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AI Photo Trend: एक ही तस्वीर में बचपन से मुलाकात! सोशल मीडिया पर छाया ‘Meet Your Younger Self’ ट्रेंड

नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक नया और दिलचस्प AI ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें लोग अपनी बचपन की यादों को तकनीक के जरिए फिर से जीवंत कर रहे हैं। इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर ‘Meet Your Younger Self’ नाम से चल रहे इस ट्रेंड में यूजर्स अपनी वर्तमान और बचपन की तस्वीरों को मिलाकर एक खास फोटो तैयार कर रहे हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक और भावनात्मक लगती है। इस ट्रेंड की खास बात यह है कि इसमें एक ही फ्रेम में व्यक्ति का बचपन और वर्तमान दोनों रूप दिखाई देते हैं। फोटो इतनी रियलिस्टिक होती है कि ऐसा लगता है मानो दो अलग-अलग लोग आमने-सामने खड़े हैं, लेकिन असल में दोनों एक ही व्यक्ति के अलग-अलग समय के रूप होते हैं। यही वजह है कि यह ट्रेंड लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और लाखों यूजर्स इसे ट्राई कर रहे हैं। इस तरह की फोटो बनाने के लिए यूजर्स ChatGPT या अन्य AI इमेज जनरेशन टूल्स का सहारा ले रहे हैं। इसमें यूजर को अपनी एक वर्तमान फोटो और एक बचपन की फोटो अपलोड करनी होती है। इसके बाद एक डिटेल्ड प्रॉम्प्ट दिया जाता है, जिसमें सीन, लाइटिंग और एक्सप्रेशन जैसी डिटेल्स बताई जाती हैं। AI उसी के आधार पर एक नई इमेज तैयार कर देता है, जिसमें दोनों टाइमलाइन एक साथ नजर आती हैं। यह ट्रेंड सिर्फ एक फोटो बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों को अपने अतीत से जोड़ने और समय के साथ आए बदलाव को महसूस करने का मौका भी देता है। कई यूजर्स इस फोटो के साथ इमोशनल कैप्शन लिखकर अपनी यादें साझा कर रहे हैं, जिससे यह ट्रेंड और भी खास बन गया है। अगर आप भी इस ट्रेंड को ट्राई करना चाहते हैं, तो बस अपनी एक क्लियर वर्तमान फोटो और बचपन की फोटो चुनें, किसी AI टूल में जाकर सही प्रॉम्प्ट डालें और कुछ ही सेकंड में आपकी यूनिक फोटो तैयार हो जाएगी। इसके बाद आप इसे सोशल मीडिया पर शेयर कर सकते हैं और इस वायरल ट्रेंड का हिस्सा बन सकते हैं।

