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डेंगू-मलेरिया से सुरक्षा: मच्छरों के आतंक से बचने के WHO के सरल टिप्स

नई दिल्ली । मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारियाँ जैसे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया आज भी दुनिया के कई हिस्सों में गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनी हुई हैं। विश्व मलेरिया दिवस के अवसर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक बार फिर इस बीमारी को पूरी तरह खत्म करने के लक्ष्य को दोहराया है और लोगों को मच्छरों से बचाव के लिए जरूरी सावधानियों के बारे में जागरूक किया है। WHO के अनुसार, मलेरिया जैसी बीमारी को रोका और ठीक किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए समय पर सावधानी और सही उपाय अपनाना बेहद जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मच्छरों को पनपने से रोका जाए और खुद को उनके काटने से सुरक्षित रखा जाए। क्या करें (Do’s)WHO ने कुछ आसान लेकिन बेहद प्रभावी उपाय बताए हैं: घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें, क्योंकि मच्छर रुके हुए पानी में ही अंडे देते हैंगमलों, टायरों, बाल्टियों और अन्य कंटेनरों को खाली रखें या ढककर रखेंशाम से सुबह तक पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनेंसोते समय मच्छरदानी का उपयोग जरूर करेंखिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाएं ताकि मच्छर घर में प्रवेश न कर सकेंघर और आसपास नियमित सफाई बनाए रखें क्या न करें (Don’ts) घर के बाहर या अंदर पानी को जमा न होने देंबिना सुरक्षा के खुले में न सोएंमच्छर की समस्या को हल्के में न लेंशुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें  मलेरिया के लक्षणों को पहचानेंWHO के अनुसार, मलेरिया के शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है: तेज बुखारठंड लगना और कंपकंपीसिरदर्दशरीर में दर्द और थकानमतली या उल्टी यदि बीमारी बढ़ जाए तो गंभीर लक्षण भी दिख सकते हैं: भ्रम की स्थितिसांस लेने में कठिनाईदौरे पड़नागहरे रंग का पेशाब समय पर इलाज है सबसे जरूरीWHO ने सलाह दी है कि जैसे ही लक्षण दिखें, तुरंत जांच कराएं और इलाज शुरू करें। मलेरिया का इलाज शुरुआती चरण में आसान होता है, लेकिन देर करने पर यह जानलेवा भी हो सकता है। सामूहिक प्रयास से ही संभव है रोकथाममच्छरों से बचाव सिर्फ व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी भी है। साफ-सफाई, जलजमाव रोकना और जागरूकता फैलाकर इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

पूर्व सेना प्रमुख का स्पष्टीकरण, सार्वजनिक कॉपी की प्रामाणिकता पर उठाए सवाल..

नई दिल्ली। पूर्व सेना प्रमुख ने अपनी किताब से जुड़े विवाद पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जो भी चर्चा सार्वजनिक रूप से सामने आई कॉपी को लेकर हो रही है, उस पर वह कोई अंतिम राय नहीं दे सकते क्योंकि उन्होंने स्वयं अभी तक अपनी पुस्तक का अंतिम ड्राफ्ट नहीं देखा है। उनके इस बयान के बाद किताब को लेकर चल रही बहस एक बार फिर चर्चा में आ गई है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि एक लेखक के तौर पर उनके सामने जो सामग्री आई है, वह अंतिम संस्करण नहीं है। ऐसे में जो कॉपी सार्वजनिक रूप से प्रसारित की जा रही है, उसकी प्रमाणिकता पर वह कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। उनका कहना है कि बिना अंतिम रूप देखे किसी भी सामग्री को आधिकारिक मानना सही नहीं होगा। इस पूरे मामले में एक और अहम बात यह सामने आई है कि प्रकाशन से जुड़ी प्रक्रिया अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। प्रकाशक की ओर से भी पहले यह कहा गया था कि पुस्तक का कोई आधिकारिक और अंतिम संस्करण अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से अलग-अलग माध्यमों में जो अंश सामने आए हैं, उन्हें अंतिम सत्य मानना उचित नहीं माना जा सकता। विवाद की जड़ में किताब का एक कथित अंश रहा, जिसमें एक पंक्ति को लेकर अलग-अलग तरह की व्याख्याएं की जाने लगीं। इस पंक्ति को कुछ लोगों ने राजनीतिक संदर्भ में जोड़कर देखा, जिससे इस पर बहस और तेज हो गई। हालांकि पूर्व सेना प्रमुख ने इस पर साफ किया कि किताब में किसी भी स्थान पर किसी विशेष व्यक्ति का नाम नहीं लिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि सेना में ऑपरेशन के दौरान निर्णय लेने की प्रक्रिया में जिम्मेदारी और भरोसे का संतुलन होता है, जिसे गलत तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी कथन या विचार को उसके मूल संदर्भ में समझना जरूरी होता है, न कि उसे तोड़-मरोड़कर अलग अर्थ देना। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अक्सर किसी भी विषय को अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है, लेकिन हर बात को विवाद या राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाना सही नहीं है। उनका मानना है कि किसी भी लेखन को उसके पूरे संदर्भ और वास्तविक उद्देश्य के साथ ही समझा जाना चाहिए।

छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ एमपी बोर्ड की गलती से रेगुलर स्टूडेंट बने प्राइवेट

भोपाल । मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहां मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की बड़ी लापरवाही के कारण हजारों छात्रों का भविष्य संकट में पड़ गया है। आरोप है कि बोर्ड ने रेगुलर यानी नियमित छात्रों को प्राइवेट श्रेणी की मार्कशीट जारी कर दी जिससे पूरे राज्य में हड़कंप मच गया है। मामला 10वीं और 12वीं कक्षाओं से जुड़ा हुआ है जहां लगभग 15 हजार छात्रों ने नियमित रूप से स्कूल में पढ़ाई की थी लेकिन जब परिणाम घोषित हुआ तो उन्हें प्राइवेट छात्र के रूप में दर्शाया गया। इस गलती के कारण छात्रों और अभिभावकों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है क्योंकि इससे आगे की पढ़ाई और करियर पर असर पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार कई स्कूलों के संचालकों ने इस गंभीर त्रुटि की शिकायत सीधे बोर्ड के अधिकारियों से की है। उनका कहना है कि छात्रों ने नियमित रूप से स्कूल में उपस्थिति दर्ज कराई और सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया फिर भी उन्हें गलत श्रेणी में शामिल कर दिया गया। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में गलती कैसे हुई। यह पूरा मामला तब और गंभीर हो गया जब यह सामने आया कि कुछ स्कूलों की मान्यता से जुड़ा विवाद चल रहा था। पहले इन स्कूलों की मान्यता भूमि दस्तावेजों की कमी के कारण रद्द की गई थी और करीब 350 स्कूलों की मान्यता समाप्त कर दी गई थी। हालांकि बाद में कुछ मामलों में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए अस्थायी मान्यता देने के निर्देश भी दिए थे। इसके बावजूद बोर्ड की ओर से छात्रों का रिजल्ट प्राइवेट श्रेणी में घोषित कर दिया गया जिससे स्थिति और उलझ गई। इस पूरे मामले को लेकर छात्रों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं क्योंकि उनकी शिक्षा और आगे की प्रवेश प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। बोर्ड के सचिव ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि पूरे प्रकरण की जांच की जा रही है और जल्द ही उचित निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि का मामला हो सकता है लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा। इस घटना ने राज्य की शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं और अभिभावकों में भी चिंता बढ़ा दी है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बोर्ड इस गलती को कैसे सुधारता है और प्रभावित छात्रों को किस तरह न्याय दिलाया जाएगा।

अक्षय कुमार की बेटी के साथ ऑनलाइन हुई शर्मनाक घटना: साइबर सुरक्षा सत्र में सामने आया चौंकाने वाला खुलासा

