैं, तो शुभ गजलक्ष्मी राजयोग बनता है। यह योग धन, वैभव, समृद्धि और सौभाग्य से जुड़ा माना जाता है। इस अवधि में कई लोगों के जीवन में करियर, वित्त और निजी संबंधों में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। वृषभ राशि: संपत्ति और करियर में बढ़तइस योग का सबसे अच्छा प्रभाव वृषभ राशि पर पड़ सकता है। संपत्ति में वृद्धि के योग बनेंगे और करियर में भी उन्नति देखने को मिलेगी। नौकरीपेशा लोगों को प्रमोशन मिल सकता है, जबकि व्यापारियों को नई डील या अच्छा मुनाफा मिलने की संभावना है। अविवाहित लोगों के विवाह के योग भी बन सकते हैं। तुला राशि: पहचान और धन लाभतुला राशि के जातकों के लिए यह समय आर्थिक रूप से लाभकारी रहेगा। रुका हुआ धन वापस मिल सकता है और निवेश के नए अवसर मिलेंगे। वैवाहिक जीवन में मधुरता बढ़ेगी और समाज में आपकी प्रतिष्ठा मजबूत होगी। धनु राशि: बड़ा आर्थिक लाभ और नई उपलब्धियांधनु राशि वालों के लिए यह योग भाग्यशाली साबित हो सकता है। नया घर या वाहन खरीदने के अवसर बन सकते हैं। व्यापार में लाभ और आर्थिक स्थिति में मजबूती देखने को मिलेगी। परिवार के साथ यात्रा के योग भी बन सकते हैं। मीन राशि: प्रेम और सुख में वृद्धिमीन राशि के लिए यह समय बेहद अनुकूल रहेगा। धन-संपत्ति में वृद्धि के साथ-साथ प्रेम जीवन भी मजबूत होगा। पुरानी परेशानियों से राहत मिलेगी और पारिवारिक जीवन में खुशियां बढ़ेंगी।

गरुड़ पुराण के रहस्य: जानिए मृत्यु के बाद 13 दिन तक क्यों निभाए जाते हैं सूतक और पिंडदान के नियम?

नई दिल्ली। सनातन धर्म में मृत्यु को जीवन का अटल सत्य माना गया है, जिसे कोई टाल नहीं सकता। लेकिन मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा कैसी होती है, यह जिज्ञासा हर व्यक्ति के मन में रहती है। गरुड़ पुराण में मृत्यु और उसके बाद की स्थिति को विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार, जैसे ही शरीर से प्राण निकलते हैं, आत्मा की यात्रा शुरू हो जाती है। यही कारण है कि मृत्यु के बाद 13 दिनों तक सूतक और पिंडदान से जुड़े नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है।मृत्यु के बाद आत्मा की पहली अवस्थाधार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद यमदूत आत्मा को यमलोक ले जाते हैं, जहां उसे उसके कर्मों का लेखा-जोखा दिखाया जाता है। कुछ समय बाद आत्मा को वापस उसके घर लाया जाता है, ताकि वह अपने परिजनों को देख सके और अपने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया का साक्षी बन सके। 13 दिनों तक घर-परिवार के पास रहती है आत्मागरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद 13 दिनों तक आत्मा अपने घर और परिवार के आसपास ही रहती है। इस दौरान वह अपने प्रियजनों को देखती और उनकी बातें सुनती है, लेकिन उनसे संवाद नहीं कर पाती। यह समय आत्मा के लिए मोह और आत्मचिंतन का होता है, जिसमें वह अपने जीवन के कर्मों पर विचार करती है। पिंडदान का आध्यात्मिक महत्वधार्मिक मान्यता है कि परलोक की यात्रा लंबी और कठिन होती है। ऐसे में पिंडदान आत्मा के लिए उस यात्रा का आहार माना जाता है। जैसे कोई व्यक्ति लंबी यात्रा पर भोजन साथ ले जाता है, वैसे ही पिंडदान आत्मा को ऊर्जा और सहारा प्रदान करता है, जिससे वह यमलोक तक की यात्रा पूरी कर सके।तेरहवीं के बाद आत्मा को मिलती है मुक्ति की राहमृत्यु के 13वें दिन होने वाला तेरहवीं संस्कार बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इन 13 दिनों तक आत्मा सांसारिक मोह में बंधी रहती है। तेरहवीं के अनुष्ठान के बाद आत्मा को आगे बढ़ने की अनुमति मिलती है और वह इस संसार के बंधनों को छोड़कर अपनी अगली यात्रा पर निकल पड़ती है।शोक काल में गरुड़ पुराण पाठ की परंपरामृत्यु के बाद शोक के दिनों में गरुड़ पुराण का पाठ करना परंपरा का हिस्सा है। माना जाता है कि इससे आत्मा को मोह त्यागने और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है, जिससे उसे शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही यह पाठ परिवार के सदस्यों को इस कठिन समय में मानसिक संबल भी देता है। (डिस्क्लेमर: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।)