जनगणना के नाम पर ठगी का जाल! OTP-बैंक डिटेल मांगने वालों से रहें सावधान

नई दिल्ली। देश में जनगणना प्रक्रिया के शुरू होते ही साइबर ठगों ने भी नया तरीका अपना लिया है। जनगणना अधिकारी बनकर लोग घर-घर या ऑनलाइन संपर्क कर रहे हैं और नागरिकों से संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में आम लोगों के लिए सतर्क रहना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि एक छोटी सी गलती आपको बड़े फ्रॉड का शिकार बना सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, असली जनगणना कर्मचारी केवल सामान्य घरेलू और जनसांख्यिकीय जानकारी ही पूछते हैं, जैसे परिवार के सदस्यों की संख्या, उम्र, लिंग, पेशा या घर से जुड़ी बेसिक जानकारी। लेकिन अगर कोई व्यक्ति आपसे बैंक अकाउंट डिटेल, आधार नंबर, पैन नंबर या OTP जैसी जानकारी मांगता है, तो यह साफ संकेत है कि सामने वाला फर्जी है और आपको ठगने की कोशिश कर रहा है। साइबर अपराधी अब सिर्फ सीधे सवाल नहीं पूछते, बल्कि डिजिटल जाल भी बिछाते हैं। कई मामलों में लोगों को लिंक भेजकर ‘डिटेल कंफर्म’ करने के लिए कहा जाता है, या कोई ऐप डाउनलोड करने के लिए मजबूर किया जाता है। कुछ मामलों में QR कोड स्कैन करवाकर भी डेटा चुराने की कोशिश की जा रही है। ऐसे किसी भी लिंक, ऐप या QR कोड से तुरंत दूरी बनाना ही सबसे सुरक्षित तरीका है। सरकार से जुड़े प्लेटफॉर्म Sanchar Saathi के तहत मौजूद Chakshu portal पर ऐसे संदिग्ध मामलों की शिकायत दर्ज की जा सकती है। इसके अलावा अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि वह ठगी का शिकार हो चुका है, तो उसे तुरंत अपने बैंक से संपर्क करना चाहिए और National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। साथ ही 1930 हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करके भी तुरंत मदद ली जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल युग में जागरूकता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। जनगणना के नाम पर हो रहे इस नए फ्रॉड से बचने के लिए जरूरी है कि लोग सही जानकारी पहचानें, अनजान लोगों पर भरोसा न करें और अपनी निजी व वित्तीय जानकारी को हर हाल में सुरक्षित रखें।

एक फोटो से साफ हो सकता है बैंक अकाउंट! AEPS फ्रॉड का नया खेल, तुरंत लॉक करें आधार बायोमेट्रिक्स

नई दिल्ली। डिजिटल दौर में ठगी के तरीके भी हाईटेक होते जा रहे हैं और अब साइबर अपराधियों ने बैंक खातों पर सेंध लगाने का नया रास्ता खोज लिया है। UIDAI के आधार सिस्टम से जुड़े AEPS को निशाना बनाकर स्कैमर्स सिर्फ एक फोटो के जरिए लोगों के खाते खाली कर रहे हैं। यह नया “फेस ऑथेंटिकेशन फ्रॉड” पारंपरिक OTP या कॉल फ्रॉड से भी ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है, क्योंकि इसमें ठगों को पीड़ित से सीधे संपर्क की भी जरूरत नहीं पड़ती। दरअसल, AEPS सिस्टम को आधार नंबर और बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट या फेस) के जरिए आसान बैंकिंग के लिए बनाया गया था, लेकिन अब अपराधी इसी तकनीक का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्कैमर्स सोशल मीडिया या अन्य प्लेटफॉर्म से आपकी एक साफ फोटो हासिल कर लेते हैं और फिर AI तकनीक की मदद से आपका नकली चेहरा (डीपफेक) तैयार कर लेते हैं। इसके जरिए वे सिस्टम को धोखा देकर आपके बैंक खाते से पैसे निकाल लेते हैं, जिससे कुछ ही मिनटों में अकाउंट खाली हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फ्रॉड से बचने के लिए सबसे जरूरी है सतर्कता और सही सेटिंग्स का इस्तेमाल। यूजर्स को तुरंत अपने आधार का बायोमेट्रिक लॉक कर देना चाहिए, ताकि कोई भी बिना अनुमति आपके फिंगरप्रिंट या फेस डेटा का उपयोग न कर सके। इसके लिए mAadhaar ऐप या UIDAI की वेबसाइट का सहारा लिया जा सकता है। इसके अलावा, अगर आप AEPS सेवा का नियमित उपयोग नहीं करते हैं तो अपने बैंक से इसे बंद या सीमित कराने की सलाह दी जाती है। साइबर एक्सपर्ट्स यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि सोशल मीडिया पर अपनी हाई-क्वालिटी तस्वीरें शेयर करते समय सावधानी बरतें, क्योंकि यही फोटो स्कैमर्स के लिए सबसे बड़ा हथियार बन सकती है। अगर आपके खाते से कोई संदिग्ध ट्रांजैक्शन होता है, तो तुरंत कार्रवाई करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करके शिकायत दर्ज कराएं, ताकि नुकसान को कम किया जा सके।