नई दिल्ली। डिजिटल दुनिया जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से इससे जुड़े खतरे भी सामने आ रहे हैं। ऑनलाइन गेमिंग और सोशल प्लेटफॉर्म बच्चों और युवाओं के जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसी के बीच साइबर अपराधी नए-नए तरीकों से लोगों को निशाना बना रहे हैं। इसी से जुड़ा एक गंभीर मामला हाल ही में सामने आया, जिसने हर माता-पिता की चिंता बढ़ा दी है। अभिनेता अक्षय कुमार ने एक कार्यक्रम के दौरान अपनी बेटी के साथ हुई एक डरावनी ऑनलाइन घटना का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि उनकी 13 वर्षीय बेटी नितारा ऑनलाइन वीडियो गेम खेल रही थी, जहां वह अन्य खिलाड़ियों के साथ बातचीत भी कर सकती थी। इसी दौरान एक अनजान व्यक्ति ने उससे बातचीत शुरू की और धीरे-धीरे उसकी पहचान पूछते हुए एक बेहद आपत्तिजनक दिशा में बातचीत को मोड़ दिया। अक्षय के अनुसार, उस व्यक्ति ने बच्ची से उसकी पहचान जानने के बाद अनुचित और आपत्तिजनक संदेश भेजे और यहां तक कि उससे निजी तस्वीरों की मांग भी कर डाली। यह घटना ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर हुई, जिससे यह साफ होता है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा कितनी कमजोर हो सकती है यदि उन्हें सही मार्गदर्शन न मिले। सौभाग्य से, नितारा ने तुरंत स्थिति को समझते हुए गेम बंद कर दिया और पूरी बात अपने परिवार को बता दी, जिससे किसी बड़ी परेशानी से बचाव हो सका। इस घटना ने अक्षय कुमार को गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने इसे केवल व्यक्तिगत अनुभव न मानकर एक गंभीर सामाजिक मुद्दे के रूप में सामने रखा। उन्होंने कहा कि आज साइबर अपराध उतना ही खतरनाक हो चुका है जितना कोई पारंपरिक अपराध हो सकता है, बल्कि कई मामलों में यह और भी अधिक जोखिम भरा है क्योंकि इसमें अपराधी अपनी पहचान छुपाकर काम करते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने एक महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया। उनका मानना है कि स्कूलों में बच्चों के लिए नियमित रूप से साइबर सुरक्षा से जुड़ा विशेष समय निर्धारित किया जाना चाहिए, जहां उन्हें इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग, ऑनलाइन खतरों की पहचान और उनसे बचने के तरीकों के बारे में सिखाया जाए। उनका यह भी कहना था कि अगर बच्चों को शुरुआत से ही सही जानकारी दी जाए, तो ऐसे मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है। विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि आज के समय में बच्चे बिना पर्याप्त निगरानी के ऑनलाइन दुनिया में सक्रिय रहते हैं, जिससे वे आसानी से साइबर अपराधियों के संपर्क में आ सकते हैं। ऑनलाइन गेमिंग, चैटिंग और सोशल मीडिया ऐसे प्लेटफॉर्म बन चुके हैं जहां अपराधी अक्सर अपनी पहचान छुपाकर बच्चों को निशाना बनाते हैं। ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर ध्यान दें और उनसे लगातार संवाद बनाए रखें। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल सुरक्षा अब केवल एक तकनीकी विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह हर परिवार की प्राथमिक आवश्यकता बन चुकी है। बच्चों को इंटरनेट के उपयोग के साथ-साथ इसके खतरों के बारे में जागरूक करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। अक्षय कुमार द्वारा साझा किया गया यह अनुभव केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है, जो बताता है कि डिजिटल दुनिया में सावधानी और जागरूकता ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।

सीमा विवाद के बीच कूटनीतिक पहल, नेपाल के पत्रकारों की भारतीय विदेश सचिव से बातचीत..

नई दिल्ली।भारत और नेपाल के बीच संबंधों में हाल के दिनों में कुछ मुद्दों को लेकर चर्चा का माहौल बना हुआ है। सीमा क्षेत्रों में व्यापार और कस्टम व्यवस्था से जुड़े नए नियमों के कारण स्थानीय स्तर पर असंतोष की स्थिति देखी जा रही है। इसी बीच दोनों देशों के बीच संवाद को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सामने आया है, जब नेपाल के पत्रकारों के एक समूह ने भारत के विदेश सचिव से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान दोनों पक्षों के बीच भारत-नेपाल संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से बातचीत हुई। बैठक में आपसी सहयोग, विकास परियोजनाओं और भविष्य में साझेदारी को और मजबूत करने की संभावनाओं पर विचार किया गया। विदेश सचिव ने इस अवसर पर दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों की मजबूती पर जोर दिया और भविष्य में सहयोग बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक दृष्टिकोण साझा किया। सीमा क्षेत्रों में हाल ही में लागू किए गए कस्टम नियमों के कारण कुछ स्थानों पर लोगों की दैनिक जीवनशैली पर असर पड़ा है। खासकर सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत के बाजारों पर निर्भर रहते हैं, ऐसे में नियमों में बदलाव से उनकी परेशानियां बढ़ी हैं। हालांकि, प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि इन नियमों का उद्देश्य मुख्य रूप से अनौपचारिक व्यापार और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण रखना है। साथ ही यह भी संकेत दिया गया है कि व्यक्तिगत उपयोग के लिए जरूरी वस्तुओं पर किसी तरह की सख्ती नहीं की जाएगी, जिससे आम लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है। इस मुद्दे को लेकर नेपाल में अलग-अलग स्तर पर प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और कुछ स्थानों पर असंतोष भी सामने आया है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में दोनों देशों के बीच लगातार संवाद और आपसी समझ बेहद जरूरी है। भारत और नेपाल के संबंध लंबे समय से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत रहे हैं, और ऐसे मुद्दों को बातचीत के माध्यम से हल किया जा सकता है।

