बैठक के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत और जर्मनी के बीच विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में दशकों पुरानी साझेदारी रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों ने वर्षों से अनुसंधान और तकनीकी विकास के क्षेत्र में एक-दूसरे के साथ मिलकर महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्ष 2024 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग के 50 वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह संबंध आज रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। तेजी से बदलती वैश्विक तकनीकी आवश्यकताओं के बीच दोनों देशों के बीच सहयोग को और विस्तार देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
चर्चा में जर्मनी के थुरिंगिया क्षेत्र की विशेष भूमिका भी सामने आई, जिसे यूरोप में फोटोनिक्स, ऑप्टिक्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग का प्रमुख केंद्र माना जाता है। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत की नवाचार क्षमता और जर्मनी की तकनीकी विशेषज्ञता एक-दूसरे की पूरक हैं। इसी आधार पर क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क, क्वांटम सैटेलाइट संचार, ऑप्टिकल ग्राउंड स्टेशन और उन्नत फोटोनिक्स तकनीकों के विकास में संयुक्त प्रयासों की संभावनाओं पर विस्तार से विचार किया गया। जर्मनी ने यूरोप में चल रही क्वांटम संचार परियोजनाओं और ऑप्टिकल नेटवर्क से जुड़े अनुभव भी साझा किए।
डॉ. सिंह ने बैठक में भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के तहत हुई प्रगति की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि देश सुरक्षित और अत्याधुनिक क्वांटम संचार प्रणाली विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसके साथ ही क्वांटम कंप्यूटिंग, मानक निर्माण, तकनीकी साझेदारी और विशेषज्ञों के आदान-प्रदान को लेकर भी चर्चा हुई। केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू की गई विभिन्न पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है और यहां वैश्विक तकनीकी निवेश के लिए व्यापक अवसर मौजूद हैं।
बैठक में अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर के बीच लंबे समय से चल रहे सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। दोनों देशों ने सैटेलाइट संचार, ऑप्टिकल कम्युनिकेशन, मानव अंतरिक्ष मिशन, माइक्रोग्रैविटी रिसर्च, पृथ्वी अवलोकन और ड्रोन तकनीक जैसे क्षेत्रों में नए सहयोग की संभावनाओं पर विचार किया। साथ ही शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और स्टार्टअप उद्यमियों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने तथा संयुक्त शैक्षणिक कार्यक्रम विकसित करने पर भी सकारात्मक रुख दिखाया गया।
भारत और जर्मनी के बीच बढ़ता तकनीकी सहयोग आने वाले वर्षों में नवाचार और अनुसंधान को नई गति दे सकता है। क्वांटम तकनीक, अंतरिक्ष विज्ञान और डीप-टेक जैसे क्षेत्रों में साझेदारी न केवल दोनों देशों के लिए बल्कि वैश्विक तकनीकी विकास के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।