नितिन गडकरी ने किया MLFF टोलिंग लॉन्च; FASTag और AI कैमरों से होगी ऑटोमैटिक वसूली, जाम से मिलेगी राहत

नई दिल्ली। देश के हाईवे सफर को आसान और तेज बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने बैरियर-लेस टोलिंग सिस्टम की शुरुआत कर दी है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने गुजरात के सूरत-भरूच सेक्शन (NH-48) पर मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) टोलिंग सिस्टम लॉन्च किया। यह देश का पहला ऐसा टोल है, जहां वाहन बिना रुके 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरते हुए भी टोल चुका सकेंगे। नई तकनीक के तहत पारंपरिक टोल प्लाजा की तरह बैरियर नहीं होंगे। इसकी जगह ओवरहेड स्ट्रक्चर पर लगे हाई-टेक कैमरे और सेंसर गाड़ियों की पहचान करेंगे। FASTag और ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) तकनीक के जरिए वाहन की जानकारी तुरंत पढ़ी जाएगी और टोल की रकम सीधे लिंक्ड खाते से कट जाएगी। खास बात यह है कि अगर किसी वाहन में FASTag नहीं लगा है या काम नहीं कर रहा, तो भी टोल वसूली नहीं रुकेगी। AI कैमरे नंबर प्लेट स्कैन कर वाहन मालिक को ई-नोटिस भेज देंगे, जिससे भुगतान सुनिश्चित किया जा सके। सरकार का दावा है कि इस नई व्यवस्था से हाईवे पर लगने वाले जाम में बड़ी कमी आएगी। वाहनों को रुकना नहीं पड़ेगा, जिससे यात्रा समय घटेगा और ईंधन की भी बचत होगी। साथ ही प्रदूषण में कमी और टोल संचालन में पारदर्शिता बढ़ेगी। मंत्री गडकरी ने कहा कि यह अत्याधुनिक सिस्टम देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगा और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को नई गति देगा। उनका कहना है कि आने वाले समय में इस तकनीक को देश के अन्य राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी लागू किया जाएगा। इस पहल को भारत के टोल सिस्टम के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जो आम लोगों के सफर को ज्यादा तेज, सुविधाजनक और झंझटमुक्त बना सकता है।