मेट्रो यात्रियों को राहत: भोपाल-इंदौर में टिकट और वॉलेट रिचार्ज पर मिलेगी छूट

नई दिल्ली । भोपाल और इंदौर मेट्रो यात्रियों के लिए 27 अप्रैल से सफर का तरीका पूरी तरह बदलने जा रहा है। अब दोनों शहरों के मेट्रो स्टेशनों पर ऑटोमैटिक फेयर कलेक्शन सिस्टम (AFC) लागू किया जाएगा, जिसके बाद टिकट लेने की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और तेज हो जाएगी। यह कदम मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (MPMRCL) की ओर से यात्रियों की सुविधा और आधुनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।इस नए सिस्टम के लागू होने के बाद यात्रियों को अब मैन्युअल टिकटिंग की झंझट से छुटकारा मिलेगा और पूरा फोकस ऑनलाइन और क्यूआर आधारित टिकटिंग पर रहेगा। यात्रियों को पेपर QR टिकट और मोबाइल QR टिकट दोनों विकल्प उपलब्ध रहेंगे। टिकट पर मिलेंगी खास छूट सुविधाएंनई व्यवस्था में यात्रियों को कई तरह की छूट भी दी जाएगी, जिससे नियमित यात्रियों और समूह में सफर करने वालों को सीधा फायदा मिलेगा।राउंड ट्रिप (आवागमन) टिकट पर 5 प्रतिशत छूट दी जाएगीग्रुप टिकट पर 10 प्रतिशत छूट मिलेगीयह सुविधा 8 से 40 यात्रियों के समूह के लिए लागू होगी  MP Metro ऐप से होगा पूरा डिजिटल सफरयात्रियों की सुविधा के लिए MPMRCL ने अपना आधिकारिक मोबाइल ऐप “MP Metro” भी लॉन्च किया है, जिसके जरिए टिकट बुकिंग और वॉलेट रिचार्ज किया जा सकेगा। इस ऐप पर QR टिकट आसानी से उपलब्ध होंगे और डिजिटल पेमेंट से समय की बचत होगी। वॉलेट रिचार्ज पर भी अलग-अलग स्लैब में छूट दी जाएगी: 200 से 499 रुपए पर 8% छूट500 से 999 रुपए पर 10% छूट1000 से 1499 रुपए पर 12% छूट1500 से 2000 रुपए पर 15% छूट टिकटिंग के नए विकल्पनई व्यवस्था में यात्रियों को कई विकल्प मिलेंगे:पेपर QR टिकट: टिकट काउंटर या ग्राहक सेवा केंद्र से नकद या UPI द्वारामोबाइल QR टिकट: MP Metro ऐप के जरिए डिजिटल भुगतान से वॉलेट नियम और शर्तेंMPMRCL ने साफ किया है कि मेट्रो वॉलेट में जमा राशि केवल टिकट खरीद के लिए ही उपयोग की जा सकेगी और इसे किसी भी स्थिति में वापस नहीं किया जाएगा।  डिजिटल मेट्रो की ओर कदमभोपाल और इंदौर में यह बदलाव मेट्रो यात्रा को तेज, पारदर्शी और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे न केवल यात्रियों का समय बचेगा, बल्कि टिकटिंग सिस्टम भी अधिक सुविधाजनक और स्मार्ट हो जाएगा।

