धार्मिक मान्यताओं और स्थापित परंपराओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की मुख्य प्रतिमा के भीतर स्थित इस दिव्य पदार्थ को छूने अथवा इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया इतनी संवेदनशील है कि मंदिर के मुख्य सेवादारों के मन में भी एक अनजाना भय व्याप्त हो जाता है। सदियों से चली आ रही इस रहस्यमयी प्रक्रिया को प्रत्येक 12 वर्ष की अवधि में एक बार निष्पादित किया जाता है, जिसे सनातन परंपरा में ‘नवकलेवर’ अनुष्ठान के नाम से जाना जाता है। इस विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत भगवान जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्राचीन काष्ठ मूर्तियों के स्थान पर नई मूर्तियों को पूर्ण विधि-विधान के साथ गर्भगृह में स्थापित किया जाता है।
इस गुप्त अनुष्ठान को अत्यंत गोपनीयता के साथ संपन्न करने के लिए निर्धारित रात्रि को संपूर्ण पुरी शहर की विद्युत आपूर्ति पूरी तरह से बंद कर दी जाती है। पूरे मंदिर परिसर को गहन अंधकार में डुबो दिया जाता है और सुरक्षा के कड़े प्रबंध करते हुए मंदिर के चारों ओर सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया जाता है, जिससे कोई भी बाहरी व्यक्ति इस प्रक्रिया का साक्षी न बन सके। गर्भगृह के भीतर केवल उन्हीं चुनिंदा पुजारियों को प्रवेश की अनुमति होती है, जो इस मूर्ति परिवर्तन की प्राचीन और गुप्त प्रक्रिया को संपन्न करने के लिए अधिकृत होते हैं।
नवकलेवर अनुष्ठान को संपन्न करने वाले पुजारियों के लिए बनाए गए नियम अत्यंत कठोर और अपरिवर्तनीय हैं। गर्भगृह में प्रवेश करने से पूर्व पुजारियों की आंखों पर रेशमी कपड़े की मोटी पट्टी बांध दी जाती है और उनके हाथों में मोटे दस्ताने पहना दिए जाते हैं। धार्मिक नियमों के अनुसार, कोई भी मनुष्य इस ब्रह्म पदार्थ को न तो अपनी नंगी आंखों से प्रत्यक्ष देख सकता है और न ही बिना आवरण के स्पर्श कर सकता है। ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं कि यदि कोई व्यक्ति अनजाने में भी इस अलौकिक पदार्थ को देख लेता है, तो उसे गंभीर शारीरिक क्षति पहुंच सकती है।
इस गुप्त प्रक्रिया के दौरान जब पुरानी मूर्ति के वक्षस्थल से इस ब्रह्म पदार्थ को निकालकर नई निर्मित मूर्ति में स्थापित किया जाता है, तो उस समय का अनुभव अत्यंत विस्मयकारी होता है। इस कार्य को संपन्न करने वाले मुख्य पुजारियों के संस्मरणों के अनुसार, हाथों में मोटे दस्ताने होने के पश्चात भी जब वे उस दिव्य पदार्थ को स्पर्श करते हैं, तो उसमें एक स्पष्ट स्पंदन और जीवंतता का आभास होता है। वह पदार्थ किसी जीवित पिंड की भांति गतिशील और इंसानी हृदय की तरह निरंतर धड़कता हुआ प्रतीत होता है, मानो साक्षात नारायण का हृदय वहां स्पंदित हो रहा हो।
इस धड़कते हुए ब्रह्म पदार्थ की वास्तविक संरचना और इसके मूल स्वरूप को लेकर सामाजिक और धार्मिक स्तर पर अनेक कथाएं एवं अनुसंधान प्रचलित हैं। एक प्रमुख पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का वह पवित्र हृदय है, जो महाभारत काल के बाद उनकी अंत्येष्टि के समय भी अग्नि में भस्म नहीं हुआ था और आज भी उसी अवस्था में सुरक्षित है। इसके विपरीत, कुछ विद्वान इसे कोई अत्यंत शक्तिशाली दिव्य धातु या चमत्कारिक मणि मानते हैं। कारण चाहे जो भी हो, परंतु वर्तमान वैज्ञानिक युग में भी यह धड़कता हुआ ब्रह्म पदार्थ अध्यात्म और आस्था का एक ऐसा अटूट स्तंभ बना हुआ है, जिसके रहस्य को भेद पाना आधुनिक चेतना के लिए अब तक असंभव सिद्ध हुआ है।