ओप्पो इंडिया ने मिड रेंज में सेल्फी चैंपियनएफ33 सीरीज़ लॉन्च की

नई दिल्‍ली। आज ओप्पो इंडिया ने भारत में ओप्पो एफ33 सीरीज़ लॉन्च की है, जिसमें दो स्मार्टफोन, ओप्पो एफ33 प्रो 5जी और ओप्पो एफ33 5जी शामिल हैं। एफ 33 सीरीज़ ओप्पो की एफ लाईन में अभी तक की सबसे आधुनिक सीरीज़ है, जिसमें सेगमेंट में सबसे बेहतर 50 मेगापिक्सल का अल्ट्रा-वाईड सेल्फी कैमरा, आईपी69के ड्यूरेबिलिटी, 7,000 एम.ए.एच की जबरदस्त बैटरी, कलरओएस16 और 5जी++ कनेक्टिविटी दी गई है। ओप्पो इंडिया के हेड ऑफ कम्युनिकेशंस, गोल्डी पटनायक ने बताया किएफ सीरीज़ भारत की सबसे ड्यूरेबल चैंपियन है। यह स्मार्टफोन जीवन की वास्तविक परिस्थितियों के लिए बनाया गया है। एफ33 सीरीज़ में हमने इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए 100 डिग्री एफ.ओ.वी (फील्ड ऑफ व्यू) के साथ 50 मेगापिक्सल का अल्ट्रा-वाईड सेल्फी कैमरा और कई ए.आई इमेजिंग फीचर्स दिए हैं। हमारी कोशिश है कि ड्यूरेबिलिटी और शानदार फोटोग्राफी के लिए ग्राहकों को महंगी कीमत न चुकानी पड़े। ग्राहकों को मॉनसून की ट्रैकिंग पर जाने की ड्यूरेबिलिटी और ग्रुप में हर व्यक्ति को सेल्फी में कैप्चर करने जैसी खूबियाँ एक ही स्मार्टफोन में मिल सकें। एफ33 हमारे इस वादे को पूरा करता है और भारत की मोबाईल-फर्स्ट पीढ़ी को वो सभी खूबियाँ प्रदान करता है, जिनके वो हकदार हैं।’’ 0.6एक्स तक के स्मार्ट ऑटो-स्विच के साथ सेगमेंट का सबसे बेहतर सेल्फी कैमरा ओप्पो की सेल्फी चैंपियन एफ33 सीरीज़ में 100 डिग्री फील्ड ऑफ व्यू के साथ 50 मेगापिक्सल का अल्ट्रा-वाईड फ्रंट कैमरा है। यह अपने सेगमेंट में सबसे बड़े स्पेस को कैप्चर करने वाला और सबसे ज्यादा रिज़ॉल्यूशन वाला कैमरा है। इसमें ई.आई.एस, ऑटोफोकस और जीसी50एफ6 सेंसर (एफ/2.0, 18 मिमी फोकल लैंथ, 5पी लेंस) जैसी खूबियाँ दी गई हैं। यह पिछली जनरेशन की फ्रेमिंग की तुलना में एक मीटर की दूरी से लगभग 30 प्रतिशत ज्यादा क्षेत्र को कैप्चर करता है। इसलिए सेल्फी में और ज्यादा लोग, और अधिक कॉन्टैक्स्ट तथा ज्यादा मूमेंट आ सकते हैं, और किसी चेहरे को भी क्रॉप करने की जरूरत नहीं पड़ती है। एफ33 प्रो की कैमरा इंटैलिजेंस रिज़ॉल्यूशन से भी बढ़कर है। ओप्पो का ए.आई ग्रुपफी एक्सपर्ट फ्रेम में दो चेहरों का प्रवेश होते ही ऑटोमैटिक 0.6एक्स तक चौड़ा हो जाता है। इसके लिए न तो टैप करने की जरूरत पड़ती है, न ही ऐप टटोलना पड़ता है और न ही कोई मूमेंट चूकता है। फेस डिस्टॉर्शन करेक्शन एलगोरिद्म एक साथ छः सब्जेक्ट्स तक को ट्रैक कर सकती है, जिससे 100 डिग्री के फील्ड ऑफ व्यू तक किनारों पर प्राकृतिक अनुपात बने रहते हैं। इसलिए इस स्मार्टफोन से ग्रुप सेल्फी लेना बहुत आसान है, फिर चाहे आप जयपुर में रूफटॉप पर होंया फिर कूर्ग के विशाल व्यूपॉईंट में सेल्फी ले रहे हों। फ्रंट कैमरा सिस्टम के चारों ओर कलरफुल फ्रंट फिल लाईट दी गई है। व्हाईट फ्लैश की जगह दिए गए इस मल्टी-कलर फ्लैश से सॉफ्ट, स्किन-टोन-फ्रेंडली इल्युमिनेशन प्राप्त होता है, जो कम रोशनी में, जब अन्य कैमरा दिक्कत देने लगते हैं, तब भी बेहतरीन सेल्फी प्रदान करता है। इस कैमरा सिस्टम से मिली सेल्फी फ्लैश की हुई नहीं, बल्कि बिल्कुल प्राकृतिक दिखाई देती हैं। एफ33 प्रो के रियर सिस्टम में ओवी50डी40 सेंसर के साथ 50 मेगापिक्सल का मेन कैमरा है, जो रोजमर्रा की शूटिंग में स्वाभाविक डिटेल बनाए रखता है। इसकी इमेज क्रॉप होने और रीफ्रेम होने के बाद भी प्राकृतिक बनी रहती हैं। इसलिए, यह कैमरा जहाँ क्लाईंट विज़िट के दौरान डॉक्युमेंट की समीक्षा करने के लिए उपयोगी है, वहीं वीकेंड ट्रिप पर शानदार फोटोग्राफी भी कर सकता है। इस कैमरा सिस्टम में 2 मेगापिक्सल का डेप्थ कैमरा भी दिया गया है, जो बैकग्राउंड में काम करता है। इससे आई.एस.पी (इमेज सिग्नल प्रोसेसर) को पर्याप्त डेटा मिलता है, जिसे रेंडर करके वह मैन्युअल इनपुट के बिना ही पोर्ट्रेट में बेहतरीन बोके इफेक्ट दे सकता है।