सफलता के शिखर पर पहुंचने का गुप्त मार्ग: इन 3 रत्नों को अपनाने वाला व्यक्ति ही कहलाता है दुनिया का सबसे बड़ा भाग्यशाली

नई दिल्ली। चाणक्य नीति जीवन दर्शन का एक ऐसा स्तंभ है जो सदियों बाद आज भी मानव समाज का मार्गदर्शन कर रहा है। आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र के माध्यम से मनुष्य को भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच का अंतर समझाया है। उनके अनुसार संसार में जिन्हें हम रत्न मानकर अत्यधिक मूल्यवान समझते हैं और सुरक्षा के घेरे में रखते हैं वे वास्तव में केवल पाषाण के टुकड़े हैं। चाणक्य का मानना है कि असली रत्न वे नहीं जो तिजोरियों में बंद हों बल्कि वे हैं जो जीवन के अस्तित्व और सामाजिक समरसता के लिए अपरिहार्य हैं। आचार्य ने पृथ्वी पर तीन रत्नों को सर्वोपरि माना है जिनमें जल अन्न और मधुर वाणी शामिल है। उनके अनुसार इन तीनों के महत्व के सामने सोना चांदी और हीरा भी तुच्छ प्रतीत होते हैं क्योंकि ये धातुएं व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में अक्षम हैं। जीवन की निरंतरता के लिए जल को प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण रत्न माना गया है। चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य स्वर्ण आभूषणों के बिना जीवन व्यतीत कर सकता है लेकिन जल के बिना उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। जल न केवल प्यास बुझाता है बल्कि संपूर्ण प्रकृति और कृषि चक्र का आधार है। जो व्यक्ति जल की महत्ता को समझता है वही वास्तव में समझदार है। प्यास लगने पर स्वर्ण मुद्राएं गले को गीला नहीं कर सकतीं और न ही जीवन की रक्षा कर सकती हैं। इसलिए चाणक्य ने जल को किसी भी कीमती पत्थर से ऊपर रखा है क्योंकि यह प्राण रक्षक है। जल की उपलब्धता ही एक समृद्ध समाज और स्वस्थ शरीर का निर्माण करती है जिसे किसी भी भौतिक धन से खरीदा नहीं जा सकता। दूसरे रत्न के रूप में अन्न का स्थान आता है जिसे आचार्य चाणक्य ने अतुलनीय माना है। अन्न वह शक्ति है जो शरीर को ऊर्जा बल और बुद्धि प्रदान करती है। एक भूखे व्यक्ति के लिए सोने के भंडार का कोई मूल्य नहीं होता जब तक कि उसके पास अपनी जठराग्नि शांत करने के लिए भोजन न हो। अन्न ही वह माध्यम है जिससे संसार की समस्त व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। चाणक्य के अनुसार जिस व्यक्ति के पास सम्मानपूर्वक अर्जित किया हुआ पर्याप्त अन्न उपलब्ध है वह विश्व का सबसे धनी व्यक्ति है। पेट की भूख केवल भोजन से ही शांत हो सकती है धन की चमक से नहीं। इसलिए अन्न को सहेजने और उसका सम्मान करने वाला व्यक्ति ही जीवन के वास्तविक सुख का अनुभव कर पाता है। आचार्य चाणक्य ने मधुर वाणी यानी सुभाषित को तीसरे रत्न के रूप में व्याख्यायित किया है। मधुर वाणी वह अद्वितीय धन है जो समाज में मान सम्मान और सफलता दिलाता है। कड़वे शब्द बोलने वाला व्यक्ति अपार संपत्ति के बावजूद अकेला रह जाता है जबकि मीठे और संयमित वचन बोलने वाला व्यक्ति शत्रुओं का हृदय भी जीत लेता है। मधुर वाणी बिगड़े हुए कार्यों को बनाने की क्षमता रखती है और रिश्तों में प्रेम का संचार करती है। यह एक ऐसा आभूषण है जिसे न तो कोई चुरा सकता है और न ही यह समय के साथ पुराना होता है। चाणक्य का संदेश स्पष्ट है कि मनुष्य को पत्थर के टुकड़ों को रत्न समझने की भूल नहीं करनी चाहिए बल्कि जीवन के इन तीन वास्तविक रत्नों को आत्मसात करना चाहिए।