जानलेवा हो सकती है मलेरिया के इलाज में लापरवाही

विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल) पर विशेष – योगेश कुमार गोयलमलेरिया एक गंभीर और कभी-कभी प्राणघातक हो जाने वाली बीमारी है, जो आमतौर पर एक निश्चित प्रकार के मच्छर को संक्रमित करने वाले परजीवी के कारण होती है और इन संक्रमित मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है। अमेरिका से करीब 70 साल पहले ही मलेरिया को पूरी तरह खत्म घोषित कर दिया गया था लेकिन अभी भी प्रतिवर्ष दो हजार अमेरिकी इससे संक्रमित होते हैं। भारत में तो हर साल लाखों लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं। चिंता की स्थिति यह है कि दुनियाभर में मलेरिया से हर साल लाखों लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं, जिनमें ज्यादातर छोटे बच्चे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चे मलेरिया से असमान रूप से प्रभावित होते हैं, जो मलेरिया से होने वाली कुल मौतों का करीब 82 प्रतिशत है। 2021 में मलेरिया से दुनियाभर में 6.19 लाख लोगों की मौत हुई थी जबकि 2022 में 6.08 लाख लोग मलेरिया के कारण मारे गए और 2024 में मलेरिया से 6.1 लाख मौतें दर्ज की गई। हालांकि मलेरिया ऐसी बीमारी है, जिसकी रोकथाम करके बड़ी संख्या में होने वाली इन मौतों को रोका जा सकता है लेकिन यह दुनियाभर में रोकी जा सकने वाली बीमारी और मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना हुआ है। इसीलिए मलेरिया को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से 2008 से ही 25 अप्रैल को एक खास विषय के साथ विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष मलेरिया दिवस की थीम है- मलेरिया को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध: अब हम कर सकते हैं। अब हमें करना ही होगा। इसका प्रमुख संदेश यही है कि मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना है। भेदभाव और कलंक को खत्म करना, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में समुदायों को शामिल करना, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल को उस स्थान के करीब लाना, जहां लोग रहते हैं और काम करते हैं, मलेरिया के खतरे को बढ़ाने वाले कारकों को संबोधित करना, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में मलेरिया नियंत्रण हस्तक्षेप इत्यादि मलेरिया दिवस मनाने के प्रमुख उद्देश्य हैं। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर किसी को मलेरिया की रोकथाम, पता लगाने और इलाज के लिए गुणवत्तापूर्ण, समय पर और सस्ती सेवाओं का अधिकार तो है लेकिन यह सभी के लिए वास्तविकता नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनियाभर में मलेरिया के बीस करोड़ से भी ज्यादा नए मामले दर्ज किए जाते हैं, जिनमें से कई लाख लोगों की हर साल मौत हो जाती है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मलेरिया की रोकथाम के मामले में बीते कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति तो हुई है लेकिन मलेरिया के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना अभी भी गंभीर चुनौती है। चिंता का विषय यह भी है कि प्रभावित क्षेत्रों में यह बीमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों और अर्थव्यवस्थाओं पर बड़ा बोझ भी डालती है। मलेरिया एनोफेलीज मादा मच्छर के काटने से होता है, जो प्लाज्मोडियम परजीवी से संक्रमित होता है और जब यह मच्छर किसी को काटता है तो ये परजीवी मानव रक्त में प्रवेश करके लिवर तथा लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगते हैं और व्यक्ति को बीमार बना देते हैं। इस रोग की गंभीरता परजीवी पर ही निर्भर करती है। मनुष्यों में सबसे आम मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम है, जो बीमारी के सबसे घातक रूप के लिए जिम्मेदार है। एनोफेलीज मच्छर वाहक के रूप में कार्य करते हैं, जब वे एक संक्रमित व्यक्ति को काटते हैं और फिर दूसरे व्यक्ति को काटते हैं तो परजीवियों को प्रसारित करते हैं। जब परजीवी एक बार मानव शरीर के अंदर यकृत में चले जाते हैं तो ये लाल रक्त कोशिकाओं के अंदर गुणन करते हैं, जिससे कई प्रकार के लक्षण पैदा होते हैं। मनुष्यों को मलेरिया के चार मुख्य प्रकार (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम विवैक्स, प्लाज्मोडियम ओवले और प्लाज्मोडियम मलेरिया) संक्रमित करते हैं। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम सबसे खतरनाक प्रकार है जबकि मलेरिया के अन्य प्रकार आमतौर पर हल्की बीमारी का कारण बनते हैं। गंभीर मलेरिया गंभीर एनीमिया, गुर्दे की विफलता, दौरे, कोमा और यहां तक कि मृत्यु जैसी जटिलताओं का कारण भी बन सकता है, खासकर यदि तुरंत निदान और इलाज नहीं किया जाए। हालांकि दुनियाभर में शोधकर्ता मलेरिया को नियंत्रित करने और अंततः ख़त्म करने के लिए टीकों और अन्य नवीन समाधानों पर काम कर रहे हैं लेकिन इसकी रोकथाम के मुख्य उपायों में उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में मच्छरदानी, कीट विकर्षक और मलेरिया-रोधी दवाओं का उपयोग करना शामिल है। जटिलताओं और मृत्यु को रोकने के लिए प्रभावी मलेरिया-रोधी दवाओं के साथ शीघ्र निदान और उपचार महत्वपूर्ण है। मलेरिया होने पर आमतौर पर तेज बुखार होता है, जो 103 से 105 डिग्री तक हो सकता है। सिरदर्द, बदन दर्द, घबराहट, अत्यधिक पसीना आना, जी मिचलाना, उल्टी होना, अत्यधिक ठंड लगना, कमजोरी इत्यादि मलेरिया के अन्य प्रमुख लक्षण हैं। इन लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है। वैसे तो मलेरिया के लक्षण प्रायः 24 से 48 घंटे में ही नजर आ सकते हैं लेकिन कई बार लक्षण सामने आने में ज्यादा समय भी लग सकता है। मलेरिया की जांच से ही पता चल पाता है कि मरीज किस तरह के मलेरिया से ग्रसित है और उसी के आधार पर विभिन्न दवाओं से उसका इलाज शुरू किया जाता है। साधारण मलेरिया होने पर सही इलाज से मरीज 3-5 दिनों में ठीक हो सकता है लेकिन यदि सीवियर फाल्सीपेरम मलेरिया हुआ तो समय पर और सही इलाज नहीं कराने पर मरीज की मौत भी हो सकती है। इसलिए बेहद जरूरी है कि मलेरिया की जांच और इलाज में कोताही न बरतें। गर्मी और मानूसन के दौरान मच्छरों की संख्या बहुत बढ़ जाती है, इसलिए आमतौर पर मलेरिया इन्हीं मौसम में सबसे ज्यादा होता है। वैसे मलेरिया के मच्छर अधिकांशतः उन्हीं जगहों पर पनपते हैं, जहां गंदगी होती है या गंदा पानी जमा होता है। इसलिए मलेरिया की रोकथाम के लिए सबसे जरूरी है कि अपने घरों में तथा आसपास गंदगी और गंदा पानी एकत्र न होने दें।