सरकार का अलर्ट फोन में क्यों नहीं बजा? Android की इस सेटिंग को ऑन कर बचें, भविष्य में तुरंत मिलेंगे इमरजेंसी मैसेज

नई दिल्ली। देशभर में हाल ही में सरकार की ओर से भेजा गया Cell Broadcast आधारित टेस्ट अलर्ट करोड़ों मोबाइल फोनों पर एक साथ पहुंचा। भारत सरकार ने इस indigenous Cell Broadcast सिस्टम को आपदा और इमरजेंसी अलर्ट के लिए तैयार किया है, जिसमें तय क्षेत्र के सभी मोबाइल डिवाइस पर एक साथ संदेश भेजे जा सकते हैं और नेटवर्क पर भी भारी दबाव नहीं पड़ता। कई यूजर्स के फोन में यह अलर्ट सुनाई नहीं दिया, और Android डिवाइस पर इसका एक बड़ा कारण “Wireless Emergency Alerts” सेटिंग का बंद होना हो सकता है। Google की आधिकारिक Android गाइड के मुताबिक, Android फोन में यह सेटिंग आमतौर पर Settings > Safety and emergency > Wireless emergency alerts के अंदर मिलती है। Pixel जैसे कुछ डिवाइस में यह Settings > Notifications > Wireless Emergency Alerts के रूप में भी दिख सकती है, और Google यह भी बताता है कि निर्माता के हिसाब से सेटिंग की जगह बदल सकती है। इसी मेन्यू में जाकर यूजर Extreme threats, Severe threats, AMBER alerts और Public safety messages जैसी श्रेणियां ऑन-ऑफ कर सकते हैं। अगर आपके फोन में भी शनिवार वाला अलर्ट नहीं बजा, तो इसका मतलब यह नहीं कि सिस्टम काम नहीं कर रहा था; संभव है कि आपके डिवाइस में यह फीचर बंद हो, या आपके फोन मॉडल पर इसका मेन्यू अलग जगह हो। Google के अनुसार, Wireless Emergency Alerts को चालू रखने से सरकारी इमरजेंसी संदेश, आपदा अलर्ट और सुरक्षा से जुड़े नोटिफिकेशन सीधे फोन पर मिलते हैं, यहां तक कि कई मामलों में साइलेंट मोड में भी। कैसे ऑन करें: अपने Android फोन में Settings खोलें, फिर Safety and emergency या Notifications में जाकर Wireless emergency alerts चुनें और ऊपर दिए गए अलर्ट टॉगल्स को ऑन कर दें। यही सेटिंग भविष्य में सरकारी इमरजेंसी अलर्ट समय पर पाने में मदद करेगी।

