कॉपर बेल बनाने की प्रक्रिया बेहद मेहनत और कौशल से जुड़ी होती है। इसमें सबसे पहले धातु की शीट से घंटी का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद उस पर तांबे या पीतल की परत चढ़ाई जाती है और फिर इसे भट्टी में पकाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद घंटियों को अंतिम आकार दिया जाता है और उनमें एक विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न की जाती है, जो इन्हें खास बनाती है।
इस कला की खास बात यह है कि इसमें परिवार के सभी सदस्य शामिल होते हैं। अलग-अलग चरणों में सभी अपनी भूमिका निभाते हैं, जिससे यह केवल एक काम नहीं बल्कि पारिवारिक परंपरा का हिस्सा बन जाता है। समय के साथ कारीगरों ने इसमें नए डिजाइन और आधुनिक रूप भी शामिल किए हैं, जिससे इसकी मांग और अधिक बढ़ गई है।
पहले ये घंटियां मुख्य रूप से पशुओं के गले में बांधने के लिए बनाई जाती थीं, लेकिन अब इनका उपयोग सजावट के रूप में भी व्यापक रूप से होने लगा है। घरों, होटलों और विभिन्न आयोजनों में इनका उपयोग बढ़ने से इनकी उपयोगिता और लोकप्रियता दोनों में इजाफा हुआ है।
सरकारी सहयोग और योजनाओं के चलते इस पारंपरिक कला को नई दिशा मिली है। नए डिजाइनों और तकनीकों के जरिए इसे आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप ढाला जा रहा है। इससे कारीगरों को आर्थिक रूप से मजबूती मिल रही है और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
जीआई टैग मिलने के बाद इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। अब कच्छ की कॉपर बेल्स अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में निर्यात की जा रही हैं, जिससे इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
इस बढ़ती लोकप्रियता ने न केवल कच्छ की सांस्कृतिक धरोहर को मजबूती दी है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। आज यह कला भारत की पारंपरिक विरासत का एक ऐसा उदाहरण बन चुकी है, जो वैश्विक मंच पर अपनी अलग पहचान बना रही है।