आचार्य महाश्रमण की निर्गुण-चेतना से विश्व-शांति की नई दिशा

आचार्य महाश्रमण के 65वें जन्मदिवस पर विशेष – ललित गर्ग मानव इतिहास के इस अशांत और संक्रमणकालीन दौर में जब विश्व का परिदृश्य युद्ध हिंसा आतंकवाद और वैचारिक टकरावों से आच्छादित है तब शांति सह अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की पुकार पहले से कहीं अधिक तीव्र हो उठी है। ऐसे समय में आचार्य महाश्रमण एक ऐसे आध्यात्मिक प्रकाशस्तंभ के रूप में उभरते हैं जिनका चिंतन केवल किसी एक पंथ सम्प्रदाय या राष्ट्र तक सीमित नहीं है बल्कि सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का व्यापक दृष्टिकोण अपने भीतर समेटे हुए है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व निर्गुण रंगी चदरिया की उस अनुभूति को मूर्त करता है जो गुणों के पार जाकर आत्मा की शुद्ध चेतना में स्थित होने का संदेश देती है। भगवद्गीता में अर्जुन को दिए गए श्रीकृष्ण के उपदेश त्रिगुणातीत बन जा के अनुरूप आचार्य महाश्रमण का जीवन एक सजीव उदाहरण बनकर सामने आता है। उन्होंने सत्व रज और तम के बंधनों को पार कर उस निर्गुण अवस्था को साधने का प्रयास किया है जहाँ व्यक्ति न केवल आत्मबोध को प्राप्त करता है बल्कि समष्टि के कल्याण का माध्यम भी बन जाता है। उनका यह दृष्टिकोण केवल दार्शनिक विमर्श नहीं बल्कि व्यवहारिक जीवन में उतरा हुआ सत्य है। उनकी साधना सत्य की पूजा नहीं करती बल्कि सत्य की शल्य चिकित्सा करती है अर्थात् वे सत्य को केवल स्वीकार नहीं करते बल्कि उसकी गहराई में उतरकर उसे परिष्कृत करते हैं। आचार्य महाश्रमण का जीवन रहें भीतर जीएँ बाहर के सूत्र पर आधारित है। यह सूत्र आधुनिक जीवन की जटिलताओं में संतुलन स्थापित करने का एक अद्वितीय मार्ग प्रस्तुत करता है। आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों की दौड़ में अपने भीतर के शून्य को अनदेखा कर देता है जिसके परिणामस्वरूप तनाव असंतोष और हिंसा का जन्म होता है। आचार्य महाश्रमण का चिंतन इस अंतर्विरोध को समाप्त करने का प्रयास करता है। वे सिखाते हैं कि यदि भीतर शांति और संतुलन है तो बाहर का जीवन स्वतः ही सुव्यवस्थित हो जाता है। यही कारण है कि उनकी साधना केवल आत्मिक उन्नति तक सीमित नहीं रहती बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी आधार बनती है। उनकी अहिंसा यात्रा आज के समय की एक ऐतिहासिक और युगान्तरकारी पहल है जो हमें दांडी यात्रा और भूदान आंदोलन की याद दिलाती है। यह यात्रा केवल एक पदयात्रा नहीं बल्कि विचारों की क्रांति है एक ऐसी क्रांति जो हथियारों से नहीं बल्कि संवाद संवेदना और संस्कारों से संचालित होती है। देश विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पैदल चलकर उन्होंने लाखों लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया उन्हें नशामुक्ति सदाचार नैतिकता और अहिंसा के मार्ग पर अग्रसर किया। आज जब विश्व के अनेक देश युद्ध और आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहे हैं तब आचार्य महाश्रमण का यह प्रयास एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है एक ऐसा मार्ग जहाँ शांति केवल एक आदर्श नहीं बल्कि एक व्यवहारिक संभावना बन जाती है। उनकी दृष्टि वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को साकार करती है जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार के रूप में देखा जाता है। वे किसी व्यक्ति को उसके धर्म जाति वर्ग या क्षेत्र के आधार पर नहीं बल्कि उसके भीतर विद्यमान गुणों के आधार पर आंकते हैं। यह दृष्टिकोण न केवल सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति और सहयोग की नींव भी रखता है। आज जब पहचान की राजनीति और सांस्कृतिक विभाजन समाज को खंडित कर रहे हैं तब आचार्य महाश्रमण का यह समन्वयवादी दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। आचार्य महाश्रमण की सादगी विनम्रता और अनुशासन उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान हैं। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ जैसे महान आचार्यों के सान्निध्य में विकसित उनका जीवन एक ऐसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जो आत्मानुशासन और सेवा को सर्वोच्च मूल्य मानती है। बाल्यावस्था में ही दीक्षा लेकर उन्होंने जिस तप त्याग और समर्पण का मार्ग अपनाया वह आज के भौतिकतावादी युग में एक प्रेरणास्रोत है। उनकी जीवन यात्रा मोहनलाल से मुनि मुदितकुमार फिर महाश्रमण और अंततः आचार्य बनने तक एक ऐसी साधना गाथा है जो यह सिद्ध करती है कि आत्मबल और संकल्प से किसी भी ऊँचाई को प्राप्त किया जा सकता है। आचार्य महाश्रमण की बौद्धिक प्रतिभा भी उतनी ही प्रभावशाली है जितनी उनकी आध्यात्मिक साधना। उत्तराध्ययन सूत्र और भगवद्गीता जैसे महान ग्रंथों का तुलनात्मक अध्ययन कर उन्होंने यह सिद्ध किया है कि सत्य किसी एक परंपरा का एकाधिकार नहीं है। उनके प्रवचनों का संकलन सुखी बनो इस दृष्टि का सशक्त उदाहरण है जिसमें उन्होंने जीवन को सरल सार्थक और संतुलित बनाने के सूत्र प्रस्तुत किए हैं। उनका चिंतन आगम दर्शन तर्कशास्त्र मनोविज्ञान और समाजशास्त्र जैसे विविध क्षेत्रों को समाहित करता है जिससे उनका व्यक्तित्व एक बहुआयामी मनीषी के रूप में उभरता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में जहाँ युद्ध की विभीषिका और परमाणु हथियारों की होड़ मानव अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा बन चुकी है वहाँ आचार्य महाश्रमण का अहिंसा का शंखनाद एक जीवनदायी संदेश के रूप में सामने आता है। उनका यह विश्वास कि अहिंसा केवल एक सिद्धांत नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या वास्तव में हिंसा के माध्यम से स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है? उनका उत्तर स्पष्ट है नहीं। शांति का मार्ग केवल संवाद सहिष्णुता और करुणा से होकर गुजरता है। उनके प्रयासों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल उपदेश नहीं देते बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। प्रतिदिन नई ऊर्जा और संकल्प के साथ वे मानव उत्थान के कार्यों में जुटे रहते हैं। उनकी दिनचर्या उनका अनुशासन और उनका समर्पण यह दर्शाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो अपने आचरण से दूसरों को प्रेरित करे। उनके नेतृत्व में तेरापंथ धर्मसंघ न केवल संगठित और सशक्त हुआ है बल्कि उसने समाज सेवा शिक्षा स्वास्थ्य और नैतिक जागरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। निश्चित तौर पर जैन धर्म के महान तपस्वी अनुशासनप्रिय दूरदर्शी और तेजस्वी आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अद्भुत संगम बनी जैन विश्व भारती में इस वर्ष योगक्षेम वर्ष के रूप में एक नया आध्यात्मिक इतिहास रचा जा रहा है आध्यात्मिक प्रशिक्षण की एक नई परंपरा विकसित की जा रही है। देशभर में विचरण करने वाले साधु संतों को एक जगह बुलाकर आचार्य महाश्रमण उन्हें

रफ्तार ने छीनी खुशियां: भिंड में भीषण सड़क दुर्घटना, 3 की मौत और 1 गंभीर घायल

नई दिल्ली । भिंड जिले के उमरी थाना क्षेत्र में शनिवार दोपहर एक भीषण सड़क हादसे ने तीन परिवारों की खुशियां छीन लीं। नेशनल हाईवे 552 पर तेज रफ्तार बस ने बाइक सवार चार युवकों को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी। इस दर्दनाक हादसे में तीन युवकों की मौत हो गई, जबकि एक युवक गंभीर रूप से घायल है और उसे ग्वालियर रेफर किया गया है। घटना करीब दोपहर 1:30 बजे किशोर सिंह का पुरा गांव के पास हुई। बताया जा रहा है कि चारों युवक एक ही बाइक पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। तभी पीछे से आ रही तेज रफ्तार बस ने उन्हें टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि बाइक के परखच्चे उड़ गए और चारों युवक सड़क पर गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसे के तुरंत बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों ने तुरंत पुलिस और 112 एंबुलेंस को सूचना दी। घायलों को तत्काल रौन के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने दो युवकों को मृत घोषित कर दिया। बाकी दो घायलों को गंभीर हालत में जिला अस्पताल भिंड रेफर किया गया। जिला अस्पताल में इलाज के दौरान एक और युवक ने दम तोड़ दिया, जिससे मृतकों की संख्या बढ़कर तीन हो गई। चौथा युवक अभी भी जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है, जिसे बेहतर इलाज के लिए ग्वालियर रेफर किया जा रहा है। खबर लिखे जाने तक मृतकों और घायल की पहचान नहीं हो सकी थी। पुलिस उनकी शिनाख्त में जुटी हुई है। हादसे के बाद बस चालक मौके से फरार बताया जा रहा है। वाहन को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी गई है। उमरी थाना प्रभारी शिव प्रताप सिंह राजावत ने बताया कि जैसे ही सूचना मिली, पुलिस टीम मौके पर पहुंची और राहत-बचाव कार्य शुरू कराया गया। तीन युवकों की मौत हो चुकी है, जबकि एक का इलाज जारी है। पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है और बस चालक की तलाश की जा रही है। यह हादसा एक बार फिर तेज रफ्तार और लापरवाही से हो रहे सड़क हादसों की गंभीरता को उजागर करता है, जिसने तीन परिवारों को गहरे शोक में डुबो दिया है।

बैतूल में दर्दनाक रात: तीन अलग-अलग घटनाओं में तीन मौतें, सड़क हादसों और विवाद ने छीनी जिंदगियां

नई दिल्ली । बैतूल जिले में शुक्रवार की रात एक साथ तीन अलग-अलग घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया। इन घटनाओं में तीन लोगों की मौत हो गई, जिनमें दो सड़क हादसों के शिकार हुए जबकि एक व्यक्ति ने पारिवारिक विवाद के बाद आत्महत्या कर ली। लगातार हुई इन घटनाओं से पूरे जिले में शोक और दहशत का माहौल है। पुलिस ने सभी मामलों की जांच शुरू कर दी है। पहली घटना बैतूल-आमला मार्ग पर बाघवाड़ सोमवारी के पास हुई, जहां मजदूरी करके घर लौट रहे 23 वर्षीय युवक गोलू पुत्र जगन उइके की दर्दनाक मौत हो गई। बताया जा रहा है कि शाम के समय जब वह काम खत्म कर घर लौट रहा था, तभी किसी अज्ञात वाहन ने उसे जोरदार टक्कर मार दी। हादसा इतना गंभीर था कि मौके पर ही उसकी हालत बिगड़ गई। स्थानीय लोगों की मदद से उसे अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस घटना के बाद उसके परिवार में कोहराम मच गया। गोलू अपने छोटे भाई ऋषि के साथ मजदूरी कर परिवार की जिम्मेदारियां संभालता था। दूसरी घटना गोंदी गोला क्षेत्र की है, जहां 23 वर्षीय रोशन पुत्र पिंटू टेकाम की सड़क हादसे में जान चली गई। रोशन शादी समारोह में शामिल होकर देर रात अपने गांव लौट रहा था। बताया गया कि वह बाइक से अकेला था और रास्ते में किसी कारणवश नियंत्रण खो बैठा। कुछ देर बाद वह गांव के पास सड़क किनारे अचेत अवस्था में पड़ा मिला। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके। रोशन अपने परिवार का सहारा था और उसकी असमय मौत से घर में मातम छा गया है। तीसरी और सबसे दर्दनाक घटना चिचोली थाना क्षेत्र के सेहरा गांव की है। यहां 35 वर्षीय राजकुमार पुत्र शिवराम ने पारिवारिक विवाद के बाद आत्महत्या कर ली। बताया गया कि वह शाम को खेत से घर लौटा था और उसने अपनी मां से तीन हजार रुपये मांगे थे, जो उसे कुएं में मोटर डालने के लिए चाहिए थे। पैसे नहीं मिलने पर घर में विवाद बढ़ गया। इसी तनाव में आकर उसने खेत में रखी खरपतवार नाशक दवा पी ली। हालत बिगड़ने पर उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां आईसीयू में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। राजकुमार तीन बेटियों और एक बेटे का पिता था और परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ उसी पर था। लगातार हुई इन तीन घटनाओं ने बैतूल जिले को गहरे सदमे में डाल दिया है। पुलिस ने तीनों मामलों में मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है और हादसों के कारणों का पता लगाया जा रहा है।