AI डिक्टेशन का नया दौर: कीबोर्ड होगा खत्म, बोलते ही तैयार होगा स्मार्ट टेक्स्ट

नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब हमारे लिखने के तरीके को पूरी तरह बदल रहा है। भारत में Wispr Flow जैसे नए AI डिक्टेशन टूल के लॉन्च के साथ अब कीबोर्ड की जरूरत तेजी से कम होती जा रही है। यूजर सिर्फ बोलते हैं और AI उसे साफ, व्यवस्थित और प्रोफेशनल टेक्स्ट में बदल देता है। खास बात यह है कि ये टूल्स सिर्फ शब्दों को नहीं, बल्कि आपकी भावनाओं और बातचीत के संदर्भ को भी समझते हैं, जिससे आउटपुट पहले से ज्यादा स्मार्ट और उपयोगी बनता है। क्लेवरटिप की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 40% स्मार्टफोन यूजर्स अब कंटेंट बनाने के लिए वॉइस इनपुट का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो एक बड़े डिजिटल बदलाव का संकेत है। पहले जहां वॉइस टाइपिंग सिर्फ बोले गए शब्दों को टेक्स्ट में बदलती थी, वहीं अब AI डिक्टेशन टूल्स उस टेक्स्ट को एडिट, सुधार और प्रोफेशनल फॉर्मेट में ढाल देते हैं। ये टूल्स अधूरे वाक्यों को पूरा करते हैं, भाषा की टोन सुधारते हैं और बातचीत को नोट्स, ईमेल या आर्टिकल में बदलने में सक्षम हैं। इस रेस में Wispr Flow, Google AI Edge Eloquent, Otter AI और Monologue जैसे ऐप्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। Wispr Flow जहां 100 से ज्यादा भाषाओं को सपोर्ट करता है और हर ऐप में काम करता है, वहीं Google AI Edge Eloquent ऑफलाइन प्रोसेसिंग के साथ प्राइवेसी को मजबूत बनाता है। Otter AI मीटिंग्स और इंटरव्यू के लिए ऑटो ट्रांसक्रिप्शन और समरी देता है, जबकि Monologue स्क्रीन पर चल रही गतिविधियों को समझकर संदर्भ के अनुसार भाषा बदल सकता है। हालांकि, इन एडवांस्ड टूल्स के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। प्राइवेसी सबसे बड़ा मुद्दा है, क्योंकि यूजर की आवाज और डेटा का इस्तेमाल कैसे हो रहा है, यह हमेशा स्पष्ट नहीं होता। इसके अलावा, लोकल भाषाओं में एक्युरेसी और तेज इंटरनेट की जरूरत भी कई बार परेशानी बनती है। फिर भी, यह साफ है कि AI डिक्टेशन टेक्नोलॉजी आने वाले समय में हमारी डिजिटल आदतों को पूरी तरह बदलने वाली है, जहां टाइपिंग की जगह बोलकर काम करना नया नॉर्म बन सकता है।

अब Amazon पर ‘बातचीत करके’ खरीदारी: AI ऑडियो फीचर से पूछो सवाल, तुरंत मिलेगा जवाब

नई दिल्ली। ऑनलाइन शॉपिंग को और आसान और इंटरैक्टिव बनाने के लिए Amazon ने नया AI ऑडियो फीचर लॉन्च किया है, जो खरीदारी के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है। इस फीचर के तहत यूजर्स अब सिर्फ प्रोडक्ट देखने या पढ़ने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उससे जुड़ी जानकारी को सुन सकेंगे और उसी दौरान सवाल पूछकर बातचीत भी कर पाएंगे। कंपनी ने अपने “Hear the Highlights” फीचर में “Join the Chat” विकल्प जोड़ा है, जिससे यूजर प्रोडक्ट की ऑडियो समरी सुनते समय टेक्स्ट या वॉइस के जरिए सवाल पूछ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर कोई यूजर पूछे कि “क्या यह कॉफी मशीन बच्चों के लिए सुरक्षित है?” तो AI तुरंत प्रोडक्ट डिटेल, कस्टमर रिव्यू और उपलब्ध डेटा के आधार पर जवाब देता है। इस फीचर की खास बात यह है कि यह सिर्फ एक साधारण चैटबॉट नहीं है, बल्कि एक वर्चुअल ऑडियो होस्ट की तरह काम करता है। AI रियल-टाइम में स्क्रिप्ट को अपडेट करता है और टेक्स्ट-टू-स्पीच तकनीक के जरिए उसी टोन में जवाब देता है, जिससे यूजर को ऐसा महसूस होता है जैसे वह किसी इंसान से बातचीत कर रहा हो। यह सिस्टम प्रोडक्ट की जानकारी, यूजर रिव्यू और वेब पर मौजूद डेटा को मिलाकर जवाब तैयार करता है। अगर किसी सवाल का जवाब पहले दिया जा चुका है, तो AI कोशिश करता है कि वह नया और अलग जवाब दे, ताकि यूजर को बेहतर अनुभव मिल सके। फिलहाल यह फीचर अमेरिका में उपलब्ध है और जल्द ही अन्य देशों में भी लॉन्च किया जा सकता है। इसे iOS और Android दोनों प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। यूजर को सिर्फ प्रोडक्ट पेज पर जाकर “Hear the Highlights” बटन पर क्लिक करना होगा। गौरतलब है कि Amazon पहले से ही Rufus नाम का AI शॉपिंग असिस्टेंट पेश कर चुका है, जो यूजर्स को प्रोडक्ट चुनने में मदद करता है। अब नया ऑडियो फीचर इस अनुभव को और ज्यादा इंटरैक्टिव और स्मार्ट बना रहा है। कुल मिलाकर, यह तकनीक ऑनलाइन शॉपिंग को एकतरफा प्रक्रिया से निकालकर बातचीत आधारित अनुभव में बदल रही है, जहां यूजर सिर्फ खरीदारी नहीं करता बल्कि समझकर फैसला लेता है।