आज ही अपनाएं ये वास्तु टिप्स, अक्षय तृतीया पर चमक उठेगा भाग्य

नई दिल्ली। अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के पर्व के दिन यानी आज अगर आप माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना करते हैं। उनकी आराधना करके उनका व्रत रखते हैं साथ ही कुछ छोटे-बड़े उपाय करते हैं। तब आपके घर परिवार में सुख समृद्धि आती है आपका जीवन खुशियों से भर जाता है तरक्की आपके पास आने लगती है। इसके साथ ही आपको यह नीचे बताए गए कुछ खास उपायों को जरूर करना चाहिए तो चलिए उन्हें जानते हैं। आज करें ये खास उपायअक्षय तृतीया पर घर की अच्छे से सफाई करनी चाहिए, विशेष रूप से मुख्य द्वार को साफ रखना चाहिए। नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखने के लिए घर में नमक मिले पानी से पोंछा लगाना चाहिए। घर या ऑफिस, कहीं भी अगर मकड़ी के जाले दिखते हैं, तो अक्षय तृतीया से पहले उसे जरूर साफ़ कर लें क्योंकि वास्तु शास्त्र के अनुसार मकड़ी के जाले धन को आने का रास्ता रोक देता है। ऐसा करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आपके घर में आगमन करती हैं और खुशियां और बरकत लेकर आती हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि आज के दिन सोना चांदी खरीदने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है आपके ऊपर अपनी कृपा बनाए रखती हैं।हर व्यक्ति सोना-चांदी खरीदने में सक्षम नहीं होता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे इस शुभ अवसर का लाभ नहीं उठा सकते। अगर कोई सोना-चांदी नहीं खरीद सकता, तो वह पीतल या कांसे के बर्तन खरीद सकता है. इसके अलावा, घर के लिए छोटी-छोटी धार्मिक वस्तुएं जैसे घंटी या शंख भी खरीदे जा सकते हैं। आज अक्षर से दिया के दिन आपको अपने मुख्य द्वार पर भी साफ सफाई पूरी तरह से रखनी चाहिए कहते हैं आज के दिन माता लक्ष्मी धरती पर भ्रमण करने आती हैं अगर आपके मुख्य द्वार पर अंधेरा रहेगा तो माता लक्ष्मी आपके घर में कभी भी प्रवेश नहीं करेगी इसलिए आपको इन सभी नियमों को ध्यान से समझना और मानना चाहिए ताकि आपके जीवन में बरकत हो सके।

