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गेहूं खरीदी पर सियासी संग्राम तेज सरकार के दावों पर कांग्रेस का बड़ा हमला


भोपाल । मध्यप्रदेश में गेहूं खरीदी को लेकर सियासी माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा खरीदी का कोटा बढ़ाने के दावों के बीच अब कांग्रेस ने राज्य सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव कुणाल चौधरी ने सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि जमीनी हकीकत सरकार के दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है।

कुणाल चौधरी ने आरोप लगाया कि सरकार भले ही 100 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी का दावा कर रही हो लेकिन असल स्थिति बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि पिछले पंद्रह दिनों के आंकड़े ही सरकार की पोल खोलने के लिए काफी हैं। उनके अनुसार इस अवधि में लगभग 2.25 लाख किसानों से केवल 9.5 लाख मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हो पाई है जबकि राज्य में कुल 19.04 लाख किसानों से खरीदी किया जाना बाकी है।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि मध्यप्रदेश में वास्तविक आवश्यकता लगभग 160 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी की है लेकिन वर्तमान गति को देखते हुए यह लक्ष्य बेहद दूर दिखाई दे रहा है। चौधरी का कहना है कि अगर इसी रफ्तार से काम चलता रहा तो पूरी खरीदी प्रक्रिया को पूरा होने में करीब छह महीने का समय लग सकता है जो किसानों के हित में बिल्कुल भी नहीं है।

कांग्रेस नेता ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह केवल विज्ञापनों के जरिए उपलब्धियां दिखाने में लगी हुई है जबकि जमीनी स्तर पर किसान परेशान हैं। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर गेहूं की खरीदी को घुन या मिट्टी का हवाला देकर रोक दिया जा रहा है जिससे किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। किसान अपनी फसल लेकर मंडियों में खड़े हैं लेकिन खरीदी प्रक्रिया धीमी होने के कारण उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानी झेलनी पड़ रही है।

चौधरी ने यह भी कहा कि सरकार को किसानों को भ्रमित करना बंद करना चाहिए और वास्तविक स्थिति को स्वीकार करते हुए तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। उन्होंने मांग की कि सरकार 24 घंटे के भीतर खरीदी प्रक्रिया को तेज करे ताकि किसानों को राहत मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसानों से किए गए वादों को निभाना सरकार की जिम्मेदारी है और इसमें किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

मध्यप्रदेश में गेहूं खरीदी हर साल एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहता है क्योंकि बड़ी संख्या में किसान अपनी आजीविका के लिए इस पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में खरीदी की धीमी रफ्तार न केवल किसानों की आय को प्रभावित करती है बल्कि राज्य की कृषि व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। अब देखना यह होगा कि सरकार इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और क्या वास्तव में खरीदी प्रक्रिया को तेज करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।

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