ईयरबड्स का नया दौर: अब सिर्फ म्यूजिक नहीं, हेल्थ, ट्रांसलेशन और AI असिस्टेंट सब कुछ एक साथ

नई दिल्ली। टेक्नोलॉजी की दुनिया में ईयरबड्स अब सिर्फ गाने सुनने का साधन नहीं रहे, बल्कि तेजी से पर्सनल AI असिस्टेंट में बदलते जा रहे हैं। नए दौर के स्मार्ट ईयरबड्स आपके आसपास के माहौल को समझते हैं, बातचीत को प्रोसेस करते हैं और यहां तक कि आपकी सेहत से जुड़े संकेतों पर भी नजर रखते हैं। Apple, Google और JBL जैसी कंपनियां ऐसे डिवाइस तैयार कर रही हैं जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेंसर और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल हो रहा है। ये ईयरबड्स न सिर्फ एडाप्टिव नॉइज कैंसलेशन देते हैं, बल्कि वॉइस कमांड, लाइव ट्रांसक्रिप्शन, रियल टाइम ट्रांसलेशन और हेल्थ मॉनिटरिंग जैसी सुविधाएं भी देते हैं। दरअसल, इन AI ईयरबड्स में लगे माइक्रोफोन और सेंसर लगातार आपके आसपास की आवाज, लोकेशन और एक्टिविटी को समझते रहते हैं। जैसे ही आप किसी से बात करते हैं, म्यूजिक खुद-ब-खुद धीमा हो जाता है या बैकग्राउंड शोर कम कर दिया जाता है। छोटे-छोटे फैसले ये डिवाइस खुद लेते हैं, जिससे यूजर को बेहतर और स्मार्ट अनुभव मिलता है। मार्केट में मौजूद कई डिवाइस इस बदलाव को दिखा रहे हैं। Apple AirPods Pro ट्रांसपेरेंसी और नॉइज बैलेंसिंग को ऑटोमैटिक तरीके से मैनेज करते हैं। Google Pixel Buds Pro 2 40 से ज्यादा भाषाओं में लाइव ट्रांसलेशन की सुविधा देते हैं। वहीं JBL Live Beam 3 फिटनेस और एक्टिव यूजर्स को ध्यान में रखकर डिजाइन किए गए हैं, जिनमें मल्टी-माइक सिस्टम शामिल है। इसके अलावा Samsung Galaxy Buds 3 Pro जरूरी आवाजों जैसे सायरन या ट्रैफिक को सुनने देते हैं, जबकि Beats Powerbeats Pro 2 में PPG सेंसर लगे हैं जो हार्ट रेट को मॉनिटर करते हैं—और कई मामलों में यह डेटा स्मार्टवॉच जितना सटीक माना जा रहा है। इन AI ईयरबड्स की सबसे बड़ी खासियत है इंटेलिजेंट नॉइज मैनेजमेंट, जिससे भीड़ में भी साफ आवाज सुनाई देती है। रियल टाइम ट्रांसलेशन भाषा की दीवार को खत्म कर रहा है, वहीं एडाप्टिव ऑडियो पर्सनलाइजेशन आपके कान के हिसाब से साउंड को सेट करता है। इसके साथ ही हेल्थ ट्रैकिंग फीचर्स हार्ट रेट, बॉडी सिग्नल्स और यहां तक कि मीटिंग ट्रांसक्रिप्शन को नोट्स में बदलने तक का काम कर रहे हैं। कुल मिलाकर, ईयरबड्स अब सिर्फ ऑडियो डिवाइस नहीं रहे—ये आपकी जेब में मौजूद एक छोटा लेकिन बेहद ताकतवर AI असिस्टेंट बन चुके हैं, जो आने वाले समय में टेक्नोलॉजी की दिशा ही बदल सकते हैं।