धन-समृद्धि का पर्व अक्षय तृतीया: लक्ष्मी पूजन का खास महत्व और आसान तरीका

नई दिल्ली। अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन को अक्षय यानी कभी न खत्म होने वाली समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ कार्य, दान-पुण्य और खरीदारी का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। लोग इस दिन सोना, चांदी, बर्तन और नई चीजें खरीदते हैं ताकि घर में सुख-समृद्धि और धन की वृद्धि हो। इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना भी की जाती है। इस दिन धरती पर भ्रमण करती हैंकथाओं के अनुसार कहा जाता हैं कि, अक्षय तृतीया के दिन माता लक्ष्मी भ्रमण को निकलती हैं। इस दौरान भक्तों के घर जा कर उन्हें सुख समृदि का वरदान देती हैं। शास्त्रों और वाराह पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी 7 से 9 बजे तक भ्रमण करने जाती हैं। वहीं जहां पर माता लक्ष्मी के भक्त भक्ति भाव से उनकी पूजा अर्चना करते हैं वहां माता लक्ष्मी प्रकट होकर उनको आशीर्वाद देती हैं। वहीं कुछ लोगों का मनाना हैं कि, अक्षय तृतीया के दिन माता लक्ष्मी की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि इस दिन को धन, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस शुभ अवसर पर माता लक्ष्मी की आराधना करने से घर में सुख-शांति और आर्थिक उन्नति बनी रहती है। आज अक्षय तृतीया पर इस विधि से करें लक्ष्मी पूजनअक्षय तृतीया पर विशेष रूप से लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर या पूजा स्थान पर चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं।माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। गंगाजल से भगवान का अभिषेक करें। अब देवी को रोली, चंदन, अक्षत अर्पित करें। इस दौरान फूल माला भी पहनाएं। यह शुभ होता है। पूजा के दौरान ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और खीर व पंचामृत का भोग बनाकर पूजा में शामिल करें। अंत में आरती करें और प्रसाद सभी में वितरित करें। मां लक्ष्मी की आरतीऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।।तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।मैया तुम ही जग-माता।।सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।मैया सुख संपत्ति दाता।जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। तुम पाताल-निवासिनि,तुम ही शुभदाता।मैया तुम ही शुभदाता।कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी,भवनिधि की त्राता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।मैया सब सद्गुण आता।सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।मैया वस्त्र न कोई पाता।खान-पान का वैभव,सब तुमसे आता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता।मैया क्षीरोदधि-जाता।रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। महालक्ष्मी जी की आरती,जो कोई नर गाता।मैया जो कोई नर गाता।उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता।ऊं जय लक्ष्मी माता।। ऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता।ऊं जय लक्ष्मी माता।।

19 अप्रैल से शुरू होगी Chardham Yatra 2026, जानें कब खुलेंगे केदारनाथ-बद्रीनाथ के कपाट

नई दिल्ली। Chardham Yatra 2026 का इंतजार अब खत्म हो गया है। उत्तराखंड की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा इस साल 19 अप्रैल से शुरू हो चुकी है। अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। हर साल की तरह इस बार भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है, जिसके लिए प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। कब खुलेंगे चारों धाम के कपाटयात्रा की शुरुआत 19 अप्रैल से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ हुई। इसके बाद केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल को खोले जाएंगे। वहीं, बद्रीनाथ धाम 23 अप्रैल को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाएगा। इस तरह कुछ ही दिनों के भीतर चारों धाम के द्वार खुल जाएंगे और पूरी यात्रा शुरू हो जाएगी। परंपरा के अनुसार श्रद्धालु पहले यमुनोत्री, फिर गंगोत्री, उसके बाद केदारनाथ और अंत में बद्रीनाथ के दर्शन करते हैं। क्या है Chardham Yatra का महत्व और तैयारियांचार धाम यात्रा का धार्मिक महत्व बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इस यात्रा को करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इस बार भी सरकार ने यात्रा को सुगम बनाने के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। यात्रा के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा शुरू कर दी गई है, ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाएं, सुरक्षा व्यवस्था और ट्रैफिक मैनेजमेंट को भी बेहतर बनाया जा रहा है। अगर आप भी इस साल चार धाम यात्रा पर जाने की योजना बना रहे हैं, तो समय रहते रजिस्ट्रेशन कराना और यात्रा की पूरी तैयारी करना जरूरी है, क्योंकि सीजन के दौरान भारी भीड़ देखने को मिलती है।