AI का नया ट्रेंड: ब्रेकअप के बाद ‘डिजिटल एक्स’ बना रहे युवा, सुकून भी…खतरा भी

नई दिल्ली। चीन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि इंसानी भावनाओं का नया सहारा बनता जा रहा है। एक नया और चौंकाने वाला ट्रेंड तेजी से सामने आया है, जिसमें युवा ब्रेकअप के बाद अपने पुराने पार्टनर को भुलाने की बजाय उसका “डिजिटल अवतार” तैयार कर रहे हैं। ये AI आधारित “डिजिटल एक्स” इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे बोलने के अंदाज, बातचीत के तरीके और भावनात्मक प्रतिक्रिया तक की नकल कर सकें, जिससे यूजर्स को ऐसा महसूस हो कि उनका रिश्ता अब भी खत्म नहीं हुआ है। इस ट्रेंड में लोग खास AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जहां वे अपने एक्स पार्टनर की चैट हिस्ट्री, फोटो, सोशल मीडिया पोस्ट और निजी यादों को अपलोड करते हैं। इसके बाद सिस्टम एक वर्चुअल मॉडल तैयार करता है, जो उसी व्यक्ति की तरह जवाब देता है। कई यूजर्स इसमें अपनी पुरानी यादें, घूमने-फिरने के अनुभव और रिश्ते की खास बातें जोड़कर इसे और ज्यादा “रियल” बनाने की कोशिश करते हैं। इस तकनीक की जड़ें Colleague.skill जैसे ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट से जुड़ी मानी जा रही हैं, जिसे मूल रूप से कार्यस्थल की बातचीत को दोबारा उपयोग करने के लिए बनाया गया था। बाद में इसे निजी रिश्तों में अपनाया जाने लगा। कुछ लोगों ने प्रयोग के तौर पर Elon Musk और Steve Jobs जैसे प्रसिद्ध व्यक्तियों के AI वर्जन भी बनाए। जहां कुछ लोग इसे भावनात्मक राहत का जरिया मान रहे हैं कहते हैं कि इससे वे अपने अधूरे जज्बात व्यक्त कर पाते हैं वहीं कई विशेषज्ञ इसे खतरनाक ट्रेंड मान रहे हैं। उनका तर्क है कि यह लोगों को वास्तविकता से दूर कर सकता है और पुराने रिश्तों में उलझाकर आगे बढ़ने से रोक सकता है। सबसे बड़ी चिंता प्राइवेसी को लेकर है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बिना अनुमति किसी व्यक्ति के डेटा का इस्तेमाल कर उसका डिजिटल अवतार बनाना कानून का उल्लंघन हो सकता है। इससे न सिर्फ व्यक्तिगत अधिकार प्रभावित होते हैं, बल्कि डेटा सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं